Friday, May 31, 2024

#ज्योतिष परामर्श

प्रिय आत्मन् 
कोई भी प्रश्न कर्ता जब तक किसी भी मान्यता में बंधा हुआ है तो हो सकता है की  वह सही तथ्य तक ना पहुंच पाए ।

उपयोगिता के आधार पर किस की बात मानने योग्य है  

१- सद्गुरु - इन्हें अनुभव आधारित ज्ञान प्राप्त होता है, इनकी बात मानने से हमें कोई भी भौतिक लाभ नहीं  होता है । इनकी बात मानने से सिर्फ आत्म कल्याण होता है ।

२- गुरु - इन्हें अनुभव आधारित ज्ञान प्राप्त होता है, इनकी बात मानने से हमें ८१% से ९८% लाभ होता है ।

३- विशेषज्ञ - इन्हें अनुभव आधारित ज्ञान प्राप्त होता है, इनकी बात मानने से हमें ४१% से ८०% लाभ होता है।

४- सामाजिक लोग - इन्हें अनुभव आधारित ज्ञान प्राप्त होता है, इनकी बात मानने से हमें ३०% से ४०% लाभ होता है।

५- मनमानी - केवल सुनी सुनाई बातों को आधार मानकर मनमानी किया गया कार्य हमारे पतन का मार्ग खोलता है।

👉किसी भी प्रकार का ज्योतिष परामर्श लेने से पहले कुछ बिंदुओं पर अवश्य ध्यान दें । 

१- क्या आपको ज्योतिष , वास्तु ,अथवा मुहूर्त शास्त्र का प्रारंभिक ज्ञान है ?

- क्या आप जीवन के प्रत्येक शुभ कार्यों में मुहूर्त का विशेष ध्यान रखते हैं ? या फिर अपनी सुविधा अनुसार कार्य करते हैं,

३- क्या आप जानते हैं कि ज्योतिष अथवा मुहूर्त शास्त्र किस सिद्धांत पर कार्य करता है ?

४- क्या आप जानते हैं कि जो लोग ज्योतिष, वास्तु , मुहूर्त के अनुसार कार्य करते हैं उन्हें क्या लाभ होता है ?

५- क्या आप जानते हैं कि जो लोग ज्योतिष, वास्तु ,मुहूर्त के अनुसार कार्य नहीं करते उन्हें क्या हानि होती है ?

आइये कुछ प्रश्नोत्तरी के माध्यम से समझते हैं कि ज्योतिष अथवा मुहूर्त शास्त्र से मानव जाति को क्या लाभ है 

१- ज्योतिष क्या है ?
ज्योति का अर्थ होता है प्रकाश और ज्योतिष का अर्थ होता है ज्योति पिंडों का अध्ययन। ज्योतिष शास्त्र का अर्थ प्रकाश वाले पिंडों की गतिविधियों को बताने वाला शास्त्र। इसमें मुख्य रूप से ग्रह, नक्षत्र आदि के स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति संबधित घटनाओं का निरूपण एवं शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है |

२- ज्योतिष में जन्म समय जन्म स्थान का क्या महत्व है ?
व्यक्ति के जन्म का जन्म स्थान और जन्म समय यह बिंदु दर्शाता है कि जीवात्मा किन कर्मबीजों,प्रारब्धों व संस्कारों को लेकर किन और कैसे उर्जा -प्रवाहों के मिलन बिंदु के साथ जन्मी है | जन्म का क्षण इस विराट ब्राह्मंड में व्यक्ति को व उसके जीवन को एक विशेष स्थान देता है । यह कालचक्र में ऐसा स्थान होता है जो सदा अपरिवर्तनीय है और इनके मिलन के क्रम के अनुरूप ही सृष्टि, व्यक्ति, जंतु, वनस्पति, पदार्थ, घटनाक्रम इत्यादि जन्म लेते हैं इसी क्रम में उनका विलय-विर्सजन भी होता है । 

३- वास्तु शास्त्र क्या है ?

ज्योतिष शास्त्र की तरह वास्तु शास्त्र का ज्ञान भी हमारे ऋषि मुनियों की देन है । किसी भी प्रकार के भवन, दुकान, कोठी, फ्लैट आदि निर्माण में पांचो तत्वों का विशेष ध्यान रखा जाता है।अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल एवं आकाश‘। इन पांचो तत्वों का दिशाओं के अनुसार समन्वय करना ही वैज्ञानिक रूप से ‘वास्तु‘ कहलाता है।

४- मुहूर्त क्या है ?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी कार्य को आरम्भ करने की "शुभ घड़ी" को कहने मुहूर्त कहते हैं। एक मुहूर्त लगभग दो घड़ी के या 48 मिनट के बराबर होता है।

५- सही मुहूर्त में काम क्यों आवश्यक है ? 
सही मुहूर्त चुनने से काम ब्रह्मांडीय प्रवाह के साथ जुड़ जाता है, जिससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है और बाधाएं कम हो जाती हैं ।

६- एक दिन में कितने मुहूर्त होते हैं ?
सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक के समय को एक दिन माना जाता है, जोकि 24 घंटे का होता है. एक दिन में 30 मुहूर्त होते हैं और हर मुहूर्त 48 मिनट का होता है. 

७- शुभ और अशुभ मुहूर्त का ज्ञान कैसे होता है ?
९ ग्रहों की २७ नक्षत्र के अंतर्गत चाल से इन मुहूर्त में शुभ और अशुभ योग का निर्माण होता है ! इसलिए कहा जाता है कि, शुभ मुहूर्त में ही किए कामों से व्यक्ति को सफलता मिलती है ।

८- जो ज्योतिष, वास्तु , मुहूर्त अनुसार कार्य करते हैं उन्हें क्या लाभ है ?
इनके अनुसार काम करके हम एक संभावना पैदा करते हैं की प्रकृति के प्रवाह से जुड़ सके, क्योंकि प्रकृति परमात्मा से जुड़ी है, इस प्रकार हम नियमों का पालन करके परमात्मा से जुड़ सकते हैं ।

९- जो ज्योतिष, वास्तु ,मुहूर्त अनुसार काम नहीं करते अर्थात मनमानी काम करते हैं उन्हें क्या हानि है ?
ऐसे लोग नियति द्वारा स्वचालित हैं और अपने प्रारब्ध की ओर आगे बढ़ रहे हैं , मनमानी किया हुआ कार्य हमें हमारे प्रारब्ध तक पहुंचना है । 

१०- मुहूर्त की सटीक जानकारी कहां से प्राप्त करें  ?
पारंपरिक पंडित जी से इस बारे में सटीक जानकारी मिल सकती है ,जो पत्रा और जंत्री अपने पास रखते हो । या फिर
गूगल पर बहुत सी प्रमाणिक साइट उपलब्ध हैं जहां  इसका सटीक विवरण मिल जाता है ।
👉 Please copy and open this link- https://www.mpanchang.com/muhurat/choghadiya/

११- पुण्य का नाश क्यों करती है ब्रह्म मुहूर्त की निद्रा ?
सफलता के लिए ब्रह्म मुहूर्त के महत्व को समझना जरूरी है. इसे शुभ मुहूर्त माना गया है, जिसमें किए गए कामों से सफलता मिलती है. मान्यता है कि इस समय वायु में अमृत धारा प्रवाहित होती है ।

१२- ज्योतिष अक्सर विफल क्यों हो जाता है ? क्या मुझे अब भी इस पर विश्वास करना चाहिए ?
ज्योतिष अपने आप में शुद्ध है। समस्या अभ्यासकर्ताओं के साथ है , वे आम तौर पर वेदों से अलग होकर ज्योतिष का अभ्यास करते हैं , जो मेरे  दृष्टिकोण में सबसे बड़ा दोष है। ज्योतिष का मतलब भविष्यवाणी करना नहीं है, बल्कि उन संभावनाओं के बारे में बताना है कि कौन सा कर्म किस विधि से किया जाए कि हमें शुभ परिणाम की प्राप्ति हो और किस कर्म को करने के लिए हम कितने स्वतंत्र हैं ।

ध्यान दें कि यदि आपने हमारे द्वारा आयोजित शुद्धिकरण कार्यक्रम नहीं किया है तो हो सकता है कि आप को हमारे द्वारा  बताई गई जानकारी से आपकी आशा के अनुसार लाभ न हो ।

अपना कीमती समय निकाल कर लेख पढ़ने के लिए 
बहुत -बहुत धन्यवाद । 🙏

👉 शुद्धिकरण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आवेदन करें । इसमें यदि आपको 50% या उससे अधिक अंक प्राप्त होते हैं तो कार्यक्रम के नियम अनुसार आप शामिल हो सकते हैं । 

👉आवेदन करें 
👉 Please Copy and open this link 
https://quizzory.in/id/6644a46367ec9f79d80432ff

👉हमारी सशुल्क सेवाएं  - यह सेवाएं केवल उनके लिए जिन्होंने हमारे कार्यक्रम किए हैं ।

👉ज्योतिष परामर्श हेतु दी गई लिंक पर क्लिक करें ।
👉 Please Copy and open this Link -
 https://guruplusmerafree.blogspot.com/2021/08/blog-post.html

👉विवाह हेतु ज्योतिष परामर्श के लिए दी गई लिंक पर क्लिक करे ।
👉 Please Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_15.html

Wednesday, May 29, 2024

मूल ज्ञान

१- मूल ज्ञान क्या है ? 
 आत्मज्ञान ही मूल ज्ञान है इस बिंदु पर आकर सभी प्रकार के ज्ञान का अंत हो जाता है , क्योंकि इससे आगे ज्ञान ही सार है, और विस्तृत ज्ञान का उद्देश्य अज्ञान को दूर करके साधक को इस अद्वैत अवस्था में स्थित करना है। 

 २- मूल ज्ञान क्यों आवश्यक है ? 
मूल ज्ञान आवश्यक है क्योंकि यह अस्तित्व की मिथ्या प्रकृति और स्वयं की वास्तविकता को उजागर करता है। यह अज्ञान को दूर करता है, जो हमारी सभी पीड़ाओं और दुखों का मूल कारण है। मूल ज्ञान हमें अद्वैत अवस्था में स्थापित करता है, जहां हम अपने सच्चे स्वरूप को समझते हैं और भ्रम और अलगाव से मुक्त हो जाते हैं। 

 ३- मूल ज्ञान प्राप्त करने से क्या लाभ है ? 
 मूल ज्ञान अज्ञान को दूर करता है, जो हमारी सभी पीड़ाओं और दुखों का मूल कारण है। यह हमें इस समझ की ओर ले जाता है कि अस्तित्व मिथ्या है और हम सभी एक हैं। अद्वैत अवस्था में स्थापन: मूल ज्ञान हमें अद्वैत अवस्था में स्थापित करता है, जहां हम अपने सच्चे स्वरूप को समझते हैं और भ्रम और अलगाव से मुक्त हो जाते हैं। हम समझते हैं कि हम ब्रह्म हैं, और हमारी कोई अलग पहचान नहीं है। मानवीय कष्ट से मुक्ति: मूल ज्ञान हमें मानवीय कष्ट से मुक्त करता है, जैसे चिंता, भय और क्रोध। ये भावनाएँ भ्रम और अलगाव की हमारी गलत समझ से उत्पन्न होती हैं। मूल ज्ञान के माध्यम से, हम इन भावनाओं की प्रकृति को समझते हैं और उनसे परे जाते हैं। आध्यात्मिक विकास: मूल ज्ञान आध्यात्मिक विकास का आधार है। यह हमें सत्य को समझने और अपने सच्चे स्वरूप को महसूस करने की अनुमति देता है। यह हमें हमारे आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने और अंततः आत्मज्ञान की प्राप्ति की ओर ले जाता है।

पूर्ण ज्ञान

हमारे पास अक्सर लोग इस समस्या को लेकर आते हैं कि कोई ढंग का गुरु नहीं मिलता ।
यहां एक बात समझना अनिवार्य है कि गुरु और शिष्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक योग्य शिष्य को ही योग्य गुरु प्राप्त होते हैं और एक युग गुरु ही योग्य शिष्यों का निर्माण करता है , अतः हम में जब तक एक योग्य शिष्य के गुण विकसित नहीं होते तब तक हमें योग्य गुरु नहीं मिलेगा ।

१- पूर्ण ज्ञान क्या है ? 
जिस ज्ञान के बाद कुछ और जानने की आवश्यकता और आकांक्षा शेष नही रह जाती, पूर्ण ज्ञान कहलाता है।

२- किसी भी विषय का पूर्ण ज्ञान कैसे होगा  ?
सबसे पहले विषय से संबंधित पूरी जानकारी एकत्रित करें । फिर उसे प्रयोग द्वारा अनुभव में लायें । जब विषय से संबंधित जैसा विवरण मिला वैसे ही अनुभूति हो जायें तो समझिए कि पूर्ण ज्ञान हो गया है । जैसा की अपरोक्त चित्र में आम का उदाहरण दिया गया है ।

३- पूरी जानकारी कैसे प्राप्त करें ? 
इसके लिए हम प्रश्न शास्त्र की सहायता ले सकते हैं ! 

४- प्रश्न शास्त्र क्या है ? 
प्रश्न शास्त्र एक ऐसा शास्त्र है जिसमें प्रश्नों का वर्गीकरण किया गया है, साथ ही इसमें यह भी विस्तार से समझाया गया है कि प्रश्नो का उपयोग करके हम किसी भी विषय की पूरी जानकारी कैसे प्राप्त कर सकते हैं ।

५- प्रश्न शास्त्र कहां से प्राप्त करें ?
किसी भी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास से । यदि उनकी कृपा हुई तो सब संभव है ।

६- प्रश्न कैसे पूछे ?
किसी से भी कोई भी प्रश्न पूछने या मार्गदर्शन प्राप्त करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि मुझे मार्गदर्शन ( ज्ञान ) चाहिए या जानकारी । किसी से भी मार्गदर्शन लेने से पूर्व कुछ बातें अवश्य ध्यान रखें  ! जैसे - आपका उस व्यक्ति से गुरु शिष्य या प्रेम, विश्वास ,श्रद्धा ,भक्ति के आधार पर संबंध स्थापित होना चाहिए । वह व्यक्ति आपके मार्ग का हो अर्थात आपके गुण और विचार उससे मिलना चाहिए । आपको चाहिए कि आप सामने वाले व्यक्ति की बातों पर पूर्ण विश्वास करते हो और उनका दृढ़ता से पालन करने की इच्छा रखते हो । तभी हमारे जीवन में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे । अन्यथा सिर्फ जानकारी के लिए हम सबके पास गूगल बाबा है , वहां  आपको हर प्रकार की जानकारी मिल जाएगी । 

उपयोगिता के आधार पर किस की बात मानने योग्य है  

१- सद्गुरु - इन्हें अनुभव आधारित ज्ञान प्राप्त होता है, इनकी बात मानने से हमें कोई भी भौतिक लाभ नहीं  होता है । इनकी बात मानने से सिर्फ आत्म कल्याण होता है ।

२- गुरु - इन्हें अनुभव आधारित ज्ञान प्राप्त होता है, इनकी बात मानने से हमें ८१% से ९८% लाभ होता है ।

३- विशेषज्ञ - इन्हें अनुभव आधारित ज्ञान प्राप्त होता है, इनकी बात मानने से हमें ४१% से ८०% लाभ होता है।

४- सामाजिक लोग - इन्हें अनुभव आधारित ज्ञान प्राप्त होता है, इनकी बात मानने से हमें ३०% से ४०% लाभ होता है।

५- मनमानी - केवल सुनी सुनाई बातों को आधार मानकर मनमानी किया गया कार्य हमारे पतन का मार्ग खोलता है।

🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃

Tuesday, May 28, 2024

संधिकाल

१- संधि काल क्या है ?
दो अवस्थाओं के मिलने का समय संधि काल होता है। जैसे-  प्रात: काल और संध्याकाल ।

२- संधिकाल कितने प्रकार के होते हैं ?
दिन और रात मिलाकर 8 प्रकार की संधि होती है जिसे अष्ट प्रहर कहते हैं। एक प्रहर एक घटी 24 मिनट की होता है। दिन के चार और रात के चार प्रहर मिलाकर कुल आठ प्रहर हुए। 

३- संधिकाल विस्तार से -

दिन के चार प्रहर- पूर्वान्ह, मध्यान्ह, अपरान्ह और सायंकाल।

रात के चार प्रहर- प्रदोष, निशिथ, त्रियामा एवं उषा।

1. पूर्वान्ह (6 बजे से 9 बजे तक),

2. मध्यान्ह (9 बजे से 12 बजे तक),

3. अपरान्ह (12 बजे से 3 बजे तक),

4. सायंकाल (3 बजे से 6 बजे तक),

5. प्रदोष (6 बजे से 9 बजे तक),

6. निशीथ (9 बजे से 12 बजे तक),

7. त्रियामा (12 बजे से 3 बजे तक) एवं

8. उषाकाल (3 बजे से 6 बजे तक)

- दो तिथियों के बीच के समय को संधिकाल कहते हैं।
 
- इसके अलावा दो पक्ष के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं जैसे अमावस्या और पूर्णिमा।
 
- दो माह के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
 
- दो ऋतु्तों के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
 
- दो अनयों अर्थात उत्तरायण और दक्षिणायन के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
 
- दो संवत्सर के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं। 
 
- दो युग के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
 
- जन्म और मृत्यु और मृत्यु और जन्म के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
 
- दो श्वासों के बीच जो अंतराल है उसे भी संधिकाल कहते हैं।

४- पहर की गणना कैसे करें ?
सूर्योदय के समय दिन का पहला प्रहर प्रारंभ होता है जिसे पूर्वान्ह कहा जाता है। दिन का दूसरा प्रहर जब सूरज सिर पर आ जाता है तब तक रहता है जिसे मध्याह्न कहते हैं। इसके बाद अपरान्ह (दोपहर बाद) का समय शुरू होता है, जो लगभग 4 बजे तक चलता है। 4 बजे बाद दिन अस्त तक सायंकाल चलता है। इसी प्रकार क्रमश: प्रदोष, निशिथ एवं उषा काल। सायंकाल के बाद ही प्रार्थना करना चाहिए।

५- संधिकाल के नियम मानना क्यों आवश्यकहै ?
जिस प्रकार दो ऋतुओं, दो मौसमों के संधिकाल में प्रकृति विचलित हो जाती है ठीक उसी प्रकार दो प्रहरों के संधिकाल में हमारा मन, मस्तिष्क भी कुछ अनबैलेंस हो जाता है। इसलिए उस समय लिया गया निर्णय फलीभूत नहीं होता। 

६- संधि काल में करने योग्य कार्य ?
सूर्य उदय और अस्त के समय संध्या वंदन की जाती है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि आदि से निवृत होकर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना एवं नाम जप करें ।

७- संधि काल में निषिद्ध कार्य ?
संध्या काल में शनि, राहु और केतु के साथ ही शिव के गण सक्रिय रहते हैं, संध्याकालीन नियम न मानने से जहां एक ओर बरकत चली जाती है वहीं व्यक्ति कई तरह के संकटों से घिर जाता है। अतः हम सभी को संध्याकालीन नियमों का पालन आवश्यक रूप से करना चाहिए ।
1.सोना ,2.सहवास करना , 3.खाना-पीना ,4.यात्रा करना
5.असत्य बोलना 6.क्रोध करना ,7.शाप देना ,8.झगड़े करना
9.गालियां देना या अभद्र बोलना , 10.शपथ लेना
11.धन लेना या देना, 12.रोना या जोर-जोर से हंसना
13.वेद मंत्रों का पाठ करना , 14.कोई शुभ कार्य करना
15.चौखट पर खड़े होना ।

८- संधिकल और संध्या काल में क्या अंतर है ?
संधिकाल व संध्याकाल काफी अंतर है, संध्याकाल संधिकाल का एक प्रहर या प्रकार है, जिसमें ईश्वर की उपासना विशेष लाभदायी मानी जाती है , जबकि संधिकाल दो प्रहर, के मिलन के समय को कहते हैं, जैसे रात व सुबह, के मिलन का समय संधिकाल कहते है ।

संध्या वंदन कितने प्रकार से कर सकते हैं ?
श्रद्धालु भक्त भगवत प्राप्ति के अपने तय मार्ग व श्रद्धा के अनुसार संध्या वंदन पांच प्रकार से किया जा सकता है, जिनमें प्रार्थना, पूजा-आरती, ध्यान, हवन व कीर्तन शामिल है ।

१०संध्या उपासना कैसे करें ?
कोई खाद्य वस्तु खाए बिना स्नान कर या हाथ पैर धोकर गाय के घी का दीपक जलाएं. इसके बाद गायत्री मंत्र का जाप करें. फिर अपने गुरु या स्थायी रूप से जपने वाले मंत्र का जाप कर तेल या घी का दीपक जलाकर आरती करें. फिर धूप या आरती को पूरे घर में घुमाएं. भगवान को भोग लगाने के बाद ही रात्रिकालीन भोजन करें.

११संध्या वंदन कहां करें ?
संध्या पूजा घर में भी की जा सकती है, पर ऋषि आख्यानों के अनुसार, घर के मुकाबले गायों के स्थान पर संध्या वंदन का सौ गुना, नदी किनारे लाख गुना तथा शिव स्थान पर अनंत गुना फल मिलता है.

१२- जो संधि काल अनुसार कार्य करते हैं उन्हें क्या लाभ है ?
संधि काल अनुसार काम करके हम एक संभावना पैदा करते हैं की प्रकृति के प्रवाह से जुड़ सके, क्योंकि प्रकृति परमात्मा से जुड़ी है, इस प्रकार हम नियमों का पालन करके परमात्मा से जुड़ सकते हैं ।

१३- जो संधि काल अनुसार काम नहीं करते अर्थात मनमानी काम करते हैं उन्हें क्या हानि है ?
ऐसे लोग नियति द्वारा स्वचालित हैं और अपने प्रारब्ध की ओर आगे बढ़ रहे हैं , मनमानी किया हुआ कार्य हमें हमारे प्रारब्ध तक पहुंचना है । 

Sunday, May 26, 2024

बुद्धि का स्तर कैसे ज्ञात करें

👉 अपनी बुद्धि का स्तर स्वयं जांचे
🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃
१- मंदबुद्धि - किसी भी विषय को समझने और विश्लेषण करने की क्षमता ना होना ।

२- जड़ बुद्धि - अपनी ही मानसिकता में रहना , अपनी भौतिक लालसाओं को ही महत्व देना, एवं किसी भी नई विचारधारा को समझने के लिए तैयार न होना । जैसे- दुर्योधन 

३- दृढ़ बुद्धि - सही गलत का ज्ञान होते हुए भी आसक्ती वस उनका साथ देना जो पतन के रास्ते पर चल रहे हैं । जैसे- कर्ण 

४- जिज्ञासु बुद्धि - स्वयं के पूर्ण विकास के लिए जहां तक संभव हो वहां तक ज्ञान ग्रहण करना । जैसे - अर्जुन 

५- प्रज्ञा बुद्धि - सृष्टि के उत्थान और उसमें आई विकृति को हटाने के लिए जो भी अनिवार्य हो आवश्यकता अनुसार निर्णय लेकर कर्म करना । जैसे - कृष्ण

Thursday, May 23, 2024

नैतिक शिक्षा

१- नैतिक शिक्षा क्या हैं ? 
नैतिक शिक्षा को समझने के लिए सबसे पहले आपको नैतिक शब्द का अर्थ पता होना चाहिए। नैतिक या नैतिकता का अर्थ वह अच्छा व्यवहार या कर्तव्य जिसकी हम हमेशा दुसरो से अपेक्षा करते है। अगर हम यह चाहते है की हमारे साथ सब लोग अच्छे से अच्छा व्यवहार करे उसके लिए सबसे पहले आपको बदलना होना। जब आप दुसरो के साथ अच्छा व्यवहार करना शुरू करते है कुछ समय बाद आपके साथ भी अच्छा व्यवहार होने लगता है। इस तरह के अच्छे व्यवहार या कर्म का समाज में आदान प्रदान नैतिकता कहलाता है। 

२- नैतिकता के मुख्य मूल तत्व कौन-कौन से है ?
  • बुद्धिमत्ता
  • ईमानदारी
  • सत्य को अपनाना
  • संवेदनशीलता
  • निस्वार्थ क्षमा
  • निष्काम कर्म
  • निस्वार्थ दान
  • निस्वार्थ सहायता आदि है। 

नैतिकता को समझने के लिए हमारे पूर्वजो और ऋषियों द्वारा नीतिशास्त्र का निर्माण और उसपर जोर दिया जाता रहा है। 

अगर हम अपने बच्चो को अच्छा इंसान बनाना चाहते है। तो इसके लिए उन्हें नैतिक कर्तव्य का ज्ञान होना अति आवश्यक है। ऐसा संभव नहीं है की आप बच्चो को दुसरो के लिए बुरा बनाये और वो आपके लिए अच्छे रहे। इसलिए नैतिकता इस मानव जीवन का अभिन्न अंग है। अगर किसी व्यक्ति में नैतिकता न हो वो व्यक्ति निश्चित ही चोर, दम्भी, अहंकारी, बलात्कारी, कपटी इंसान बनेगा। जिसे हम अनैतिक व्यक्ति कहते है।  ऐसे लोगो का पतन निश्चित होता है। इन लोगो को समाज की तो छोडो परिवार के लोग भी साथ नहीं देते। 

३- नैतिक शिक्षा की आवश्यकता क्यों है ?

नैतिक शिक्षा व्यक्ति के चरित्र-निर्माण का एक माध्यम है क्योंकि चरित्र ही मनुष्य के जीवन का मूल आधार है। इसलिए चरित्र की रक्षा करना नैतिक शिक्षा का मूल उद्देश्य है। नैतिक शिक्षा को स्वीकार किए बिना मनुष्य जीवन में वास्तविक सफलता तक नहीं पहुँच सकता।

४- आज की शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों पर जोर क्यों नहीं दिया जाता ?
नैतिकता किसी भी समाज या देश का मुख्य आधार होता है। जब मनुष्य अंदर से मृत हो जाता है , तब समाज में नैतिकता का पतन हो जाता है।

आज हर तरफ लोग बस इसी कोशिश में लगे हैं कि सामने वाले को कैसे लुटा जाए, नीचा दिखाया जाए, जलील किया जाए। 

प्यार, मोहब्बत, बड़ों का आदर, किसी जरूरतमंद की मदद ये सब समाज से गायब हो चूका है। जब समाज ही अनैतिक हो गया है तो शिक्षा में नैतिक कैसे रहेगा।

५- शिक्षा वयवस्था में नैतिक मूल्य क्यों नहीं है :

भारत में शिक्षा आज व्यवसायीकरण हो गया है। आज बच्चे न गुरु की इज्जत करते हैं और न गुरु बच्चे को शिष्य समझते हैं। आज का शिक्षक स्कूल में कम पढ़ाता है ताकि बच्चे उसके ट्यूशन join कर सके।
भारत शिक्षा वयवस्था का दुर्भाय यह है कि सिलेबस से नैतिक शिक्षा को ही हटा दिया।
इंडोनेशिया मुस्लिम देश है फिर भी वहां भगवत गीता पढ़ाया जाता है
जापान में बच्चे अपने स्कूल की सफाई खुद करते हैं। भारत में गलती से अगर कोई स्कूल में शिक्षक बच्चों से स्कूल की सफाई करवा ले, माता पिता खुद शिक्षकों की क्लास ले लेंगे
इस देश में शिक्षा और नैतिकता दोनों का स्तर बहुत गिर गया है

६- नैतिक मूल्यों का हमारे जीवन में क्या महत्व है ?

नैतिकता का सम्बंध मानव जीवन की अभिव्यक्ति से हैं। मानव जीवन में नैतिक मूल्यों की आवश्यकता, महत्त्व अनिवार्यता व अपरिहार्यता जरुरी हैं, ताकि वह अपने परिवार के साथ -साथ सामाजिक और देश के प्रति दायित्व को भी निभा सके। नैतिकता सामाजिक जीवन को सुगम एवं विस्तृत बनाती हैं । सनातन धर्म के वैदिक मन्त्रों में नैतिकता को विशेष महत्व दिया जाता हैं ।

७- नैतिक शिक्षा से हमें क्या सीख मिलती है ?
वर्तमान परिवेश में बच्चों को उच्च शिक्षा तो दी जा रही है, लेकिन उनकी नैतिक शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। नैतिक शिक्षा बच्चों को न सिर्फ संस्कारवान बनाता है, बल्कि उन्हें अनुशासित जीवन जीने की सीख भी देता है। जो उसके समुचित विकास के लिए जरूरी है।

८- नैतिक शिक्षा प्रदान करने के लिए सबसे उत्तम साधन कौन-कौन से है ?
नैतिक शिक्षा के लिए सबसे उत्तम साधन योगवासिष्ठ , विवेक चूड़ामणि और कर्मयोग इत्यादि ग्रंथ शामिल है।

नैतिकता से लाभ 

नैतिक मूल्य बच्चे के पालन-पोषण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाने से उन्हें जिम्मेदार और दयालु वयस्क बनने में मदद मिल सकती है। 

हालाँकि, कई माता-पिता इस बात से अवगत नहीं हैं कि बच्चे नैतिक मूल्यों से क्या सीख सकते हैं। इसलिए, हम बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाने के कुछ सबसे महत्वपूर्ण लाभों का पता लगाएंगे , जो उन्हें सफल और पूर्ण जीवन जीने में मदद करते हैं।

-उन्हें सही और गलत की मजबूत समझ विकसित करने में मदद करना

 बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाने से उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझने में मदद मिलेगी। इससे उन्हें बेहतर विकल्प चुनने और ऐसी गलतियाँ करने से बचने में मदद मिलेगी जिनके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

 -उन्हें जिम्मेदार बनना सिखाएं

 बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाने का सबसे महत्वपूर्ण लाभ उन्हें अधिक जिम्मेदार वयस्क बनने में मदद करेगा। जिम्मेदारी एक महत्वपूर्ण मूल्य है जिसे बच्चों को छोटी उम्र से ही सिखाया जाना चाहिए।

 -उन्हें सहानुभूति विकसित करने में मदद करना

सहानुभूति एक और महत्वपूर्ण नैतिक मूल्य है जो माता-पिता को अपने बच्चों को सिखाना चाहिए । सहानुभूति दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को समझने और साझा करने की क्षमता है। यह एक मूल्यवान कौशल है जो उन्हें व्यक्तिगत संबंधों से लेकर काम तक, उनके जीवन के सभी पहलुओं में मदद करेगा।

-दूसरों के प्रति सम्मान विकसित करने में उनकी मदद करना

 सम्मान एक और महत्वपूर्ण नैतिक मूल्य है जो सभी माता-पिता को अपने बच्चों को सिखाना चाहिए। दूसरों का सम्मान करने में उनके साथ दयालुता और विचारपूर्वक व्यवहार करना और उनकी राय और भावनाओं को महत्व देना शामिल है।

-उन्हें आत्म-मूल्य की भावना विकसित करने में मदद करना

आत्म-मूल्य की भावना एक महत्वपूर्ण कौशल है जो सभी माता-पिता को अपने बच्चों को सिखाना चाहिए। यह मूल्य बच्चों को यह समझने में मदद करता है कि वे मूल्यवान हैं और प्यार और सम्मान के पात्र हैं।

-उन्हें स्वतंत्र विचारक बनने में मदद करना 

बच्चों को नैतिकता और मूल्य सिखाने का एक और सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इससे उन्हें स्वतंत्र विचारक बनने में मदद मिलेगी। यह नैतिक मूल्य बच्चों को अपने बारे में सोचने और स्वयं निर्णय लेने में मदद करता है।

-उन्हें जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करना

जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण कौशल है जो सभी माता-पिता को अपने बच्चों को सिखाना चाहिए। इससे बच्चों को लोगों और परिस्थितियों में अच्छाई देखने और जीवन में सुंदरता की सराहना करने में मदद मिलती है।

 -उनमें चरित्र की मजबूत भावना विकसित करने में मदद करना

चरित्र की मजबूत समझ एक ऐसा कौशल है जो सभी माता-पिता को अपने बच्चों को जल्दी सिखाना चाहिए। यह कौशल बच्चों को स्वयं के प्रति सच्चा होने और वे जिस चीज़ में

 विश्वास करते हैं उसके लिए खड़े होने में मदद करता है। 

-उन्हें वैश्विक नागरिक बनने में मदद करना

बच्चों को नैतिकता और मूल्य सिखाने से उन्हें वैश्विक नागरिक बनने में मदद मिल सकती है। इससे उन्हें सभी लोगों के परस्पर जुड़ाव और दुनिया को सभी के लिए एक बेहतर जगह बनाने के लिए मिलकर काम करने के महत्व को समझने में मदद मिल सकती है।

 

-उन्हें सीखने के प्रति प्रेम विकसित करने में मदद करना

सीखने के प्रति प्रेम एक और महत्वपूर्ण नैतिक मूल्य है जो सभी माता-पिता को अपने बच्चों को सिखाना चाहिए। इससे बच्चों को जिज्ञासु और खुले विचारों वाला बनने और आजीवन सीखने के लिए प्रेरित होने में मदद मिलती है।

९- नैतिक संकट क्यों पैदा होता है ?

- ज्ञान का अभाव : सही और गलत को ना समझना अथवा गलत कार्यों को भी अपने स्वार्थ बुद्धि से सही मानकर अनैतिक, अनुचित कार्यों को करना तथा समर्थन देना कभी परंपराओं के नाम पर तो कभी रीति-रिवाज के नाम पर जैसे सती प्रथा जैसी कुरीति का पालन उस समय लोग अज्ञानतावश इस धारणा से करते रहे कि वह सामाजिक परंपराओं का पालन कर रहे हैं परंतु वह मात्र अज्ञानता के अतिरिक्त कुछ नहीं था। जैसे ही कुछ विलान, चिंतकों, समाज सुधारकों ने इस और प्रयास कर लोगों में चेतना जगाई और समाज से ऐसी कुरीतियां समाप्त हुईं अर्थात सही गलत के अंतर को ना पहचाना व भेड़ चाल चलना भी समाज के लिए हानिकारक होता है

-धार्मिक कट्टरता : समाज में विशेष धर्म के प्रति कट्टरता के कारण अनैतिक कार्यों व धारणा को नैतिक मानकर स्वयं अनुचित कार्य करना व दूसरों को अनुचित कार्य व्यवहार के लिए उकसाना भी समाज को क्षति पहुंचाता है ।

-अनैतिक आचरण में रुचि : अधिकतर मनुष्यों को सही गलत का ज्ञान तो होता है किंतु अनैतिक अनुचित आचरण कार्य व्यवहार में स्वत: रुचि होने के कारण मनुष्य जानते हुए भी गलत कार्यों को ही करना पसंद करता है। गलत कार्यों का ही चयन करता है। जैसे : दुर्योधन, उसे सही गलत का ज्ञान तो होता था किंतु गलत कार्यों में रुचि व जिद्द के कारण वह अनुचित कार्यों ही करता था।

गुरु शरणं गच्छामि:

प्रिय आत्मन्  

"शिक्षा" - अशिक्षित व्यक्ति हर जगह विकृति फैलाता है अतःजीवन में शिक्षा का महत्व आप सबसे छिपा नहीं है। किन्तु वर्तमान समय मे शिक्षा की ऐसी कोई पद्धति नही है जिससे व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास हो सके । 

वर्तमान मे जो शिक्षा व्यवस्था है वह केवल व्यक्ति के बौद्धिक विकास को ही लक्ष्य लेकर चल रही है, जिसके दुष्परिणाम वर्तमान मे हम सब को भुगतने पड़ रहे है ! 

क्या आप यह मेहसूस करते हैं कि आपके आस - पास के लोग या बच्चे आवश्यकता से अधिक तार्किक हो गये है। 

वर्तमान शिक्षा पद्धति व्यक्ति के चरित्र निर्माण में असफल है !  यह केवल व्यक्ति को भौतिक बादकी ओर ही धकेल रही है। यहां नैतिक ज्ञान बिल्कुल ही समाप्त हो चुका है ,
इसलिये दिनो-दिन समाज की हालत खराब होती जा है। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज हम ज्ञान और कर्म के बीच संतुलन नहीं बना पा रहे।

आज समाज में लोग तमोगुणी मानसिकता के शिकार होते जा रहे है। इस कारण लोग इंद्रिय सुख तक ही सीमित हो गए हैं ! मित्थ्या ज्ञान, शिष्टाचार और संस्कार रहित जीवन, और अधिक कहना यहाँ व्यर्थ है। समझदार व्यक्ति मेरी बात जरूर समझेंगे !

तो आईये अब अपने मुख्य विषय पर आते हैं। 
- क्या कोई ऐसा स्थान होना चाहिये ? जहाँ व्यक्ति संस्कार और जिम्मेवारी सीख सके ? 
- क्या कोई ऐसा स्थान होना चाहिये ? जहाँ व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास हो सके ?

- क्या कोई ऐसा विद्यालय होना चाहिये ? जहाँ बौद्धिक ज्ञान के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रो को ज्ञान दिया जाना चाहिये  ?

अपने जीवन में कोई भी कार्य करते रहिये किन्तु आपको यदि यह पता नहीं कि इस कार्य का उद्देश्य क्या है तो हमारा जीवन व्यर्थ है।

उपरोक्त बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए  आप सबके लिए 11 घंटे का प्रारंभिक पाठ्यक्रम उपलब्ध  है , जिसका लाभ आप घर बैठे ऑनलाइन आवेदन करके ले सकते हैं 

अच्छे गुरु प्राप्ति के लिए ईश्वर कृपा होनी चाहिए । ईश्वर कृपा के लिए निस्वार्थ कर्म करना आवश्यक है । जब भी जीवन में हम ऐसे कर्म करते हैं जिनके बदले में हम कुछ नहीं चाहते, ऐसे कार्यों से ईश्वर हमेशा प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा हम पर बनी रहती है।

👉वीडियो देखें 
👉 Please Copy and open this link 
https://youtu.be/l3ju-Nmeaa8?si=-9cmcMNzKV3Hw1lX


👉कार्यक्रम संबंधी सामान्य प्रश्न और उनके उत्तर

१- यह कार्यक्रम क्या है ? और इसका उद्देश्य क्या है ?
अपने पूर्ण विकास , सुखी और निश्चिंत जीवन जीने के लिए हमें बहुत से सूत्रों का ज्ञान होना आवश्यक है । यह कार्यक्रम आध्यात्मिक सूत्रों को समझने का बहुत ही सरल माध्यम है , और यह आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित एक व्यवस्थित पाठ्यक्रम है , जिसका मूल उद्देश्य मानव शरीर के महत्व को समझने से लेकर जीवन में सद्गुरु के महत्व को जानना और समझना है ।

२- इस कार्यक्रम की आवश्यकता क्यों है ? 
हमने देखा कि समाज में बहुत से गुरु हैं जिनके विषय भी अलग-अलग है एक आम आदमी इनमें उलझा ना जाए और सही ज्ञान प्राप्त करें । इसके लिए हमें आध्यात्मिक विषयों का प्रारंभिक ज्ञान आवश्यक है । इसी को समझने के लिए यह प्रारंभिक पाठ्यक्रम है ।

३- इस कार्यक्रम को पूर्ण करने से हमें क्या लाभ होगा ? 
यह कार्यक्रम केवल मानसिक और बौद्धिक रूप से स्पष्ट को प्राप्त करने के लिए है । किसी भी प्रकार का कोई भी भौतिक लाभ नहीं होगा । 

४- कार्यक्रम से जुड़ने की क्या योग्यता होनी चाहिए ? 
आपकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक होनी चाहिए । किसी भी विषय को विश्लेषण करने की बौद्धिक क्षमता अनिवार्य है हमारी बुद्धि इतनी विकसित होना चाहिए कि हम अपनी बात समझ सके और सत्संग या चर्चाओं में क्या बात कही जा रही है उसको समझ सके ।

५- कार्यक्रम का लाभ हम कहां से और कैसे ले सकते है ?
हमारे सभी कार्यक्रम ऑनलाइन उपलब्ध है जिनका लाभ आप आवेदन फॉर्म सबमिट करके ले सकते हैं ।

६- क्या कोई कार्यक्रम प्रयोगात्मक भी है ?
यह कार्यक्रम मात्रा आप सभी को प्रारंभिक जानकारी देने के उद्देश्य बनाया गया है ! यहां कोई प्रयोगात्मक कार्यक्रम नहीं है 

७- कार्यक्रम में शामिल होने का क्या शुल्क है ? 
नए साधकों के लिए मात्र १००१ /- रू , और जो हमारे ऑनलाइन राम नाम लेखन कार्यक्रम में शामिल हैं यदि उनके 21 लाख राम नाम लेखन या उससे ऊपर हो चुके हैं , वे सभी इस कार्यक्रम में निःशुल्क भाग ले सकते हैं ।

८- ज्ञानियों का कर्तव्य है कि सभी को निशुल्क ज्ञान बांटे, आपने कार्यक्रम में शामिल होने का शुल्क क्यों रखा है ?
यह बात पूरी तरह सही नहीं है, मूल ज्ञान तो निशुल्क ही है, यदि आपको समझ में आए तो आप सीधा ले सकते हैं। 
लेकिन हमारा अब तक का यह अनुभव रहा है कि निशुल्क ज्ञान से आज तक कोई लाभ नहीं ले पाया, इसलिए ऐसा शुल्क रखा गया जो सबके बजट में रहे । 
इसके साथ ही जो हमारे राम नाम लेखन कार्यक्रम में शामिल पुराने साधक है , वह इसमें निशुल्क भाग ले सकते हैं ।

आवेदन करने से पूर्व दी गयी प्रश्नोत्तरी को पूर्ण करना अनिवार्य है । यदि इसमें आपके 50% या 50% से अधिक नंबर आते हैं तभी आप कार्यक्रम के लिए आवेदन कर पाएंगे ।
👉 आवेदन फॉर्म भरें 
👉 Please Copy and open this link 
https://quizzory.in/id/6644a46367ec9f79d80432ff

👉यदि आपका कार्यक्रम संबंधी और कोई प्रश्न हो तो मुझे व्हाट्सएप करें । 9752420899

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर 11 घंटे का कोर्स आप सबके लिए उपलब्ध है ! 

१- मानव शरीर 
२- गृहस्थ जीवन 
३- बुद्धि 
४- नियम 
५- धर्म 
६- कर्म 
७- दुख
८-सत्संग 
९-साधक 
१०- कृपा 
११- गुरु 
यदि आपको उपरोक्त विषयों का महत्व ४ प्रश्नो ( क्या , क्यों , लाभ , हानि, ) अतर्गत ज्ञात नहीं है , तो यह पाठ्यक्रम आपके लिए उपयोगी रहेगा ।

गुरु पूर्णिमा सत्र २०२४



गुरु पूर्णिमा सत्र 2024 

👉 कार्यक्रम संबंधी आवश्यकजानकारी 
👉 Please copy and open this link 
 http://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/05/blog-post_18.html

👉 आवेदन एवं पाठ्यक्रम विवरण
👉Please copy and open this link 
http://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/05/blog-post_22.html

👉 पाठ्यक्रम
👉Please copy and open this link 
 http://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/05/blog-post_29.html

                                                          Agyey ~

👉 मूल्यांकन ( अपना समूह स्वयं चुनें )

प्रिय आत्मन् 
आपने समाज में अक्सर यह प्रचलित कहावत अवश्य सुनी होगी कि हाथ की पांचो उंगलियां बराबर नहीं होती । इसी प्रकार कोई भी नियम हर किसी को एक समान लाभ नहीं पहुंचा सकते ! अतः जब तक आप स्वयं का मूल्यांकन नहीं कर लेते तब तक कोई भी नियम ना लें ।
ध्यान दें की सबसे पहले स्वयं का मूल्यांकन अवश्य करें । जिससे आप नियम पालन का पूरा लाभ ले पाएं ।

👉प्रथम श्रेणी 
१-भोगवादी - मूर्छा में जीवन जी रहे हैं । इनके जीवन का आधार भय, मैथुन, आहार , निद्रा और इंद्रिय सुख है ।  

२- सामाजिक व्यक्ति - जीवन में कोई  स्थाई गुरु नहीं, मान्यताओं और अंधविश्वास में घिरे रहना , केवल स्वयं को सही सिद्ध करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं ।

३- नास्तिक - स्थूल शरीर के स्तर पर जीवन जी रहे हैं इनके लिए इससे आगे कुछ भी नहीं है , केवल भौतिक सुख सुविधा को ही महत्व देते हैं । इनका जीवन केवल सही और गलत के स्तर पर ही रहता है ।

४- आस्तिक - उनकी कुछ श्रेणी निम्नलिखित हैं। 
धार्मिक ,भक्त 

धार्मिक व्यक्ति - यह दो प्रकार के हैं ! कर्मकांडी, सकाम कर्मी ! यह नियम धर्म अर्थ काम मोक्ष के प्रारूप का अनुसरण करते हैं । यह लोग हमेशा पाप पुण्य के स्तर पर ही रहते हैं और स्वयं से कभी कोई पाप कर्म ना हो जाए इससे बचते हैं।  

भक्त -  यह हमेशा प्रेम भाव में रहते हैं और जिज्ञासा ,विश्वास, समर्पण ,भक्ति , प्रेम ! इस प्रारूप का अनुसरण करते हैं । 

५- अध्यात्मिक व्यक्ति - यह निष्काम कर्मी है और यह वैराग्य ,सत्य की खोज ,गुरु की प्राप्ति ,साधना उपासना और पूर्ण ज्ञान प्राप्ति । इस प्रारूप का अनुसरण करते हैं । यह सही गलत ,पाप पुण्य से ऊपर उठकर अपने लक्ष्य के प्रति अधिक संवेदनशील रहते हैं  ! और उपलब्ध सभी साधनों का उपयोग करके अपने परम लक्ष्य परमानंद को प्राप्त करते हैं ।

👉 द्वितीय श्रेणी 
आज के समय में ग्रंथ ना तो कोई पड़ता है और ना ही उन्हें समझने की किसी में क्षमता है ,इसलिए नए मानदंड जो कि वैज्ञानिक विधि से प्रस्तुत किए जा रहे हैं । जिसके अनुसार हमने इस धरती पर उपस्थित सभी लोगों को कुछ श्रेणी में बनता है

१-मूर्छित अवस्था- समाज में ज्यादातर लोग मूर्छा में ही जी रहे हैं । ऐसे लोग जीवन में अनुशासन पसंद नहीं करते ! इनके जीवन का ना तो कोई लक्ष्य है और ना ही उद्देश्य । जीवन में कोई आध्यात्मिक प्रश्न नहीं । केवल इंद्रिय सुख और भौतिक उन्नति को ही अपना विकास मानते हैं ।

२-कल्पना अवस्था- ऐसे लोग हर समय । कल्पनाओं में खोए रहते हैं जिसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं । कथा कहानी , सुनी बातों में विश्वास करते हैं । इनके जीवन में कोई तत्वदर्शी गुरु या मार्गदर्शन नहीं होता । स्वयं में बदलाव नहीं करते , सब कुछ मेरे अनुकूल हो ऐसा उनके विचार रहते हैं ,कार के गुरुओं को सुनकर जानकारी एकत्रित करते रहते हैं । और अपना जीवन मनमाने ढंग से जीते हैं । 

३- जागृत अवस्था- ऐसे लोग अपने गुरु के सानिध्य में साधना करते हैं ,और व्यवस्थित तरीके से जीवन के उच्चतम शिखर आत्मज्ञान की ओर आगे बढ़ रहे हैं ।

👉 "दुःख कष्ट, परेशानी "

भक्तों की दृष्टि से - जीवन में दुःख इसलिए आते हैं कि अपने प्रभु को अधिक से अधिक याद करें ।

ज्ञानी की दृष्टि से- मेरा जीवन मिथ्या है, और इस में आने वाले दुःख भी मिथ्या है, यह सब मन का भ्रम है ।

कर्मयोगी की दृष्टि से - मेरे जीवन में जो भी दुःख हैं वह मेरे ही कर्मों का परिणाम है इसमें किसी का कोई दोष नहीं ।

सांसारिक लोग - दुख मुसीबत परेशानी से बचने के लिए तंत्र मंत्र जादू टोना एवं अन्य विद्याओं द्वारा स्थिति को अपने अनुकूल करने के सभी प्रकार के हथकंडे अपनाते हैं ।

                                    ऋषि Agyey ~ 🧘
                      "Spritual mentor and Motivator

Wednesday, May 22, 2024

👉 जीवन रहस्य


           "Ishwa spiritual Course"
           •~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•

प्रिय आत्मन्

आप बहुत भाग्यशाली है जो आपने कार्यक्रम में व्यवस्थित रूप से जुड़ना सुनिश्चित किया ! यहां तक पहुंचने में लोगों को जन्म जन्मांतर का सफर तय करना पड़ता है । जब अनंत जन्मों के दृढ़ कर्म कट जाते हैं, तभी हम ईश्वर के मार्ग पर आगे बढ़ पाते हैं । कार्यक्रम को आप अपनी योग्यता अनुसार समय से पूर्ण करें, यही हमारी कामना है । धन्यवाद ।

👉कार्यक्रम संबंधी सामान्य प्रश्न और उनके उत्तर

१- यह कार्यक्रम क्या है ? और इसका उद्देश्य क्या है ?
क्योंकि मैं सभी को बार-बार चीज नहीं समझा सकता अतः यह कार्यक्रम मुझसे जुड़ने का बहुत ही सरल माध्यम है और यह आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित एक पाठ्यक्रम है जिसका मूल उद्देश्य हमारे शरीर मन और बुद्धि के शुद्धिकरण की जानकारी प्रदान करना है ।

२- इस कार्यक्रम की आवश्यकता क्यों है ? 
हमने देखा कि समाज में बहुत से गुरु हैं जिनके विषय भी अलग-अलग है एक आम आदमी इनमें उलझा ना जाए और सही ज्ञान अर्जित करें । इसके लिए हमें आध्यात्मिक विषयों का प्रारंभिक ज्ञान आवश्यक है । 

३- इस कार्यक्रम को पूर्ण करने से हमें क्या लाभ होगा ? 
यह कार्यक्रम केवल मानसिक और बौद्धिक स्पष्टता के लिए है । किसी भी प्रकार का कोई भी भौतिक लाभ नहीं होगा । 

४- कार्यक्रम से जुड़ने की क्या योग्यता होनी चाहिए ? 
आपकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक होनी चाहिए । किसी भी विषय को विश्लेषण करने की बौद्धिक क्षमता अनिवार्य है हमारी बुद्धि इतनी विकसित होना चाहिए कि हम अपनी बात समझ सके और सत्संग या चर्चाओं में क्या बात कही जा रही है उसको समझ सके ।

५- कार्यक्रम का लाभ हम कहां से और कैसे ले सकते है ?
हमारे सभी कार्यक्रम ऑनलाइन उपलब्ध है जिनका लाभ आप आवेदन का फॉर्म सबमिट करके ले सकते हैं ।

६- क्या कोई कार्यक्रम प्रयोगात्मक भी है ?
यह कार्यक्रम मात्रा आप सभी को जानकारी देने के उद्देश्य बनाया गया है ! पहले चरण में कोई प्रयोगात्मक कार्यक्रम नहीं है ।

७- कार्यक्रम में शामिल होने का क्या शुल्क है ? 
नए साधकों के लिए मात्र १००१ /- रू , जो हमारे ऑनलाइन राम नाम लेखन कार्यक्रम में शामिल हैं और जिनके 21 लाख राम नाम लेखन से ऊपर हो चुके हैं , वे सभी इस कार्यक्रम में निशुल्क भाग ले सकते हैं ।
 
८- कार्यक्रम को पूर्ण करने की क्या प्रक्रिया रहेगी ? 
आवेदन फॉर्म सबमिट करने के पश्चात आपके कार्यक्रम की लिंक भेज दी जाएगी, उसमें प्रत्येक दिन का एक चैप्टर दिया गया है । लिंक को ओपन करें दिए गए चैप्टर को अच्छी तरह से पढ़ें और उन विषयों पर मनन करें । यदि आप मनन की विधि जानना चाहते हैं तो मुझे व्हाट्सएप पर अलग से मैसेज करें । 

इसके बाद दिए गए फॉर्म की लिंक को ओपन करें एवं पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें ।
ध्यान रहे कॉपी पेस्ट ना करें, जो भी लिखें अपने शब्दों में लिखें इसके लिए आपको प्रत्येक पाठ को पूरा करने के लिए दो दिन का समय भी दिया जाता है ।

👉यदि आपका कार्यक्रम संबंधी और कोई प्रश्न हो तो मुझे व्हाट्सएप करें । 9752420899 

👉पाठ्यक्रम-
१ - सत्संग
२ -  बुद्धि
३ - दिनचर्या 
४ - अनुशासन
५ - साधक
६ - ओज
७- मन
८ - पंचकोष 
९ - ज्ञान 
१० - मानव शरीर 
११- दुख 
१२- लक्ष्य 
१३- साधक के गुण 
१४ - अध्यात्म 
१५- गुरु 

👉 जीवन में प्रश्न क्यों आवश्यक है 
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_45.html

👉स्वामूल्यांकन 
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_23.html

👉आवेदन 
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_76.html

 👉 पाठ-१ ( १ से ३ दिवस तक - सत्संग )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_1.html

👉पाठ-२ ( ४ से ६ दिवस तक - बुद्धि )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post.html

👉पाठ-३ ( ७ से ९ दिवस तक - दिनचर्या )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_8.html

👉पाठ-४ (१० से १२ दिवस तक - अनुशासन )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_4.html

👉पाठ -५ ( १३ से १५  दिवस तक - ओज )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_11.html

👉पाठ -६ ( १६ से १८  दिवस तक - साधक )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_64.html

👉पाठ -७  ( १९ से २१ दिवस तक - मन )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_75.html

👉पाठ- ८ ( २२ से २४ दिवस तक - पंचकोष )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_14.html

👉पाठ-९ ( २५ से २७ दिवस तक - ज्ञान  )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_19.html

👉 पाठ-१० (२८ से ३० दिवस तक - मानव शरीर )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_28.html

👉पाठ-११ ( ३१ से ३३  दिवस तक - दुख )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/05/blog-post_8.html

👉पाठ-१२ ( ३४ से ३६  दिवस तक - लक्ष्य )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_83.html

👉पाठ-१३ ( ३७ से ३९ दिवस तक - साधक के गुण )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_43.html

👉पाठ-१४ ( ४० से ४२ दिवस तक - अध्यात्म )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_27.html

👉पाठ - १५ ( ४३ से ४५ दिवस तक - गुरु )
👉Copy and open this Link -
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_24.html 

👉 परीक्षा 
यह कार्यक्रम लाइव रहेगा , इसके लिए मुझे मेरे नंबर 9752420899 पर व्हाट्सएप करें  ।      
                                                        ।।  समाप्त ।।


👉लेख या प्रश्नोत्तरी से संबंधित कोई भी जिज्ञासा या शंका हो तो व्यक्तिगत रूप से चर्चा के लिए आप मुझे सोमवार और शनिवार रात्रि 9 से 10 के बीच संपर्क कर सकते हैं ।

🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃



Tuesday, May 21, 2024

👉स्वामूल्यांकन

प्रिय आत्मन् 
आपने समाज में अक्सर यह प्रचलित कहावत अवश्य सुनी होगी कि हाथ की पांचो उंगलियां बराबर नहीं होती । इसी प्रकार कोई भी नियम हर किसी को एक समान लाभ नहीं पहुंचा सकते ! अतः जब तक आप स्वयं का मूल्यांकन नहीं कर लेते तब तक कोई भी नियम ना लें ।
ध्यान दें की सबसे पहले स्वयं का मूल्यांकन अवश्य करें । जिससे आप नियम पालन का पूरा लाभ ले पाएं ।

👉प्रथम श्रेणी 
१-भोगवादी - मूर्छा में जीवन जी रहे हैं । इनके जीवन का आधार भय, मैथुन, आहार , निद्रा और इंद्रिय सुख है ।  

२- सामाजिक व्यक्ति - जीवन में कोई  स्थाई गुरु नहीं, मान्यताओं और अंधविश्वास में घिरे रहना , केवल स्वयं को सही सिद्ध करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं ।

३- नास्तिक - स्थूल शरीर के स्तर पर जीवन जी रहे हैं इनके लिए इससे आगे कुछ भी नहीं है , केवल भौतिक सुख सुविधा को ही महत्व देते हैं । इनका जीवन केवल सही और गलत के स्तर पर ही रहता है ।

४- आस्तिक - उनकी कुछ श्रेणी निम्नलिखित हैं। 
धार्मिक ,भक्त 

धार्मिक व्यक्ति - यह दो प्रकार के हैं ! कर्मकांडी, सकाम कर्मी ! यह नियम धर्म अर्थ काम मोक्ष के प्रारूप का अनुसरण करते हैं । यह लोग हमेशा पाप पुण्य के स्तर पर ही रहते हैं और स्वयं से कभी कोई पाप कर्म ना हो जाए इससे बचते हैं।  

भक्त -  यह हमेशा प्रेम भाव में रहते हैं और जिज्ञासा ,विश्वास, समर्पण ,भक्ति , प्रेम ! इस प्रारूप का अनुसरण करते हैं । 

५- अध्यात्मिक व्यक्ति - यह निष्काम कर्मी है और यह वैराग्य ,सत्य की खोज ,गुरु की प्राप्ति ,साधना उपासना और पूर्ण ज्ञान प्राप्ति । इस प्रारूप का अनुसरण करते हैं । यह सही गलत ,पाप पुण्य से ऊपर उठकर अपने लक्ष्य के प्रति अधिक संवेदनशील रहते हैं ! और उपलब्ध सभी साधनों का उपयोग करके अपने परम लक्ष्य परमानंद को प्राप्त करते हैं ।

👉 द्वितीय श्रेणी

१- निम्न स्तर - इस स्तर पर लोगों की चर्चाओं के मुख्य बिंदु भौतिक जगत घट रही  बाहरी घटनाओं एवं लोगों की निंदा आधारित रहते हैं।

२- मध्यम स्तर - इस स्तर पर लोगों की चर्चाओं के मुख्य बिंदु स्वयं के शरीर से संबंधित लाभ हानि, सुख दुख, एवं भोग विलास तक ही सीमित रहते हैं। यह लोगों की निंदा और 
कभी -कभी प्रशंसा भी कर लेते हैं ।

३-उच्च स्तर -  इस स्तर पर लोगों की चर्चाओं के मुख्य बिंदु स्वयं की आध्यात्मिक प्रगति, मानव कल्याण एवं ईश्वरीय विषयों पर आधारित रहती है।

👉ध्यान दें कि हम दिन के 24 घंटे में से कितना समय किस स्तर पर रहते हैं ।

👉 कुछ  विंदु विस्तारित रुप से - 

१-भौतिकवादी व्यक्ति -
जो व्यक्ति अपने को शरीर मानता है वह भौतिक पदार्थों में आनंद को खोजता है । भौतिकवादी शरीर को ही आराम देना चाहते हैं और इससे आगे उनकी बुद्धि नहीं चलती । 
इनका सारा ध्यान भौतिक वस्तुओं पर होता है . भौतिकवादी व्यक्ति नैतिक या आध्यात्मिक मामलों में कम रुचि रखते हैं और धन और भौतिक संपत्ति की इच्छा रखते हैं. भौतिकवादी लोग जुनूनी रूप से पैसे पर ध्यान केंद्रित करते हैं और विलासिता की वस्तुओं के मालिक होने की गहरी परवाह करते हैं. ।

२-अध्यात्मिक व्यक्ति 
कुछ लोग पूर्णतया अध्यात्मवाद को महत्व देते हैं ! आप जो भी कार्य करते हैं, अगर उसमें सभी की भलाई निहित है, तो आप आध्यात्मिक हैं। बाहरी परिस्थितियां चाहे जैसी हों, उनके बावजूद भी अगर आप अपने अंदर से हमेशा प्रसन्न और आनंद में रहते हैं,  इनके लिए पैसा, नाम, शोहरत उन के लिए मायने नहीं रखते ! संसार रूपी कीचड़ में कमल के समान निरलेप हो जाते हैं ! आनंद की प्राप्ति करना ही इनका वास्तविक लक्ष्य है जोकि आध्यात्मिक पथ पर चलने से ही प्राप्त हो सकेगा ।

३-धार्मिक व्यक्ति: 
वह व्यक्ति जो की अपनी उन्नति के लिये, अपने परिवार, तथा अपने पूरे परिवार, तथा जिस समाज, मोहल्लें, या सोसाइटी मैं वो रह रहा है, उसकी उनत्ति के लिये पूरी निष्ठा व् इमानदारी से कार्यरत रहता है वो धार्मिक व्यक्ति है! ऐसा करते हुए वो समाज मैं प्रगती भी कर सकता है व् घन अर्जित भी कर सकता है ! यहाँ यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि निष्ठा व् इमानदारी से कार्यरत रहने का यह भी आवश्यक मापदंड है कि वह व्यक्ति समस्त नकरात्मक सामाजिक बिंदुओं का भौतिक स्थर पर विरोध करेगा , जैसे कि भ्रष्टाचार, कमजोर वर्ग तथा स्त्रीयों पर अत्याचार, पर्यावाह्रण को दूषित करना या नष्ट करना, आदी, ! ऐसा व्यक्ति सत्यम शिवम सुन्दरम जैसी पवित्र शब्दावली मैं सत्यम है!


४- सांसारी व्यक्ति -
एक संसारी व्यक्ति केवल भौतिक ज्ञान ही विद्यालय में क्रम से ग्रहण करता है । बाकी यदि धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा की जाए तो यह इनके पास केवल सुना- सुनाया, रटा-रटाया ही रहता है ! जो की स्वप्रमाणित भी नहीं रहता । शिकायतों भरा जीवन, अव्यवस्थित दिनचर्या, लक्ष्य रहित जीवन इनकी मुख्य पहचान है। इनकी एक और खास पहचान है कि ईश्वर और ईश्वर संबंधी विषयों को जानने के लिए उनके पास समय नहीं रहता। प्रारंभ में यह कितने भी सभ्य और संस्कारी दिखे किंतु विपत्ति काल में इनका वास्तविक रूप सामने आ जाता है । अध्यात्म और आध्यात्मिक कामों के लिए समय नहीं रहता। स्वयं की योग्यता बढ़ाने की बजाय सिस्टम में कमी निकालते हैं।

५- साधक व्यक्ति -
यदि साधकों की बात की जाए तो भौतिक ज्ञान के साथ-साथ धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान भी गुरु सानिध्य में रहकर ग्रहण करते हैं  ! और चरणबद्ध तरीके से अनुभवों को अपने जीवन में उतारते हुए आगे बढ़ते हैं । जो किसी से भी कोई शिकायत किए बिना अपनी साधना में लगे हुए हैं ! इन्होंने यह स्वीकार कर लिया है कि उनकी वर्तमान स्थिति में तकलीफ या सुखद एहसास उनके ही कर्म की फल हैं। विपरीत परिस्थितियों मैं भी ईश्वर से कोई शिकायत नहीं करते ।

👉 तृतीयश्रेणी -
१- यदि हम समाज के लोगों को कुछ वर्गों के अंतर्गत बांटे तो - समाज का एक वर्ग ऐसा है जो अपने जीवन में बहुत ही दुखी और पीड़ित है ! और संभवतः समाज के अन्य लोगों एवं अपने ही रिश्तेदारों से सताया हुआ है । ऐसे लोग बहुत ही अच्छे सलाहकार होते हैं और ज्ञान की बातें करते हैं । किंतु कभी स्वयं का दुख दूर नहीं कर पाते ।

२- यदि यदि दूसरा वर्ग देखा जाए तो यह वर्ग धन संपन्न है ! यह केवल भोग और यह अपने भोग और विलास में ही रत है । अर्थात समस्याओं और अध्यन चिंतन मनन के विषय में बात करने का समय नहीं नहीं है है ! !

३-यदि तीसरा वर्ग देखा जाए तो यह साधकों का वर्ग है जो किसी से भी कोई शिकायत किए बिना अपनी साधना में लगे हुए हैं! इन्होंने यह स्वीकार कर लिया है कि उनकी वर्तमान स्थिति में तकलीफ या सुखद एहसास उनके ही कर्म की फल हैं।

👉चतुर्थ श्रेणी- 
आज के समय में ग्रंथ ना तो कोई पड़ता है और ना ही उन्हें समझने की किसी में क्षमता है ,इसलिए नए मानदंड जो कि वैज्ञानिक विधि से प्रस्तुत किए जा रहे हैं । जिसके अनुसार हमने इस धरती पर उपस्थित सभी लोगों को कुछ श्रेणी में बनता है

१-मूर्छित अवस्था- समाज में ज्यादातर लोग मूर्छा में ही जी रहे हैं । ऐसे लोग जीवन में अनुशासन पसंद नहीं करते ! इनके जीवन का ना तो कोई लक्ष्य है और ना ही उद्देश्य । जीवन में कोई आध्यात्मिक प्रश्न नहीं । केवल इंद्रिय सुख और भौतिक उन्नति को ही अपना विकास मानते हैं ।

२-कल्पना अवस्था- ऐसे लोग हर समय । कल्पनाओं में खोए रहते हैं जिसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं । कथा कहानी , सुनी बातों में विश्वास करते हैं । इनके जीवन में कोई तत्वदर्शी गुरु या मार्गदर्शन नहीं होता । स्वयं में बदलाव नहीं करते , सब कुछ मेरे अनुकूल हो ऐसा उनके विचार रहते हैं ,कार के गुरुओं को सुनकर जानकारी एकत्रित करते रहते हैं । और अपना जीवन मनमाने ढंग से जीते हैं । 

३- जागृत अवस्था- ऐसे लोग अपने गुरु के सानिध्य में साधना करते हैं ,और व्यवस्थित तरीके से जीवन के उच्चतम शिखर आत्मज्ञान की ओर आगे बढ़ रहे हैं ।

👉पंचम श्रेणी -


Monday, May 20, 2024

👉मर्यादा

प्रिय आत्मन् 
मर्यादा जीवन का वह आधार है, जो हमें नैतिक, सामाजिक, और व्यक्तिगत रूप से संतुलित बनाता है। यह न केवल हमें स्वयं के प्रति जिम्मेदार बनाती है, बल्कि समाज और दूसरों के प्रति भी हमारी जवाबदेही को बढ़ाती है। मर्यादित जीवन जीने से व्यक्ति न केवल स्वयं का सम्मान अर्जित करता है, बल्कि समाज में एक सकारात्मक प्रभाव भी छोड़ता है। वहीं, मर्यादा का उल्लंघन व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हानिकारक सिद्ध होता है। इसलिए, मर्यादा को अपनाकर हम अपने जीवन को सार्थक और समृद्ध बना सकते हैं।

Q- मर्यादा की क्या परिभाषा है ?
मर्यादा की परिभाषा :- मर्यादा का अर्थ है वह सीमा, नियम, या आचरण जो व्यक्ति, समाज, और संस्कृति के मूल्यों को बनाए रखने के लिए निर्धारित होता है। उदाहरण के लिए, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना, अपनी वाणी और व्यवहार में संयम रखना, और सामाजिक नियमों का पालन करना मर्यादा के अंतर्गत आता है।

Q- मर्यादा के अंतर्गत कौन-कौन से विषय आते हैं ?
मर्यादा के अंतर्गत निम्नलिखित विषय आते हैं:

1. वाणी की मर्यादा :- 
   - दूसरों के प्रति सम्मानजनक और सौम्य भाषा का उपयोग करना। 
   - अपशब्द, गाली, या अपमानजनक भाषा से बचना।  
   - सच बोलना, परंतु सत्य को इस तरह व्यक्त करना कि वह किसी की भावनाओं को ठेस न पहुँचाए।  
उदाहरण: किसी की आलोचना करते समय संयमित और रचनात्मक शब्दों का चयन करना।

2. व्यवहार की मर्यादा :-   
   - दूसरों के साथ विनम्रता, सहानुभूति, और सम्मान के साथ व्यवहार करना।  
   - दूसरों की निजता (प्राइवेसी) और व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करना।  
   - सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंडों का पालन करना। उदाहरण: परिवार, कार्यस्थल, या सार्वजनिक स्थानों पर शिष्टाचार बनाए रखना।

3. आचरण की मर्यादा :- 
   - नैतिकता और ईमानदारी के साथ कार्य करना।  
   - धोखा, चोरी, या अनुचित साधनों से बचना।  
   - अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का निर्वहन करना। उदाहरण: कार्यस्थल पर समय का पालन करना और अपने दायित्वों को पूरा करना।

4. सामाजिक मर्यादा :- 
   - समाज के नियमों और परंपराओं का सम्मान करना।  
   - विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, और समुदायों के प्रति संवेदनशीलता दिखाना।  
   - सामाजिक समारोहों में उचित व्यवहार करना।  
उदाहरण: किसी धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन में वहाँ के नियमों का पालन करना।

5. पारिवारिक मर्यादा :- 
   - परिवार के सदस्यों, विशेषकर बड़ों, के प्रति सम्मान और छोटों के प्रति दयालुता दिखाना।  
   - पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं का पालन करना।  
   - परिवार में आपसी विश्वास और प्रेम बनाए रखना।  
उदाहरण: माता-पिता या बुजुर्गों की सलाह का सम्मान करना।

6. नैतिक मर्यादा :-
   - सही और गलत के बीच भेद करने की क्षमता और नैतिक सिद्धांतों का पालन करना।  
   - दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रता का सम्मान करना।  
   - स्वार्थी या अनैतिक व्यवहार से बचना।  
उदाहरण: किसी को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों से दूर रहना।

7. आत्म-मर्यादा (स्वयं की मर्यादा) :-
   - आत्मसम्मान बनाए रखना और अपने मूल्यों पर अडिग रहना।  
   - अपनी इच्छाओं और भावनाओं पर नियंत्रण रखना।  
   - ऐसी गतिविधियों से बचना जो स्वयं की गरिमा को कम करें।  
उदाहरण: नशे या अनुचित व्यवहार से बचना।

8. पेशेवर मर्यादा :-
   - कार्यस्थल पर नियमों, नीतियों, और नैतिकता का पालन करना।  
   - सहकर्मियों और ग्राहकों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार।  
   - समयबद्धता और जिम्मेदारी का पालन करना।  
उदाहरण: कार्यस्थल पर गोपनीयता और पेशेवर नैतिकता बनाए रखना।

9. सांस्कृतिक और धार्मिक मर्यादा :-
   - विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता।  
   - धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करना।  
उदाहरण: किसी धार्मिक स्थल पर वहाँ के नियमों का सम्मान करना।

10. पर्यावरणीय मर्यादा :-
    - प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव रखना।  
    - संसाधनों का दुरुपयोग न करना और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने से बचना।  
उदाहरण: कूड़ा न फैलाना और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना।

Q- जीवन में मर्यादा क्यों आवश्यक है ?
मर्यादा जीवन में इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह समाज में व्यवस्था, शांति, और सामंजस्य बनाए रखती है। यह निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है:
1. सामाजिक समरसता : मर्यादा के पालन से लोग एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहानुभूति रखते हैं, जिससे समाज में एकता और शांति बनी रहती है।
2. आत्मनियंत्रण : मर्यादा हमें अपनी इच्छाओं और भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखाती है, जिससे हम आवेगपूर्ण निर्णयों से बचते हैं।
3. नैतिकता का आधार : यह हमें सही और गलत के बीच भेद करने की समझ देती है, जिससे हम नैतिक और सार्थक जीवन जी सकते हैं।
4. सम्मान और विश्वास : मर्यादित व्यवहार से व्यक्ति दूसरों का विश्वास और सम्मान अर्जित करता है, जो व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों को मजबूत करता है।
5. संस्कृति का संरक्षण : मर्यादा हमारी सांस्कृतिक और पारंपरिक मूल्यों को जीवित रखती है, जो समाज की पहचान को बनाए रखने में मदद करती है।

Q- जीवन में किसके लिए मर्यादा आवश्यक है ?
मर्यादा हर व्यक्ति, समूह, और समाज के लिए आवश्यक है, चाहे वह किसी भी उम्र, लिंग, या सामाजिक स्थिति का हो। विशेष रूप से:
1. व्यक्तिगत स्तर पर : प्रत्येक व्यक्ति के लिए मर्यादा आत्मसम्मान और आत्मविश्वास का स्रोत है। यह हमें दूसरों के साथ सम्मानजनक और संतुलित संबंध बनाने में मदद करती है।
2. पारिवारिक स्तर पर : परिवार में मर्यादा से आपसी प्रेम, विश्वास, और समझ बढ़ती है। उदाहरण के लिए, बड़ों का सम्मान और छोटों के प्रति दयालुता मर्यादा का हिस्सा है।
3. सामाजिक स्तर पर : समाज में मर्यादा से लोग एक-दूसरे के अधिकारों और भावनाओं का सम्मान करते हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव बना रहता है।
4. पेशेवर स्तर पर : कार्यस्थल पर मर्यादा सहकर्मियों और वरिष्ठों के साथ सम्मानजनक व्यवहार, समय का पालन, और नैतिकता को बढ़ावा देती है।
5. राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर : मर्यादा विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों, और समुदायों के बीच आपसी समझ और शांति को बढ़ावा देती है।

Q- मर्यादा में रहकर कार्य करने वालों को लाभ
जो लोग मर्यादा में रहकर कार्य करते हैं, उन्हें निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
1. सम्मान और विश्वसनीयता : मर्यादित व्यक्ति समाज में सम्मान और विश्वास अर्जित करता है, जिससे उसके व्यक्तिगत और पेशेवर संबंध मजबूत होते हैं।
2. आंतरिक शांति : मर्यादा के पालन से व्यक्ति का मन शांत रहता है, क्योंकि वह गलत कार्यों से होने वाले अपराधबोध से मुक्त रहता है।
3. सफलता : मर्यादित व्यवहार से व्यक्ति दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम होता है, क्योंकि वह संयम और नैतिकता के साथ निर्णय लेता है।
4. सामाजिक स्वीकार्यता : मर्यादित व्यक्ति समाज में आसानी से स्वीकार किया जाता है, क्योंकि वह दूसरों की भावनाओं और अधिकारों का सम्मान करता है।
5. आत्मविश्वास : मर्यादा से व्यक्ति को अपनी नैतिकता पर गर्व होता है, जो उसके आत्मविश्वास को बढ़ाता है।

Qबिना मर्यादा के रहने वालों को हानि
जो लोग मर्यादा का पालन नहीं करते, उन्हें निम्नलिखित हानियाँ हो सकती हैं:
1. सम्मान की हानि : बिना मर्यादा के व्यवहार करने वाला व्यक्ति समाज में अपनी प्रतिष्ठा खो देता है, क्योंकि लोग उस पर भरोसा नहीं करते। 
2. संबंधों में तनाव : असंयमित व्यवहार से परिवार, दोस्तों, और सहकर्मियों के साथ संबंध खराब हो सकते हैं।
3. मानसिक अशांति : मर्यादा का उल्लंघन करने से व्यक्ति को अपराधबोध, तनाव, और असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है।
4. कानूनी और सामाजिक परिणाम : मर्यादा तोड़ने से कानूनी समस्याएँ, सामाजिक बहिष्कार, या अन्य नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं।
5. लक्ष्यों में असफलता : बिना मर्यादा के कार्य करने से व्यक्ति आवेगपूर्ण निर्णय लेता है, जो उसकी दीर्घकालिक सफलता को बाधित करता है।



जिन्हें आता है उनके लिए


👉सत्य का निर्धारण कौन करे -

सत्य का निर्धारण

समाज में किसी व्यक्ति को सत्य जानने  में कोई रुचि नहीं है , वह तो केवल अपनी मान्यताओं की पुष्टि ही खोजता है और उसे प्रमाणित करने के लिए तरह-तरह के प्रमाण भी खोजता है । जबकि वास्तविकता इससे अलग है । 
 
व्यक्ति को आपकी बातें तभी तक अच्छी लगती हैं जब तक कि उसकी मान्यताएं भंग ना हो । जैसे उसकी मान्यताएं भंग होने लगती है , इसके बाद तो वह आपकी एक भी बात नहीं सुनेगा 

सही परिभाषा सही ज्ञान परिणाम सुखी निश्चिंत जीवन , गलत परिभाषा गलत ज्ञान परिणाम अपूर्ण इच्छाएं मानसिक क्लेश युक्त दुःखी जीवन ।

वर्तमान समय में यदि आज समाज की बात की जाए तो सभी लोगों की स्थिति बहुत ही दैयनीय है । कारण कि सब ने अपनी आवश्यकता अनुसार अलग-अलग सत्य की परिभाषा गढ़ ली है , और यहीं से शुरुआत होती है समाज के टूटने की । वर्तमान समाज में प्रत्येक व्यक्ति एक काल्पनिक दुनिया में काल्पनिक ज्ञान के सहारे रह रहा है और उसका परिणाम है समाज का पतन। समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभव को ही सत्य मानता है, और यदि वह अनुभव कई अन्य लोगों के अनुभवों से मेल खाता है, तब यह संभावना बन जाती है कि वह वास्तविक सत्य हो l किंतु जब तक कोई अनुभव तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जाता तब तक उसे सत्य ना माने l आइए कुछ प्रश्नों के माध्यम से जानते हैं कि हमारे अनुभव सत्य के कितने करीब हैं l देखें प्रश्न इस प्रकार हैं

- क्या- पूछने पर परिभाषा बतानी चाहिए l

- क्यों- पूछने पर कारण बताना चाहिए l

३ - कैसे- पूछने पर प्रक्रिया बतानी चाहिए l

४- कब- पूछने पर समय बताना होगा ।

५ - कहाँ - पूछने पर स्थान बताना चाहिए l

६ - कौन- पूछने पर व्यक्ति बताना चाहिए l

७- कितना- पूछने पर मात्र बताना चाहिए l

८- यह भी जानना आवश्यक है कि जो नियम फॉलो करता है उसे क्या लाभ है और जो नियम फॉलो नहीं करता उसे क्या हानि है।

👉 मानव शरीर का महत्व
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/6633a61190b6cf109879dde3

👉 बुद्धि का महत्व
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/660a3bec32732b6c93d68490

👉सत्संग का महत्व 
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/660a5e80265ea87ba7036a43

👉४- अनुशासन का महत्व 
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/660a645887f7ea7572a4f817

👉५- संतुलित दिनचर्या का महत्व 
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/660a618cc542af6405cef56 

👉६- ओज का महत्व 
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/6618cffbb7d6b907099b9155

👉७- पंच कोष का महत्व 
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/661bae3758f07f07020260c2

👉८- ज्ञान का महत्व 
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/66234a76b3c66c20860bc7f6

👉९- गुरु का महत्व 
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/660a66030c245d27afe943d5

👉 १०- साधक जीवन का महत्व 
👉 Please Copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/6628e636d3ef0c7249a4a07e

👉११- कृपा 
👉 Please copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/6649fcd3494988410f374b49


~~~~~~~~~~~~~~~~~~~🌷


👉शुद्धिकरण ( 9/4/24से 18/5/24 तक )

प्रिय आत्मन् 
जैसा कि आप सभी को ज्ञात है की शुद्धिकरण के प्रथम चरण को लेकर हमने 40 दिवसीय नियम ( 9/4/24से 18/5/24 तक ) शुरू किए थे आपके जीवन में इसका क्या परिणाम निकला आप स्वयं विश्लेषण करें । 
१- सभी नियम करने में समस्या आई या नियम पूरे नहीं हो सके । 
२- सभी नियम पूरे हुए और मुझे कुछ चीजों की अनुभूति हुई ।

जीवन में प्रत्येक नियम के पीछे कोई ना कोई उद्देश्य होता है किंतु सामाजिक लोग उन उद्देश्यों को भूलकर जीवन भर नियमों से ही चिपके रहते हैं, जिसके कारण अपने आस पास वह कई समस्याएं उत्पन्न कर लेते हैं , और इससे उनका कोई आध्यात्मिक और भौतिक विकास भी नहीं होता । उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर मेरे लिए नहीं अपने लिए खोजें । यदि नियमों के पालन से आपकी कोई प्रगति नहीं हो रही तो किसी योग्य समर्थ गुरु के शरण में अवश्य जाएं । 


अक्सर आप लोग जब भी हमसे मिलते तब हमसे नियमों के बारे में अधिक सुनते हो , और कभी-कभी यह भी संभावना रहती है कि आप सब हमारे क्रियाकलापों को देखकर संशय में पड़ जाते हैं कि ये नियमों की इतनी बातें करते हैं और स्वयं नियमों का पालन नहीं करते । तो आप सबको  नियमों का महत्व आसानी से समझाने के लिए इनका वर्गीकरण किया गया है आशा करता हूं कि आप इसे अवश्य समझेंगे ।

१- पहले चरण के नियम - क्योंकि पहले चरण में हम किसी गुरु से नहीं जुड़े रहते इसलिए पहले चरण के नियम बहुत ही सख्त रहते हैं ,  जिनमें  किसी भी प्रकार की छूट की कोई संभावना नहीं रहती ।  पहले चरण में साधकों के लिए वैदिक कर्मकांड एवं संतुलित दिनचर्या के पूरे नियम शामिल है ।

२- दूसरा चरण - क्योंकि दूसरे चरण में हम अपने अनुकूल गुरु से जुड़ जाते हैं , इसलिए गुरु के बताए हुए नियम पालन करना अनिवार्य रहता है । दूसरे चरण में वैदिक कर्मकांड के नियम इतने सख्त नहीं रहते । किंतु संतुलित दिनचर्या के नियम सख्ती से पालन करना अनिवार्य है । 

३- तृतीय चरण - यहां गुरु मंत्र द्वारा जब हमारा अंतःकरण शुद्ध हो चुका होता हैं , अब यहां केवल प्राकृतिक नियमों का पालन ही अनिवार्य है ।

🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃



मुझे इन 40 दिवस में क्या मिला वह अनुभव आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूं हो सकता है आप में से किसी को इससे लाभ हो ।

१- बौद्धिक , मानसिक स्पष्टता प्राप्त हुई ।
२- अनावश्यक दायित्वों के बोझ से मुक्ति ।
३- रिश्तों और संबंधों का आधार ज्ञात हुआ ।
जो रिश्ते दोनों ओर से स्वीकार किए जाएं वही मान्य है ।
जिन रिश्तों का आधार प्रेम है वह कभी नहीं टूटते । 
४- यूं तो समाज में प्रत्येक व्यक्ति को सहायता की आवश्यकता होती है, किन्तु हमें किसकी सहायता करनी है और किस स्तर की करनी है , इसका स्पष्ट रूप से ज्ञान हुआ ।
५- ऐसे लोगों को छोड़कर अपनी साधना में आगे बढ़ना होगा 
जो मेरे मार्ग के नहीं है, या जिनसे मेरी विचारधारा नहीं मिलती।

Sunday, May 19, 2024

प्रश्न कैसे पूछें ?

प्रिय आत्मन् 
जीवन में गुरु का महत्व किसी से छिपा नहीं है । गुरु के अभाव में भटकाव के सिवा कुछ नहीं है । बिना समर्थ गुरु के आपके जीवन में रत्ती भर भी प्रगति नहीं होगी । 

जब भी हमारे मन में कोई प्रश्न शंका या जिज्ञासा प्रकट हो तो हमें इसके निवारण के लिए अपने गुरु के पास ही जाना चाहिए  ( गुरु अर्थात जो अपने शिष्यों का बिना भौतिक लाभ के सही मार्गदर्शन देता हो, सर्व समर्थ तत्वदर्शी हो ) जिनके भी गुरु नहीं है उन सभी के लिए हमारा यही संदेश है कि समय रहते किसी तत्वदर्शी योग्य समर्थ गुरु की शरण में जाएं । और उनसे ही जुड़कर अपनी शंकाओं का समाधान करना उचित है ।  स्मरण रखें की गुरु आपके ही विचारधारा का होना चाहिए । इसके अभाव में आप यूं ही भटकते रहेंगे ।

किसी से भी कोई भी प्रश्न पूछने या मार्गदर्शन प्राप्त करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि मुझे मार्गदर्शन ( ज्ञान ) चाहिए या जानकारी । किसी से भी मार्गदर्शन लेने से पूर्व कुछ बातें अवश्य ध्यान रखें  ! जैसे - आपका उस व्यक्ति से गुरु शिष्य या प्रेम, विश्वास ,श्रद्धा ,भक्ति के आधार पर संबंध स्थापित होना चाहिए । वह व्यक्ति आपके मार्ग का हो अर्थात आपके गुण और विचार उससे मिलना चाहिए । आपको चाहिए कि आप सामने वाले व्यक्ति की बातों पर पूर्ण विश्वास करते हो और उनका दृढ़ता से पालन करने की इच्छा रखते हो । तभी हमारे जीवन में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे । अन्यथा सिर्फ जानकारी के लिए हम सबके पास गूगल बाबा है , वहां  आपको हर प्रकार की जानकारी मिल जाएगी । 

नोट - यदि आपने हमारे द्वारा आयोजित कार्यक्रम 
"Ishwa -1" पूर्ण नहीं किया हैं , तो हमारे द्वारा बताये गये नियम और जानकारी से आपको कोई लाभ नहीं मिलेगा । आपका समय नष्ट होगा ।

👉"Ishwa -1" कार्यक्रम की अधिक जानकारी के लिए दी गई लिंक को ओपन करें ।
👉Please copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/05/blog-post_18.html

👉 प्रश्न करता और उनकी श्रेणियां 
👉Please copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_45.html
 
अपना कीमती समय निकाल कर लेख पढ़ने के लिए 
बहुत -बहुत धन्यवाद । 🙏

गुरु पूर्णिमा २१/७/२४ भाग-२

प्रिय आत्मन् 
आप बहुत भाग्यशाली है जो आपने कार्यक्रम में व्यवस्थित रूप से जुड़ना सुनिश्चित किया ! यहां तक पहुंचने में लोगों को जन्म जन्मांतर का सफर तय करना पड़ता है । जब अनंत जन्मों के दृढ़ कर्म कट जाते हैं, तभी हम ईश्वर के मार्ग पर आगे बढ़ पाते हैं । कार्यक्रम को आप अपनी योग्यता अनुसार समय से पूर्ण करें, यही हमारी कामना है । 

धन्यवाद 🌷


पाठ्यक्रम विवरण - 

👉१- स्वस्थ मानव शरीर  
👉 Please Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_28.html

👉२- बुद्धि 
👉 Please Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post.html

👉३- सत्संग 
👉Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_1.html

👉४- अनुशासन 
👉 Please Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_4.html

👉५- संतुलित दिनचर्या 
👉 Please Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_8.html

👉६- ओज
👉 Please Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_11.html

👉७- पंच कोष 
👉 Please Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_14.html

👉८- ज्ञान 
👉 Please Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_19.html

👉९- गुरु 
👉 Please Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/04/blog-post_24.html

👉१०साधक
👉 Please Copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/05/blog-post_15.html

👉११- कृपा 
👉 Please copy and open this link 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/05/blog-post_19.html

👉 परीक्षा Online होगी ।
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

कृपा

१- कृपा क्या है ?
हम अपनी शक्ति, बुद्धि और जानकारी से जो कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं, वह हमारा कर्म फल है, किंतु जब हमारे किए गए कर्मों का फल कयी गुना मिलता है, तो हमें ज्ञात होता है कि यह सब हमें कृपा से मिल रहा है ।  कृपा अर्थात बिना किसी लाभ की आशा के दूसरे की भलाई के लिए किया गया कार्य । स्वयं मनन करें कि आप पर किसने कृपा की है और आपने किस पर कृपा की है ।

२- कृपा से क्या होगा ?
किसी भी काम को करने के तीन मार्ग है - परिश्रम, छल, कृपा
परिश्रम से किए गए कार्य का फल उतना ही प्राप्त होता है जितना का हमने परिश्रम किया ।
छल से किए हुए कार्यों का परिणाम कई गुना घट जाता है ।
कृपा से जो हमें परिणाम प्राप्त होते है वह कई गुना बढ़ जाते हैं । अतः कृपा सर्वश्रेष्ठ माध्यम है अपने कर्मार्जीत पुण्यों को कई गुना बढ़ाने के लिए ।

३- कृपा कब होती है ?
कोई भी व्यक्ति चाहे मंदिर में जाकर कितना ही माथा टेके, उसको भगवान नहीं मिलेंगे। भगवान न ही अकारण किसी पर कृपा करते हैं और न ही अकारण करुणा करते हैं। जब तक मन, बुद्धि अपने इष्ट को समर्पित नहीं करता तब तक वह शुद्ध ज्ञान और भगवान की कृपा का पात्र नहीं बन सकता। 

४- किसकी कृपा अनिवार्य है ?
हमारे मनुष्य जन्म के पीछे कई कारण विद्यमान है जिस पर अलग से विस्तृत चर्चा होनी आवश्यक है । किंतु यदि हम यहां जीवन के मूल उद्देश्य आत्मज्ञान की बात करें तो इसे प्राप्त करने के लिए ईश्वर कृपा और गुरु कृपा अनिवार्य है । अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ईश्वर या सद्गुरु हम पर कृपा क्यों करेंगे तो यहां यह भी समझ लेना अनिवार्य है कि जब हम अपने आश्रित लोगों पर कृपा करते हैं तब ईश्वर और गुरु भी हम पर कृपा करते हैं ।

५- हमें यह कैसे पता चलेगा कि कृपा हम पर है ?
कृपा पाने का उद्देश्य निश्चित ही उच्चतम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होना चाहिए । आपको यह लगता है कि कृपा के द्वारा आपकी सारी इच्छायें, पूरी हो जायें । आपकी यह वही पुरानी आदत है कि मंदिर जा कर भगवान से अपनी इच्छाएं बताते हैं । अगर वो आपकी इच्छा पूरी न करें तो आप अपने भगवान ही बदल देते हैं । यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि यदि हम अपने जीवन के उच्चतम शिखर अर्थात अपने जीवन के मूल्य उद्देश्य को पाने की तरफ बढ़ रहे हैं तो निश्चित ही हम पर कृपा है ।

६- कृपा न मिलने का कारण क्या है ?
ज्यादातर लोगों के साथ यही समस्या रहती है कि राग द्वेष और अपनी पूर्व की मान्यताओं और विचारधारा में बंधे रहते हैं , वे इसे त्यागने को तैयार नहीं रहते । यदि आपके अंदर, अगर कोई खाली जगह है जहाँ सद्गुरु या ईश्वर के संदेश ग्रहण करने की संभावना हो तो आपकेजीवन में कृपा की संभावना हो सकती है ।




नोट-  दिए गए लेख को अच्छी तरह पढ़े ! अपनी जिज्ञासा शंकाओं के समाधान के लिए चर्चाओं में शामिल हों । इसके बाद प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें । इसके लिए आपको 2 दिन का समय मिलेगा 

👉 Please copy and open this link 
https://surveyheart.com/form/6649fcd3494988410f374b49

Saturday, May 18, 2024

जीवन रहस्य भाग - ५५ ( समाज में रिश्तो का आधार क्या )

प्रिय आत्मन् 
रिश्ते जीवन का आधार हैं, जो हमें भावनात्मक, सामाजिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाते हैं। कुछ रिश्ते हमें जन्म से मिलते हैं, जैसे माता-पिता, भाई-बहन, जबकि कुछ रिश्ते हम स्वयं बनाते हैं, जैसे दोस्ती, प्रेम या वैवाहिक संबंध। ये रिश्ते हमारे जीवन को अर्थ, खुशी और सहारा प्रदान करते हैं।नए रिश्ते बनाते समय हमें सावधानी बरतनी चाहिए। रिश्तों का आधार प्रेम, विश्वास, और समर्पण होना चाहिए। आपसी स्वीकृति और निस्वार्थ भाव से बने रिश्ते ही सबसे मजबूत और टिकाऊ होते हैं। चाहे रिश्ता पारिवारिक हो, सामाजिक हो या प्रेम-संबंध, उसकी नींव को परखना आवश्यक है। विश्वास और सम्मान की कमी रिश्तों को कमजोर कर सकती है, जबकि समझदारी और संवाद उन्हें और गहरा बनाते हैं। आईये इस लेख के माध्यम से समझते हैं रिश्ते और उनकी श्रेणी ।

1. आंतरिक और सकारात्मक आधार
प्रेम : यह सबसे शुद्ध और गहरा आधार है, जो निस्वार्थ भाव, समर्पण, और आत्मीयता पर टिका होता है। प्रेम पर आधारित रिश्ते दीर्घकालिक और अटूट होते हैं, जैसा कि आपने कहा।
मित्रता : यह आपसी समझ, विश्वास, और सहजता पर आधारित होती है, जो रिश्तों को स्वाभाविक और मजबूत बनाती है।
सजातीय गुण : समान गुण, मूल्य, और विचारधारा रिश्तों में सामंजस्य लाते हैं।
धर्म : यदि धर्म का अर्थ नैतिकता, कर्तव्य, और आध्यात्मिक मूल्यों से है, तो यह रिश्तों को एक उच्च उद्देश्य देता है।

2. बाहरी या परिस्थितिजन्य आधार
अनुवांशिकता (DNA) : यह रक्त-संबंधों (जैसे परिवार) का आधार है, जो स्वाभाविक रूप से बनता है, लेकिन इसकी मजबूती भावनात्मक जुड़ाव पर निर्भर करती है।
इच्छा और आवश्यकता : ये व्यक्तिगत या परिस्थितिजन्य हो सकती हैं। इच्छा स्वार्थी हो सकती है, जबकि आवश्यकता आपसी सहयोग पर टिक सकती है।
समझौता : यह रिश्ता बाहरी दबाव या परिस्थितियों के कारण बन सकता है, जो कभी-कभी मजबूरी में होता है।
भौतिक सुखों की लालसा : यह आधार अस्थायी और स्वार्थपरक हो सकता है, जो रिश्तों को कमजोर बना सकता है।
जबरदस्ती थोपा गया रिश्ता : यह सबसे कमजोर आधार है, क्योंकि इसमें स्वतंत्र इच्छा और स्वीकृति का अभाव होता है।

रिश्तों की जांच के लिए सुझाए गए बिंदु:
आपने रिश्तों की मजबूती के लिए छह जांच बिंदु दिए हैं:- 
समान विचार, गुण, पसंद, चर्चा के विषय, दिनचर्या, और कार्य क्षेत्र। ये बिंदु रिश्तों में सामंजस्य और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन्हें हम निम्नलिखित तरीके से समझ सकते हैं:

1. समान विचार : समान विचारधारा और विश्वास रिश्तों में गहरा तालमेल बनाते हैं। यह वैचारिक स्तर पर एकजुटता लाता है।
2. समान गुण : नैतिकता, व्यवहार, और स्वभाव में समानता रिश्तों को विश्वसनीय और सम्मानजनक बनाती है।
3. समान पसंद : शौक, रुचियां, और प्राथमिकताएं समान होने से रिश्तों में आनंद और सहजता बढ़ती है।
4. समान चर्चा के विषय : समान रुचियों और विषयों पर बातचीत रिश्तों को जीवंत और गतिशील बनाती है।
5. समान दिनचर्या : जीवनशैली और दैनिक आदतों में सामंजस्य रिश्तों में व्यावहारिक स्तर पर तालमेल बनाता है।
6. समान कार्य क्षेत्र : यदि दोनों का पेशेवर या कार्य क्षेत्र समान है, तो यह आपसी समझ और सहयोग को बढ़ाता है।

प्रेम और समर्पण का महत्व:- आपने कहा कि "जिन रिश्तों का आधार प्रेम और समर्पण हो, वह रिश्ते कभी नहीं टूटते।" यह एक गहन सत्य है। प्रेम और समर्पण रिश्तों को निस्वार्थ और आध्यात्मिक आयाम देते हैं। ऐसे रिश्ते बाहरी दबावों, मतभेदों, या परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते, क्योंकि वे आत्मा के स्तर पर जुड़े होते हैं। यह रिश्तों का सबसे मजबूत आधार है, जो आपसी स्वीकृति और निस्वार्थ भाव पर टिका होता है।


यदि आपके अपने जीवन से संबंधित कोई अनसुलझे प्रश्न हों तो हमें लिए व्हाट्सएप करें - 
👉https://wa.me/+919752420899?text=Hi....Ishwa


अपना कीमती समय निकालकर लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏

Wednesday, May 15, 2024

#साधक के गुण

आध्यात्मिक शोध से हमने सीखा है कि हमारा जन्म दो कारणों से होता है :

१. प्रारब्ध भोग भोगना और

२. आध्यात्मिक उन्नति करना ।

प्रारब्ध एक ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर प्रायः हमारा नियंत्रण नहीं रहता;किंतु हम अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए गंभीरता से प्रयत्न कर सकते हैं । ऐसे प्रयत्न करने में, आध्यात्मिक उन्नति को अपने जीवन का उद्देश्य बनाने में और स्वयं में कुछ विशिष्ट गुण अपनाने से हमें सहायता मिलती है । इस लेख में हमने साधक किसे कहें, आध्यात्मिक यात्रा में सहायता के लिए साधक में कौन-से गुण होने चाहिए और वह उन गुणों का विकास कैसे कर सकता है, का विवेचन किया है ।

२. साधक किसे कहें ?

१. जो अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रतिदिन सत्यनिष्ठा से गंभीर प्रयास करता है ।

२. जिसमें आध्यात्मिक उन्नति की तीव्र लगन हो और

३. जो प्रतिदिन साधना की गुणवत्ता और मात्रा, दोनों बढाने का प्रयास करता है ।

३. साधक और सामान्य व्यक्ति में अंतर
सच्चा साधक बनने के लिए आध्यात्मिक अंर्तमुखता अथवा ईश्वर पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है । आध्यात्मिक अंर्तमुखता से शनैः-शनैः पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि का अस्तित्व घटता जाता है । जबकि दूसरी ओर सामान्य व्यक्ति अपनी पंचज्ञानेंद्रियां, मन एवं बुद्धि का अस्तित्व बढाने के लिए श्रम करते हैं । 
साधक के गुण जिज्ञासा समर्पण आचरण में लाना दृढ़ता एवं शंकाओं का समाधान करना ।

४- साधक के गुण ?
किसी भी साधक में यह सामान्य गुण होना आवश्यक है 
इससे साधक अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तैयार हो सकता है । इसके आगे ईश्वर और गुरु कृपा ही सहयोग कर सकती है ।

१- जिज्ञासा
 - जिज्ञासा का मतलब है किसी चीज़ के बारे में ज़्यादा जानने की इच्छा ! जिज्ञासा मानव विकास में मदद करती है और सीखने की प्रक्रिया को बढ़ाती है. जिज्ञासा रखने से हमें सतर्क रहने और अपने बदलते परिवेश के बारे में ज्ञान हासिल करने में मदद मिलती है ।

२- तर्क - बुद्धि की क्षमता है जिसका प्रयोग हम श्रेष्ठ से श्रेष्ठ को खोजने के लिए करते हैं 

३- विश्वास - यह मन की एक भावना है जब हम किसी भी जानकारी को प्रमाणों के आधार पर सत्य मानना विश्वास है ।

४- समर्पण - यह मन की एक स्थिति है जब हमारे मन में किसी के प्रति आदर भाव या प्रेम उत्पन्न होता तो समर्पण स्वत: ही हो जाता है  ।
 
५- अनुशासन - प्रकृति के किसी भी नियम को स्वयं के भौतिक लाभ के लिए न तोड़ना अनुशासन कहलाता है ।

६- वैराग्य - किसी भी विषयवस्तु की नश्वरता को जान  
लेना ही वैराग्य है । और उनसे आसक्ति रहित होकर कार्य करना यही बैरागी के लक्षण है । 

७- विरक्ति - यह एक ऐसी भावना है जहां व्यक्ति किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति आकर्षण या मोह को खो देता है। लेकिन यह वैराग्य की तुलना में अधिक व्यक्तिगत और भावनात्मक होता है।

८- सारग्रहिता - किसी भी लेख ,कथा, कहानी या घटना को कम से कम शब्दों में उसका मूल उद्देश्य क्या है यह ग्रहण करना सारग्रहिता कहलाता है ।

९- न्यूनतावादी - जब तक एक साधक अपने परम लक्ष्य तक ना पहुंच जाए तब तक उसमें भौतिक इच्छाएं ना के बराबर होनी चाहिए । और भौतिक आवश्यकताएं इतनी हो कि स्वयं का भरण पोषण हो जाए ।

१० - अन्य गुण -
शम - यानी मन की एकाग्रता
दम - यानी इंद्रियनिग्रह
उपरति - यानी निवृत्ति
तितिक्षा - यानी सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मान-अवमान आदि द्वंद्वों के प्रति सहनशीलता
श्रद्धा - यानी शास्त्र, संत और गुरु के वचनों पर, वे जो बताते हैं उस पर, पूरा विश्वास
समाधान - यानी शंकाओं का निवारण करना 


नोट-  दिए गए लेख को अच्छी तरह पढ़े ! अपनी जिज्ञासा शंकाओं के समाधान के लिए चर्चाओं में शामिल हों । इसके बाद प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें । इसके लिए आपको 2 दिन का समय मिलेगा ।

👉 प्रश्न पत्र के लिए लिंक पर क्लिक करें ।
https://surveyheart.com/form/6628e636d3ef0c7249a4a07e

वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या: दोषारोपण की प्रवृत्ति

प्रणाम मित्रो वर्तमान समय में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली अधिकांश समस्याओं और विकृतियों के लिए स्...