Tuesday, December 28, 2021

अज्ञात की यात्रा

प्रिय आत्मन् 
मानव जीवन में सत्य की खोज तब तक प्रारंभ नहीं हो सकती, जब तक हम अपनी अज्ञानता के प्रति सजग नहीं होते। किसी भी प्रश्न के संदर्भ में जब हमें इसका प्रामाणिक उत्तर ज्ञात न हो और हमारा "अहम् भाव" यह स्वीकार नहीं कर पा रहा हो कि मैं यह नहीं जानता, तब हमारे भीतर एक गहरा आंतरिक द्वंद्व जन्म लेता है। यह अहम् भाव ही है जो हमें अज्ञान के अंधकार में बांधकर रखता है और स्वयं को सर्वज्ञाता सिद्ध करने के लिए छल, कपट और झूठे तर्कों का सहारा लेने पर विवश करता है। इस अहम् की सूक्ष्म जंजीरों को तोड़कर जब हम इस सत्य के सम्मुख नतमस्तक होते हैं कि हमारा ज्ञान सीमित है, तब हमें स्वयं ही उस अज्ञात तत्व की यात्रा पर आगे बढ़ना होगा। क्योंकि यह यात्रा ही हमें वास्तविकता से परिचय करवा कर उसका अनुभव करवाएगी।
इस अज्ञात तत्व की यात्रा पर आगे बढ़ने का मुख्य कारण साधक के भीतर छिपी वह तीव्र जिज्ञासा और तड़प होती है, जो उसे किसी भी परिस्थिति में असत्य या अधूरे ज्ञान से समझौता नहीं करने देती। जब साधक यह देख लेता है कि संसार की कोई भी बाहरी कहानी, मनोरंजन या चमत्कारी घटनाएँ उसके मूलभूत प्रश्नों का प्रामाणिक उत्तर नहीं दे पा रही हैं, तब वह बाहर खोजना बंद कर देता है। इसके विपरीत, अहम् भाव से ग्रसित व्यक्ति कभी इस यात्रा का कारण नहीं समझ पाता; वह बिना किसी वास्तविक प्रक्रिया को पूरा किए, केवल लोभ और प्रतिष्ठा की चाह में परिणाम को जबरन हासिल करने का ढोंग करता रहता है।
इस यात्रा की प्रक्रिया अत्यंत कठिन परंतु परम आनंदमयी है। यह प्रक्रिया किसी काल्पनिक लोक की सैर नहीं है, बल्कि उपलब्ध विवेक के प्रकाश में एक-एक कदम आगे बढ़ाने का नाम है। इस मार्ग पर आगे बढ़ने का अर्थ है कि हम अपनी धारणाओं, पूर्वग्रहों और दूसरों से सुने-सुनाए उधार ज्ञान को पूरी तरह पीछे छोड़ दें। जैसे-जैसे साधक इस अज्ञात की गहराई में उतरता है, उसकी बुद्धि का अहंकार गलने लगता है। वह पूरी ईमानदारी के साथ सत्य की खोज की प्रक्रिया का पालन करता है, जिससे उसके भीतर संशय के बादल छटने लगते हैं और चेतना का स्तर ऊपर उठने लगता है।
इस पूरी यात्रा का एकमात्र उद्देश्य उस परम तत्व की उपयोगिता को अपने स्वयं के जीवन में चरितार्थ करना और वास्तविकता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करना है। जब तक कोई विषय अज्ञात है, तब तक वह केवल एक बौद्धिक विचार या कल्पना मात्र है। लेकिन जब साधक स्वयं प्रयास करके उस अज्ञात के साथ एकरूप हो जाता है, तब उसका उद्देश्य पूर्ण हो जाता है। वह जान जाता है कि वास्तविकता किसी के बताने या सिखाने से नहीं, बल्कि स्वयं के रूपांतरण से ही समझ में आती है।
इस क्रमिक यात्रा का जो अंतिम परिणाम प्राप्त होता है, वह साधक को पूरी तरह बदल कर रख देता है। जब अज्ञात तत्व का वास्तविक स्वरूप अनुभव में आता है, तब अहम् भाव सदा के लिए विलीन हो जाता है। यह परिणाम साधक को एक अगाध शांति, स्थिरता और परम संतोष से भर देता है। अब वह किसी बाहरी प्रभाव, वाद-विवाद या भ्रामक कथाओं से विचलित नहीं होता, क्योंकि उसने वास्तविकता को स्वयं जिया है और उसका प्रामाणिक अनुभव प्राप्त किया है। यही अनुभव उसे जीवन के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित करता है।
अज्ञात से वास्तविकता के इस सफर को अपने भीतर गहराई से उतारने के लिए साधकों को इन प्रश्नों पर मंथन करना चाहिए:
 * जब हमारा अहम् भाव किसी बात को "न जानने" की स्वीकृति में बाधा बनता है, तब उस क्षण हम अपने भीतर सजगता कैसे पैदा करें?
 * किसी अज्ञात विषय के संदर्भ में काल्पनिक मान्यताओं को मानने और उसकी वास्तविक खोज की यात्रा पर निकलने में क्या अंतर है?
 * इस यात्रा के दौरान जब पुराने विचारों का अंत होता है और वास्तविकता सामने आती है, तब उस नए अनुभव को जीवन में पूरी तरह कैसे समाहित किया जाए?
अहम् भाव के विसर्जन और अज्ञात तत्व की यह दिव्य यात्रा आपको परम वास्तविकता का साक्षात् अनुभव कराए तथा आपका अंतर्मन सदा ज्ञान के प्रकाश से आलोकित रहे, इसी मंगल भावना के साथ व्याख्यान को यहीं विराम देते हैं।


Friday, December 24, 2021

👉मानस में नारी शब्द का वास्तविक अर्थ

*मानस में नारी शब्द का वास्तविक अर्थ*
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*ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ।*
*सकल ताडना के अधिकारी ।*
   मानस सुन्दर कांड 59/6

यहाँ पर नारी शब्द की आज तक अधिकतर की गयी व्याख्य्यायें स्त्री को ध्यान में रखकर की गयी हैं . जो सर्वथा अनुचित है,

परन्तु यह वाक्य समुद्र देव वरुण देव का है उसने इसमें अपने को न कहकर नारी को क्यों कहा ?

यह विचारणीय है !

यहाँ नारी शब्द से सागर स्वयं अपने को कह रहा है -

ध्यातव्य है कि नारी शब्द 2 प्रकार से व्याकरण कि दृष्टि से बनताहै ।

*( 1 )* मनुष्य वाचक नृ और नर शब्द से –नृनरयोर्वृद्धिश्च—पाणिनि सूत्र

(गणसूत्र) द्वारा वृद्धि होकर जिसका अर्थ है स्त्री ।

*( 2 )* नार शब्द से नारी शब्द कि निष्पत्ति होती है, नार का अर्थ है –जल |

प्रमाण –

*आपो नारा इति प्रोक्तः आपो वै नरसूनवः ।*

*ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।।*
         मनुस्मृति -1/10,

यहाँ आपो नारा से नार शब्द जल के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है ।

इसीलिये नारायण शब्द का अर्थ है जल में रहने वाले भगवान ।

*नारः =जलम् अयनं यस्य सः नारायणः ।*

मेदिनी कोष में भी “नार” शब्द जल का वाचक कहा गया है ।

*"नारस्तर्णकनीरयोः”*

जैसे ज्ञान शब्द से ज्ञानी (ज्ञान वाला ) बनता है ठीक वैसे ही जल वाचक नार शब्द

से नारी बनता है जिसका अर्थ है जल वाला अर्थात स्वयं समुद्र !

इसी की ताडना भगवान श्रारीम ने जब की है तब प्रकट हुआ है ।

ध्यातव्य है कि स्त्री वाचक नारी शब्द का रूप नारी, नार्यौ, नार्यः चलता है ।

और सागर वाचक नारी शब्द का रूप नारी, नारिणौ, नारिणः चलता है ।

क्योंकि यह 

*'अत इनिठनौ”*
5/2/115 पाणिनि सूत्र द्वारा “नार” शब्द से

इन् प्रत्यय करके बना है ! जिसका अर्थ समुद्र है ।

प्रकरण के अनुसार यही अर्थ मान्य है ! यहाँ नारी का अर्थ स्त्री करके लोगो ने

स्त्रियों और अपनी मेधा के साथ घोर अन्याय किया है !

अब इस प्रासंगिक अर्थ में न तो स्त्रियों कि निंदा है न ही कोई अनुपपत्ति ! ताडना

का शिकार नारी =समुद्र हुआ है कोई महिला नहीं ।
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👉चार प्रकार का ज्ञान होता है।

प्रिय आत्मन् 
जैसे आपका भोजन आपको स्वयं ही खाना पड़ता है, तभी भूख मिटती और शक्ति प्राप्त होती है। इसी प्रकार से आपको अपने मन में स्वयं झाड़ू लगानी होगी, तभी उससे मन की शुद्धता और प्रसन्नता प्राप्त होगी।

कुल मिलाकर चार प्रकार का ज्ञान होता है। मिथ्या ज्ञान, संशयात्मक ज्ञान, शाब्दिक ज्ञान, और तत्त्वज्ञान।

1- मिथ्या ज्ञान - उसे कहते हैं, जब वस्तु कुछ और हो और व्यक्ति उसे समझता कुछ और हो। जैसे  रस्सी को सांप समझना। यह मिथ्या ज्ञान है।

2- संशयात्मक ज्ञान - उसे कहते हैं, जब वस्तु समझ में ही नहीं आए। जैसे यह वस्तु रस्सी है, या सांप है, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा। कोई निर्णय नहीं हो पा रहा। ऐसी स्थिति में जो ज्ञान होता है, उसे संशयात्मक ज्ञान कहते हैं।

3- शाब्दिक ज्ञान - जब व्यक्ति शब्दों से तो किसी वस्तु को ठीक-ठीक समझ लेता है, जान लेता है, बोल भी देता है, परंतु वैसा आचरण नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति वाले ज्ञान को शाब्दिक ज्ञान कहते हैं। जैसे - क्रोध नहीं करना चाहिए। यह बात ठीक है। व्यक्ति समझता है, बोलता भी है, परंतु फिर भी इस के अनुकूल आचरण नहीं करता। व्यवहार में फिर भी क्रोध कर ही देता है। ऐसे ज्ञान को शाब्दिक ज्ञान कहते हैं।

4- चौथा है तत्त्वज्ञान - जब शाब्दिक ज्ञान को व्यक्ति अपने आचरण में भी ठीक वैसा ही उतार लेता है, जैसा वह शब्दों से कह रहा था। तो उसके ज्ञान को तत्त्वज्ञान कहते हैं। यही वास्तविक ज्ञान है। ऐसे वास्तविक ज्ञान से ही पूर्ण लाभ होता है।  जो व्यक्ति व्यवहार में क्रोध नहीं करता, उसका ज्ञान तत्त्वज्ञान है।

अब ज्ञान की इस व्यवस्था के अनुसार हमें यह भी समझना चाहिए, कि यदि घर में कूड़ा कचरा गंदगी रहेगी, तो घर दूषित रहेगा, और वहां जो भी बैठेगा, उसे सुख शांति आनंद नहीं मिलेगा। और यदि झाड़ू पोंछा लगा कर घर साफ-सुथरा होगा, तो वहां जो भी बैठेगा उसे सुख शांति आनंद मिलेगा। बैठना अच्छा लगेगा। मन प्रसन्न रहेगा।
इसी प्रकार से शाब्दिक ज्ञान तो सभी को है, कि यदि मन में क्रोध घृणा ईर्ष्या अभिमान आदि बुराइयां रहेंगी, तो मन अशुद्ध रहेगा, और उसके प्रभाव से व्यक्ति सारा दिन दुखी रहेगा। और यदि मन में  प्रेम दया सरलता नम्रता आदि अच्छे गुण रहेंगे, तब मन शुद्ध रहेगा, और व्यक्ति सारा दिन प्रसन्न रह पाएगा। इसलिए अपने मन को शुद्ध करना ही बुद्धिमत्ता है। मन को कचरा पेटी न बनाएं, फूलों का गुलदस्ता बनाएं।

परंतु जब तक व्यक्ति उस शाब्दिक ज्ञान को तत्त्वज्ञान में न बदल दे, तब तक उस शाब्दिक ज्ञान से कोई विशेष लाभ नहीं होता। केवल 10 20 प्रतिशत लाभ होता है। इसलिए अपने शाब्दिक ज्ञान को वास्तविक ज्ञान में अथवा तत्त्वज्ञान में बदलने का प्रयत्न करना चाहिए।

अब रही बात, कि ""शाब्दिक ज्ञान को तत्त्वज्ञान में कैसे बदलें ???""

इसका उपाय है, कि उस शाब्दिक ज्ञान को सैकड़ों बार दोहराएं। हर रोज दोहराएं। दिन में दो चार पांच दस बार दोहराएं। इसके बाद उस शाब्दिक ज्ञान को थोड़ा-थोड़ा अपने व्यवहार में लाएं। ऐसे व्यवहार में लाते लाते, धीरे-धीरे वह शाब्दिक ज्ञान तत्त्वज्ञान में बदल जाएगा। और आपका जीवन आनन्दित हो जाएगा।

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