Friday, February 26, 2021

बिना संकल्प

यदि में बिना संकल्प के प्रतिदिन 1 या 2 घंटे किसी मंत्र का जाप करता हूँ तो क्या मुझे उसका फल मिलेगा या नहीं?

जी हाँ मंत्रजप का फल अवश्य ही मिलेगा लेकिन होगा क्या और कैसे, आइये सबसे पहले ये जानते हैं | जैसे की आपने कहा की 1 या 2 घंटे तो इतना वक़्त अगर आप मंत्रजप को देंगे तो काफी संभव है की मंत्र का जाप कुछ हफ्ते या महीने के बाद स्वतः अपने आप शुरू हो जाये उदाहरण के तौर पर आपका शरीर, मन-मष्तिष्क एक ऐसे टेप-रिकॉर्डर की तरह बजने लगेगा जिसमें से हमेशा आपको उस मन्त्र के उच्चारण की आवाज हर-पल-हर-सेकंड आएगी जैसे की आप कहीं भी हों, कुछ भी कर रहे हो चाहे घर पर, ऑफिस में, सड़क पर, दूकान में, मार्किट में, ड्राइविंग कर रहे हो और यकायक आपको पता चलेगा की अरे ये मेरा मंत्रजप तो अपने आप हो रहा है, कुछ दिनों के बाद यह भ्रम आपका विश्वास में बदल जायेगा की सच में ही मंत्रजप अपने आप चल रहा है अब आप चाहे उसको खुद से जपें या ना जपें, कभी अचानक आधी रात को जागने पर पता चलेगा की मंत्र-जाप चल रहा है तो कभी सुबह जागोगे तो भी यह मंत्रोच्चारण आपको चलता हुआ मिलेगा |

यह तो है मंत्र की महिमा की एक निश्चित संख्या और समय के बाद मंत्र आपके शरीर के कुछ खास चक्रों को अपना यन्त्र बना लेता है और उन केंद्रों के ईष्ट देवी देवता आपके लिए उस मंत्रजप को करते हैं तो अब आपका यह शरीर एक चलता-फिरता मंदिर बन चुका है जहाँ सदैव परम-ईस्वर का गुणगान चलता रहता है, उनकी पूजा, स्तुति चलती रहती है इस मंत्र जप के जरिये | जरा सोंचिये की कैसा लगेगा जब आपका शरीर अब मंदिर बन चूका होगा, है ना एकदम अनूठा और आश्चर्यजनक 

तो यह तो हुआ मंत्रजप का सिस्टम कैसे एक तरीके से काम करता है आपके शरीर के चक्रों के द्वारा, यही चक्र आप कह सकते हैं की कुण्डिलिनी चक्र कहलाते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं की आपकी कुण्डिलिनी जागृत हो चुकी है, नहीं लेकिन हाँ यहाँ से आपकी कुंडलिनी यात्रा आरम्भ होती है | वैसे यह हर किसी व्यक्ति के साथ नहीं होता है कुछ विरले ही पैदा होते हैं, दिल के साफ़, सदाचारी, विनम्र, शांत ह्रदय के लोगों के साथ यह आध्यात्मिक सत्य घटना होने के साक्षात दर्शन और सुअवसर प्राप्त होने के चान्सेस ज्यादा होते हैं | अब आप इतना समझ लो की यह मंत्रजप और ध्यान-साधना, दोनों ही रास्ते एक मंजिल पर जाकर मिलते हैं वो है उस आदि-शक्ति से आपका मिलना और यह तय है क्यूंकि आप वह यन्त्र बन चुके हो जिसका सीधा समबन्ध इस ब्रहांड से है | तरह-तरह की ब्रहाण्डीय शक्तियों से आप रूबरू होने लगोगे, आप वो देखने लगोगे जो किसी और को नहीं दिख सकता, आप वो जानने लगोगे जो कोई और शायद सोंच भी ना पाए, आपको हरपल कुछ ऐसा होता दिखने लगेगा जोकि आपने कुछ देर पहले ही सोंचा था, तो यह बहुत आश्चर्य जनक बातें आपके साथ होने लगेंगी |

अगर आप मन से मजबूत हैं तो आप इतनी ऊर्जा को अपने आज्ञाचक्र और अनाहत पर संग्रह कर पाएंगे वरना तो ऊर्जा आपको व्यथित भी कर सकती है, आपके साथ बहुत इमोश्नल प्रपंच रचे जायेंगे, आप टूट सकने वाली सोंच में भी पड़ सकते हो क्यूंकि शायद आपकी इस आध्यात्मिक पढाई की वो हेडमास्टर परीक्षा भी लेता है शायद 

आपको इन सभी परीक्षाओं में सफल होना होगा जैसे की आपके व्यक्तिगत सम्बन्ध, पारिवारिक रिश्ते, व्यापारिक कार्य आदि सब खराब होने लगेंगे, बने-बनाये कार्य बिगड़ भी सकते हैं जिससे आपको अपनी मंत्रजप साधना से विश्वास डगमगाना पड़ सकता है, कुछ अलग तरह से भी आपके साथ हो सकता हो यहाँ नहीं लिखा है लेकिन फिर अचानक से आपको सबकुछ ठीक होने जैसा भी लगेगा तो यह ऊपर-नीचे आपके साथ चलता रहेगा और इन सबके आप इतने अभ्यस्त होते जाओगे की आपको स्वयं पता नहीं चलेगा कब आप बड़े-बड़े चक्रव्यहूों से यूँ ही निकल आये | वो कहते भी हैं ना की भगवान् भी भक्त की परीक्षा लेता है तो बड़े-बुजुर्ग सही कहावतें छोड़कर गए हैं |

खैर टॉपिक पर आते हैं, सो आपको इन सब उंच-नीच, दुःख-दर्द, रिश्ते-नाते, व्यापार-धंधे, प्रेम-घृणा जैसी प्राकृतिक भावनात्मक आपदाओं से लड़ने को तैयार रहना होगा बाकी तो मंत्रजप की शक्ति खुदबखुद ही आपको इन झंझावातों से बाहर निकाल कर लाएगी |

अब आते हैं अंत में की फल मिलेगा या नहीं तो हाँ अवश्य मिलेगा और वो कुछ धीमा प्रोसेस होगा, कार्य बनेंगे, मुश्किलें भी ख़तम होंगी और अच्छे दिन भी आएंगे लेकिन वो क्या है ना की यह जो मंत्रजाप आप कर रहे हो वो सबसे ज्यादा आपको मोक्षप्राप्ति की तरफ लेकर जाता है, कहते हैं की एक करोड़ मंत्रजप से मनुष्य शिवतत्व युक्त हो जाता है, देवतुल्य हो जाता है तो आपके साथ उसी तरह की दैवीय घटनाएं होंगी, भौतिक सुख-साधनों की प्राप्ति भी होगी लेकिन प्रारब्ध पहले आता है तो सभी केंद्रों में जो पूर्वजन्मों के कर्म संचित हैं वो काटेंगे आप, कष्ट होगा लेकिन कर्म कटेंगे जरूर |

यह ऊर्जा जिसको आप केवल और केवल आप छू पाओगे, इसको अपनी आँखों से देख पाओगे और सब नहीं तो कुछ रहस्यों से पर्दा उठ जाएगा, आपके हरे रंग की लम्बोर्गिनी कार वहीँ पास खड़ी होगी और आप सर्वोच्च के पास शिखर पर खड़े होंगे उस आदिशक्ति के पास जिसने यह मनुष्य को जनम दिया | जब ऊर्जा आये तो उसको संभालना जरूर सीखें दोस्त क्यूंकि यह होगा जरूर |

Wednesday, February 24, 2021

👉शारीरिक सम्बन्ध से आध्यात्मिक उर्जा का आदान प्रदान होता है

शारीरिक सम्बन्ध से आध्यात्मिक उर्जा का आदान प्रदान होता है
शारीरिक सम्बन्ध से ऊर्जा स्थानांतरित होती है 
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हजार बार सोचें शारीरिक सम्बन्ध बनाने के पहले [बेहद गंभीर तथ्य ]
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                                    प्रकृति में विकास और संतति उत्पत्ति का माध्यम शारीरिक सम्बन्ध है | सभी जीवों में यह होता है,वनस्पतियों में इसकी प्रकृति भिन्न होती है किन्तु होता वहां भी है बीजारोपण ही ,,भले परागों के ही रूप में क्यों न हो  | इस प्रक्रिया में जंतुओं में उत्तेजना और आनंद की अनुभूति होती है ,जिसे पाने अथवा एकाधिकारके लिए आपसी संघर्ष भी होते हैं | मनुष्य में यह देखने में और व्यवहार में एक सामान्य प्रक्रिया है जो संततिवृद्धि का माध्यम है | परन्तु इसमें बहुत बड़े बड़े रहस्य भी हैं और बहुत बड़ी बड़ी क्रियाएं भी होती हैं ,जोसम्बंधित व्यक्तियों को जीवन भर प्रभावित करती है | देखने समझने में मामूली सा लगने वाला आपसी शारीरिक सम्बन्ध पूरे जीवन अपना अच्छा अथवा बुराप्रभाव डालता ही रहता है ,भले एक बार ही किसी से शारीरिक सम्बन्ध क्यों न बने हों यह मात्र लिंग- योनी कासम्बन्ध और आपसी घर्षण से उत्पन्न आनंद ही नहीं होता ,अपितु यह दो ऊर्जा संरचनाओं ,ऊर्जा धाराओं केबीच की आपसी प्रतिक्रया भी होती है ,दो चक्रों की उर्जाओं का आपसी सम्बन्ध भी होता है |
                             बहुत लोग असहमत हो सकते हैं ,बहुत लोगों को मालूम नहीं हो सकता ,बहुत लोगों ने कभी सोचा ही नहीं होगा किन्तुयह अकाट्य सत्य है की यह आपसी सम्बन्ध ऊर्जा स्थानान्तरण करते हैं एक से दुसरे में ,यहाँ तक की बाद मेंभी इनमे ऊर्जा स्थानान्तरण होता रहता है ,बिना सम्बन्ध के भी  इसकी एक तकनिकी है ,इसका एक रहस्यहै ,जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा धारा से सम्बंधित है  |इसे हमारे ऋषि मुनि जानते थे ,इसीलिए उन्होंने कईयों सेशारीरिक सम्बन्ध रखने की वर्जना की ,भिन्न जातियों ,भिन्न लोगों से सम्बन्ध रखने को मना किया  | हिन्दू धर्म सहित कई धर्मो में पत्नी को अर्धांगिनी माना जाता है ,क्यों जबकि वह खून के रिश्ते में भी नहींहोती  ,इसलिए ,क्योकि वह आधा हिस्सा [रिनात्मक] होती है जो पति [धनात्मक] से मिलकर पूर्णता प्रदानकरती है | इसका मूल कारण इनका आपसी शारीरिक सम्बन्ध ही होता है ,अन्यथा वैवाहिक व्यवस्था तो एककृत्रिम सामाजिक व्यवस्था है सामाजिक उश्रीन्खलता रोकने का ,और यह सभी धर्मों में सामान भी नहीं है नविधियाँ ही समान है ,मन्त्रों से अथवा परम्पराओं- रीती- रिवाजों से रिश्ते नहीं बनते और न ही वह अर्धांगिनीबनती है | यही वह सूत्र है जिसके बल पर उसे पति के पुण्य का आधा फल प्राप्त होता है और पति को उसकेपुण्य का | वह सभी धर्म- कर्म ,पाप- पुण्य की भागीदार होती है ,इसलिए उसे अर्धांगिनी कहा जाता है |
                                सोचने वाली बात है कि ,जब पत्नी से शारीरिक सम्बन्ध रखने मात्र से उसे आपका आधा पाप पुण्य मिलजाता है ,तो जिस अन्य स्त्री या पुरुष से आप सम्बन्ध रखेंगे ,क्या उसे आपका पाप- पुण्य ,धर्म कर्म नहींमिलेगा  | जरुर मिलेगा इसका सूत्र और तकनिकी होता है | यह सब ऊर्जा का स्थानान्तरण है ,यह ऊर्जा काआपसी रति है ,यह उर्जाओं का आपसी सम्बन्ध है ,जो मूलाधार से सबन्धित होकर आपसी आदान- प्रदान कामाध्यम बन जाता है | यह भी भ्रम नहीं होना चाहिए की एक बार का सम्बन्ध से कुछ नहीं होता | एक बार का सम्बन्ध जीवन भर ऊर्जा स्थानान्तरण करता है ,भले उसकी मात्रा कम हो ,किन्तु होगी जरुर | भले आपकिसी वेश्या या पतित से सम्बन्ध बनाएं किन्तु तब भी ऊर्जा का स्थानान्तरण होगा | आपमें सकारात्मकऊर्जा है तो वह उसकी तरफ और उसमे नकारात्मक ऊर्जा है तो आपकी तरफ आएगी भी और आपको प्रभावित भी करेगी | यह तत्काल समझ में नहीं आता ,क्योकि आपमें नकारात्मकता या सकारात्मकता अधिक होसकती है जो क्रमशः विपरीत उर्जा आने से क्षरित होती है | अगर नकारात्मकता और सकारात्मकता कासंतुलन बराबर है और आपने किसी नकारामक ऊर्जा से ग्रस्त व्यक्ति से सम्बन्ध बना लिए तो आने वालीनकारात्मकता आपमें अधिक हो जायेगी और आपका संतुलन बिगड़ जाएगा ,फलतः आप कष्ट उठाने लगेंगे,,फिर भी चूंकि आपको इस रहस्य का पता नहीं है इसलिए आप इस कारण को न जान पायेंगे और न मानेंगे |किन्तु होता ऐसा ही है |
                  जब आप किसी से शारीरिक सम्बन्ध को उत्सुक होते हैं [भले वह काल गर्ल ही क्यों न हो या व्यावसायिक रूपसे सेक्स सेवा देने वाला पुरुष ही क्यों न हो ],तब आपने कामुकता जागती है और आपका मूलाधार अधिकसक्रिय हो अधिक तरंगें उत्पादित करता है | जब आप उस व्यक्ति या स्त्री से शारीरिक सम्बन्ध बना रहे होते हैंतो आपके ऊर्जा चक्र और ऊर्जा धाराओं का सम्बन्ध उसकी ऊर्जा धाराओं और चक्रों से हो जाता है ,क्योकिप्रकृति का प्रत्येक जीव एक आभामंडल से युक्त होता है जिसका सम्बन्ध चक्रों से होता है | आपसी समबन्धमें यह सम्बन्ध बनने से दोनों शरीरों में उपस्थित धनात्मक अथवा रिनात्मक उर्जाओं का आदान- प्रदान इससेतु से होने लगता है | इसमें मानसिक संपर्क इसे और बढ़ा देता है | 
                         सम्बन्ध समाप्त होने के बाद भी यह घटनाअवचेतन से जुडी रहती है ,भले आप प्रत्यक्ष भूल जाएँ ,साथ ही बने हुए ऊर्जा धाराओं के सम्बन्ध भी कभीसमाप्त पूरी तरह नहीं होते | यह ऊर्जा विज्ञान है ,जिसे सभी नहीं समझ पाते | ऐसे में जब कभी आपमें जिसप्रकार की ऊर्जा बढ़ेगी वह स्थानांतरित स्वयमेव होती रहेगी | मात्रा भले कम हो पर होगी जरुर | मात्रा कानिर्धारण सम्बंधित व्यक्ति से मानसिक जुड़ाव और संबन्धिन की मात्रा पर निर्भर करता है | इसी तरह जो आपके खून के रिश्ते में हैं वह भी आपके पाप- पुण्य पाते हैं ,क्योकि उनमे आपस में सम्बन्धहोते हैं | यही कारण है की कहा जाता है की पुत्र द्वारा किये धर्म से माता- पिता अथवा बंधू- बांधव स्वयं इसजगत के चक्रों से मुक्त हो सकते हैं | यही वह कारण है की साधू- महात्मा बचपन में घर त्याग को प्राथमिकतादेते हैं ,कि न अब और सम्बन्ध बनेगे न ऊर्जा स्थानान्तरण होगा | जो पहले से हैं उनमे तो होता ही होता है | अब और नए सम्बन्ध यथा पत्नी ,पुत्र ,पुत्री होने पर उनमे भी प्राप्त की जा रही ऊर्जा का स्थानान्तरण होगा औरपरम लक्ष्य के लिए अधिक श्रम करना होगा |पत्नी तो सीधे सर्वाधिक ऊर्जा प्राप्त करने लगती है ,संताने भीअति नजदीकी जुडी होने से ऊर्जा स्थानान्तरण पाती है |
                               यही वह सूत्र है ,जिसके कारण भैरवी साधना में भैरवी [साधिका] से भैरव [साधक] में ऊर्जा का स्थानान्तरणहोता है |जब साधना की जाती है तो शक्ति या ऊर्जा का पदार्पण भैरवी में ही होता है | इसका कारण होता है की साधिका के ऋणात्मक प्रकृति का होने से उसकी और उर्जा या शक्ति शीघ्र आकर्षित होती है ,क्योकि शक्ति की प्रकृति भी ऋणात्मक ही होती है और तंत्र साधना में शक्ति की साधना की जाती है | भैरव की प्रकृति धनात्मक होने से उसमे शक्ति आने में अधिक प्रयास और श्रम करना पड़ता है | जब शक्ति या उर्जा साधिकामें प्रवेश करती है तो वह मूलाधार के सम्बन्ध से ही साधक को प्राप्त होती है और साधक को सिद्धि और लक्ष्यप्राप्त होता है | साधिका सहायिक होने पर भी स्वयं सिद्ध होती जाती है ,क्योकि जिस भी ऊर्जा का आह्वानसाधक करता है वह पहले साधिका से ही साधक को प्राप्त होती है जिससे वह खुद सिद्ध होती जाती है ,जबकिसमस्त प्रयास साधक के होते हैं | यह सूत्र बताता है की शारीरिक सम्बन्ध और आपसी ऊर्जा धाराओं की क्रियासे ऊर्जा स्थानान्तरण होता है | 
                        आप अपने पत्नी या पति के अतिरिक्त किसी अन्य से शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं तो आपके अन्दरउपस्थित ऊर्जा [सकारात्मक या नकारात्मक ]उस व्यक्ति तक भी स्थानांतरित होती है |मान लीजिये आपनेकिसी पुण्य या साधना से या किसी अच्छे कर्म से १००% लाभदायक उर्जा प्राप्त की | आप अपनी पत्नी से सम्बन्ध रखते हैं ,इस तरह पत्नी को आधा उसका मिल जाएगा ,किन्तु आप किसी अन्य से भी शारीरिकसम्बन्ध रखते हैं तो तीनो में वह ऊर्जा ३३ - ३३% विभाजित हो जाएगी और उन्हें मिल जायेगी | यदि आपने कईयों से एक ही समय में सम्बन्ध रखे हैं तो प्राप्त या पहले से उपस्थित ऊर्जा उतने ही हिस्सों में बट जाएगी और आपको लेकर जितने लोग शारीरिक सम्बन्ध के दायरे में होंगे उतने हिस्से हो आपको एक हिस्सा मिलजायेगा बस |यहाँ कहावत हो जायेगी मेहनत की १०० के लिए मिला १० |जब आप किसी से शारीरिक सम्बन्धकुछ दिन रखते है [जैसे विवाह पूर्व अथवा बाद में ] और फिर वह सम्बन्ध टूट जाता है तब भी ऊर्जास्थानान्तरण रुकता नहीं ,,हाँ मात्रा जरुर कम हो जाती है ,पर बिलकुल समाप्त नहीं होती ,क्योकि आपकेसम्बन्ध को आपका अवचेतन याद रखता है और जो सम्बन्ध उस समय बने होते हैं वह अदृश्य ऊर्जा धाराओंमें हमेशा के लिए एक समबन्ध बना देते हैं |ऐसे में आप जीवन भर जो कुछ ऊर्जा अर्जित करेंगे वह उस व्यक्तिको खुद थोडा ही सही पर मिलता जरुर रहेगा और आपमें से कमी होती जरुर रहेगी |आप द्वारा किये गएकिसी धर्म–कर्म ,पूजा –साधना का पूर्ण परिणाम या साकारात्मक ऊर्जा आपको पूर्ण रूपें नहीं मिलेगा ,न आपजिसके लिए करेंगे उसे ही पूरा मिलेगा |
                          इस मामले में चरित्रहीन और गलत व्यक्ति लाभदायक स्थिति में होते हैं |वह कईयों से सम्बन्ध झूठ–सच केसहारे बनाते हैं |स्थिर कहीं नहीं रहते और व्यक्ति बदलते रहते हैं |ऐसे में होना तो यह चाहिए की उनका पतनऔर नुकसान हो |पर कभी कभी ही ऐसा होता है ,अति नकारात्मकता के कारण अन्यथा ,जिनसे जिनसेउन्होंने सम्बन्ध बनाये हैं ,उनके पुण्य प्रभाव और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्ति का प्रयास इन्हें भी अपने आपलाभदायक ऊर्जा दिलाता रहता है |इस तरह ये पाप करते हुए भी नकारात्मकता में कमी पाते रहते है |नुक्सानसत्कर्मी अथवा सकारात्मक ऊर्जा के लिए प्रयास रत अथवा सुख संमृद्धि–शान्ति की कामना वाले का होता है,उसकी एक भूल उसे हमेशा के लिए सकारात्मक ऊर्जा में कमी देती ही रहती है , फल उसे कभी नहीं मिल पाताअगर उसने कभी अन्य किसी से सम्बन्ध बना लिए हैं ,भले बाद में वह सुधर गया हो |उसे लक्ष्य प्राप्ति के लिएकई गुना अधिक प्रयास करना पड़ जाता है |किसी साधक –सन्यासी –साधू आदि से कोई अगर सम्बन्ध बनालेता है तो पहले तो तत्काल उसके नकारात्मक ऊर्जा का क्षय हो जाता है ,उसके बाद भी जब भी वह साधकसाधना से ऊर्जा प्राप्त करेगा ,उसका कुछ अंश अवश्य सम्बन्ध बनाने वाली को मिलता रहेगा |नुक्सान सिर्फसाधक या ऊर्जा प्राप्ति का प्रयास करने वाले का होता है |
                         इसलिए हमेशा इस दृष्टि से भी देखना चाहिए की आपकी एक गलती आपको जीवन भर कुछ कमी देती रहेगी|कभी आप पूर्ण सकारात्मक ऊर्जा अपने प्रयास का नहीं पायेंगे | यदि वह व्यक्ति जिससे आपने सम्बन्धबनाए हैं नकारात्मक ऊर्जा से ग्रस्त है तो आप बिना कुछ किये नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में आयेंगे | यदि यह अधिक हुआ और संतुलन बिगड़ा तो आपका पतन होने लगेगा | इसलिए कभी किसी अन्य से या यहाँ वहांशारीरिक सम्बन्ध न बनायें | विवाह पूर्व ऐसे संबंधों से दूर रहें ,अन्यथा बाद में पति या पत्नी को बहुत चाहनेऔर पूर्ण समर्पित होने के बाद भी आप उसे अपने धर्म–कर्म का पूर्ण परिणाम नहीं दिला सकेंगे |बिना चाहेआपकी ऊर्जा कहीं और भी स्थानांतरित होती रहेगी |……[यह स्वयं की जानकारियों और समझ के आधारपर बने व्यक्तिगत विचार है  हर कोई सहमत होअथवा समझ पाए आवश्यक नहीं है -]…………………………………………………………..हर–हरमहादेव

👉कौनसी दस आदतों ने आपका जीवन बदल दिया?

१ सुंदरकांड - मैं २०१७ से सुंदरकांड का पाठ कर रही हूं । मेरी जिंदगी में हर एक बदलाव सुंदरकांड पाठ से हुए हैं एवं मुझे भगवान की भक्ति में और भी ज्यादा रस मिलने लगा ‌‌‌‌है । श्री सीताराम जी मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं।

२ सूर्योदय के पहले उठना - मैं हर रोज 3:00 से 4:00 के बीच में उठ जाती हूं और 9 - 10 के बीच सो जाती हूं।

३ व्यायाम करना - मैं आधा घंटे का व्यायाम करती हूं एवं 2–2मिनट का कपालभाति प्राणायाम और अनुलोम विलोम प्राणायाम करती हूं ।

४ हर रोज़ डायरी लिखना - मेरी सबसे अच्छी सहेली मेरी डायरी है । मेरी डायरी में मेरी जिंदगी के हर राज़ छिपे हैं । मैं हर रोज डायरी लिखती हूं । लिखते लिखते ही मुझे मेरी समस्याओं का हल मिल जाता है ।

५ कुछ बाहर खाती हूं तो किसी बच्चे को भी खिला देती हूं - जब भगवान ने हमें इस लायक बनाया है तो क्यों ना हम थोड़ा सा उन लोगों को भी खिला दें ,आखिर वह भी तो बच्चे हैं वह भी खुश हो जाते हैं । मेरी इस आदत के लिए मुझे कई बार डांट भी पड़ जाती है ।

६ पौधों से प्रेम - मुझे पेड़ पौधों की देखभाल करना बहुत पसंद है , मैं उनसे बातें करती हूं। मुझे उनके पास बैठकर बहुत सुकून मिलता है ।

७ किताबें पढ़ना - जब से मैंने किताबें पढ़ना शुरू किया है, तब से पता चला कि इन किताबों में कितने कीमती अल्फाज़ हैं जो इंसान को ही बदल कर रख देते हैं । मेरी सबसे पसंदीदा किताब है एक सन्यासी जिसने

८ ऐतिहासिक फिल्में देखना - मैंने अब ऐतिहासिक , जीवनी एवं साउथ की फ़िल्में देखना शुरू कर दिया है । मैं हफ्ते में एक मूवी देखती हूं ।

९ पापा की सलाह डायरी में लिखना - क्योंकि उनकी सलाह बार-बार पढ़कर मैं इस दुनिया के झूठे और फरेबी लोगों से बच जाती हूं । मेरे पापा का कहना है जो इंसान स्वयं की गलती पहचान कर सुधार कर ले , उससे महान व्यक्ति कोई नहीं ।

१० पढाई - भले ही मैं कुछ पाने के लिए पढ़ाई कर रही हूं पर जब से मैंने पढ़ना शुरू किया है तब से मुझे बहुत कुछ जानने को मिला। मुझमें नई नई चीजें जाने की इच्छा बढ़ने लगी ।

Wednesday, February 17, 2021

👉कटु सत्य

पोस्ट डली नही की पहुच गए इनबॉक्स में मेसेज पहले से तैयार रहता है क्योंकि बहुत से ज्योतिषियों को भेजा हुआ रहता है तो कॉपी पेस्ट कर दिया 
महाराज आर्थिक स्थिति अच्छी नही है फीस नही दे सकता अब इस गरीब के पास कमसे कम 10हजार का फोन और 599 रु रिचार्ज के है 
दूसरे महाराज स्टूडेंट हु तो भाई जब तू स्टूडेंट है तो ज्योतिष की तुम्हे जरूरत ही नही है हा जरूरत जब पड़ेगी जब छात्र जीवन के नियमो का पालन नही केरेगा धूम्रपान करकर लड़की बाजी में पड़कर छात्र जीवन का तो सत्यानाश कर लिया जब ग्रहो का दंड मिल रहा है तो रोना रो रहे हो 
महाराज सरकारी नोकरी लगेगी या नही अनुशाशन में रहके पढ़ाई करो शनि महाराज ओर मंगल महाराज अनुशाशन में रहने वाले को बहुत कुछ दे देते है ब्रहा मुहूर्त का पता तुम्हे है नही ओर सोच रहे हो सरकारी नोकरी
एक आते है महाराज केवल एक प्रश्न है अरे भाई प्रश्न एक हो या दस कुंडली तो बनाकर अगला पूरा ही देखेगा महाराज विवाह नही हो रहा है लड़की हु घरवालो पर निर्भर हु फीस नही है घरवाले पैसे नही देते तो मोबाइल और उसमे होने वाला रिचार्ज कहा से आता है 
एक ये महाराज बेरोजगार हु तो भाई कुंडली छोड़ ओर जॉब ढूंढने में हाड़ तोड़ मेहनत करो शनि एक्टिव होगा और नोकरी मिल जाएगी 
महाराज जी पत्नी छोड़कर चली गई है आर्थिक स्थिति खराब है तो भाई जब शुक्र ही चला गया तो आर्थिक स्थिति कहा से ठीक होगी बची खुची कसर फ्री में पूछ पूछकर ब्रह्स्पति ओर खराब कर लो फिर फिरते रहना 
ओर सबसे बड़े तो ये प्रेमिका छोड़कर चली गई है महाराज लाखो रु लूटा चुका हूं काम होने के बाद आपको मुह मांगे पैसे दूंगा अब भाई एक बात बताओ अगर लाखो रु ही तुम्हारे पास थे तो उसी समय विवाह कर लेते  क्यों ऐसी परिस्थितिया की की वो छोड़कर चली गई 

तुम जगह जगह कुंडलियां पोस्ट करकर या जगह जगह निशुल्क पूछकर झूठ बोलकर राहु ब्रह्स्पति मंगल सूर्य को इस कदर खराब कर लेते हो कि उनको ठीक करने में तुम्हे पसीना आ जाता है 
जो व्यक्ति इस क्षेत्र में होगा जिसके सब कुछ ज्योतिष ही होगा वो तो फीस लेगा ही ओर सच्चाई है निशुल्क के उपायो से आज तक किसी का भला नही हुआ है 
ओर गारंटी तो ऐसे मांगते हो जैसे खरीद रहे हो ज्योतिषी को 
किसी डॉक्टर से गारंटी लेते हो क्या वो काकाजी तो ऑपरेशन के पहले कागज साइन करवा लेता है कि कुछ हो गया तो हमारी जिम्मेदारी नही होगी वहाँ कहा जाती है तुम्हारी गारंटी
रही बात समाज सेवा की तो समाज सेवा फेसबुक पर नही होती है लोगो के बीच मे रहकर होती है 

किसी की मेहनत मारकर क्या सोचते हो इशबर तुम्हारी मेहनत का परिणाम तुम्हे दे देगा क्या 

कुछ लोगो को पोस्ट बुरी लग सकती है जिनको बुरी लगे वो 11 बार ये बोले जो नीचे लिखा है 
जय महाकाल
जय मातादी

Saturday, February 13, 2021

👉गीता प्रश्न मंच

  1. १--- धृतराष्ट्र ने संजय से क्या पूंछा ?
    उत्तर --- धृतराष्ट्र ने संजय पूंछा कि धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में पाण्डव और दुर्योधन क्या कर रहे हैं ?
    प्रश्न २ --- संजय ने धृतराष्ट्र को क्या उत्तर दिया ?
    उत्तर ---- संजय ने उत्तर दिया की दुर्योधन द्रोणाचार्य के पास जाकर उनका ध्यान दोनों सेनाओं के अवलोकन
                      की तरफ आकर्षित करना चाह रहा है।
    प्र्शन ३ ----  संख्या और बल से संपन्न होते हुए भी वह अपनी सेना को पाण्डव की सेना से अपर्याप्त यानी
                      कमजोर क्यों समझता है ?
    उत्तर ----- संख्या और बल में संपन्न होते हुए भी वह अपनी सेना को अपर्याप्त इसलिए समझता है क्योकि
                      उसके सेना पति उभय पक्षी भीष्मपितामह हैं जबकि पाण्डव सेना में स्वपक्षी भीम हैं।
    प्रश्न  ४ -- श्री कृष्ण के रथ में किस रंग के घोड़े जुते हुए हैं ?
    उत्तर --- श्री कृष्ण के घोड़े में सफ़ेद रंग के घोड़े जुते हुए हैं।
    प्रश्न ५ --- श्री कृष्ण के शंख का नाम क्या था ?
    उत्तर ---- श्री कृष्ण के शंख का नाम पाञ्चजन्य थ है।
    प्रश्न ६ --  अर्जुन के शंख का नाम क्या था ?
    उत्तर ---- अर्जुन के शंख का नाम देवदत्त था।
    प्रशन ७ --- भीम के शंख का नाम क्या था ?
    उत्तर ----- भीम के शंख का नाम पौंड्र था।
    प्रश्न  ८ ----भीम को बृकोदर क्यों कहा गया ?
    उत्तर -------भोजन अधिक करने के कारण।
    प्रश्न  ९ ---- युधिष्ठिर के शंख का नाम क्या था ?
    उत्तर ---- युधिष्ठिर के शंक का नाम अनंत विजय थ.
    प्रश्न १० -- नकुल के शंख का नाम क्या था ?
    उत्तर --- नकुल के शंख का नाम सुघोष था।
    प्रश्न ११ ----सहदेव के शंक का नाम क्या था ?
    उत्तर ----- सहदेव के शंख का नाम मणिपुष्पक था।
    प्रश्न १२ --- अर्जुन के झंडे में किसका चिन्ह अंकित था।
    उत्तर -----अर्जुन के झंडे में हनुमान का चिन्ह अंकित था।
     प्रश्न १३ ---- अर्जुन को विरित क्यों हो जाती है ?
    उत्तर --दोनों सेनाओं में अपने ही सगे सम्बं सम्बन्धियों को देखकर अर्जुन का दिल दहल जाता है। और उन्हें युद्ध से विरित हो जाती है।
    प्रश्न १४ ---  स्वजनों के मरने और मारने से किस बात का भय अर्जुन को सर्वाधिक विचलित करता है ?
    उत्तर ---  स्वजनों के मरने और मरने से कुलधर्म के नष्ट होने और वर्णशंकर की उतपत्ति का भय अर्जुन को
                    विचलित करता है।
    प्रश्न १५ --  श्री कृष्ण के समझाने पर भी युद्ध न करने का कारणं अर्जुन क्या बताते हैं ?
    उत्तर ---    श्री कृष्ण के समझाने पर भी युद्ध न करने का कारण  अर्जुन बताते हैं कि भीष्मपितामह और        
                      द्रोणाचार्य दोनों ही  पूज्यनीय हैं , जिनसे युद्ध करना होगा।  
    प्रश्न १६ ---  यह शरीर यानी देह कैसा है ?
    उत्तर ---     यह शरीर परिवर्तन शील और नश्वर है।
    प्रश्न १७ --  मोक्ष के योग्य कौन होता है ?
    उत्तर --    मोक्ष के योग्य वह होता है जो दुःख -सुख को समान समझे इन्द्रिय और विषय के संयोग से व्याकुल
                     न हो।
    प्रश्न १८ -- नाशरहित कौन है ? अथवा  नष्ट  कौन नहीं होता ?
    उत्तर ---   नाश रहित जीवात्मा है।
    प्रश्न १९ --  नाशवान कौन है ? अथवा नष्ट कौन होता है ?
    उत्तर ---  नाशवान शरीर है।
    प्रश्न २० --  श्री कृष्ण अर्जुन को पृथा पुत्र क्यों कहते हैं ?
    उत्तर ---- श्री कृष्ण अर्जुन को पृथा पुत्र इसलिए कहते हैं क्योंकि अर्जुन कुन्ती के पुत्र हैं और कुन्ती का एक नाम
                    पृथा भी है।
    प्रशन २१ -- ऐसी कौन सी चीज है जिसे शस्त्र काट नहीं सकते , अग्नि जला नहीं सकती , जल गीला नहीं कर
                       सकता , वायु सुखा नहीं सकती।
    उत्तर ---  आत्मा।
    प्रश्न २२ --  योग क्या कहलाता है ?
    उत्तर ---   फल- अफल , सुख - दुःख , सिद्धि - असिद्धी ,में समत्व ही योग कहलाता है।
    प्रश्न २३ --- क्षेम क्या है ?
    उत्त्तर --प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है।
    प्रश्न २४ -- समत्वं क्या है ?
    उत्तर ---- पूर्ण -अपूर्ण एवं फल -अफल में सम भाव ही समत्व है।
    प्रश्न २५ --कैसा कर्म निम्न श्रेणी का माना जाता है ?
    उत्तर --- सकाम कर्म।
    प्रश्न  २६ -- गीता में दल -दल किसे कहा गया है ?
    उत्तर ---- मोह को।
    प्रश्न २७ --- स्थित प्रज्ञ कौन है ?
    उत्तर ------समस्त कामनाओं को त्याग देने वाला , आत्म संतुष्ट व्यक्ति स्थित प्रज्ञ है।
    प्रश्न २८ --- स्थिर बुद्धि मनुष्य के क्या लक्षण हैं ?
    उत्तर ---- दुःख में उद्विग्न नहीं होने वाला , सुख में निःस्पृह रहने वाला , राग , भय , क्रोध से मुक्त मुनि स्थिर
                   बुद्धि  जाता है।
    प्रश्न २९ --- स्थिर बुद्धि किसकी हो सकती है ?
    उत्तर ------जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया हो।
    प्रश्न ३० --- क्रोध कब उत्पन्न होता है ?
    उत्तर ------- कामना में विध्न उत्पन्न होने पर।
    प्रश्न ३१ ---क्रोध होने पर इंशान पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
    उत्तर ---- ज्ञान (बुद्धि ) का नाश होता है।
    प्रश्न ३२ -- दुःख की उत्तपत्ति कब होती है ?
     उत्तर --- निश्चयात्मिका बुद्धि के आभाव में शांत रहित मनुष्य में दुःख की उत्तपत्ति होती है।
    प्रश्न ३३ -- शांति किसे प्राप्त होती है ?
    उत्तर --- कामना,  ममता , अहंकार , स्पृहा (लालच ) रहित व्यकित को शान्ति प्राप्त होती है।
    प्रश्न ३४ --  निष्ठा (पराकाष्ठा ) क्या है ?
     उत्तर ----- साधन की परिपक्व अवस्था अर्थात पराकाष्ठा  नाम निष्ठा है।
    प्रश्न ३५ --- सम्पूर्ण निष्ठा किस योग के द्वारा प्राप्त होती है ?
     उत्तर ---- कर्म योग के द्वारा।
     प्रश्न ३५ -- समत्व योग , बुद्धि योग , कर्म योग , तदर्थ कर्म , मदर्थ कर्म , आदि किसे कहा गया है ?
    उत्तर ----- निष्काम कर्म योग को।
    प्रश्न ३६ -- समत्व योग किसे कहते हैं ?
    उत्तर ---- समबुद्धि युक्त पुरुष पाप-पुण्य से ऊपर उठ कर कर्म वन्धन से छूट जाते हैं , और सभी कार्यों में रुचि                लेते हैं तब उसे समत्व योग कहा जाता है।  (सम बुद्धि को )

    प्रश्न ३७ ---- निष्ठा कितने प्रकार की होती है ? और कौन - कौन सी होती है ?
    उत्तर ------ निष्ठा दो प्रकार की होती है।  सांख्य योग ( भक्ति योग ) ज्ञान योग , कर्म योग।
    प्रश्न ३८ -- श्रेष्ठ योग कौन सा मन गया है ?
    उत्तर ---- कर्म योग।
    प्रश्न३९  --- सर्व प्रथम योग की बात किसने - किससे की थी ?
    उत्तर --- कृष्ण ने सूर्य से विष्णु रूप में।
    प्रश्न४० -- श्री कृष्ण इस पृथ्वी पर कब - कब आने की बात किससे कहते हैं ?
    उत्तर -----  कृष्ण अधर्म की बृद्धि पर आने की बात अर्जुन से कहते हैं।
    प्रश्न ४१ --- युद्ध कहाँ हुआ था ?
    उत्तर ----- कुरुक्षेत्र में।
    प्रश्न ४२ -- कौरव कौन थे ?
    उत्तर ----- कुरु के वंशज।
    प्रश्न ४३ -- कुरु क्षेत्र का नाम कुरु क्षेत्र क्यों पड़ा ?
    उत्तर ----- राजा कुरु के तपो भूमि के कारण।
    प्रश्न ४४ -- धृतराष्ट्र कौन थे ?
     उत्तर ---- हस्तिना पुर के राजा।
    प्रश्न ४५ -- संजय कौन थे ?
    उत्तर ----- धृतराष्ट्र के मुख्य सचिव।
    प्रश्न ४६ -- दुर्योधन कौन था ?
    उत्तर ---- धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र।
    प्रश्न ४७ -- भीष्म पितामह कौन थे ?
    उत्तर ---- कौरव - पांडव पर दादा।
    प्रश्न ४८ -- पांडव कौन थे ?
    उत्तर ---- राजा पाण्डु के पांच पुत्र।
    प्रश्न ४९ -- कर्ण कौन था ?
    उत्तर --- सूर्य पुत्र कुंती का बेटा।
    प्रश्न ५० -- भीष्म पितामह के माता - पिता का नाम क्या था ?
    उत्तर ---  माता का नाम गंगा और पिता का नाम शान्तनु था।
    प्रश्न ५१ --  शान्तनु कौन थे ?
    उत्तर ---- कुरु के वंशज , हस्तिना पुर के राजा , तथा कौरव - पाण्डव के पूर्वज।
    प्रश्न ५२ -- विदुर कौन थे ?
    उत्तर ---- कुरु वंश के दासी पुत्र , तथा  धृतराष्ट्र के धार्मिक सलाह कार।
    प्रश्न ५३  --- द्वारिका धीश कौन थे ?
    उत्तर ---  श्री कृष्ण।
    प्रश्न   ५४ -  दुर्योधन - द्रोणाचार्य के पास जाकर क्या कहता है ?
    उत्तर ----- कौरव - पाण्डव की सेना पर ध्यान आकृष्ट करने के लिए - दोनों सेनाओं को देखने के लिए कहता है।
    प्रश्न ५५ -- द्रोणाचार्य कौन थे ?
    उत्तर --- कौरव - पाण्डव के गुरु।
    प्रश्न ५६ -- कृपाचार्य कौन थे ?
    उत्तर ----- कौरव वंश के कुलगुरु।
    प्रश्न ५७ -- विकर्ण कौन था ?
     उत्तर --- दुर्धोधन का भाई।
    प्रश्न ५८ --- अश्वत्थामा  कौन था ?
    उत्तर ------- द्रोणाचर्य का पुत्र।
    प्रश्न ५९ -- अश्वत्थामा एवं द्रोणाचार्य किसके तरफ से युद्ध कर रहे थे ?
    उत्तर ---- दुर्योधन के तरफ से (कौरव के तरफ से )
    प्रश्न ६० -- दुर्योधन अपनी सेना को कमजोर क्यों समझता है ?
    उत्तर ----- क्योंकि उसके सेना पति उभय पक्षी भीष्मपितामह हैं।  जो पांडवों का पक्ष लेते हैं।
    प्रश्न ६१ -- पांडव सेना के सेना पति कौन हैं ?
    उत्तर ---- धृष्टद्युम्न।
    प्रश्न ६२ -- अर्जुन सेना के मध्य में क्यों जाते हैं ?
    उत्तर ---- दोनों सेनाओं को देखने के लिए।
    प्रश्न ६३ -- अर्जुन के सारथि कौन थे ?
    उत्तर ---- श्री कृष्ण।
    प्रश्न ६४ -- अर्जुन को युद्ध से सन्यास ( विरति ) क्यों हो जाती है ?
    उत्तर --- क्योंकि दोनों पक्षों में उन्ही के कुटुम्बी थे , जिन्हे देखकर उन्हें विरति हो जाती है।
    प्रश्न ६५ -- गीता का उपदेश कौन - कहाँ - किसे सुनते हैं ?
    उत्तर --- श्री कृष्ण कुरु क्षेत्र में अर्जुन को।
    प्रश्न ६६ -- श्री कृष्ण सेना के बीच में जाकर अर्जुन से क्या कहते हैं ? और क्यों ?
    उत्तर ---  सुहृदों को देखने के लिए।  क्योंकि वह अर्जुन के अन्तर का मोह जगाना चाहते थे।
    प्रश्न ६७ -- श्री कृष्ण कौन सा शंख बजाते हैं ?
    उत्तर --- पाञ्चजन्य।
    प्रश्न ६८ -- भीम कौन सा शंख बजाते हैं ?
    उत्तर -- पौण्ड्र।
    प्रशन ६९ -- अर्जुन कौन सा शंख बजाते हैं ? या अर्जुन के शंख का नाम क्या है ?
    उत्तर -- देवदत्त।
    प्रश्न ७० -- नकुल के शंख का नाम क्या है ?
    उत्तर --  सुघोष।
    प्रश्न ७१ -- सहदेव के शंख का नाम क्या है ?
    उत्तर -- मणिपुष्पक।
    प्रश्न ७२ -- संजय - पाण्डव का विस्तार में कौरव का संक्षेप में वर्णन क्यों करते हैं ?
    उत्तर -- क्योंकि संजय की आस्था न्याय के तरफ है।
    प्रश्न ७३ -- शिखण्डी कौन था ?
     उत्तर -- शिखंडी राजा द्रुपद की पुत्री था , जो तप - बल से पुरुष बनी थी।
    प्रश्न ७४ -- युधिष्ठिर के शंख का नाम क्या था ?
    उत्तर --- अनन्त विजय।
    प्रश्न ७५ -- सेना पति न होते हुए भी सर्व प्रथम युद्ध घोष शंख श्री कृष्ण क्यों बजाते हैं ?
    उत्तर --- क्योंकि पाण्डव पक्ष में वही सर्वश्रेष्ठ थे।
    प्रश्न ७६ -- द्रुपद कौन थे ?
    उत्तर --- द्रुपद - द्रोपदी के पिता एवं पाण्डवों के स्वसुर थे।
    प्रश्न ७७ -- जनार्दन कौन थे ?
    उत्तर -- श्री कृष्ण।
    प्रश्न ७८ --  कितने प्रकार के होते हैं ?नाम बताइये -
    उत्तर ----- तीन प्रकार के होते हैं।  नाम है -- भक्ति योग।, कर्म योग , ज्ञान योग।
    प्रश्न ७९ --- विभूति क्या कहलाती है ?
    उत्तर ----- ऐश्वर्य , अलौकिक शक्ति ही विभूति कहलाती है।
    प्रश्न ८० -- स्थित प्रज्ञ किसे कहते हैं ?
    उत्तर -----  इन्द्रियों को वश में करने वालों को  स्थित प्रज्ञ कहते हैं।
    प्रश्न ८१ --- गीता उपदेश में  कृष्ण ने सबसे बड़ा योग  कौन सा बताया है ?
    उत्तर --- निष्काम कर्म योग।
    प्रश्न ८२ -- गुण कितने और कौन - कौन से होते हैं ?
    उत्तर --- गुण तीन होते हैं - १ - सात्विक २- राजस ३- तामस।
    प्रश्न ८३ -- त्रिलोकी क्या है ? उसके नाम कौन - कौन से हैं ?
    उत्तर --- त्रिलोकी तीनों लोक हैं - उनके नाम हैं -- मृत्यु लोक २ - स्वर्ग लोक ३ पाताल लोक।
    प्रश्न ८४ -- विराट दर्शन किसने किसे दिया ?
    उत्तर --- श्री कृष्ण ने अर्जुन को।
    प्रश्न ८५ -- सूर्य ने योग विद्या किसे सिखाई थी ?
    उत्तर -- मनु को।
    प्रश्न ८६ -- मनु ने योग विद्या किसे सिखाई ?
    उत्तर --- राजा इक्ष्वाकु को।
    प्रश्न ८७ -- चातुष्य वर्ण( चार वर्णों) का उल्लेख गीता में किसके लिए किया गया है ?
    उत्तर --- चार वर्णों का उल्लेख - १ ब्राम्हण २ -  क्षत्रिय  ३ - शूद्र के लिए किया गया है।
    प्रश्न ८८ -- पंचेन्द्रियों का नाम बताइये --
    उत्तर -- पांच इन्द्रियाँ  १- नाक २- कान ३- आँख ४- जीव्हा ५- त्वचा हैं
    प्रश्न ८९ -- महाभारत संग्राम का नाम महाभारत क्यों पड़ा ?
    उत्तर --- क्योंकि कौरव - पाण्डव राजा  भरत के वंशज थे , इसलिए उन्हें भारत कहा गया।  महा युद्ध कौरव और              पाण्डव के ही बीच हुआ , इसीलिये इस युद्ध का नाम महाभारत पड़ा।
    प्रश्न ९० -- भारत शब्द सम्बोधन किसने - किसके लिए किया ?
    उत्तर --- श्री कृष्ण ने अर्जुन के लिए।
    प्रश्न ९१ --- युद्ध में विजय श्री किसे और क्यों मिलेगी ? यह उद्गार किसने किससे किया ?
    उत्तर --- युद्ध में विजय श्री अर्जुन को मिलेगी क्योंकि योगेश्वर  कृष्ण उन्ही के तरफ हैं.
    प्रश्न ९२ -- श्री कृष्ण योगेश्वर शब्द पर बल क्यों दिया गया है ?
     उत्तर -- क्योंकि वह महान योगी थे।  योग वल से गीता उपदेश के समय उन्होंने कुरु क्षेत्र में सूर्य की गति को                     रोक दिया था।
    प्रश्न ९३ -- वेद कितने होते हैं ? नाम बताइये।
    उत्तर -- वेद चार होते हैं -- १ - ऋगवेद २ - सामवेद  ३ - यजुर्वेद  ४ - अथर्ववेद।
    प्रश्न ९४ -- श्री कृष्ण के कुल कितने भाव हैं ?
    उत्तर -- २० ( बीस )
    प्रश्न ९५ -- संसार में प्रभव (मूल कारन ) कौन है ?
     उत्तर -- श्री कृष्ण (अनादि )
    प्रश्न ९६ --  प्रकाश में श्री कृष्ण कौन हैं ? 
    उत्तर ----- सूरज।
    प्रश्न ९७ -- वामन रूप में श्री कृष्ण किसके पुत्र थे ?
    उत्तर --  अदिति के।  ( वृष्णु )
    प्रश्न ९८ -- भूतों (जीव ) के ह्रदय में स्थित आत्मा  कौन है ?
    उत्तर ---- श्री कृष्ण।
    प्रश्न ९९ --- गीता के अनुसार श्री कृष्ण किस - किस तत्व में क्या - क्या हैं ?
    उत्तर --- १- नक्षत्रों में चन्द्रमा हैं   २- वेदों में सामवेद  ३ - देवों में इन्द्र ४- इन्द्रियों में मन ५- ग्यारह रुद्रों में शिव
                ६ - धन के स्वामी कुवेर - आठों वसुओं में   ७- तेज में  अग्नि ८ - पर्वतों में सुमेरु ९ --पुरोहितों में                          बृहस्पति  १० -  सेनापति में स्कन्द ११ -- जलाशयों में समुद्र  १२ - महर्षियों में भृगु  १३ - अक्षर (प्रणव)              में ओंकार  १४ - यज्ञों में जप यज्ञ   १५ - स्थिर में हिमालय  १६ - वृक्षों पीपल  १७ -  देवर्षियों में नारद
                 १८ - गन्धर्वों में चित्ररथ  १९ - सिद्धों में कपिल  २० - घोड़ों में उच्चैः श्रवा  २१ हंथियों में ऐरावत  २२-
                मनुष्यों में राजा २३ - शास्त्रों में दंड  २४- गौ में कामधेनु  २५ - सर्पों में वासुकि  २६ - नागों में शेषनाग
               २७ - जलचरों के देवता में  वरुण २८ - पितरों में  अर्यमा  २९ - शाशक में यमराज  ३० - दैत्यों में प्रह्लाद
                ३१ - गणना ( गिनती ) में समय  ३२ - पशुओं में सिंह  ३३ - पक्षियों में गरुण  ३४ - मछलियों ( जलजीवों             में  मगर  ३५ - नदियों गंगा ३६ - शास्त्र धारियों में श्री राम  ३७ - समास में द्वन्द समास  ३८ - छंद में                 गायत्री छंद  ३९ - महीनें में उत्तम मार्गशीर्ष  ४० - ऋतुओं में वसंत  ४१ - कवियों में शुक्राचार्य  ४२ -                 वृष्ण वंश में वासुदेव  ४३ - गुप्त भाव में मौन भाव  ४४-  सबका पालक पोषक में  , चारों तरफ मुख वाला                 विराट  स्वरूप  ४५ -  नष्ट करने वाला मृत्यु  ४६ - उत्पत्ति का कारण  ४७ - स्त्रियों में कीर्ति  , श्री ,वाक् ,             स्मृति ,   मेधा , धृति , क्षमा , ४८ - गायन श्रुतियों में वृहत्साम  ५० - छल में जुआं ५१ - पुरुषों में प्रभाव              ५२ -   जीतने वालों में विजय  ५३ - निश्चय करने वालों में निश्चय  ५४ -  भावों में सात्विक भाव  ५५ -                पाण्डवों में धनञ्जय  ( अर्जुन )  ५६ - मुनियों में वेद व्यास  ५७ - दमन करनेमें दमन शक्ति।  ये सभी श्री            कृष्ण के स्वरूप   हैं।
    प्रश्न १००---- विराट रूप किसने और कहाँ धारण किया ?
    उत्तर --- श्री कृष्ण ने कुरु क्षेत्र में।
    प्रश्न १०१ --अर्जुन के  अतिरिक्ति गीता  उपदेश किसने  देखा और सुना ?
    उत्तर ------ संजय ने।
    प्रश्न १०२ -- संजय को  कुरुक्षेत्र  दृश्य कैसे दिखाई दिया ?
    उत्तर ----- दिव्य दृष्टि से।
    प्रश्न १०३ -- संजय को दिव्य दृष्टि कैसे मिली ?
     उत्तर ---- वेद व्यास से।
    प्रश्न १०४ -- महाभारत का आँखों देखा वर्णनं किसने किया ?
    उत्तर ------ संजय ने।
    प्रश्न १०५ - वेद व्यास ने कितने वेद लिखे ?
    उत्तर -------चार
    प्रश्न १०६ - श्री कृष्ण ने अर्जुन को पार्थ क्यों कहा ?
    उत्तर ------ राजा पृथु की पुत्री कुंती का नाम पृथा था , अर्जुन कुंती यानि पृथा के पुत्र थे अतः उनका नाम पार्थ                       पड़ा।
    प्रश्न १०७ - वर्णों का विभाजन किस आधार पर किया गया ?
    उत्तर ----- गुण और कर्म के आधार पर।
    प्रश्न १०८ -- गीता का जन्म कब हुआ ?
    उत्तर --- मार्ग शीर्ष माह के शुक्ल पक्ष एकादशी को हुआ।  यह एकादशी मोक्षदा एकादशी के नाम विख्यात है।
    प्रश्न १०९ - पुराण कुल कितने हैं ?
    उत्तर -------- १८ ( अट्ठारह )
    प्रश्न ११० -- पुराणों के रचयिता कौन हैं ?
    उत्तर ------ हर्ष लोमश और उग्रश्रवा हैं।
    प्रश्न १११ -- किरीटी कौन हैं ?
    उत्तर ------ अर्जुन।
    प्रश्न ११२ -- अर्जुन का नाम किरीटी क्यों पड़ा ?
     उत्तर ---- इंद्र के द्वारा दिए गए किरीट (मुकुट ) के कारण।
    प्रश्न ११३ -- सव्यसांची कौन   हैं ?
    उत्तर ----- अर्जुन।
    प्रश्न ११४ -- अर्जुन को सव्यसांची क्यों कहा गया।
    उत्तर ------ दायें - बाएं दोनों हांथों  धनुष - वान चलाने के   कारण।
    प्रश्न ११५ -- विश्वरूप कौन   हैं ?
    उत्तर ------ श्री कृष्ण।
    प्रश्न ११६ -- चतुर्भुज  किसने धारण किया ?
    उत्तर ----- श्री कृष्ण ने।
    प्रश्न ११७ -- अस्वत्थ वृक्ष क्या है ?
    उत्तर ----- पीपल।
    प्रश्न ११८ -- अर्जुन के धनुष का नाम क्या था ?
    उत्तर ---- गाण्डीव।
    प्रश्न ११९ --- अधिभूत क्या है ?
    उत्तर ---- सृष्टि।
    प्रश्न १२० - अधिदैव कौन है ?
    उत्तर ----- ब्रम्हा।
    प्रश्न १२१ - अधियज्ञ कौन है ?
    उत्तर ---- श्री कृष्ण।
    प्रश्न १२२ - श्री कृष्ण के विश्व रूप का वर्णन किसने - किससे किया ?
    उत्तर ------ संजय ने धृतराष्ट्र से।
    प्रश्न १२३ -- अर्जुन को गुडाकेश क्यों कहा गया ?
    उत्तर ---- नींद पर विजय पाने के कारण तथा घुंघराले बालों के कारण।
    प्रश्न १२४ - श्री कृष्ण को ऋषकेश क्यों कहा गया ?
    उत्तर ---- जीवों के  ह्रदय में निवास  करने के कारण।
    प्रश्न १२५ - अर्जुन ध्वज में किसका चिन्ह है ?
    उत्तर ------ हनुमान का।  जिसे कपिध्वज भी कहा गया।
    प्रश्न १२६ -- गीता  में कुल कितने श्लोक हैं ?
    उत्तर ----७०० (700 ) श्लोक  .
    प्रश्न १२७ --  कितने अध्याय हैं ?
    उत्तर ------ 18 अध्याय।
    प्रश्न १२८ --- पहला शब्द धर्मक्षेत्रे किसने - किससे कहा था ?
    उत्तर ------- धृतराष्ट्र ने संजय से।
    प्रश्न १२९ -- पहला श्लोक कौन सा था ?
    उत्तर ------ धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवश्चैव किम कुर्वत संजयः। .
    प्रश्न १३० -- पहला श्लोक किसने - किससे कहा था ?
    उत्तर  ------ धृतराष्ट्र ने संजय से।
    प्रश्न १३१ -- विषाद होने पर अर्जुन रथ के किस भाग में बैठ गए थे ?
    उत्तर ------ मध्य भाग में।
    प्रश्न १३२ --  भीम  की बृकोदर क्यों कहा गया है ?
    उत्तर ----- अधिक भोजन करने के कारण।
    प्रश्न १३३ -- पृथ्वी पर श्री कृष्ण कब -कब आने की बात किससे कहते हैं ?
    उत्तर --------अधर्म की बृद्ध होने पर अर्जुन से।
    प्रश्न १३४ ---- अश्वत्थ वृक्ष की जड़ कहाँ है ?
    उत्तर -------- ऊपर।
    प्रश्न १३५ --- अश्वत्थ वृक्ष की शाखा कहाँ है ?
    उत्तर ------ नीचे।
    प्रश्न १३६ -- श्री मद भगवद् गीता का संवाद किसके बीच होता है।?
    उत्तर ------ श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच।
    प्रश्न १३७ -- ब्रम्हा जी का दिन और रात कितने युग का होता है ?
    उत्तर --- 1000 चतुर्युग का।
    प्रश्न १३८ -- सत्व गुण , रजो गुण , एवं तमों गुण से कौन गति प्राप्त होती है ?
    उत्तर ----- क्रमशः उर्ध्व गति (स्वर्ग लोक ) मध्यम गति ( मृत्यु लोक) , अधो गति ( निम्न योनि -- जैसे कीड़े -                  मकोड़े )
    प्रश्न १३९ --- विराट रूप का प्रकाश अर्जुन ने कितने सूर्य के प्रकाश के अधिक बताया ?
    उत्तर ---- 1000 करोड़ सूर्य के प्रकाश से अधिक।
    प्रश्न १४० -- यम कितने और कौन - कौन से होते हैं ?
    उत्तर -----यम पांच होते हैं --- १ - सत्य  २- अहिंसा  ३ - अस्तेय ४ - अपरिग्रह  ५ - ब्रम्हचर्य।
    प्रश्न १४१ --- धृतराष्ट्र के कितने पुत्र थे ?
    उत्तर ------- 100 .
    प्रश्न १४२ ---- चतुर्भुज रूप का दर्शन कैसे होता है ?
    उत्तर ------- निर्विकार भाव से भजन करने पर।
    प्रश्न १४३ -- गीता का उपदेश श्री कृष्ण के अतिरिक्ति किसने -किसे सुनाया ?
    उत्तर ---- संजय ने धृतराष्ट्र को।
    प्रश्न १४४ -- अक्षर क्या है , और कौन हैं।
    उत्तर --- जिसका क्षरण न हो अर्थात जो नष्ट न हो , वह श्री कृष्ण (वृष्णु ) हैं।
    प्रश्न १४५ -- धर्म रक्षक योद्धा के मरने पर उसे क्या प्राप्त होता है ?
    उत्तर ---- स्वर्ग लोक।
    प्रश्न १४६ -- युद्ध में विजय प्राप्त करने पर योद्धा को क्या प्राप्त होता है ?
    उत्तर ----- राज्य।
    प्रश्न १४७ -  नरक के कितने द्वार हैं ?
    उत्तर ---- नरक के तीन द्वार हैं --१- काम (इक्षा )  २- क्रोध  ३ - मोह  (माया ) .
    प्रश्न १४८ -- ईश्वर  प्रिय भक्त  है ?
    उत्तर ---- सुख - दुःख , लाभ -हानि , जय - पराजय में समान रहने वाला।
    प्रश्न १४९ -- श्री विजय  विभूति कहाँ है ,? यह उद्गार किसका है ?
    प्रश्न १५० -- जहाँ श्री कृष्ण और अर्जुन  हैं श्री , विजय , विभूति वहीं है।  यह उद्गार संजय का है।
    प्रश्न १५१ -- पहले अध्याय में कौन सा योग है ?
    उत्तर --- विषाद योग।
    प्रश्न १५२ -- मन कैसा है ?
    उत्तर ----- चंचल।
    प्रश्न १५३ --संपत्ति कितनी होती हैं ? और कौन - कौन सी होती हैं ?
    उत्तर --- संपत्ति दो तरह की होती हैं।  १ -- दैवी  २ -- आसुरी।
    प्रश्न १५४ -- विषाद होने पर अर्जुन के हाथ  क्या छूट गया ?
    उत्तर ----- धनुष।
    प्रश्न १५५ -- प्रवित्ति कितनी और कौन - कौन सी होती हैं ?
    उत्तर ---- प्रवित्ति तीन होती हैं  - १ - सात्विक  २ - राजस ३ - तामस
    प्रश्न १५६ - श्री मद भगवद् गीता का विवेचन (उपदेश ) किस ग्रन्थ  हुआ ?
    उत्तर ---- महाभारत में।
    प्रश्न १५७ -- प्रथम क्रम में शंख नाद किसने किया ?
    उत्तर ------ भीष्म पितामह ने।
    प्रश्न १५८ -- द्वितीय क्रम  शंख किसने वजाया ?
    उत्तर ---- श्री कृष्ण नें।
    प्रश्न १५९-- कौरव - पाण्डव दोनों एक ही परिवार के थे , फिर भी धृतराष्ट्र पाण्डु पुत्र और मामकाः क्यों कहते हैं ?
    उत्तर ----- क्योंकि धृतराष्ट्र के मन में भेद - भाव और पक्षपात था।
    प्रश्न १६० --  श्री कृष्ण को मधुषूदन अर्जुन के द्वारा  क्यों कहा गया ?
    उत्तर ----- मधु दैत्य  वध करने के कारण।
    प्रश्न १६१ -- शरीरी , देहि , क्षेत्रज्ञ , आदि शब्दों का प्रयोग किसके लिए किया गया है ?
    उत्तर ----- आत्मा के लिए।
    प्रश्न १६२ ---  क्षेत्र , देह , शरीर शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है ?
    उत्तर ------ शरीर के लिए।
    प्रश्न १६३ -- श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश किस मुद्रा में दिया ?
    उत्तर ------ मुश्कुराते हुए।
    प्रश्न १६४ -- शरीर कैसा है ?
     उत्तर --- परिवर्तन शील।
    प्रश्न १६५ -- मृत्यु केबाद आत्मा कहाँ चली जाती है।
    उत्तर ----- एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रविष्ट हो जाती है।
    प्रश्न १६६ -- आत्मा  कैसी है ?
    उत्तर ----- अजर - अमर।  इसे न काटा जा सकता है , न जलाया जा सकता है , न गीला किया जा सकता है ,
                      न ही सुखाया जा सकता है।
    प्रश्न १६७ -- गीता में पार्थ शब्द का प्रयोग कितने बार किया गया है ?
    उत्तर ----- 38 बार .
    प्रश्न १६८ ---- अष्टांग योग क्या है ?
    उत्तर ------- यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान , समाधि यही आठों योग अष्टांग                          योग कहलाते हैं।
    प्रश्न १६९ - यम कितने होते हैं ?
    उत्तर ----- यम  पांच होते हैं।
    प्रश्न १७० -- योगी कितने प्रकार होते हैं ?
    उत्तर ------ योगी आठ प्रकार के होते हैं --- १ - कर्म योगी  २- ज्ञान योगी  ३- ध्यान योगी  ४- लय योगी
                     ५- हठ योगी  ६- राज योगी  ७-  मंत्र योगी  ८-  अनाशक्त योगी।
    प्रश्न १७१ --- भक्त के लक्षण कौन -कौन से हैं ?
    उत्तर -------  १ - समत्व बुद्धि और मनन शील  २- निष्काम कर्म करने वाला  ३- सबका प्रेमी
                        ४- राग द्वेष भाव रहित   ५-  सर्व संकल्पों का आभाव  ६-  इन्द्रिय भोगों में अनाशक्ति
                         ७-  सर्दी - गर्मी , सुख - दुःख , मान - अपमान , में सम भाव रखने वाला।  ८ - हेतु रहित दयालु
                         ९ -  परमात्मा के शिवाय अन्य कुछ भी नहीं है , यह भावना मन में रखने वाला ,  १० -  विकार
                          रहित स्थिति  ११- मिट्टी - पत्थर , स्वर्ण को एक समान मनाने वाला  १२ -  संग्रह रहित ,                                वासना - मन और इन्द्रियों पर काबू रखने वाला ममता , अहंकार , काम - क्रोध , मद - मत्सर
                        रहित हो।  यही सब भक्त के लक्षण होते हैं।
    प्रश्न १७२ -- भक्ति के उपाय क्या -क्या हैं ?
    उत्तर ----------- १ भगवान की उपाशना ,  २- कर्म करने के बाद फल भगवान को अर्पण कर देना  ३-  धंधा या
                            नौकरी करने के बाद प्राप्त धन राशि का कुछ भाग जन कल्याणार्थ उपयोग करना ,४- ज्ञान
                            बढ़ाना ५ - सत्संग करना ६- फल की अपेक्षा न करना  आदि भक्ति के उपाय हैं।
    प्रश्न १७३ --- गीता के पूरे १८ ( अट्ठारह ) अध्याय में कौन - कौन से योग का वर्णन है /
    उत्तर ---------- प्रथमं अर्जुन विषाद योगं ,  द्वितीयं च सांख्य योगं।
                          कर्म योगम् तृतीयकम् , चतुर्थकम् ज्ञान - कर्म - सन्यास च।

                          पंचमम कर्म -सन्यास योगं , षष्टम आत्मसयंमम च।  .
                         ज्ञान -विज्ञान योगं सप्तमम्, अक्षर ब्रम्ह अष्टमम् च।

                         नवमम् राज विद्या - राज गुह्यं , दसमम विभूति योगं।
                         एकादशः विश्वदर्शनम् , भक्ति योगं च द्वादशः।

                         त्रयोदशः क्षेत्र - क्षत्रज्ञ विभाग , गुण त्रय विभाग च चतुर्दशः।
                        पुरुषोत्तम योग पंचदशः , दैवा सुर सम्पद्विभाग च षोडशः।

                       सप्त श्रद्धा त्रय विभाग , मोक्ष - सन्यास च अष्टदशः।
                      इति अष्टादशः योगं , गीतोपनिषद वर्णनम्। .
             
                 १ - अर्जुन विषाद योग  २-  सांख्य योग  ३-  कर्म योग  ४-  ज्ञान - कर्म सन्यास योग  ५ -  कर्म सन्यास               योग     ६ -  आत्म संयम योग  ७-  ज्ञान - विज्ञानं योग  ८-  अक्षर ब्रम्ह योग  ९ -  राज विद्द्या -
                  - राज गुह्य योग  १० -  विभूति योग  ११ -  विश्वरूप दर्शन योग  १२ - भक्ति योग  १३-  क्षेत्र - क्षत्रज्ञ
                   विभाग योग  १४-  गुण त्रय विभाग योग  १५-  पुरुषोत्तम योग  १६ - दैवा सुर सम्पद विभाग योग
                   १७ -  श्रद्धा त्रय विभाग योग  १८ -  मोक्ष - सन्यास योग।

    प्रश्न १७४ -- अर्जुन के विषाद ग्रस्त होने पर  क्या अवस्था हुई ?
    उत्तर ----     अंग शिथिल होने लगे , मुख सूखने लगा , शरीर में कम्पन होने लगा , रोंगटे खड़े होने लगे , हाथ से
                       गाण्डीव छूटने लगा , त्वचा में जलन होने लगी।
    प्रश्न १७५ --   नरक में ले जाने वाला कौन होता है।
    उत्तर ---------- वर्ण संकर।
    प्रश्न १७६ ---श्री मद भगवद् गीता के प्रत्येक अध्याय की समाप्ति पर महर्षि वेदव्यास ने क्या पुष्पिका लिखी है
    उत्तर -------- ओम तत शत श्री मद भगवत् गीता शूपनिषत्सु ब्रम्ह विद्यायां योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन संवादे
                        -------- अध्यायः कहते हैं।
    प्रश्न १७७ -----  श्री मद भगवद् गीता को गीता क्यों कहा गया है ?
    उत्तर ---------   क्योंकि भगवान  कृष्ण ने इसे आनंद में आकर गया है इसलिए गीता कहा गया।  इसके                                     अतिरिक्ति  संस्कृत व्याकरण के अनुसार गीत होना चाहिए , उपनिषद् स्वरूप होने से स्त्री लिंग                        गीता कहा गया।
    प्रश्न १७८ --   गीता  उपनिषद् क्यों कहा गया ?
    उत्तर ---------  गीता में समस्त उपनिषदों का सार तत्व संग्रहीत है , और यह भागवत वाणी है इसलिए इसे                               उपनिषद् कहा गया।
    प्रश्न १७९ ---   श्री मद भगवद् गीता को श्री कृष्ण अर्जुन संबाद क्यों कहा गया ?
    उत्तर --------- क्योंकि गीता में अर्जुन निःसंकोच भाव से प्रश्न किये और भगवान ने उदारता पूर्वक उत्तर दिया
                         इस कारण इन दोनों नाम की विशेष महिमा है अतः इसे श्री कृष्ण अर्जुन संबाद कहा गया।
    प्रश्न १८० --- प्रथम अध्याय में कितने श्लोक हैं ?
    उत्तर ---------४७  (47 )
    प्रश्न १८१ ---    सबसे अधिक श्लोक किस अध्याय में हैं ?
    उत्तर ---------- १८ (अट्ठारह ) ७८ (78 )
    प्रश्न १८२ ---  विद्वान या पंडित लोग किस बात का शोक नहीं मानते ?           (  २ /११ )
    उत्तर ----------   जिनके प्राण चले गए हों , या नहीं गए हों , किसी  लिए भी विद्वन या पंडित  शोक नहीं मानते। प्रश्न १८३ ----  श्री मद भगवद् गीता के अनुसार अविनाशी किसे मानना चाहिए ?
    उत्तर --------- जिनसे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है , जिसका कोई विनाश नहीं कर सकता , उसे अविनाशी मानना                          चाहिए।
    प्रश्न १८४ --श्री मद भगवद् गीता किस महाग्रंथ के अंतर्गत वर्णित है ?
    उत्तर ------ महाभारत।
    प्रश्न १८५ --- श्री मद भगवत् गीता किस पर्व के अंतर्गत कही गयी है ?
    उत्तर ------- भीष्म पर्व।
    प्रश्न १८६ --- श्री मद भगवद् गीता भीष्म पर्व के अंतर्गत किस अध्याय से आरम्भ होकर किस अध्याय में                             समाप्त होती है ?
     उत्तर ------- भीष्म पर्व 13 अध्याय से प्रारम्भ होकर 42 अध्याय में पूर्ण होती है।
    प्रश्न १८७ --- अत्र शूरा महेश्वासा शब्द का अर्थ क्या है ?                                     ( १/४ )
    उत्तर --------- जिनसे वान चलाये या फेके जाते हैं , उसे ईश्वास अर्थात धनुष कहते हैं।  अतः बड़ा और विशेष                            धनुष को धारण करने वाले को महेश्वासा कहते हैं।
    प्रश्न १८८ -- सेनयोर्मध्ये गीता में कितनी बार आया है ?
    उत्तर -------- तीन बार -- १ -- सेनाओं की विशालता ( विस्तार ) देखने के लिए , २ -- उपस्थित कुटुम्बियों के
                       परिवार भाव से ,   ३-- विषाद मग्न अर्जुन को गीता उपदेश के भाव से।
    प्रश्न १८९ --  श्री कृष्ण को अर्जुन के द्वारा माधव क्यों कहा गया ?                      
    उत्तर ----------    माधव का अर्थ माँ लक्ष्मी , धव का अर्थ पति  लक्ष्मी पति यानि श्री कृष्ण विष्णु का पूर्ण                                   अवतार होने के कारन  माधव कहा गया।
    प्रश्न १९० --- अमरत्वं किसे मिलता है ?                                          २/१५
    उत्तर ----------- दुःख - सुख में सम रहने वालों को।
    प्रश्न १९१ --- अविनाशी कौन है ?                                                         २/१७
    उत्तर --------- जो न मरता, न नष्ट होता , सम्पूर्ण जगत में हरदम व्याप्त रहता है।
    प्रश्न १९२ --- गीता के अनुसार अर्जुन ( मनुष्य ) का अधिकार क्या है ?                         २/४७
     उत्तर ------- कर्तव्य का पालन।
    प्रश्न १९३ ---स्थित प्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण क्या हैं ?                                                        २/ ५५ , २ /५६
    उत्तर ------  कामनाओं को त्याग देता है , स्वतः संतुष्ट रहने वाला , सुख - दुःख राग , क्रोध रहित व्यक्ति
                      स्थित प्रज्ञ होता है।
    प्रश्न १९४ -- शांति किसे प्राप्त हो सकती है ?                                                         २/७१
    उत्तर ------   ममता , अहंता , स्पृहा , कामनाओं के त्यागी को शांति मिल सकती है।
    प्रश्न १९५ --- परमार्थ मार्ग में विध्न डालने बाले शत्रु कौन होते हैं ?                                 ३/३४
    उत्तर ----      सभी विषयों में रत  इन्द्रयाँ , और राग -द्वेष।
    प्रश्न १९६ --  श्री मद भगवद् गीता में कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ बताया गया है ?                           ३/३५
    उत्तर -------    अपना।
    प्रश्न १९७ ---   पाप कर्म करने वाला  किससे प्रेरित होकर पाप करता है ?                                     ३/ ३६ , ३/ ३७
    उत्तर -------      कामनाओं से।  ( क्रोध और रजोगुण बढ़ने के कारण )
    प्रश्न १९८ --- कल कितने होते हैं ?                                                            ७/२६
    उत्तर ------ तीन   १ - वर्त्तमान काल  २-- भूत काल   ३--- भविष्य काल।
    प्रश्न १९९ -- भक्ति के मार्ग कितने हैं ?                                                            १२/१
    उत्तर ------     दो --  १ --  निर्गुण  २ -- सगुण।
    प्रश्न २०० -- वैदिक नियम को ग्रहण करने वाले कार्य का प्रारम्भ किस शब्द के उच्चारण से करते हैं ?    १७/२४
    उत्तर --------  ॐ।
    प्रश्न २०१ -- कर्म - अकरम के पांच हेतु ( कारण ) कौन -कौन से हैं ?                    १८/१३
    उत्तर ------- -१   --  अधिष्ठान (शरीर ) ,   २ --- करता ,  ३-- कारण  ४-  (पांच कर्मेन्द्रियाँ , पांच ज्ञानेंद्रियाँ , और मन -बुद्धि , अहंकार , 13 कारण )   ४ -- कारणों की अलग - अलग चेष्टाएँ   ५ -- स्वाभाव।








प्रश्नोत्तरी ( पुनर्जन्म विषय पर ) :-

प्रश्नोत्तरी ( पुनर्जन्म विषय पर ) :-
(1) प्रश्न :- पुनर्जन्म किसको कहते हैं ? 
उत्तर :- जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं ।
(2) प्रश्न :- पुनर्जन्म क्यों होता है ? 
उत्तर :- जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधुरे रह जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं ।
(3) प्रश्न :- अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता ? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो ?
उत्तर :- नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं ।
(4) प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ?
उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन और मृत्यु को समझना आवश्यक है । और जीवन मृत्यु को समझने के लिए शरीर को समझना आवश्यक है ।
(5) प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ ?
उत्तर :- हमारे शरीर को निर्माण प्रकृति से हुआ है । 
जिसमें मूल प्रकृति ( सत्व रजस और तमस ) से प्रथम बुद्धि तत्व का निर्माण हुआ है । 
बुद्धि से अहंकार ( बुद्धि का आभामण्डल ) । 
अहंकार से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ( चक्षु, जीह्वा, नासिका, त्वचा, श्रोत्र ), मन ।
पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) ।
शरीर की रचना को दो भागों में बाँटा जाता है ( सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर ) ।
(6) प्रश्न :- सूक्ष्म शरीर किसको बोलते हैं ?
उत्तर :- सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रीयाँ । ये सूक्ष्म शरीर आत्मा को सृष्टि के आरम्भ में जो मिलता है वही एक ही सूक्ष्म शरीर सृष्टि के अंत तक उस आत्मा के साथ पूरे एक सृष्टि काल ( ५३२००००००० वर्ष ) तक चलता है । और यदि बीच में ही किसी जन्म में कहीं आत्मा का मोक्ष हो जाए तो ये सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में वहीं लीन हो जायेगा ।
(7) प्रश्न :- स्थूल शरीर किसको कहते हैं ? 
उत्तर :- पंच कर्मेन्द्रीयाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) , ये समस्त पंचभौतिक बाहरी शरीर ।
(8) प्रश्न :- जन्म क्या होता है ? 
उत्तर :- जीवात्मा का अपने करणों ( सूक्ष्म शरीर ) के साथ किसी पंचभौतिक शरीर में आ जाना ही जन्म कहलाता है ।
(9) प्रश्न :- मृत्यु क्या होती है ?
उत्तर :- जब जीवात्मा का अपने पंचभौतिक स्थूल शरीर से वियोग हो जाता है, तो उसे ही मृत्यु कहा जाता है । परन्तु मृत्यु केवल सथूल शरीर की होती है , सूक्ष्म शरीर की नहीं । सूक्ष्म शरीर भी छूट गया तो वह मोक्ष कहलाएगा मृत्यु नहीं । मृत्यु केवल शरीर बदलने की प्रक्रीया है, जैसे मनुष्य कपड़े बदलता है ।वैसे ही आत्मा शरीर भी बदलता है ।
(10) प्रश्न :- मृत्यु होती ही क्यों है ? 
उत्तर :- जैसे किसी एक वस्तु का निरन्तर प्रयोग करते रहने से उस वस्तु का सामर्थ्य घट जाता है, और उस वस्तु को बदलना आवश्यक हो जाता है, ठीक वैसे ही एक शरीर का सामर्थ्य भी घट जाता है और इन्द्रियाँ निर्बल हो जाती हैं । जिस कारण उस शरीर कोबदलना की प्रक्रिया का नाम ही मृत्यु है ।
(11) प्रश्न :- मृत्यु न होती तो क्या होता ? 
उत्तर :- तो बहुत अव्यवस्था होती । पृथीवी की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती । और यहाँ पैर धरने का भी स्थान न होता ।
(12) प्रश्न :- क्या मृत्यु होना बुरी बात है ?
उत्तर :- नहीं, मृत्यु होना कोई बुरी बात नहीं ये तो एक प्रक्रीया है शरीर परिवर्तन की ।
(13) प्रश्न :- यदि मृत्यु होना बुरी बात नहीं है तो लोग इससे इतना डरते क्यों हैं ?
उत्तर :- क्योंकि उनको मृत्यु के वैज्ञानिक स्वरूप की जानकारी नहीं है । वे अज्ञानी हैं । वे समझते हैं कि मृत्यु के समय बहुत कष्ट होता है । उन्होंने वेद, उपनिषद, या दर्शन को कभी पढ़ा नहीं वे ही अंधकार में पड़ते हैं और मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं ।
(14) प्रश्न :- तो मृत्यु के समय कैसा लगता है ? थोड़ा सा तो बतायें ?
उत्तर :- जब आप बिस्तर में लेटे लेटे नींद में जाने लगते हैं तो आपको कैसा लगता है ?? ठीक वैसा ही मृत्यु की अवस्था में जाने में लगता है उसके बाद कुछ अनुभव नहीं होता । जब आपकी मृत्यु किसी हादसे से होती है तो उस समय आमको मूर्छा आने लगती है, आप ज्ञान शून्य होने लगते हैं जिससे की आपको कोई पीड़ा न हो । तो यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है कि मृत्यु के समय मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और सुशुपतावस्था में जाने लगता है ।
(15) प्रश्न :- मृत्यु के डर को दूर करने के लिए क्या करें ?
उत्तर :- जब आप वैदिक आर्ष ग्रन्थ ( उपनिषद, दर्शन आदि ) का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन,मृत्यु, शरीर, आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का मृत्यु के प्रती भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान कमतर होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा । आप निडर हो जायेंगे । जैसे हमारे बलिदानीयों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये । तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे ? नहीं उन्होने ने भी योगदर्श्न, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था । योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था । महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की मंशा को त्याग बैठा था तो योगेश्वर कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ । तो इसी कारण तो वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाल मनुष्य ही राष्टर के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता , प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है ।
(16) प्रश्न :- किन किन कारणों से पुनर्जन्म होता है ? 
उत्तर :- आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता । वे कर्म अच्छे करे या फिर बुरे, ये उसपर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य । तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है । पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है ।
(17) प्रश्न :- पुनर्जन्म कब कब नहीं होता ? 
उत्तर :- जब आत्मा का मोक्ष हो जाता है तब पुनर्जन्म नहीं होता है ।
(18) प्रश्न :- मोक्ष होने पर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता ?
उत्तर :- क्योंकि मोक्ष होने पर स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में लीन हो ही जाता है, पर सूक्ष्म शरीर जो आत्मा के सबसे निकट होता है, वह भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है ।
(19) प्रश्न :- मोक्ष के बाद क्या कभी भी आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता ? 
उत्तर :- मोक्ष की अवधी तक आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता । उसके बाद होता है ।
(20) प्रश्न :- लेकिन मोक्ष तो सदा के लिए होता है, तो फिर मोक्ष की एक निश्चित अवधी कैसे हो सकती है ?
उत्तर :- सीमीत कर्मों का कभी असीमित फल नहीं होता । यौगिक दिव्य कर्मों का फल हमें ईश्वरीय आनन्द के रूप में मिलता है, और जब ये मोक्ष की अवधी समाप्त होती है तो दुबारा से ये आत्मा शरीर धारण करती है ।
(21) प्रश्न :- मोक्ष की अवधी कब तक होती है ?
उत्तर :- मोक्ष का समय ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष है, जब तक आत्मा मुक्त अवस्था में रहती है ।
(22) प्रश्न :- मोक्ष की अवस्था में स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ रहता है या नहीं ?
उत्तर :- नहीं मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रहमाण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है, बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे कि मछली पूरे समुद्र में रहती है । तो किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं है ।
(23) प्रश्न :- मोक्ष के बाद आत्मा को शरीर कैसे प्राप्त होता है ?
उत्तर :- सबसे पहला तो आत्मा को कल्प के आरम्भ ( सृष्टि आरम्भ ) में सूक्ष्म शरीर मिलता है फिर ईश्वरीय मार्ग और औषधियों की सहायता से प्रथम रूप में अमैथुनी जीव शरीर मिलता है, वो शरीर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या विद्वान का होता है जो कि मोक्ष रूपी पुन्य को भोगने के बाद आत्मा को मिला है । जैसे इस वाली सृष्टि के आरम्भ में चारों ऋषि विद्वान ( वायु , आदित्य, अग्नि , अंगिरा ) को मिला जिनको वेद के ज्ञान से ईश्वर ने अलंकारित किया । क्योंकि ये ही वो पुन्य आत्मायें थीं जो मोक्ष की अवधी पूरी करके आई थीं ।
(24) प्रश्न :- मोक्ष की अवधी पूरी करके आत्मा को मनुष्य शरीर ही मिलता है या जानवर का ?
उत्तर :- मनुष्य शरीर ही मिलता है ।
(25) प्रश्न :- क्यों केवल मनुष्य का ही शरीर क्यों मिलता है ? जानवर का क्यों नहीं ?
उत्तर :- क्योंकि मोक्ष को भोगने के बाद पुन्य कर्मों को तो भोग लिया , और इस मोक्ष की अवधी में पाप कोई किया ही नहीं तो फिर जानवर बनना सम्भव ही नहीं , तो रहा केलव मनुष्य जन्म जो कि कर्म शून्य आत्मा को मिल जाता है ।
(26) प्रश्न :- मोक्ष होने से पुनर्जन्म क्यों बन्द हो जाता है ?
उत्तर :- क्योंकि योगाभ्यास आदि साधनों से जितने भी पूर्व कर्म होते हैं ( अच्छे या बुरे ) वे सब कट जाते हैं । तो ये कर्म ही तो पुनर्जन्म का कारण हैं, कर्म ही न रहे तो पुनर्जन्म क्यों होगा ??
(27) प्रश्न :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय क्या है ? 
उत्तर :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय है योग मार्ग से मुक्ति या मोक्ष का प्राप्त करना ।
(28) प्रश्न :- पुनर्जन्म में शरीर किस आधार पर मिलता है ?
उत्तर :- जिस प्रकार के कर्म आपने एक जन्म में किए हैं उन कर्मों के आधार पर ही आपको पुनर्जन्म में शरीर मिलेगा ।
(29) प्रश्न :- कर्म कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :- मुख्य रूप से कर्मों को तीन भागों में बाँटा गया है :- सात्विक कर्म , राजसिक कर्म , ताम्सिक कर्म ।
(१) सात्विक कर्म :- सत्यभाषण, विद्याध्ययन, परोप्कार, दान, दया, सेवा आदि । 
(२) राजसिक कर्म :- मिथ्याभाषण, क्रीडा, स्वाद लोलुपता, स्त्रीआकर्षण, चलचित्र आदि ।
(३) ताम्सिक कर्म :- चोरी, जारी, जूआ, ठग्गी, लूट मार, अधिकार हनन आदि ।
और जो कर्म इन तीनों से बाहर हैं वे दिव्य कर्म कलाते हैं, जो कि ऋषियों और योगियों द्वारा किए जाते हैं । इसी कारण उनको हम तीनों गुणों से परे मानते हैं । जो कि ईश्वर के निकट होते हैं और दिव्य कर्म ही करते हैं ।
(30) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से मनुष्य योनी प्राप्त होती है ?
उत्तर :- सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मागव देह मिलती है , यदि सात्विक कर्म बहुत कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में , यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा । जिसने अत्याधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा ।
(31) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से आत्मा जीव जन्तुओं के शरीर को प्राप्त होता है ?
उत्तर :- ताम्सिक और राजसिक कर्मों के फलरूप जानवर शरीर आत्मा को मिलता है । जितना तामसिक कर्म अधिक किए होंगे उतनी ही नीच योनी उस आत्मा को प्राप्त होती चली जाती है । जैसे लड़ाई स्वाभाव वाले , माँस खाने वाले को कुत्ता, गीदड़, सिंह, सियार आदि का शरीर मिल सकता है , और घोर तामस्कि कर्म किए हुए को साँप, नेवला, बिच्छू, कीड़ा, काकरोच, छिपकली आदि । तो ऐसे ही कर्मों से नीच शरीर मिलते हैं और ये जानवरों के शरीर आत्मा की भोग योनियाँ हैं ।
(32) प्रश्न :- तो क्या हमें यह पता लग सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे ? या आगे क्या होंगे ?
उत्तर :- नहीं कभी नहीं, सामान्य मनुष्य को यह पता नहीं लग सकता । क्योंकि यह केवल ईश्वर का ही अधिकार है कि हमें हमारे कर्मों के आधार पर शरीर दे । वही सब जानता है ।
(33) प्रश्न :- तो फिर यह किसको पता चल सकता है ? 
उत्तर :- केवल एक सिद्ध योगी ही यह जान सकता है , योगाभ्यास से उसकी बुद्धि । अत्यन्त तीव्र हो चुकी होती है कि वह ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति के महत्वपूर्ण राज़ अपनी योगज शक्ति से जान सकता है । उस योगी को बाह्य इन्द्रीयों से ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती है । वह अन्तः मन और बुद्धि से सब जान लेता है । उसके सामने भूत और भविष्य दोनों सामने आ खड़े होते हैं ।
(34) प्रश्न :- यह बतायें की योगी यह सब कैसे जान लेता है ? 
उत्तर :- अभी यह लेख पुनर्जन्म पर है, यहीं से प्रश्न उत्तर का ये क्रम चला देंगे तो लेख का बहुत ही विस्तार हो जायेगा । इसीलिये हम अगले लेख में यह विषय विस्तार से समझायेंगे कि योगी कैसे अपनी विकसित शक्तियों से सब कुछ जान लेता है ? और वे शक्तियाँ कौन सी हैं ? कैसे प्राप्त होती हैं ? इसके लिए अगले लेख की प्रतीक्षा करें ।
(35) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म के कोई प्रमाण हैं ?
उत्तर :- हाँ हैं , जब किसी छोटे बच्चे को देखो तो वह अपनी माता के स्तन से सीधा ही दूध पीने लगता है जो कि उसको बिना सिखाए आ जाता है क्योंकि ये उसका अनुभव पिछले जन्म में दूध पीने का रहा है, वर्ना बिना किसी कारण के ऐसा हो नहीं सकता । दूसरा यह कि कभी आप उसको कमरे में अकेला लेटा दो तो वो कभी कभी हँसता भी है , ये सब पुराने शरीर की बातों को याद करके वो हँसता है पर जैसे जैसे वो बड़ा होने लगता है तो धीरे धीरे सब भूल जाता है ।
(36) प्रश्न :- क्या इस पुनर्जन्म को सिद्ध करने के लिए कोई उदहारण हैं ? 
उत्तर :- हाँ, जैसे अनेकों समाचार पत्रों में, या TV में भी आप सुनते हैं कि एक छोटा सा बालक अपने पिछले जन्म की घटनाओं को याद रखे हुए है, और सारी बातें बताता है जहाँ जिस गाँव में वो पैदा हुआ, जहाँ उसका घर था, जहाँ पर वो मरा था । और इस जन्म में वह अपने उस गाँव में कभी गया तक नहीं था लेकिन फिर भी अपने उस गाँव की सारी बातें याद रखे हुए है , किसी ने उसको कुछ बताया नहीं, सिखाया नहीं, दूर दूर तक उसका उस गाँव से इस जन्म में कोई नाता नहीं है । फिर भी उसकी गुप्त बुद्धि जो कि सूक्ष्म शरीर का भाग है वह घटनाएँ संजोए हुए है जाग्रत हो गई और बालक पुराने जन्म की बातें बताने लग पड़ा ।
(37) प्रश्न :- लेकिन ये सब मनघड़ंत बातें हैं, हम विज्ञान के युग में इसको नहीं मान सकते क्योंकि वैज्ञानिक रूप से ये बातें बेकार सिद्ध होती हैं, क्या कोई तार्किक और वैज्ञानिक आधार है इन बातों को सिद्ध करने का ?
उत्तर :- आपको किसने कहा कि हम विज्ञान के विरुद्ध इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त का दावा करेंगे । ये वैज्ञानिक रूप से सत्य है , और आपको ये हम अभी सिद्ध करके दिखाते हैं ।
(38) प्रश्न :- तो सिद्ध कीजीए ?
उत्तर :- जैसा कि आपको पहले बताया गया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, पर सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ वैसे ही आगे चलता है , तो हर जन्म के कर्मों के संस्कार उस बुद्धि में समाहित होते रहते हैं । और कभी किसी जन्म में वो कर्म अपनी वैसी ही परिस्थिती पाने के बाद जाग्रत हो जाते हैं । 
इसे उदहारण से समझें :- एक बार एक छोटा सा ६ वर्ष का बालक था, यह घटना हरियाणा के सिरसा एक गाँव की है । जिसमें उसके माता पिता उसे एक स्कूल में घुमाने लेकर गये जिसमें उसका दाखिला करवाना था और वो बच्चा केवल हरियाणवी या हिन्दी भाषा ही जानता था कोई तीसरी भाषा वो समझ तक नहीं सकता था । लेकिन हुआ कुछ यूँ था कि उसे स्कूल की Chemistry Lab में ले जाया गया और वहाँ जाते ही उस बच्चे का मूँह लाल हो गया !! चेहरे के हावभाव बदल गये !! और उसने एकदम फर्राटेदार French भाषा बोलनी शुरू कर दी !! उसके माता पिता बहुत डर गये और घबरा गये , तुरंत ही बच्चे को हस्पताल ले जाया गया । जहाँ पर उसकी बातें सुनकर डाकटर ने एक ुभाषिये का प्रबन्ध किया । जो कि French और हिन्दी जानता था , तो उस दुभाषिए ने सारा वृतान्त उस बालक से पूछा तो उल बालक ने बताया कि " मेरा नाम Simon Glaskey है और मैं French Chemist हूँ । मेरी मौत मेरी प्रयोगशाला में एक हादसे के कारण ( Lab. ) में हुई थी । "
तो यहाँ देखने की बात यह है कि इस जन्म में उसे पुरानी घटना के अनुकूल मिलती जुलती परिस्थिती से अपना वह सब याद आया जो कि उसकी गुप्त बुद्धि में दबा हुआ था । यानि की वही पुराने जन्म में उसके साथ जो प्रयोगशाला में हुआ, वैसी ही प्रयोगशाला उस दूसरे जन्म में देखने पर उसे सब याद आया । तो ऐसे ही बहुत सी उदहारणों से आप पुनर्जन्म को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर सकते हो ।
(39) प्रश्न :- तो ये घटनाएँ भारत में ही क्यों होती हैं ? पूरा विश्व इसको मान्यता क्यों नहीं देता ?
उत्तर :- ये घटनायें पूरे विश्व भर में होती रहती हैं और विश्व इसको मान्यता इसलिए नहीं देता क्योंकि उनको वेदानुसार यौगिक दृष्टि से शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं है । वे केवल माँस और हड्डियों के स्मूह को ही शरीर समझते हैं , और उनके लिए आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है । तो ऐसे में उनको न जीवन का ज्ञान है, न मृत्यु का ज्ञान है, न । आत्मा का ज्ञान है, न कर्मों का ज्ञान है, न ईश्वरीय व्यवस्था का ज्ञान है । और अगर कोई पुनर्जन्म की कोई घटना उनके सामने आती भी है तो वो इसे मान्सिक रोग जानकर उसको Multiple Personality Syndrome का नाम देकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं और उसके कथन अनुसार जाँच नहीं करवाते हैं ।
(40) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म केवल पृखीवी पर ही होता है या किसी और गृह पर भी ?
उत्तर :- ये पुनर्जन्म पूरे ब्रह्माण्ड में यत्र तत्र होता है, किसने असंख्य सौरमण्डल हैं, कितनी ही पृथीवियाँ हैं । तो एक पृथीवी के जीव मरकर ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी पृथीवी के उपर किसी न किसी शरीर में भी जन्म ले सकते हैं । ये ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन है ।
(41) प्रश्न :- परन्तु यह बड़ा ही अजीब लगता है कि मान लो कोई हाथी मरकर मच्छर बनता है तो इतने बड़े हाथी की आत्मा मच्छर के शरीर में कैसे घुसेगी ?
उत्तर :- यही तो भ्रम है आपका कि आत्मा जो है वो पूरे शरीर में नहीं फैली होती । वो तो हृदय के पास छोटे अणुरूप में होती है । सब जीवों की आत्मा एक सी है । चाहे वो वहेल मछली हो, चाहे वो एक कीड़ी हो ।
{ नोट :- यह पुनर्जन्म पर संक्षिप्त लेख था, इसको विस्तार से जानने के लिए वेद, दर्शन, उपनिषद, ब्राह्मण आदिग्रन्थों का विचारपूर्वक स्वाध्याय करें । }

Friday, February 12, 2021

👉निंदा मत करो शरीर की

🙏❤️🙏फरीद कहता हैः निंदा मत करो शरीर की। सभी ज्ञानियों ने यह कहा है। और जिन्होंने इससे विपरीत कहा हो, वे ज्ञानी नहीं हैं। शरीर की निंदा करने वाले लोग ज्ञानी नहीं हैं। क्यों? क्योंकि शरीर की निंदा का मतलब ही यह है कि तुम शरीर से अभी मुक्त नहीं हो पाए। निंदा हम उसी की करते हैं जिससे हम भयभीत होते हैं। निंदा हम उसी की करते हैं जिसमें हम जकड़े होते हैं और छूट नहीं पाते। निंदा हम उसी की करते हैं, जो हमें बलवान मालूम पड़ता है, शक्तिशाली मालूम पड़ता है, और हम पर कब्जा किए होता है। निंदा हम उसी की करते हैं जिससे हम हार-हार जाते हैं। निंदा हम उसी की करते हैं जिसको हम समझ नहीं पाते, जो बेबूझ है, और जिसके साथ हमारी हजार पराजय की कथाएं लिखी हैं। निंदा हारे हुए आदमी का रोष है।

तो जिन्होंने शरीर की निंदा की है, समझ लेना कि वे शरीर से डरे हुए हैं, शरीर की वासना से भयभीत हैं, शरीर की कामना से शरीर की तृष्णा से, उनके हाथ-पैर कंप रहे हैं, उनका प्राण डांवाडोल है। वे जानते हैं कि शरीर ने अगर पुकार दी तो वे उसके पीछे चल कर रहेंगे। आत्मा की आवाज उन्हें सुनाई नहीं पड़ती। अगर किसी तरह उन्होंने अपने को शरीर से रोक भी रखा है तो वह रोकना जबरदस्ती का है, बोध का नहीं है। वह रोकना किसी समझ से पैदा नहीं हुआ है। वह रोकना किसी लोभ से पैदा हुआ है। वे निरंतर शरीर की निंदा करेंगे। वे शरीर को गाली देंगे। वे शरीर की दुश्मनी सिखाएंगे। वे तुमसे कहेंगेः लड़ो शरीर से, हार मत जाना।

शरीर से लड़ना पागलपन है। शरीर तो खाक है। यह तो ऐसे ही है जैसे दर्पण में झलकी हुई ज्योति से कोई लड़े। निपट पागलपन है। वहां कुछ है ही नहीं ल.ड़ने को। शरीर ने तुम्हें कभी भरामाया नहीं है, भटकाया नहीं है। अगर तुम भटके हो, भरमाए गए हो तो अपनी ही मूच्र्छा के कारण कि तुमने शरीर को सब कुछ समझ लिया। इसमें शरीर का कोई कसूर नहीं है; तुम्हारी ही भूल है।

ज्ञानियों ने, परम ज्ञानियों ने शरीर की निंदा नहीं की, बल्कि उन्होंने तो शरीर की प्रशंसा की है। उन्होंने तो शरीर को मंदिर कहा है। उन्होंने तो कहा है, शरीर अदभुत है, बड़ा रहस्य है। मिट्टी है, फिर भी सत्तर वर्ष तक जीवन की लीला का खेल चलता है। नाकुछ है, खाक है; फिर भी बड़े फूल खिलते हैं।

फरीदा खाकु न निंदीए; …

मिट्टी की निंदा मत करो। मत करना। मिट्टी के बराबर और क्या है?

…खाकु जेडु न कोइ।

जीते जी हमारे पैरों के तले, मरने के बाद हमारी छाती के ऊपर। और दोनों के बीच-बीच तुम जो बचोगे, वह भी तो खाक है। नीचे भी खाक, ऊपर भी खाक, बीच में भी खाक। वह पक्षी जो आत्मा का है, वह तो उड़ चुका होगा।

शरीर घर है। थोड़ी देर का विश्राम है वहां। रात भर को रुक रहे हैं। सुबह मुर्गा बांग देगा और चल पड़ेंगे। जिसने शरीर को विश्राम से ज्यादा समझा, वह भूला। जिसने शरीर को रात का विश्राम समझा, एक सराय मानी, उसके जीवन से प्रकाश ज्यादा दूर नहीं है।

इब्राहीम की कथा है, मुझे बड़ी प्रीतिकर है। वह बैठा है अपने सिंहासन पर और एक आदमी आ कर द्वार पर झगड़ा करने लगा है। एक फकीर। उसे आवाज सुनाई भी पड़ने लगी। वह फकीर यह कह रहा हैः रास्ता दो मुझे। तुम रोकने वाले कौन होे?

वह पहरेदार से झंझट कर रहा है।

मैं रुक कर रहूंगा। इस सराय में मैं आज रात विश्राम करूंगा।

पहरेदार ने उसे कहा कि तुम पागल हो, नासमझ हो, अजनबी हो। यह महल है सम्राट का, निवास-गृह है, कोई सराय नहीं है। सराय भी है; तुम बस्ती में जाकर खोज लो।

पर वह जिद किए है। आखिर सम्राट को भी उत्सुकता हुई कि यह आदमी है कौन, जो सुनता ही नहीं है और कहे चला जाता है, और उसकी आवाज में भी बड़ी मिठास है, और उसकी आवाज में कोई एक गहरा आकर्षण है। सम्राट ने कहाः इस आदमी को भीतर आने दो।

वह आदमी भीतर आया। उसकी चाल में भी बड़ी खूबी है। उसकी शान और है! फकीर की शान! निर-अहंकारी की शान! विनम्र की शान! वह आ कर खड़ा हो गया। सम्राट भी फीका लगा उसके सामने, बैठा था सिंहासन पर। उसने कहाः तुम क्यों जिद कर रहे हो? क्या मामला है? यह महल है, मेरा निवास स्थान है। तुम्हें सुनाई नहीं पड़ता है? पहरेदार कहे जा रहा है…!

उस फकीर ने सम्राट को गौर से देखा! उसकी आंखें सम्राट को आर-पार भेद गईं। उसने कहा कि इसके पहले भी मैं आया था, तब मैंने इसी सिंहासन पर किसी और को बैठ देखा था।

सम्राट ने कहाः तुम्हारा कहना ठीक है। वे मेरे पिता थे। उनका स्वर्गवास हो गया।

उस फकीर ने कहाः मैं उसके पहले भी आया था, तब मैंने किसी और को बैठे देखा था।

सम्राट ने कहाः वह भी ठीक है। तुम आदमी पागल नहीं हो। वे मेरे पिता के पिता थे। वे जा चुके।

वह फकीर हंसने लगा और उसने कहाः जब मैं दुबारा आऊंगा, तुम्हें पक्का है कि तुम मुझे यहां बैठे मिलोगे? तुम्हारा बेटा तो न मिलेगा, कि कहेगा कि वे मेरे पिता जी थे? इसलिए तो मैं इसको सराय कहता हूं। तीन बार आया, अलग-अलग लोगों को ठहरे पाया। इसको मैं निवास कैसे कहूं?
कहते हैं, इब्राहीम के जीवन में जैसे बिजली कौंध गई, किसी ने झकझोर कर जगा दिया। वह उठ कर खड़ा हो गया। उसने कहाः तुम्हारी बात ठीक है। तुम रुको, मैं जाता हूं। इब्राहीम ने घर छोड़ दिया। इब्राहीम फकीर हो गया। लोग उससे पूछते कि क्या हो गया है? उसने कहाः कुछ हुआ नहीं; समझ आ गई। बात तो ठीक ही है, जहां दो दिन रुकते हैं और हट जाना पड़ता है, उसको घर क्या मानना!

वह बस्ती उसने छोड़ दी, वह मरघट में रहने लगा। लोग पूछते कि मत रहो घर में, कम से कम बस्ती में रहो। वह कहताः बस्ती में ही रह रहे हैं, क्योंकि यहां जो बसा है, कभी नहीं उजाडता। और तुम जिसे बस्ती कहते हो, वह मरघट है, मरने वालें की भीड़ लगी है। वहां सबका मौका आने को है। सब अपनी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वह तो मरने वालों की कतार है, क्यू है। लोग मर रहे हैं। तुम जिसे बस्ती कहते हो, वह मरघट है, और यहां मैंने बस्ती पाई। अपनी अपनी कब्र में लोग सोए हैं, कभी कोई हटता नहीं। सब बसे हैं। अब इसको कोई उजाड़ न सकेगा। वहां तो प्रतिदिन उजाड़ना होता रहेगा। कोई मरेगा, कोई आएगा, कोई जाएगा..उसे तुम क्या बस्ती कहते हो?

फरीदा खाकु न निंदीए, खाकु जेडु न कोइ।

मिट्टी की निंदा मत कर फरीद, मिट्टी जैसा और कुछ भी नहीं है।

जीऊंदियां पैरा तलै, मुइआ उपरि होइ।

जिंदा-जिंदा पैरों के नीचे, मरने के बाद सिर के ऊपर। यही है बिछावन, यही है ओढ़नी। इसी से है उठना, इसी में है खो जाना।

इसकी निंदा मत कर। इसको पहचान।

और यह तुम समझ लो, जिसकी तुम निंदा करोगे, उसे तुम पहचान न पाओगे। निंदा का धुआं ही आंख को अंधा कर देता है। निंदा का भाव ही समझ को धुंधला जाता है।

ओशो 🙏❤️🙏

Monday, February 8, 2021

👉दैत्य, दानव,असुर और राक्षस में परस्पर क्या अंतर है?

ये सभी प्राचीन काल की अलग अलग जातियाँ थीं। पुराणों के अनुसार इनमें से अधिकतर वंश महर्षि कश्यप से निकले हैं। इनका अलग अलग विवरण इस प्रकार है।

दैत्य- ये महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के पुत्र और अन्य वंशज हैं। दैत्य का अर्थ ही है दिति के पुत्र।

पुराणों की वंशावली के अनुसार दिति के दो पुत्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष थे। प्राचीनकाल में तीनो लोकों के राजा हिरण्यकशिपु ही थे। हिरण्याक्ष को वराह भगवान और हिरण्यकशिपु को नरसिंह भगवान ने मारा था। हिरण्यकशिपु के बाद उसका पुत्र प्रह्लाद और प्रह्लाद के बाद विरोचन राजा हुए थे। यह लगता है कि विरोचन के पुत्र बलि के समय देवताओं ने अन्तिम रूप से दैत्यों से राज्य ले लिया जैसा कि वामन अवतार की कथा से प्रकट होता है। बलि के पाताल चले जाने के बाद दैत्यों के राजा बलि के पुत्र बाणासुर हुए जिनका कृष्ण भगवान से युद्ध हुआ था।

पौराणिक साहित्य में दैत्यों की बड़ी प्रशंसा की गयी है। हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष इतने बड़े पुण्यात्मा थे कि उनको मारने के लिए स्वयं भगवान विष्णु को आना पड़ा। हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु के सर्वश्रेष्ठ भक्तों में से हैं। प्रह्लाद के पुत्र विरोचन इतने बड़े दानवीर थे कि इन्द्र के माँगने पर उन्होंने अपना सिर काटकर उन्हें दे दिया था। विरोचन के पुत्र बलि की दानवीरता का लाभ उठाकर ही वामन ने तीन पग भूमि के दान में पूरी पृथ्वी ले ली थी और इसी कारण स्वयं विष्णु भगवान उनके प्रहरी बने। बलि के पुत्र बाण इतने बड़े शिवभक्त थे कि स्वयं भगवान शिव उनके नगर की रक्षा करते थे।

दानव- कश्यप की पत्नी दनु के वंशज दानव कहे जाते हैं। दनु के चौंतीस पुत्रों के नाम महाभारत में गिनाये गये हैं जिनमें विप्रचित्ति सबसे बड़ा था। इनमें वृषपर्वा नाम के दानवराज का नाम भी आया है जो ययाति की पत्नी शर्मिष्ठा के पिता थे। महाभारत में वर्णित ययाति की कथा में इनका नाम प्रमुखता से आता है।

असुर- दैत्य और दानव से भिन्न असुर किसी वंश का नाम नहीं विशेषण मात्र है। यह लगता है कि वैदिक काल में यह विशेषण सम्मानसूचक था क्योंकि ऋग्वेद में इसका प्रयोग अधिकतर स्थानों पर सकारात्मक रूप से किया गया है। इन्द्र और वरुण को भी आदर से असुर कहा गया है। यह लगता है कि बाद में ईरानी आर्यों से कटुता होने के बाद 'असुर' शब्द को नकारात्मक रूप में लिया जाने लगा। बाद में तो 'आसुरी' का मतलब ही मनुष्य की बुरी प्रवृत्तियों से लिया जाने लगा।

राक्षस- यह लगता है कि राक्षसों का आर्य परम्परा से सम्बन्ध नहीं है क्योंकि कश्यप ऋषि के वंश में राक्षसों का उल्लेख नहीं आता। रामायण में उल्लेख आया है कि यक्ष और राक्षसों की उत्पत्ति जल से हुई है। जिन लोगों ने जल की रक्षा करने का दायित्व लिया वे लोग इसकी रक्षा करने के कारण राक्षस कहलाये और जिन्होंने उसकी पूजा(यजन) करने का दायित्व लिया वे यक्ष कहे गये। इस बात से कि यक्षों के राजा कुबेर तथा राक्षसों के राजा रावण और विभीषण(जो रावण के मरने के बाद राक्षसों का राजा हुआ।) आपस में भाई बताये गये हैं(बौद्ध ग्रन्थ लंकावतार सूत्र में बताया गया है कि रावण यक्षों का और उसका भाई कुम्भकर्ण राक्षसों का राजा था।) इस बात की पुष्टि होती है कि ये दोनो प्राचीन जातियाँ एक ही वंश की शाखाएँ थीं।

राक्षसों के प्रारम्भिक नेता हेति व प्रहेति थे। इनके वंश में बाद में लङ्कु नाम का राजा हुआ जिसने लंका नगर बसाया। कालान्तर में इस वंश में माल्यवान, माली और सुमाली नाम के तीन प्रतापी भाई हुए जिनका देवताओं से संघर्ष हुआ। देवताओं से हुए युद्ध में पराजित होने के बाद इन्हें लंका छोड़नी पड़ी। इसी युद्ध में माली की मृत्यु हो गयी।

सुमाली ने अपनी कन्या कैकसी का विवाह पुलस्त्य ऋषि के पुत्र विश्रवा से किया। इस विवाह से ही रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और उनकी बहिन शूर्पनखा का जन्म हुआ और रावण को राक्षसों का राजा बनाकर उसके माध्यम से सुमाली ने लंका पुनः प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। रामायण से पता लगता है कि सुमाली की देवताओं से हुए संग्राम में मृत्यु हो गयी थी जबकि माल्यवान राम की विजय के बाद भी विभीषण के राज्यभिषेक के समय तक जीवित रहा था।

महाभारत काल में हमें घटोत्कच, हिडिम्ब, बकासुर, अलायुध और अलम्बुष जैसे कुछ राक्षस दिखते हैं पर यह स्पष्ट लगता है कि इस समय तक राक्षस वंश के बहुत कम लोग रह गये थे। घटोत्कच के बाद किसी प्रमुख राक्षस का नाम नहीं पता चलता।

यह स्पष्ट हो जाता है कि राक्षस, दैत्य और दानव अलग अलग जातियाँ थीं और लोग इनको एक दूसरे का एकरूप मानकर भूल करते हैं। इस गलतफहमी का कारण यह है कि समय समय पर तीनों जातियों से देवताओं के युद्ध हुए थे जिसके कारण लोगों ने सामान्य धर्मविरोधी जाति के रूप में उनकी छवि बैठा ली। जहाँ तक 'असुर' शब्द का सवाल है इसका प्रयोग विशेष रूप से दैत्यों के लिए और सामान्य रूप से उक्त तीनों देवविरोधी जातियों के लिए होता है। यद्यपि शास्त्रों में दुष्ट स्वभाव के लोगों को भी लाक्षणिक रूप से असुर कहा गया है। इस प्रकार से इन सभी शब्दों के अर्थ में अन्तर है।

👉आज हम आपको श्वेतार्क गणपति का विधान बतायेगें III

आज हम आपको श्वेतार्क गणपति का विधान बतायेगें III

गणेश प्रतिमाओं का दर्शन विभिन्न मुद्राओं में होता है लेकिन प्रमुख तौर पर वाम एवं दक्षिण सूण्ड वाले गणेश से आमजन परिचित हैं। इनमें सात्विक और सामान्य उपासना की दृष्टि से वाम सूण्ड वाले गणेश और तामसिक एवं असाधारण साधनाओं के लिए दांयी सूण्ड वाले गणेश की पूजा का विधान रहा है।

तत्काल सिद्धि प्राप्ति के लिए श्वेतार्क गणपति की साधना भी लाभप्रद है। ऐसी मान्यता है कि रवि पुष्य नक्षत्रा में सफेद आक की जड़ से बनी गणेश प्रतिमा सद्य फलदायी है।

श्वेतार्क गणपति,,,शास्त्रों में श्वेतार्क के बारे में कहा गया है- "जहां कहीं भी यह पौधा अपने आप उग आता है, उसके आस-पास पुराना धन गड़ा होता है। जिस घर में श्वेतार्क की जड़ रहेगी, वहां से दरिद्रता स्वयं पलायन कर जाएगी। इस प्रकार मदार का यह पौधा मनुष्य के लिए देव कृपा, रक्षक एवं समृद्धिदाता है।

सफेद मदार की जड़ में गणेशजी का वास होता है, कभी-कभी इसकी जड़ गणशेजी की आकृति ले लेती है। इसलिए सफेद मदार की जड़ कहीं से भी प्राप्त करें और उसकी श्रीगणेश की प्रतिमा बनवा लें। उस पर लाल सिंदूर का लेप करके उसे लाल वस्त्र पर स्थापित करें। यदि जड़ गणेशाकार नहीं है, तो किसी कारीगर से आकृति बनवाई जा सकती है। शास्त्रों में मदार की जड़ की स्तुति इस मंत्र से करने का विघान है-

चतुर्भुज रक्ततनुंत्रिनेत्रं पाशाकुशौ मोदरक पात्र दन्तो।
करैर्दधयानं सरसीरूहस्थं गणाधिनाभंराशि चूùडमीडे।।

गणेशोपासना में साधक लाल वस्त्र, लाल आसान, लाल पुष्प, लाल चंदन, मूंगा अथवा रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। नेवैद्य में गुड़ व मूंग के लड्डू अर्पित करें। "ऊँ वक्रतुण्डाय हुम्" मंत्र का जप करें। श्रद्धा और भावना से की गई श्वेतार्क की पूजा का प्रभाव थोड़े बहुत समय बाद आप स्वयं प्रत्यक्ष रू प से अनुभव करने लगेंगे।

तन्त्र शास्त्र में श्वेतार्क गणपति की पूजा का विधान है | यह आम लक्ष्मी व गणपति की प्रतिमाओं से भिन्न होती है | यह प्रतिमा किसी धातु अथवा पत्थर की नहीं बल्कि जंगल में पाये जाने वाले एक पोधे को श्वेत आक के नाम से जाना जाता है।

इसकी जड़ कम से कम २७ वर्ष से जयादा पुरानी हो उसमें स्वत: ही गणेश जी की प्रतिमा बन जाती है | यह प्रक्रति का एक आश्चर्य ही है | श्वेत आक की जड़ (मूल ) यदि खोदकर निकल दी जाये तो निचे की जड़ में गणपति जी की प्रतिमा प्राप्त होगी | इस प्रतिमा का नित्य पूजन करने से साधक को धन-धान्य की प्राप्ति होती है | यह प्रतिमा स्वत: सिद्ध होती है | तन्त्र शास्त्रों के अनुसार ऐशे घर में यंहा यह प्रतिमा स्थापित हो , वंहा रिद्धी-सिद्ध तथा अन्नपूर्णा देवी वस् करती है।

श्वेतार्क की प्रतिमा रिद्धी-सिद्ध की मालिक होती है | जिस व्यक्ति के घर में यह गणपति की प्रतिमा स्थापित होगी उस घर में लक्ष्मी जी का निवास होता है तथा जंहा यह प्रतिमा होगी उस स्थान में कोई भी शत्रु हानी नहीं पहुंचा सकता | इस प्रतिमा के सामने नित्य बैठकर गणपति जी का मूल मन्त्र जपने से गणपति जी के दर्शन होते हैं तथा उनकी क्रपा प्राप्त होती है |

श्वेतक आक की गणपति की प्रतिमा अपने पूजा स्थान में पूर्व दिशा की तरफ ही स्थापित करें | ' ओम गं गणपतये नम:' मन्त्र का प्रतिदिन जप करने | जप के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें तथा श्वेत आक की जड़ की माला से यह जप करें तो जप कल में ही साधक की हर मनोकामना गणपति जी पूरी करते हैं |

व्यापार स्थल पर किसी भी प्रकार की समस्या हो तो वहां श्वेतार्क गणपति तथा की स्थापना करें।

स्वास्थ्य और धन के लिए श्वेत आर्क गणपति: श्वेतार्क वृक्ष से सभी परिचित हैं । इसे सफेद आक, मदार, श्वेत आक, राजार्क आदि नामों से जाना जाता है । सफेद फूलों वाले इस वृक्ष को गणपति का स्वरूप माना जाता है । इसलिए प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जहां भी यह पौधा रहता है, वहां इसकी पूजा की जाती है । इससे वहां किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आती । वैसे इसकी पूजा करने से साधक को काफी लाभ होता है।

अगर रविवार या गुरूवार के दिन पुष्प नक्षत्र में विधिपूर्वक इसकी जड़ को खोदकर ले आएं और पूजा करें तो कोई भी विपत्ति जातकों को छू भी नहीं सकती । ऐसी मान्यता है कि इस जड़ के दर्शन मात्र से भूत-प्रेत जैसी बाधाएं पास नहीं फटकती । अगर इस पौधे की टहनी तोड़कर सुखा लें और उसकी कलम बनाकर उसे यंत्र का निर्माण करें , तो यह यंत्र तत्काल प्रभावशाली हो जाएगा । इसकी कलम में देवी सरस्वती का निवास माना जाता है । वैसे तो इसे जड़ के प्रभाव से सारी विपत्तियां समाप्त हो जाती हैं ।

इसकी जड़ में दस से बारह वर्ष की आयु में भगवान गणेश की आकृति का निर्माण होता है । यदि इतनी पुरानी जड़ न मिले तो वैदिक विधि पूर्वक इसकी जड़ निकाल कर इस जड़ की लकड़ी में गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर बनाएं । यह आपके अंगूठे से बड़ी नहीं होनी चाहिए । इसकी विधिवत पूजा करें । पूजन में लाल कनेर के पुष्प अवश्य इस्तेमाल में लांए । इस मंत्र ‘‘ ऊँ पंचाकतम् ऊँ अंतरिक्षाय स्वााहा ’’ से पूजन करें और इसके पश्चात इस मंतर
‘‘ ऊँ ह्रीं पूर्वदयां ऊँ ही्रं फट् स्वाहा ’’ से 108 आहुति दें।

लाल कनेर के पुष्प शहद तथा शुद्ध गाय के घी से आहुति देने का विधान है । इसके बाद 11 माला जप नीचे लिखे मंत्र का करें और प्रतिदिन कम से कम 1 माला करें । ‘‘ ऊँ गँ गणपतये नमः ’’ का जप करें । अब ’’ ऊँ ह्रीं श्रीं मानसे सिद्धि करि ह्रीं नमः ’’ मंत्र बोलते हुए लाल कनेर के पुष्पों को नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें ।

धार्मिक दृष्टि से श्वेत आक को कल्प वृक्ष की तरह वरदायक वृक्ष माना गया है । श्रद्धा पूर्वक नतमस् तक होकर इस पौधे से कुछ माँगन पर यह अपनी जान देकर भी माँगने वाले की इच्छा पूरी करता है । यह भी कहा गया है कि इस प्रकार की इच्छा शुद्ध होनी चाहिए।

ऐसी आस्था भी है कि इसकी जड़ को पुष्प नक्षत्र में विशेष विधिविधान के साथ जिस घर में स्थापित किया जाता है वहाँ स्थायी रूप से लक्ष्मी का वास बना रहता है और धन धान्य की कमी नहीं रहती । श्वेतार्क के ताँत्रिक, लक्ष्मी प्राप्ति, ऋण नाशक, जादू टोना नाशक, नजर सुरक्षा के इतने प्रयोग हैं कि पूरी किताब लिखी जा सकती है।

थोड़ी सी मेहनत कर आप भी अपने घर के आसपास या किसी पार्क आदि में श्वेतार्क का पौधा प्राप्त कर सकते हैं । श्वेतार्क गणपति घर में स्थापित करने से सिर्फ गणेश जी ही नहीं बल्कि माता लक्ष्मी और भगवान शिव की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है । सिद्धी की इच्छा रखने वालों को 3 मास तक इसकी साधन करने से सिद्धी प्राप्त होती है । जिनके पास धन न रूकता हो या कमाया हुआ पैसा उल्टे सीधे कामों में जाता हो उन्हें अपने घर में श्वेतार्क गणपति की स्थापना करनी चाहिए।

जो लोग कर्ज में डूबे हैं उनके लिए कर्ज मुक्ति का इससे सरल अन्य कोई उपाय नहीं है । जो लोग ऊपरी बाधाओं और रोग विशेष से ग्रसित हैं इसकी पूजा से वायव्य बाधाओं से तुरंत मुक्ति और स्वास्थ्य में अप्रत्याशित लाभ पा सकते हैं । जिनके बच्चों का पढ़ने में मन न लगता हो वे इसकी स्थापना कर बच्चों की एकाग्रता और संयम बढ़ा सकते है । पुत्रकाँक्षी यानि पुत्र कामना करने वालों को गणपति पुत्रदा स्त्रोत का पाठ करना चाहिए ।

श्वेतार्क गणेश साधना: हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को अनेक रूप में पूजा जाता है इनमें से ही एक श्वेतार्क गणपति भी है । धार्मिक लोक मान्ताओं में धन, सुख-सौभाग्य समृद्धि ऐश्वर्य और प्रसन्नता के लिए श्वेतार्क के गणेश की मूर्ति शुभ फल देने वाली मानी जाती है।

श्वेतार्क के गणेश आक के पौधे की जड़ में बनी प्राकृतिक बनावट रूप में प्राप्त होते हैं । इसे पौधे की एक दुर्लभ जाति सफेद श्वेतार्क होती है जिसमें सफेद पत्ते और फूल पाए जाते हैं इसी सफेद श्वेतार्क की जड़ की बाहरी परत को कुछ दिनों तक पानी में भिगोने के बाद निकाला जाता है तब इस जड़ में भगवान गणेश की मूरत दिखाई देती है।

इसकी जड़ में सूंड जैसा आकार तो अक्सर देखा जा सकता है । भगवान श्री गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि के दाता माना जाता है । इसी प्रकार श्वेतार्क नामक जड़ श्री गणेश जी का रूप मानी जाती है श्वेतार्क सौभाग्यदायक व प्रसिद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है । श्वेतार्क की जड़ श्री गणेशजी का रूप मानी जाती है।

श्वेतार्क सौभाग्यदायक व प्रसिद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है । श्वेतार्क की जड़ को तंत्र प्रयोग एवं सुख-समृद्धि हेतु बहुत उपयोगी मानी जाती है । गुरू पुष्प नक्षत्र में इस जड़ का उपयोग बहुत ही शुभ होता है । यह पौधा भगवान गणेश के स्वरूप होने के कारण धार्मिक आस्था को और गहरा करता है ।

श्वेतार्क गणेश पूजन: श्वेतार्क गणपति की प्रतिमा को पूर्व दिशा की तरफ ही स्.थापित करना चाहिए तथा श्वेत आक की जड़ की माला से यह गणेश मंत्रों का जप करने से सर्वकामना सिद्ध होती है । श्वेतार्क गणेश पूजन में लाल वस्त्र, लाल आसान, लाल पुष्प, लाल चंदन, मूंगा अथवा रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करनी चाहिए।

नेवैद्य में लडडू अर्पित करने चाहिए ‘‘ ऊँ वक्रतुण्डाय हुम् ’’ मंत्र का जप करते हुए श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ श्वेतार्क की पूजा कि जानी चाहिए पूजा के श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ श्वेतार्क की पूजा कि जानी चाहिए पूजा के प्रभावस्वरूप् प्रत्यक्ष रूप से इसके शुभ फलों की प्राप्ति संभव हो पाती है

तन्त्र शास्त्र में भी श्वेतार्क गणपति की पूजा का विशेष बताया गया है । तंत्र शास्त्र अनुसार घर में इस प्रतिमा को स्ािापित करने से ऋद्धि-सिद्धि कि प्राप्ति होती है । इस प्रतिमा का नित्य पूजन करने से भक्त को धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा लक्ष्मी जी का निवास होता है । इसके पूजन द्वारा शत्रु भय समाप्त हो जाता है । श्वेतार्क प्रतिमा के सामने नित्य गणपति जी का मंत्र जाप करने से गणेशजी का आर्शिवाद प्राप्त होता है तथा उनकी कृपा बनी रहती है ।

श्वेतार्क गणेश महत्व: दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के साथ ही श्वेतार्क गणेश जी का पूजन व अथर्वशिर्ष का पाठ करने से बंधन दूर होते हैं और कार्यों में आई रूकावटें स्वत: ही दूर हो जाती है । धन की प्राप्ति हेतु श्वेतार्क की प्रतिमा को दीपावली की रात्रि में षडोषोपचार पूजन करना चाहिए ।

श्वेतार्क गणेश साधना अनेकों प्रकार की जटिलतम साधनाओं में सर्वाधिक सरल एवं सुरक्षित साधना है । श्वेतार्क गणपति समस्त प्रकार के विघनों के नाश के लिए सर्वपूजनीय है । श्वेतार्क गणपति की विधिवत स्थापना और पूजन से समस्त कार्य साधानाएं आदि शीघ्र निर्विघं संपन्न होते है।

श्वेतार्क गणेश के सम्मुख मंत्र का प्रतिदिन 10 माला जप करना चाहिए तथा ‘‘ ऊँ नमो हस्ति - मुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट - महात्मने आं क्रों हीं क्लीं ह्रीं हूं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा ’’ साधना से सभी इष्ट कार्य सिद्ध होते हैं।

Sunday, February 7, 2021

मित्र कैसे होने चाहिए

प्रिय आत्मन् 
मानव जीवन में मित्रता एक ऐसा रिश्ता है जो हमारे अस्तित्व को सार्थकता प्रदान करता है। मित्र हमारे जीवन के हर पहलू में साथ देते हैं, चाहे वह खुशी के पल हों या दुख की घड़ियां। लेकिन सभी मित्र एक समान नहीं होते। हर मित्र का महत्व और स्थान अलग होता है। खास मित्र हमारे लिए सबसे मूल्यवान होते हैं, जो बिना शर्त हमारे साथ रहते हैं। सामाजिक मित्र केवल स्वार्थ के लिए हमारे पास आते हैं, जबकि समाज में रहने वाले मित्र समय के साथ हमसे दूर हो जाते हैं। हमें अपने मित्रों की इन श्रेणियों को समझना चाहिए और यह पहचानना चाहिए कि कौन से मित्र हमारे जीवन में सच्चा योगदान देते हैं। सच्चे और खास मित्रों को पहचानकर उन्हें संजोना हमारे जीवन को और भी सुंदर बना सकता है। मित्रों को उनके व्यवहार, उनके साथ हमारे रिश्ते की प्रकृति और उनके महत्व के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में बांटा जा सकता है। इस लेख में, हम मित्रों की तीन मुख्य श्रेणियों- खास मित्र, सामाजिक मित्र और समाज में रहने वाले मित्र- पर चर्चा करेंगे।

1. खास मित्र :- खास मित्र वे होते हैं जो हमारे दिल के सबसे करीब होते हैं। ये हमारे सुख-दुख में शामिल होते हैं और हमारे गुणों व भावनाओं से अच्छी तरह परिचित होते हैं। ये मित्र हर समय हमारी सहायता के लिए तैयार रहते हैं, चाहे परिस्थितियां कितनी भी जटिल क्यों न हों। इनका रिश्ता लाभ-हानि से परे होता है और यह केवल आदर व प्रेम पर आधारित होता है। ऐसे मित्र हमारे जीवन में एक मजबूत नींव की तरह होते हैं।  

उदाहरण :- एक खास मित्र वह हो सकता है जो आपके साथ बचपन से है। जब आप किसी परीक्षा में असफल हो गए थे, तो उसने आपको हौसला दिया और जब आपने कोई उपलब्धि हासिल की, तो वह आपकी खुशी में शामिल हुआ। वह बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहता है। ऐसे मित्र जीवन में बहुत कम मिलते हैं और इनकी कीमत अनमोल होती है।

2. सामाजिक मित्र :- सामाजिक मित्र वे होते हैं जो केवल काम पड़ने पर ही हमें याद करते हैं। इनका हमारे साथ रिश्ता सिर्फ भौतिक लाभ पर टिका होता है। ये मित्र तब तक हमसे संपर्क करते हैं जब उन्हें हमसे कुछ सहायता चाहिए होती है। जैसे ही उनका उद्देश्य पूरा हो जाता है, वे हमसे दूरी बना लेते हैं। ऐसे रिश्तों में गहराई या भावनात्मक जुड़ाव की कमी होती है।  

उदाहरण :- कार्यस्थल पर एक सहकर्मी, किसी बीमा कंपनी में काम करने वाले या फिर किसी एम एल एम कंपनी से जुड़े हुये लोग । इन्हें हमारी जब याद आती है जब उनको अपना बिजनेस निकलना हो या फिर उन्हें अपनी चेन बनानी हो । यदि हम उनके कार्यों में रुचि नहीं दिखाते तब इनका बर्ताव हमारे प्रति ऐसा होता है कि यह हमें जानते ही नहीं और ना ही फिर भी हमसे दोबारा मिलते हैं । ऐसे मित्रों से हमें सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि इनका आधार स्वार्थ होता है।

3. समाज में रहने वाले मित्र :- ये वे मित्र हैं जो किसी कारणवश हमसे दूर हो गए हैं। समय, स्थान या जीवन की बदलती परिस्थितियों ने हमें इनसे अलग कर दिया। अब ये हमारे हित-अनहित की भावना से भी दूर हैं। ये मित्र कभी हमारे जीवन का हिस्सा थे, लेकिन अब इनका हमारे वर्तमान से कोई विशेष जुड़ाव नहीं रह गया है।  

उदाहरण :- आपके स्कूल के वे दोस्त जिनके साथ आपने खूब समय बिताया, लेकिन अब आप अलग-अलग शहरों में रहते हैं और संपर्क टूट गया है। इनके साथ पुरानी यादें जुड़ी हैं, पर आज के जीवन में इनकी भूमिका नहीं के बराबर है।

जब भी हम चेतना की अवस्था में किसी से कोई भी रिश्ता बनाएं तो हमें सबसे पहले यह ध्यान देना अनिवार्य है कि हमारे किसी भी रिश्ते का आधार क्या है ?
१ - प्रेम 
२ - धर्म 
३ - अनुवांशिकता (DNA )
४ - इच्छा 
५ - आवश्यकता 
६ - सजातीय गुण 
७ - मित्रता 
८- समझौता 
९- भौतिक सुखों की लालसा
१०- या कोई जबरदस्ती थोपा गया रिश्ता ।

किसी से जुड़ने से पहले स्वयं जांचे कि - 
१- क्या हमारे विचार एक समान हैं ?
२- क्या हमारे गुण एक समान है ?
३- क्या हमारी पसंद एक समान है ?
४- क्या हमारी चर्चाओं के विषय एक समान है ?
५- क्या हमारी दिनचर्या एक समान है ?
६- क्या हमारा कार्य क्षेत्र एक है ?
७- क्या हमारा लक्ष्य एक समान है ?
८- क्या हमारा मार्ग एक समान है ?

इसी आधार पर रिश्तो के मजबूत होने की संभावना रहती है ।ध्यान दें कि रिश्ता वही मान्य होता है जो दोनों ओर से स्वीकार किया जाए । और जिन रिश्तों का आधार प्रेम और समर्पण हो वह रिस्ते कभी नहीं टूटते ।


Saturday, February 6, 2021

👉जानें जन्म का पाया ओर ज्योतिष शास्त्र फलकथन*

*जानें जन्म का पाया ओर ज्योतिष शास्त्र फलकथन*
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✍🏻बच्चे का जन्म होते ही बड़े-बुजुर्ग यह जानने को उत्सुक रहते हैं कि बच्चा किस पाए के साथ घर में आया है। कुंडली के बारह स्थानों को चार पायों में बाँटा गया है और इन्हें चार धातुओं-सोना, चाँदी, ताँबा और लोहे का नाम दिया गया है। 
ज्योतिषाचार्य पं. नरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के अनुसार जन्म के समय चंद्रमा जिस स्थान पर होता है (कुंडली में) उसके अनुसार पाया जाना जाता है.!
*१:-सोने का पाया:-* जब चंद्रमा पहले, छठे या ग्यारहवें भाव में हो तो स्वर्ण पाद का जन्म समझा जाता है, श्रेष्ठता क्रम में यह तीसरे नंबर पर आता है। 
*२:- चाँदी का पाया:-*  चंद्रमा दूसरे, पाँचवे या नववें भाव में हो तो चाँदी के पाए का जन्म माना जाता है। श्रेष्ठता क्रम में यह सर्वोत्तम माना जाता है। 
*३:- ताँबे का पाया:-* चंद्रमा तीसरे, सातवें या दसवें स्थान में हो तो ताँबे का पाया होता है। श्रेष्ठता क्रम में यह दूसरे क्रम पर है।
*४:-लोहे का पाया:-* जब चंद्रमा चौथे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो बच्चे का जन्म लोहे के पाए का होता है। यह पाया शुभ नहीं माना जाता!
वास्तव में चंद्रमा 4, 8, 12 में स्वास्थ्य हानि करता है इसलिए कदाचित लोहे के पाए को अशुभ माना गया है।

Monday, February 1, 2021

👉शिव पूजा


अब भगवान को वस्त्र पहनाएं। वस्त्रों के बाद आभूषण और फिर यज्ञोपवित (जनेऊ) पहनाएं। अब पुष्पमाला पहनाएं। सुगंधित इत्र अर्पित करें। अब तिलक करें। तिलक के लिए अष्टगंध या चंदन का प्रयोग करें। अब धूप व दीप अर्पित करें। भगवान शिव को धतूरा, आक के फूल विशेष प्रिय है। बिल्वपत्र अर्पित करें। 11 या 21 चावल अर्पित करें। श्रद्धानुसार घी या तेल का दीप

पूजन सामग्री
देव मूर्ति के स्नान के लिए तांबे का पात्र, तांबे का लोटा, दूध, अर्पित किए जाने वाले वस्त्र । चावल, अष्टगंध, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती, चंदन, धतूरा, अकुआ के फूल, बिल्वपत्र, जनेऊ, फल, मिठाई, नारियल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद व शक्कर), सूखे मेवे, पान, दक्षिणा में से जो भी हो।

सकंल्प लें
पूजन शुरू करने से पहले सकंल्प लें। संकल्प करने से पहले हाथों मेे जल, फूल व चावल लें। सकंल्प में जिस दिन पूजन कर रहे हैं उस वर्ष, उस वार, तिथि उस जगह और अपने नाम को लेकर अपनी इच्छा बोलें। अब हाथों में लिए गए जल को जमीन पर छोड़ दें। 

आवाहन
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आव्हानयामि स्थापयामि कहते हुए मूर्ति पर चावल चढ़ाएं। आवाहन का अर्थ है कि भगवान शिव को अपने घर में आने का बुलावा देना।

आसन
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि कहते हुए आसन दें। आसन का अर्थ है कि भगवान शिव को घर के पूजा घर में विराजने के लिए आसन दिया है।

पाद्यं
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पादयो : पाद्यं समर्पयामि कहते हुए पैर धुलाएं।

अर्घ
आचमनी में जल, पुष्प, चावल लें। ऊँ साम्ब शिवाय नमः हस्तयोः अर्घं समर्पयामि कहते हुए हाथों को धुलाएं।

आचमन
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आचमनीयम् जलं समर्पयामि कहते हुए आचमन के लिए जल छोड़े। आचमन का अर्थ होता है मुख शुद्धि करना।

पंचामृत से स्नान कराना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पंचामृत स्नानं समर्पयामि कहते हुए पंचामृत से नहलाएं। पंचामृत का अर्थ है कि दूध, दही, शक्कर, शहद व घी का मिश्रण। इन पांचों चीजों से भगवान को नहलाना।

शुद्ध जल से स्नान कराना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। कहते हुए शुद्ध जल से स्नान कराएं।

वस्त्र अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः वस्त्रोपवस्त्रम् समर्पयामि कहते हुए वस्त्र अर्पित करें।

गन्ध अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः गन्धं समर्पयामि। चंदन, अष्टगंध इत्यादि सुगंधित द्रव्यों को लगाएं।

पुष्प अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पुष्पं समर्पयामि कहते हुए आक, धतुरा, चंपा के पुष्प चढ़ाएं।

बिल्व पत्र अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः बिल्वपत्रं समर्पयामि कहते हुए बिल्व पत्र अर्पित करें।

अक्षत
ऊँ साम्ब शिवाय नमः अक्षताम् समर्पयामि। कहते हुए 11 या 21 चावल अर्पित करें। अक्षत का अर्थ है आखा। ध्यान रखें कि अक्षत टूटे हुए न हों।

धूप दिखाना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः धूपम् आघर्पयामि कहते हुए धूप दिखाएं। अपने हाथों से धूप पर से हाथ फिरा कर शिव पर छाया करें।

दीप दिखाना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः दीपम् दर्शयामि। कहते हुए दीपक दिखाएं। अपने हाथों से दीपक पर से हाथ फिरा कर भगवान शिव पर छाया करें।

आरती करें
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आरार्तिक्यम् समर्पयामि कहते हुए आरती अर्पित करें। 

प्रदक्षिणा
भगवान शिव की परिक्रमा करें। शास्त्रों में भगवान शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करने का उल्लेख किया गया है। जलाधारी का लंधन नहीं किया जाता है। परिक्रमा करने के बाद भगवान शिव की मूर्ति के सामने यह कहते हुए प्रदक्षिणा समर्पित करें। 
ऊँ साम्ब शिवाय नमः प्रदक्षिणा समर्पयामि।

पुष्पांजलि अर्पित करें
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पुष्पांजलि समर्पयामि कहते हुए हाथ में लिए पुष्पों को भगवान शिव को समर्पित कर दें।

नेवैद्य अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः नेवैद्यम् निवेदयामि कहते हुए पंचामृत का भोग लगाएं। 

फल समर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः फलम् समर्पयामि कहते हुए फल अर्पित करें। 

मिठाई का भोग लगाएं
ऊँ साम्ब शिवाय नमः मिष्ठान्न भोजनम् समर्पयामि कहते हुए मीठा भोजन मिठाई अर्पित करें। 

पंचमेवा समर्पयामि
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पंचमेवा भोजनम् समर्पयामि कहते हुए पंचमेवा अर्पित करें।

आचमन करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः नेवैद्यांति जलं आचमनम् समर्पयामि कहते हुए आचमन के लिए जल छोड़े। भगवान को नेवैद्य अर्पित करने के बाद मुख शुद्धि के लिए आचमन करवाया जाता है।

ताम्बूल
ऊँ साम्ब शिवाय नमः तांबूल समर्पयामि कहते हुए पान अर्पित करें। भगवान को पान का भोग लगाएं।

द्रव्य दक्षिणा समर्पित करें
ऊँ साम्ब शिवाय नमः यथाशक्ति द्रव्य दक्षिणा समर्पयामि कहते हुए दक्षिणा समर्पित करें।

क्षमा-प्रार्थना
क्षमा-प्रार्थना पूजन में रह गई किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए भगवान शिव से क्षमा मांगे। जीवन में सुख समृद्धि बनाये रखने की प्रार्थना करें

daily shiv puja vidhi in hindi- प्रतिदिन इस विधि से करें भगवान शिव की पूजा

By: balmeek pandey

|

Published: 11 Jul 2017, 02:50 PM IST

जबलपुर। भगवान शिव की पूजा का बड़ा ही महत्व है। एक लोटा जल चढ़ा देने से प्रसंन्न होने वाले भगवान शिव की पूजा बड़ी-बड़ी बाधाओं को दूर कर देती है। तो आइये हम आपको बताते हैं कि प्रतिदिन भगवान शिव की किस विधि से पूजा करें। भगवान भोलेनाथ के पूजन में इन बातों का विशेष ध्यान रखें। सर्वप्रथम गणेश पूजन करें। भगवान गणेश को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। गंध, पुष्प, अक्षत अर्पित करें। अब भगवान शिव का पूजन शुरु करें। गृहस्थ जीवन में भगवान शिव की पारद प्रतिमा का पूजन सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। सफेद आक या स्फटिक की प्रतिमा का पूजन से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है। सबसे पहले जिस मूर्ति में भगवान शिव की पूजा की जानी है। उसे अपने पूजा घर में स्थान दें। मूर्ति में भगवान शिव का आवाहन करें। भगवान शिव को अपने घर में सम्मान सहित स्थान देें। अब भगवान शिव को स्नान कराएं। स्नान पहले जल से फिर पंचामृत से और वापिस जल से स्नान कराएं।

अब भगवान को वस्त्र पहनाएं। वस्त्रों के बाद आभूषण और फिर यज्ञोपवित (जनेऊ) पहनाएं। अब पुष्पमाला पहनाएं। सुगंधित इत्र अर्पित करें। अब तिलक करें। तिलक के लिए अष्टगंध या चंदन का प्रयोग करें। अब धूप व दीप अर्पित करें। भगवान शिव को धतूरा, आक के फूल विशेष प्रिय है। बिल्वपत्र अर्पित करें। 11 या 21 चावल अर्पित करें। श्रद्धानुसार घी या तेल का दीप

पूजन सामग्री
देव मूर्ति के स्नान के लिए तांबे का पात्र, तांबे का लोटा, दूध, अर्पित किए जाने वाले वस्त्र । चावल, अष्टगंध, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती, चंदन, धतूरा, अकुआ के फूल, बिल्वपत्र, जनेऊ, फल, मिठाई, नारियल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद व शक्कर), सूखे मेवे, पान, दक्षिणा में से जो भी हो।

सकंल्प लें
पूजन शुरू करने से पहले सकंल्प लें। संकल्प करने से पहले हाथों मेे जल, फूल व चावल लें। सकंल्प में जिस दिन पूजन कर रहे हैं उस वर्ष, उस वार, तिथि उस जगह और अपने नाम को लेकर अपनी इच्छा बोलें। अब हाथों में लिए गए जल को जमीन पर छोड़ दें। 

आवाहन
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आव्हानयामि स्थापयामि कहते हुए मूर्ति पर चावल चढ़ाएं। आवाहन का अर्थ है कि भगवान शिव को अपने घर में आने का बुलावा देना।

आसन
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि कहते हुए आसन दें। आसन का अर्थ है कि भगवान शिव को घर के पूजा घर में विराजने के लिए आसन दिया है।

पाद्यं
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पादयो : पाद्यं समर्पयामि कहते हुए पैर धुलाएं।

अर्घ
आचमनी में जल, पुष्प, चावल लें। ऊँ साम्ब शिवाय नमः हस्तयोः अर्घं समर्पयामि कहते हुए हाथों को धुलाएं।

आचमन
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आचमनीयम् जलं समर्पयामि कहते हुए आचमन के लिए जल छोड़े। आचमन का अर्थ होता है मुख शुद्धि करना।

पंचामृत से स्नान कराना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पंचामृत स्नानं समर्पयामि कहते हुए पंचामृत से नहलाएं। पंचामृत का अर्थ है कि दूध, दही, शक्कर, शहद व घी का मिश्रण। इन पांचों चीजों से भगवान को नहलाना।

शुद्ध जल से स्नान कराना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। कहते हुए शुद्ध जल से स्नान कराएं।

वस्त्र अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः वस्त्रोपवस्त्रम् समर्पयामि कहते हुए वस्त्र अर्पित करें।

गन्ध अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः गन्धं समर्पयामि। चंदन, अष्टगंध इत्यादि सुगंधित द्रव्यों को लगाएं।

पुष्प अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पुष्पं समर्पयामि कहते हुए आक, धतुरा, चंपा के पुष्प चढ़ाएं।

बिल्व पत्र अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः बिल्वपत्रं समर्पयामि कहते हुए बिल्व पत्र अर्पित करें।

अक्षत
ऊँ साम्ब शिवाय नमः अक्षताम् समर्पयामि। कहते हुए 11 या 21 चावल अर्पित करें। अक्षत का अर्थ है आखा। ध्यान रखें कि अक्षत टूटे हुए न हों।

धूप दिखाना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः धूपम् आघर्पयामि कहते हुए धूप दिखाएं। अपने हाथों से धूप पर से हाथ फिरा कर शिव पर छाया करें।

दीप दिखाना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः दीपम् दर्शयामि। कहते हुए दीपक दिखाएं। अपने हाथों से दीपक पर से हाथ फिरा कर भगवान शिव पर छाया करें।

आरती करें
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आरार्तिक्यम् समर्पयामि कहते हुए आरती अर्पित करें। 

प्रदक्षिणा
भगवान शिव की परिक्रमा करें। शास्त्रों में भगवान शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करने का उल्लेख किया गया है। जलाधारी का लंधन नहीं किया जाता है। परिक्रमा करने के बाद भगवान शिव की मूर्ति के सामने यह कहते हुए प्रदक्षिणा समर्पित करें। 
ऊँ साम्ब शिवाय नमः प्रदक्षिणा समर्पयामि।

पुष्पांजलि अर्पित करें
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पुष्पांजलि समर्पयामि कहते हुए हाथ में लिए पुष्पों को भगवान शिव को समर्पित कर दें।

नेवैद्य अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः नेवैद्यम् निवेदयामि कहते हुए पंचामृत का भोग लगाएं। 

फल समर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः फलम् समर्पयामि कहते हुए फल अर्पित करें। 

मिठाई का भोग लगाएं
ऊँ साम्ब शिवाय नमः मिष्ठान्न भोजनम् समर्पयामि कहते हुए मीठा भोजन मिठाई अर्पित करें। 

पंचमेवा समर्पयामि
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पंचमेवा भोजनम् समर्पयामि कहते हुए पंचमेवा अर्पित करें।

आचमन करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः नेवैद्यांति जलं आचमनम् समर्पयामि कहते हुए आचमन के लिए जल छोड़े। भगवान को नेवैद्य अर्पित करने के बाद मुख शुद्धि के लिए आचमन करवाया जाता है।

ताम्बूल
ऊँ साम्ब शिवाय नमः तांबूल समर्पयामि कहते हुए पान अर्पित करें। भगवान को पान का भोग लगाएं।

द्रव्य दक्षिणा समर्पित करें
ऊँ साम्ब शिवाय नमः यथाशक्ति द्रव्य दक्षिणा समर्पयामि कहते हुए दक्षिणा समर्पित करें।

क्षमा-प्रार्थना
क्षमा-प्रार्थना पूजन में रह गई किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए भगवान शिव से क्षमा मांगे। जीवन में सुख समृद्धि बनाये रखने की प्रार्थना करें

daily shiv puja vidhi in hindi- प्रतिदिन इस विधि से करें भगवान शिव की पूजा

By: balmeek pandey

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Published: 11 Jul 2017, 02:50 PM IST

जबलपुर। भगवान शिव की पूजा का बड़ा ही महत्व है। एक लोटा जल चढ़ा देने से प्रसंन्न होने वाले भगवान शिव की पूजा बड़ी-बड़ी बाधाओं को दूर कर देती है। तो आइये हम आपको बताते हैं कि प्रतिदिन भगवान शिव की किस विधि से पूजा करें। भगवान भोलेनाथ के पूजन में इन बातों का विशेष ध्यान रखें। सर्वप्रथम गणेश पूजन करें। भगवान गणेश को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। गंध, पुष्प, अक्षत अर्पित करें। अब भगवान शिव का पूजन शुरु करें। गृहस्थ जीवन में भगवान शिव की पारद प्रतिमा का पूजन सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। सफेद आक या स्फटिक की प्रतिमा का पूजन से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है। सबसे पहले जिस मूर्ति में भगवान शिव की पूजा की जानी है। उसे अपने पूजा घर में स्थान दें। मूर्ति में भगवान शिव का आवाहन करें। भगवान शिव को अपने घर में सम्मान सहित स्थान देें। अब भगवान शिव को स्नान कराएं। स्नान पहले जल से फिर पंचामृत से और वापिस जल से स्नान कराएं।

अब भगवान को वस्त्र पहनाएं। वस्त्रों के बाद आभूषण और फिर यज्ञोपवित (जनेऊ) पहनाएं। अब पुष्पमाला पहनाएं। सुगंधित इत्र अर्पित करें। अब तिलक करें। तिलक के लिए अष्टगंध या चंदन का प्रयोग करें। अब धूप व दीप अर्पित करें। भगवान शिव को धतूरा, आक के फूल विशेष प्रिय है। बिल्वपत्र अर्पित करें। 11 या 21 चावल अर्पित करें। श्रद्धानुसार घी या तेल का दीप

पूजन सामग्री
देव मूर्ति के स्नान के लिए तांबे का पात्र, तांबे का लोटा, दूध, अर्पित किए जाने वाले वस्त्र । चावल, अष्टगंध, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती, चंदन, धतूरा, अकुआ के फूल, बिल्वपत्र, जनेऊ, फल, मिठाई, नारियल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद व शक्कर), सूखे मेवे, पान, दक्षिणा में से जो भी हो।

सकंल्प लें
पूजन शुरू करने से पहले सकंल्प लें। संकल्प करने से पहले हाथों मेे जल, फूल व चावल लें। सकंल्प में जिस दिन पूजन कर रहे हैं उस वर्ष, उस वार, तिथि उस जगह और अपने नाम को लेकर अपनी इच्छा बोलें। अब हाथों में लिए गए जल को जमीन पर छोड़ दें। 

आवाहन
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आव्हानयामि स्थापयामि कहते हुए मूर्ति पर चावल चढ़ाएं। आवाहन का अर्थ है कि भगवान शिव को अपने घर में आने का बुलावा देना।

आसन
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि कहते हुए आसन दें। आसन का अर्थ है कि भगवान शिव को घर के पूजा घर में विराजने के लिए आसन दिया है।

पाद्यं
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पादयो : पाद्यं समर्पयामि कहते हुए पैर धुलाएं।

अर्घ
आचमनी में जल, पुष्प, चावल लें। ऊँ साम्ब शिवाय नमः हस्तयोः अर्घं समर्पयामि कहते हुए हाथों को धुलाएं।

आचमन
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आचमनीयम् जलं समर्पयामि कहते हुए आचमन के लिए जल छोड़े। आचमन का अर्थ होता है मुख शुद्धि करना।

पंचामृत से स्नान कराना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पंचामृत स्नानं समर्पयामि कहते हुए पंचामृत से नहलाएं। पंचामृत का अर्थ है कि दूध, दही, शक्कर, शहद व घी का मिश्रण। इन पांचों चीजों से भगवान को नहलाना।

शुद्ध जल से स्नान कराना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। कहते हुए शुद्ध जल से स्नान कराएं।

वस्त्र अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः वस्त्रोपवस्त्रम् समर्पयामि कहते हुए वस्त्र अर्पित करें।

गन्ध अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः गन्धं समर्पयामि। चंदन, अष्टगंध इत्यादि सुगंधित द्रव्यों को लगाएं।

पुष्प अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पुष्पं समर्पयामि कहते हुए आक, धतुरा, चंपा के पुष्प चढ़ाएं।

बिल्व पत्र अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः बिल्वपत्रं समर्पयामि कहते हुए बिल्व पत्र अर्पित करें।

अक्षत
ऊँ साम्ब शिवाय नमः अक्षताम् समर्पयामि। कहते हुए 11 या 21 चावल अर्पित करें। अक्षत का अर्थ है आखा। ध्यान रखें कि अक्षत टूटे हुए न हों।

धूप दिखाना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः धूपम् आघर्पयामि कहते हुए धूप दिखाएं। अपने हाथों से धूप पर से हाथ फिरा कर शिव पर छाया करें।

दीप दिखाना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः दीपम् दर्शयामि। कहते हुए दीपक दिखाएं। अपने हाथों से दीपक पर से हाथ फिरा कर भगवान शिव पर छाया करें।

आरती करें
ऊँ साम्ब शिवाय नमः आरार्तिक्यम् समर्पयामि कहते हुए आरती अर्पित करें। 

प्रदक्षिणा
भगवान शिव की परिक्रमा करें। शास्त्रों में भगवान शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करने का उल्लेख किया गया है। जलाधारी का लंधन नहीं किया जाता है। परिक्रमा करने के बाद भगवान शिव की मूर्ति के सामने यह कहते हुए प्रदक्षिणा समर्पित करें। 
ऊँ साम्ब शिवाय नमः प्रदक्षिणा समर्पयामि।

पुष्पांजलि अर्पित करें
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पुष्पांजलि समर्पयामि कहते हुए हाथ में लिए पुष्पों को भगवान शिव को समर्पित कर दें।

नेवैद्य अर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः नेवैद्यम् निवेदयामि कहते हुए पंचामृत का भोग लगाएं। 

फल समर्पित करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः फलम् समर्पयामि कहते हुए फल अर्पित करें। 

मिठाई का भोग लगाएं
ऊँ साम्ब शिवाय नमः मिष्ठान्न भोजनम् समर्पयामि कहते हुए मीठा भोजन मिठाई अर्पित करें। 

पंचमेवा समर्पयामि
ऊँ साम्ब शिवाय नमः पंचमेवा भोजनम् समर्पयामि कहते हुए पंचमेवा अर्पित करें।

आचमन करना
ऊँ साम्ब शिवाय नमः नेवैद्यांति जलं आचमनम् समर्पयामि कहते हुए आचमन के लिए जल छोड़े। भगवान को नेवैद्य अर्पित करने के बाद मुख शुद्धि के लिए आचमन करवाया जाता है।

ताम्बूल
ऊँ साम्ब शिवाय नमः तांबूल समर्पयामि कहते हुए पान अर्पित करें। भगवान को पान का भोग लगाएं।

द्रव्य दक्षिणा समर्पित करें
ऊँ साम्ब शिवाय नमः यथाशक्ति द्रव्य दक्षिणा समर्पयामि कहते हुए दक्षिणा समर्पित करें।

क्षमा-प्रार्थना
क्षमा-प्रार्थना पूजन में रह गई किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए भगवान शिव से क्षमा मांगे। जीवन में सुख समृद्धि बनाये रखने की प्रार्थना करें

वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या: दोषारोपण की प्रवृत्ति

प्रणाम मित्रो वर्तमान समय में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली अधिकांश समस्याओं और विकृतियों के लिए स्...