Wednesday, October 31, 2018

सूक्ष्म अहंकार

सभी साधकों को प्रणाम

अध्यात्म के इस अत्यंत गहन और व्यावहारिक पथ पर जब हम अग्रसर होते हैं, तो मार्ग में आने वाली बाधाएँ भी उतनी ही सूक्ष्म और रहस्यमयी होती जाती हैं। स्थूल विकार तो बाहर से दिखाई दे जाते हैं और उन पर नियंत्रण पाना भी कुछ सीमा तक सरल होता है, परंतु अंतःकरण की गहराइयों में छुपा सूक्ष्म अहंकार एक ऐसा आवरण है जो साधक को अपनी ही दृष्टि में भ्रमित रखता है। इस विषय की महत्ता को समझना प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य है क्योंकि इसके बोध के बिना चेतना के उच्च स्तरों पर प्रवेश असंभव है। किसी भी कार्य या साधना की सफलता के लिए उसके मूल कारण, उसकी संपूर्ण प्रक्रिया और उससे प्राप्त होने वाले वास्तविक परिणाम का स्पष्ट ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। जब तक हम इस सूक्ष्म अवरोध के कारण और इसके कार्य करने की शैली को नहीं समझेंगे, तब तक साधना मात्र एक बौद्धिक विलास बनकर रह जाएगी।

इस विषय में गहन जिज्ञासा का होना ही साधक के भीतर जागृति का पहला लक्षण है। जब मन में यह तीव्र उत्कंठा जागती है कि वह कौन सी शक्ति है जो हमें सत्य का साक्षात् करने से रोक रही है, तब इस सूक्ष्म अहंकार का रहस्य खुलना प्रारंभ होता है। इस विषय की उपयोगिता साधक के जीवन में यह है कि यह उसे आत्म-निरीक्षण की शक्ति प्रदान करता है। जब हम किसी चर्चा में अपनी अज्ञानता को छुपाने के लिए विषय बदलने लगते हैं, तर्क-वितर्क का सहारा लेते हैं या सहजता से अपनी अज्ञानता को स्वीकार नहीं कर पाते, तब यह समझ लेना चाहिए कि यह अज्ञान नहीं बल्कि सूक्ष्म अहंकार की उपस्थिति है। यह अहंकार साधक को निरंतर एक सहज और सुखद मार्ग की खोज में भटकाता रहता है। वह कभी ज्ञान, कभी कर्म तो कभी भक्ति के केवल बाहरी सिद्धांतों और वचनों से आकर्षित होकर स्वयं को उस मार्ग का सिद्ध मान लेता है, परंतु वास्तव में वह किसी भी पथ की गहराई में उतरने का कष्ट नहीं उठाना चाहता।

इस सूक्ष्म बंधन से मुक्त होने और वास्तविक ज्ञान अर्जित करने की प्रक्रिया अत्यंत अनुशासित और तपस्यापूर्ण है। ज्ञान प्राप्ति की वास्तविक प्रक्रिया यही है कि साधक को किसी भी प्रकार की काल्पनिक कहानियों, चमत्कारी घटनाओं या केवल मनोरंजन करने वाले वृत्तांतों के प्रभाव में आए बिना, पूरी तरह से तटस्थ होकर विवेकपूर्ण मार्ग पर आगे बढ़ना होता है। साधना केवल मन के स्तर पर विचारों को दोहराना नहीं है, बल्कि शरीर, मन और बुद्धि—तीनों स्तरों पर निरंतर प्रयास करने का नाम है। सूक्ष्म अहंकार साधक को उसके सुरक्षित घेरे से बाहर आने नहीं देता और हर परिस्थिति में स्वयं को सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है। इस प्रक्रिया को बदलने के लिए एक मार्ग को दृढ़ता से पकड़कर, समर्पण के साथ निरंतर अभ्यास करना पड़ता है। जब साधक हर क्षण सजग रहकर अपनी इस प्रवृत्ति को देखता है और अपनी सीमाओं को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता है, तब ज्ञानार्जन की वास्तविक प्रक्रिया क्रियाशील होती है।

इस निरंतर साधना और समर्पण का जो परिणाम प्राप्त होता है, वह साधक के जीवन को पूरी तरह से रूपांतरित कर देता है। इस प्रक्रिया के पूर्ण होने पर जब "मैं सब जानता हूँ" का भ्रम टूटता है, तब अंतःकरण में एक अगाध विनम्रता और स्वीकार्यता का जन्म होता है। परिणाम स्वरूप, साधक मत-मतांतरों और केवल शाब्दिक चर्चाओं के जाल से बाहर निकलकर सत्य के वास्तविक प्रकाश का अनुभव करता है। जहाँ स्थूल अहंकार दूसरों को दबाने की चेष्टा करता है, वहीं यह सूक्ष्म अहंकार सत्य को ही अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास करता है। परंतु जब साधना के प्रभाव से इसका क्षय होता है, तब सत्य के सम्मुख पूर्ण समर्पण घटित होता है, जो साधक को आत्मिक उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित कर देता है।

इस चर्चा के आलोक में, जब आप अपने दैनिक व्यवहार या वैचारिक आदान-प्रदान का निरीक्षण करते हैं, तो क्या आपको कहीं अपनी अज्ञानता को सहजता से स्वीकार करने में संकोच का अनुभव होता है?

क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी साधना मार्ग के केवल बौद्धिक सिद्धांतों को जानकर मन ने क्रियात्मक साधना किए बिना ही स्वयं को तृप्त मान लिया हो?

परिस्थितियों में स्वयं को सही सिद्ध करने की जो स्वाभाविक इच्छा उठती है, उसे रोकने और समर्पण भाव को जगाने के लिए आप अपने दैनिक जीवन में किस प्रकार का अभ्यास आवश्यक समझते हैं?

आपकी साधना निर्बाध रूप से आगे बढ़ती रहे और चेतना का यह सूक्ष्म अन्वेषण आपको सत्य के और निकट ले जाए, इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ।

👉दिवाली की रात में कहां-कहां दीपक लगाने चाहिए ?

👉दिवाली की रात में कहां-कहां दीपक लगाने चाहिए ?

(1)  पीपल के पेड़ के नीचे दीपावली की रात एक दीपक लगाकर घर लौट आएं। दीपक लगाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। ऐसा करने पर आपकी धन से जुड़ी समस्याएं दूर हो सकती हैं।

(2) यदि संभव हो सके तो दिवाली की रात के समय किसी श्मशान में दीपक लगाएं। यदि यह संभव ना हो तो किसी सुनसान इलाके में स्थित मंदिर में दीपक लगा सकते हैं।

(3) धन प्राप्ति की कामना करने वाले व्यक्ति को दीपावली की रात मुख्य दरवाजे की चौखट के दोनों ओर दीपक अवश्य लगाना चाहिए।

(4) अपने घर के आसपास वाले चौराहे पर रात के समय दीपक लगाना चाहिए। ऐसा करने पर पैसों से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।

(5) घर के पूजन स्थल में दीपक लगाएं, जो पूरी रात बुझना नहीं चाहिए। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

(6)  किसी बिल्व पत्र के पेड़ के नीचे दीपावली की शाम दीपक लगाएं। बिल्व पत्र भगवान शिव का प्रिय वृक्ष है। अत: यहां दीपक लगाने पर उनकी कृपा प्राप्त होती है।

(7) घर के आसपास जो भी मंदिर हो वहां रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इससे सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।

(8) घर के आंगन में भी दीपक लगाना चाहिए। ध्यान रखें यह दीपक रातभर बुझना नहीं चाहिए।

(9) घर के पास कोई नदी या तालब हो तो वहा पर रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इस से दोषो से मुक्ति मिलती है !

(10) तुलसी जी और के पेड़ और सालिगराम के पास रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

(11) पितरो  का दीपक गया तीर्थ के नाम से घर के दक्षिण में लगाये ! इस से पितृ दोष से मुक्ति मिलती  है

👉व्रत-पर्व शंका समाधान

👉व्रत-पर्व शंका समाधान
〰️〰️🔸〰️🔸〰️〰️
धर्म शास्त्रों के अनुसार जिस तिथि में सूर्य उदय होता है उस तिथि को उदया तिथि कहां जाता है लोगों की धारणा है कि जिस तिथि में सूर्य उदय होता है उसी तिथि में व्रत पर्व उत्सव मनाना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है कि सभी पर्व उत्सव जयंती उदया तिथि में ही मनाई जाए धर्म शास्त्रों के अनुसार कर्म कॉल तिथि मध्य व्यापिनी तिथि प्रदोष व्यापिनी तिथि अर्द्धरात्रि व्यापिनी तिथि निशीथ व्यापिनी तिथि में भी व्रत उत्सव पर्व मनाने का शास्त्रोक्त विधान है।

जैसे             

1👉 भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी तिथि को मध्यम दोपहर के समय हुआ था इसमें मध्य व्यापिनी तिथि ही लेना चाहिए उसी तिथि में उत्सव व्रत करना चाहिए।  

  2👉 भगवान परशुराम जी का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को प्रदोष काल में हुआ था इसमें प्रदोष व्यापिनी तिथि ही लेना चाहिए जो शाम के समय हो।                           

3👉 भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र बुधवार को अर्ध रात्रि के समय हुआ था परंतु इस व्रत में दो मत है स्मार्त लोग अर्ध रात्रि का स्पर्श होने पर या रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी में भी व्रत उपवास करते हैं परंतु वैष्णव लोग सप्तमी का किंचित मात्र स्पर्श होने पर द्वितीय दिवस में ही वास करते हैं निंबार्क संप्रदाय वैष्णव तो पूर्ण दिन अर्धरात्रि से यदि कुछ पल भी सप्तमी अधिक हो तो भी अष्टमी करके नवमी में ही व्रत करते हैं शेष वैष्णवों में उदय व्यापिनी अष्टमी भी एवं रोहिणी नक्षत्र को ही मान्यता एवं प्रधानता दी जाती है।  

4👉 श्री गणेश चतुर्थी व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को मध्यम के समय भगवान विघ्न विनायक गणेश जी का जन्म हुआ था इस कारण इस व्रत में मध्य व्यापिनी तिथि ही ली जाती है।

5👉 श्राद्ध कर्म में भी मध्यम व्यापिनी तिथि लेने का विधान है।
                                    
6👉 नवरात्रा में चैत्र के नवरात्रि में अमावस्या युक्त प्रतिपदा तिथि और शारदीय नवरात्रि में प्रतिपदा युक्त द्वितीया तिथि ग्रहण करना चाहिए।
        
7👉  दशहरा पर्व में प्रदोष व्यापिनी नवमी विधा दशमी तिथि ग्रहण करना चाहिए।
 
8👉 शरद पूर्णिमा में निशीथ व्यापिनी तिथि ग्रहण करना चाहिए रात्रि के समय पूर्णिमा रहे।
                                    
9👉 दीपावली का त्यौहार में निशीथ व्यापिनी अमावस्या ग्रहण करना चाहिए जो रात्रि के समय हो क्योंकि दीपावली का त्यौहार रात्रि में ही मनाया जाता है प्रदोष काल से रात्रि में अमावस्या रहे।
           
10👉  महाशिवरात्रि का पर्व जिस दिन रात्रि के समय चतुर्दशी तिथि रहे उसी दिन मनाना चाहिए इसमें अर्धरात्रि व्यापिनी चतुर्दशी ग्रहण करना चाहिए महर्षि वेदव्यास जी ने पुराणों में व्रत पर्व एवं उत्सव संबंधी संपूर्ण मार्गदर्शन किया है व्रत पर्व और उत्सव हमारी लौकिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के सशक्त साधन है मेरा अपना यह मानना है कि हर व्रत पर्व उत्सव में उदया तिथि का महत्व नहीं है कुछ त्योहार व्रत उत्सव पर्व उदया तिथि से मनाए जाते हैं कुछ कर्म कॉल विद्वान लोग जब कोई संकल्प करते हैं तो जिसमें सूर्य उदय हुआ है उस तिथि के साथ कर्म कॉल तिथि का भी उच्चारण करते हैं।
〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

Sunday, October 28, 2018

👉अठारह पुराण उनके नाम और उनका संक्षिप्त परिचय।

अठारह पुराण उनके नाम और उनका संक्षिप्त परिचय।
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰
पुराण शब्द का अर्थ है प्राचीन कथा। पुराण विश्व साहित्य के प्रचीनत्म ग्रँथ हैं। उन में लिखित ज्ञान और नैतिकता की बातें आज भी प्रासंगिक, अमूल्य तथा मानव सभ्यता की आधारशिला हैं। वेदों की भाषा तथा शैली कठिन है। पुराण उसी ज्ञान के सहज तथा रोचक संस्करण हैं।

उन में जटिल तथ्यों को कथाओं के माध्यम से समझाया गया है। पुराणों का विषय नैतिकता, विचार, भूगोल, खगोल, राजनीति, संस्कृति, सामाजिक परम्परायें, विज्ञान तथा अन्य विषय हैं।

विशेष तथ्य यह है कि पुराणों में देवा-देवताओं, राजाओ, और ऋषि-मुनियों के साथ साथ जन साधारण की कथायें भी उल्लेख करी गयी हैं जिस से पौराणिक काल के सभी पहलूओं का चित्रण मिलता है।

महृर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया है। ब्रह्मा विष्णु तथा महेश्वर उन पुराणों के मुख्य देव हैं। त्रिमूर्ति के प्रत्येक भगवान स्वरूप को छः पुराण समर्पित किये गये हैं। इन 18 पुराणों के अतिरिक्त 16 उप-पुराण भी हैं किन्तु विषय को सीमित रखने के लिये केवल मुख्य पुराणों का संक्षिप्त परिचय ही दिया गया है। मुख्य पुराणों का वर्णन इस प्रकार हैः-

ब्रह्म पुराण – ब्रह्म पुराण सब से प्राचीन है। इस पुराण में 246 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा की महानता के अतिरिक्त सृष्टि की उत्पत्ति, गंगा आवतरण तथा रामायण और कृष्णावतार की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ से सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर सिन्धु घाटी सभ्यता तक की कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

पद्म पुराण – पद्म पुराण में 55000 श्र्लोक हैं और यह गॅंथ पाँच खण्डों में विभाजित है जिन के नाम सृष्टिखण्ड, स्वर्गखण्ड, उत्तरखण्ड, भूमिखण्ड तथा पातालखण्ड हैं। इस ग्रंथ में पृथ्वी आकाश, तथा नक्षत्रों की उत्पति के बारे में उल्लेख किया गया है। चार प्रकार से जीवों की उत्पत्ति होती है जिन्हें उदिभज, स्वेदज, अणडज तथा जरायुज की श्रेणा में रखा गया है। यह वर्गीकरण पुर्णत्या वैज्ञायानिक है।

भारत के सभी पर्वतों तथा नदियों के बारे में भी विस्तरित वर्णन है। इस पुराण में शकुन्तला दुष्यन्त से ले कर भगवान राम तक के कई पूर्वजों का इतिहास है। शकुन्तला दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम से हमारे देश का नाम जम्बूदीप से भरतखण्ड और पश्चात भारत पडा था।

विष्णु पुराण
〰〰〰〰
विष्णु पुराण में 6 अँश तथा 23000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में भगवान विष्णु, बालक ध्रुव, तथा कृष्णावतार की कथायें संकलित हैं। इस के अतिरिक्त सम्राट पृथु की कथा भी शामिल है जिस के कारण हमारी धरती का नाम पृथ्वी पडा था।

इस पुराण में सू्र्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास है। भारत की राष्ट्रीय पहचान सदियों पुरानी है जिस का प्रमाण विष्णु पुराण के निम्नलिखित शलोक में मिलता हैः
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।

(साधारण शब्दों में इस का अर्थ है कि वह भूगौलिक क्षेत्र जो उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में सागर से घिरा हुआ है भारत देश है तथा उस में निवास करने वाले सभी जन भारत देश की ही संतान हैं।) भारत देश और भारत वासियों की इस से स्पष्ट पहचान और क्या हो सकती है? विष्णु पुराण वास्तव में ऐक ऐतिहासिक ग्रंथ है।

शिव पुराण
〰〰〰〰
शिव पुराण में 24000 श्र्लोक हैं तथा यह सात संहिताओं में विभाजित है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की महानता तथा उन से सम्बन्धित घटनाओं को दर्शाया गया है। इस ग्रंथ को वायु पुराण भी कहते हैं। इस में कैलास पर्वत, शिवलिंग तथा रुद्राक्ष का वर्णन और महत्व, सप्ताह के दिनों के नामों की रचना, प्रजापतियों तथा काम पर विजय पाने के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है। सप्ताह के दिनों के नाम हमारे सौर मण्डल के ग्रहों पर आधारित हैं और आज भी लगभग समस्त विश्व में प्रयोग किये जाते हैं।

भागवत पुराण
〰〰〰〰
भागवत पुराण में 18000 श्र्लोक हैं तथा 12 स्कंध हैं। इस ग्रंथ में अध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप है। भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया गया है। विष्णु और कृष्णावतार की कथाओं के अतिरिक्त महाभारत काल से पूर्व के कई राजाओं, ऋषि मुनियों तथा असुरों की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ में महाभारत युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण का देहत्याग, दूारिका नगरी के जलमग्न होने और यादव वँशियों के नाश तक का विवर्ण भी दिया गया है।

नारद पुराण 
〰〰〰〰
नारद पुराण में 25000 श्र्लोक हैं तथा इस के दो भाग हैं। इस ग्रंथ में सभी 18 पुराणों का सार दिया गया है। प्रथम भाग में मन्त्र तथा मृत्यु पश्चात के क्रम आदि के विधान हैं। गंगा अवतरण की कथा भी विस्तार पूर्वक दी गयी है। दूसरे भाग में संगीत के सातों स्वरों, सप्तक के मन्द्र, मध्य तथा तार स्थानों, मूर्छनाओं, शुद्ध ऐवम कूट तानो और स्वरमण्डल का ज्ञान लिखित है।

संगीत पद्धति का यह ज्ञान आज भी भारतीय संगीत का आधार है। जो पाश्चात्य संगीत की चकाचौंध से चकित हो जाते हैं उन के लिये उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नारद पुराण के कई शताब्दी पश्चात तक भी पाश्चात्य संगीत में केवल पाँच स्वर होते थे तथा संगीत की थि्योरी का विकास शून्य के बराबर था। मूर्छनाओं के आधार पर ही पाश्चात्य संगीत के स्केल बने हैं।

मार्कण्डेय पुराण
〰〰〰〰〰
अन्य पुराणों की अपेक्षा यह छोटा पुराण है। मार्कण्डेय पुराण में 9000 श्र्लोक तथा 137 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में सामाजिक न्याय और योग के विषय में ऋषिमार्कण्डेय तथा ऋषि जैमिनि के मध्य वार्तालाप है। इस के अतिरिक्त भगवती दुर्गा तथा श्रीक़ृष्ण से जुड़ी हुयी कथायें भी संकलित हैं।

अग्नि पुराण
〰〰〰〰
अग्नि पुराण में 383 अध्याय तथा 15000 श्र्लोक हैं। इस पुराण को भारतीय संस्कृति का ज्ञानकोष (इनसाईक्लोपीडिया) कह सकते है। इस ग्रंथ में मत्स्यावतार, रामायण तथा महाभारत की संक्षिप्त कथायें भी संकलित हैं। इस के अतिरिक्त कई विषयों पर वार्तालाप है जिन में धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद मुख्य हैं। धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद को उप-वेद भी कहा जाता है।

भविष्य पुराण
〰〰〰〰
भविष्य पुराण में 129 अध्याय तथा 28000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में सूर्य का महत्व, वर्ष के 12 महीनों का निर्माण, भारत के सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक विधानों आदि कई विषयों पर वार्तालाप है। इस पुराण में साँपों की पहचान, विष तथा विषदंश सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गयी है।

इस पुराण की कई कथायें बाईबल की कथाओं से भी मेल खाती हैं। इस पुराण में पुराने राजवँशों के अतिरिक्त भविष्य में आने वाले नन्द वँश, मौर्य वँशों, मुग़ल वँश, छत्रपति शिवा जी और महारानी विक्टोरिया तक का वृतान्त भी दिया गया है।

ईसा के भारत आगमन तथा मुहम्मद और कुतुबुद्दीन ऐबक का जिक्र भी इस पुराण में दिया गया है। इस के अतिरिक्त विक्रम बेताल तथा बेताल पच्चीसी की कथाओं का विवरण भी है। सत्य नारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गयी है। यह पुराण भी भारतीय इतिहास का महत्वशाली स्त्रोत्र है जिस पर शोध कार्य करना चाहिये।

ब्रह्मवैवर्त पुराण
〰〰〰〰〰
ब्रह्मवैवर्त पुराण में 18000 श्र्लोक तथा 218 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा, गणेश, तुल्सी, सावित्री, लक्ष्मी, सरस्वती तथा क़ृष्ण की महानता को दर्शाया गया है तथा उन से जुड़ी हुयी कथायें संकलित हैं। इस पुराण में आयुर्वेद सम्बन्धी ज्ञान भी संकलित है।

लिंग पुराण
〰〰〰
लिंग पुराण में 11000 श्र्लोक और 163 अध्याय हैं। सृष्टि की उत्पत्ति तथा खगौलिक काल में युग, कल्प आदि की तालिका का वर्णन है। राजा अम्बरीष की कथा भी इसी पुराण में लिखित है। इस ग्रंथ में अघोर मंत्रों तथा अघोर विद्या के सम्बन्ध में भी उल्लेख किया गया है।

वराह पुराण
〰〰〰〰
वराह पुराण में 217 स्कन्ध तथा 10000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में वराह अवतार की कथा के अतिरिक्त भागवत गीता महामात्या का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस पुराण में सृष्टि के विकास, स्वर्ग, पाताल तथा अन्य लोकों का वर्णन भी दिया गया है। श्राद्ध पद्धति, सूर्य के उत्तरायण तथा दक्षिणायन विचरने, अमावस और पूर्णमासी के कारणों का वर्णन है। महत्व की बात यह है कि जो भूगौलिक और खगौलिक तथ्य इस पुराण में संकलित हैं वही तथ्य पाश्चात्य जगत के वैज्ञिानिकों को पंद्रहवी शताब्दी के बाद ही पता चले थे।

सकन्द पुराण
〰〰〰〰
सकन्द पुराण सब से विशाल पुराण है तथा इस पुराण में 81000 श्र्लोक और छः खण्ड हैं। सकन्द पुराण में प्राचीन भारत का भूगौलिक वर्णन है जिस में 27 नक्षत्रों, 18 नदियों, अरुणाचल प्रदेश का सौंदर्य, भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों, तथा गंगा अवतरण के आख्यान शामिल हैं। इसी पुराण में स्याहाद्री पर्वत श्रंखला तथा कन्या कुमारी मन्दिर का उल्लेख भी किया गया है। इसी पुराण में सोमदेव, तारा तथा उन के पुत्र बुद्ध ग्रह की उत्पत्ति की अलंकारमयी कथा भी है।

वामन पुराण
〰〰〰〰
वामन पुराण में 95 अध्याय तथा 10000 श्र्लोक तथा दो खण्ड हैं। इस पुराण का केवल प्रथम खण्ड ही उप्लब्द्ध है। इस पुराण में वामन अवतार की कथा विस्तार से कही गयी हैं जो भरूचकच्छ (गुजरात) में हुआ था। इस के अतिरिक्त इस ग्रंथ में भी सृष्टि, जम्बूदूीप तथा अन्य सात दूीपों की उत्पत्ति, पृथ्वी की भूगौलिक स्थिति, महत्वशाली पर्वतों, नदियों तथा भारत के खण्डों का जिक्र है।

कुर्मा पुराण
〰〰〰〰
कुर्मा पुराण में 18000 श्र्लोक तथा चार खण्ड हैं। इस पुराण में चारों वेदों का सार संक्षिप्त रूप में दिया गया है। कुर्मा पुराण में कुर्मा अवतार से सम्बन्धित सागर मंथन की कथा विस्तार पूर्वक लिखी गयी है। इस में ब्रह्मा, शिव, विष्णु, पृथ्वी, गंगा की उत्पत्ति, चारों युगों, मानव जीवन के चार आश्रम धर्मों, तथा चन्द्रवँशी राजाओं के बारे में भी वर्णन है।

मतस्य पुराण
〰〰〰〰
मतस्य पुराण में 290 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मतस्य अवतार की कथा का विस्तरित उल्लेख किया गया है। सृष्टि की उत्पत्ति हमारे सौर मण्डल के सभी ग्रहों, चारों युगों तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास वर्णित है। कच, देवयानी, शर्मिष्ठा तथा राजा ययाति की रोचक कथा भी इसी पुराण में है

गरुड़ पुराण
〰〰〰〰
गरुड़ पुराण में 279 अध्याय तथा 18000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस पुराण में कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का वर्णन भी है।

साधारण लोग इस ग्रंथ को पढ़ने से हिचकिचाते हैं क्यों कि इस ग्रंथ को किसी सम्वन्धी या परिचित की मृत्यु होने के पश्चात ही पढ़वाया जाता है। वास्तव में इस पुराण में मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म होने पर गर्भ में स्थित भ्रूण की वैज्ञानिक अवस्था सांकेतिक रूप से बखान की गयी है जिसे वैतरणी नदी आदि की संज्ञा दी गयी है।

समस्त योरुप में उस समय तक भ्रूण के विकास के बारे में कोई भी वैज्ञानिक जानकारी नहीं थी। अंग्रेज़ी साहित्य में जान बनियन की कृति दि पिलग्रिम्स प्रौग्रेस कदाचित इस ग्रंथ से परेरित लगती है जिस में एक एवेंजलिस्ट मानव को क्रिस्चियन बनने के लिये प्रोत्साहित करते दिखाया है ताकि वह नरक से बच सके।

ब्रह्माण्ड पुराण
〰〰〰〰
ब्रह्माण्ड पुराण में 12000 श्र्लोक तथा पू्र्व, मध्य और उत्तर तीन भाग हैं। मान्यता है कि अध्यात्म रामायण पहले ब्रह्माण्ड पुराण का ही एक अंश थी जो अभी एक प्रथक ग्रंथ है। इस पुराण में ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रहों के बारे में वर्णन किया गया है। कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास भी संकलित है। सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ले कर अभी तक सात मनोवन्तर (काल) बीत चुके हैं जिन का विस्तरित वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है।

परशुराम की कथा भी इस पुराण में दी गयी है। इस ग्रँथ को विश्व का प्रथम खगोल शास्त्र कह सकते है। भारत के ऋषि इस पुराण के ज्ञान को इण्डोनेशिया भी ले कर गये थे जिस के प्रमाण इण्डोनेशिया की भाषा में मिलते है।

हिन्दू पौराणिक इतिहास की तरह अन्य देशों में भी महामानवों, दैत्यों, देवों, राजाओं तथा साधारण नागरिकों की कथायें प्रचिलित हैं।

कुछ के नाम उच्चारण तथा भाषाओं की विभिन्नता के कारण बिगड़ भी चुके हैं जैसे कि हरिकुल ईश से हरकुलिस, कश्यप सागर से केस्पियन सी, तथा शम्भूसिहं से शिन बू सिन आदि बन गये। तक्षक के नाम से तक्षशिला और तक्षकखण्ड से ताशकन्द बन गये। यह विवरण अवश्य ही किसी ना किसी ऐतिहासिक घटना कई ओर संकेत करते हैं।

प्राचीन काल में इतिहास, आख्यान, संहिता तथा पुराण को ऐक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता था। इतिहास लिखने का कोई रिवाज नहीं था और राजाओ नें कल्पना शक्तियों से भी अपनी वंशावलियों को सूर्य और चन्द्र वंशों से जोडा है। इस कारण पौराणिक कथायें इतिहास, साहित्य तथा दंत कथाओं का मिश्रण हैं।

रामायण, महाभारत तथा पुराण हमारे प्राचीन इतिहास के बहुमूल्य स्त्रोत्र हैं जिन को केवल साहित्य समझ कर अछूता छोड़ दिया गया है। इतिहास की विक्षप्त श्रंखलाओं को पुनः जोड़ने के लिये हमें पुराणों तथा महाकाव्यों पर शोध करना होगा।
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

👉E- Library

https://youtu.be/yQ2bw0sfekQ

*e Library*

यह e Library है, इसमें कई अमूल्य ग्रंथों के PDF हैं, ताकि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों के काम आ सकें, देश धर्म संबंधी अमूल्य पुस्तकें इन लिंक में संग्रहीत हैं, आप विषय देखकर लिंक खोलें तो बहुत सी पुस्तकें मिलेंगी, सभी पुस्तकें आप निशुल्क download कर सकते हैं, इन लिंक्स की किताबें दो साल में अलग अलग स्त्रोतों से इकट्ठी की गईं हैं, अपनी पसंद की किताबें पढ़ें और शेयर करें...

Aadi Shankaracharya -
आद्य शंकराचार्य
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRallkZ0VIWnRPVjA

Sri Aurobindo - श्री अरविंदो
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRSWktaVFPa2tSa2s

Swami Dayananda - स्वामी दयानंद
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRZnUxOEpPSVBHVzQ/edit

Swami Vivekanand -
स्वामी विवेकानन्द
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRMFAtTi1yUFAzdW8

Swami Shivanand - स्वामी शिवानंद
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRYXJDclQwYTBfWFk

Swami Ramteerth - स्वामी रामतीर्थ
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRNGlYZzhqTEQtcU0

Sitaram Goel - सीताराम गोयल
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRT19aT3pnZ0tvODA

Veer Savarkar - वीर सावरकर
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRbE0wQng5YVZmb1E

P.N.Oak - पी.एन. ओक
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRRUVTTHpHVGhMVmM

हिन्दू, राष्ट्र
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRNW1scHdGMHQzZ0U/edit

Basic Hinduism
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRTXdpN29OTUQ0Q3c

Hindutva and India
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRNzh0MXhyRVpiVEE

Islam Postmortem -
इस्लाम की जांच पड़ताल
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRdjB2R1VNTTk2Q3M

Christianity Postmortem -
बाइबिल पर पैनी दृष्टि
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRcHJfRnFkRGFQcFk

Autobiography - आत्मकथाएं
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRbEpPUGcydTZlWDQ

धर्म एवं आध्यात्म
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRRzViUEdGMnI2Smc/edit

यज्ञ - Yajna
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRUThPYWlldEd6NVE/edit

Brahmcharya - ब्रह्मचर्य
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRNzJmbWpSYmg5bjQ

Yog - योग
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRcWZ1NzBoWER2Tkk

Upanishad - उपनिषद
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRNDJiQVFDbVFjbGc/edit

Geeta - श्रीमद्भगवद्गीता
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRWk9KVno2V3NNLXM

Manusmriti - मनुस्मृति
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRTXlYQUJhUXNWM00

Valmeeki and Kamba Ramayan - वाल्मीकि व कम्ब रामायण
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRa18yTE5EM1Z3Zk0

Puran - पुराण
https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRZnB1NnBCblVoUm8

Books on Vedas - वेदों पर किताबें
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRSU9OVzBfbENTcDg/edit

Maharshi Dayananda -
महर्षि दयानंद
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRN2RzYVdFZWI1a0U/edit

*सम्पूर्ण वेद भाष्य*
RigVeda - ऋग्वेद सम्पूर्ण
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfROXl0b3B0RFpkWEE/edit

YajurVeda - यजुर्वेद सम्पूर्ण
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRby02cXFWbnQ2b2M/edit

SamaVeda - सामवेद सम्पूर्ण
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRNnh4ZG5PdUJ2bkU/edit

AtharvaVeda -अथर्ववेद सम्पूर्ण
https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRMFFXcU9waVl4aDQ/edit

*हर हर महादेव...*🚩

🚩 हिन्दू धर्म की महत्वपूर्ण कहानियां एवं अन्य महत्वपूर्ण किताबें ( E-Library )📚

https://drive.google.com/folderview?id=1UITeiH8UbosN_f3errSrOOayaRTu0WlQ

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

@HindutvaBooks
https://t.me/HindutvaBooks

Telegram Channel Subscribe
🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵

http://www.sanskritebooks.org/2013/12/complete-works-of-jibananda-vidyasagara/

Saturday, October 27, 2018

👉जन्म कुंडली के बिना ऐसे जान सकते हैं आपके ग्रहों का हाल

👉जन्म कुंडली के बिना ऐसे जान सकते हैं आपके ग्रहों का हाल
----------------------------------------------------------------------------
यूं तो जन्म कुंडली द्वारा व्यक्ति के जीवन में हर ग्रह के प्रभाव और दुष्प्रभाव के बारे में जाना जा सकता है लेकिन एक अच्छा ज्योतिष केवल व्यक्ति के हाव-भाव, उठने-बैठने, बोलने आदि से ही उसके अच्छे बुरे ग्रहों के बारे में बिना कुंडली के ही सबकुछ बता सकता है। हालांकि इसके लिए लंबे विशलेषण और रिसर्च की भी अावश्यक्ता है लेकिन फिर भी मैं आज आप सबको कुछ ऐसे लक्षण बताने वाला हुं जिसके बाद आप भी सामने वाले को देख कर बता दोगे कि उसका कौनसा ग्रह उसके लिए कैसा फल दे रहा है। ग्रहों की मुख्य तौर पर दो ही स्थितियां होती हैं कारक या मारक, इसे और भी आसान करते हुए यहां मैं आपको ग्रहों के पॉजीटिव होने और पीडित होने के बारे में बताउंगा कि यदि कोई ग्रह कुंडली में पाजीटिव फल देने वाला है तो व्यक्ति में उसके क्या लक्ष्ण दिखेंगे और पीडित हैं तो कैसे पता लगेगा। तो आइए जानते हैं :

👉पॉजीटिव सूर्य:

व्यक्ति के व्यक्तित्व का आकर्षण या ओरा प्रभावशाली होता है, चेहरा उठा हुआ रहता है, प्रसिद्ध होता है, विवादों आदि में सदैव विजयी रहता है, मस्तक चमकदार होता है, व्यक्ति राजा की तरह बैठता है, लीडर की तरह बोलता है, दूसरे उसका सम्मान करते हैं, नजर अच्छी होती है।

👉पीडित सूर्य :

चेहरा निस्तेज रहेगा, जल्दी बिमार हो जाएगा, नजर कमजोर होगी, सम्मान नहीं मिलता, अपनी ताकत का दुरूपयोग करेगा, गलत कार्यों के लिए प्रसिद्ध हो जाएगा।
-----

👉पाजीटिव चंद्र :

व्यक्तित्व सुंदर होगा, शालीनता होगी, भावनात्मक रूप से संपन्न होगा, व्यंजन बनाना व खाना दोनों पसंद होगा, मुस्कान हमेंशा बनी रहेगी, सबको स्नेह देगा, दूसरों की केयर करेगा, आंखे विशेष सुंदर होंगी, लोगों का पसंदीदा होगा।

👉पीडित चंद्र :

असुरक्षा का एहसास, डिप्रैशन, धोखा देना, अच्छा भोजन न खा पाना, जरूरत से ज्यादा चिपकू किस्म का होना, महिलाओं से जुड़ाव नहीं होगा, मानसिक तनाव या बिमारी भी हाे सकती है, कन्फ्यूजन रहेगा, दूसरों पर आरोप लगाता रहेगा, हमेंशा शिकायत करना इनका स्वभाव होता है।
--------

👉पॉजिटिव मंगल :

शारिरीक रूप से हष्ट पुष्ट बनाता है, चुस्ती फूर्ती देता है, रोमांच पसंद होता है, शारीरिक श्रम से जुडे हर कार्य में निपुन्न होता है, टैक्नॉलाजी में निपुन्न होता है, ऐ व्यक्तियों को सुबह जल्दी उठ कर कसरत, योगा आदि करना पसंद होता है, सीना फूला रहता है।

👉पीडित मंगल :

व्यक्ति झगड़ालु होता है, हिंसक हो जाता है, वाहन को तेज गति से चलाएगा, न बर्दाश्त नहीं होती ऐसे लोगों को, चेहरे या शरीर पर चोट के निशान होंगे, दांत खराब होंगे।
------

👉पॉजीटिव बुध :

जिसका बुध उसकी कुँडली में अच्छा होगा वह व्यक्ति बोलते समय हाथों का इस्तेमाल करेगा, दोस्तों का दायरा बड़ा होगा, अच्छा कॉमेडियन होगा, उम्र से छोटा दिखेगा, बचपना चेहरे से झलकेगा, आंकलन करने की क्षमता अच्छी होगी, अच्छा वक्ता होगा, स्मरण शक्ति कमाल की होगी।

👉पीडित बुध :

बोलने में समस्या होगी, बोलते बोलते भूलना-अटकना, त्वचा खराब होना, लाभ-हानि देखकर संबंध बनाएगा, लोगों द्वारा स्वार्थ के लिए यूज हो जाएगा, आचरण कमजोर होगा।
----------

👉पॉजीटिव गुरू :

शरीर की चर्बी समानानुपात में होगी, मोटा भी हुआ तो भी अच्छा लगेगा, समझदारी से निर्णय लेने वाला, सच का साथ देने वाला, धार्मिक होगा, दूसरों को आगे लाने में प्रयास करेगा, नाक सुंदर होगी, आदरणीय रहेगा, अध्यापक जैसा भाव होगा।

👉पीडित गुरू :

नाक का आकार विकृत होगा, स्वार्थी होगा, बेवजह सलाह देगा, वजन बेढबा बढेगा, नकली बाबा-साधुओं, ज्योतिषियों द्वारा ऐसे लोग ठगे जाते हैं, अपना सही ज्ञान नहीं व्यक्त कर पाएगा।
----------

👉पॉजीटिव शुक्र:

ऐसे लोगों के पास कपड़ों का अच्छा खासा संग्रह होता है, हर उम्र में आकर्षक दिखते हैं, स्टाईलिश होते हैं, अपनी लुक्स से एक्सपेरीमेंटस करते रहते हैं, इनके गाल बहुत साफ और सुंदर होते हैं, इत्र आदि का शौंक होता है, विशेष आकर्षण इनके चेहरे और मुस्कान में होता है।

👉पीडित शुक्र:

चेहरा सुंदर नहीं होता, ऐसे लोग चुभने वाली बातें करते हैं, स्त्री पक्ष से विशेष लाभ नहीं मिलता, महिलाओं से बेइज्जती मिलती है, जितना मर्जी सज संवर लें बुरे ही दिखते हैं।
-------

👉पॉजीटिव शनि :

ऐसे लोग गंभीर दिखते हैं, ताेल मोल करके कार्य करते हैं, इमोश्न्स छुपाने में सक्षम होते हैं, खेलों में अच्छे होते हैं और विवाद निपटाने में सक्षम होते हैं, स्पष्ट निश्चय होता है, जिम्मेवार व्यक्ति होते हैं।

👉पीडित शनि :

ऐसे लोगों के कपडे कभी फिट नहीं होते, दाड़ी और बाल बडे और अव्यवस्थित होते हैं, जिम्मेवारी नहीं निभा पाते, कंधे झुके हुए होते हैं, नाकारात्मक सोच होती है, जूते-चप्पल जल्दी टूट जाते हैं।

वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या: दोषारोपण की प्रवृत्ति

प्रणाम मित्रो वर्तमान समय में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली अधिकांश समस्याओं और विकृतियों के लिए स्...