Friday, February 21, 2025
वृत्तियां
Thursday, February 20, 2025
पंचकोशीय शुद्धिकरण
Sunday, February 16, 2025
जीवन रहस्य भाग - ४३ ( नये साधकों के लिए )
Monday, February 10, 2025
extra subject
मेटा फिजिक्स
Sunday, February 9, 2025
जीवन रहस्य
Saturday, February 8, 2025
हलधर भैया
शनि एक सख्त, गंभीर और न्यायिक प्रकृति का प्रतीक है। जबकि, केतु एकान्त और कारावास का प्रतिनिधित्व करता है। कुंडली का पहला या लग्न भाव आपके बाहरी रूप, अहंकार, स्वभाव, आत्मविश्वास और आत्म-अभिव्यक्ति को दर्शाता है। इस भाव में शनि और केतु की युति होने से व्यक्ति वैरागी का व्यक्तित्व धारण करता है।
इस प्रकार, जातक एक गंभीर प्रकृति का व्यक्ति होता है, वह एकांत पसंद करता है, और अपने जीवन में दूसरों को शामिल करना पसंद नहीं करता है।
इस भाव में, शनि-केतु युति व्यक्ति को एक बेहतर सोच प्रदान करता है यथा जातक हर किसी की बेहतरी के लिए सोचता है, और एक आध्यात्मिक जीवन पसंद करता है। ऐसे जातक वे सीमाओं को बनाए रखते हैं और महत्वपूर्ण होने पर ही बातचीत करते हैं।
पहला भाव सहनशक्ति, सम्मान, स्वास्थ्य और प्रसिद्धि का प्रतीक भी है। शनि की ऊर्जा से प्रेरित कड़ी मेहनत के बावजूद, शनि और केतु के संयोजन से जातक प्रसिद्धि प्राप्त नहीं पते हैं। उनके पास मन की शांति नहीं होती है।
पंचम भाव में शुक्र
पांचवें त्रिकोण, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में अपनी ही तुला राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को संतान तथा विद्या के क्षेत्र में शक्ति प्राप्त होते हुए भी कुछ कमी बनी रहती है | ऐसा जातक बुद्धिमान तथा चतुर होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ उठाता है | जातक को बुद्धि द्वारा खूब लाभ होता है, परन्तु शुक्र के व्ययेश होने के कारण आमदनी से खर्च अधिक बना रहता है | ऐसा जातक बहुत बातूनी, चालाक भी होता है | यहां उपस्थित शुक्र जातक के खुशहाली भरे जीवन और संबंधों में बाधा उत्पन्न कर सकता है , इसलिए वे विवाह आदि बातों पर जल्द ध्यान नहीं देते हैं.
सातवें भाव में राहु
सातवें केंद्र, स्त्री तथा व्यवसाय के भवन में अपने शत्रु गुरु की धनु राशि पर स्थित नीच के राहु के प्रभाव से जातक को स्त्री के द्वारा विशेष कष्ट प्राप्त होता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | उसे अपनी ग्रहस्थी का संचालन करने के लिए भी हर समय चिंतित एवं परेशान रहना पड़ता है तथा मूत्रेंद्रिय में भी कोई विकार होता है | ऐसा व्यक्ति स्वयं को परतंत्र तथा परेशान सा भी अनुभव करता रहता है |
पत्नी ऋण : कुंडली में जब सूर्य, चन्द्र या राहु दूसरे अथवा सातवें भाव में हो, तो जातक स्त्री-ऋण से ग्रसित माना जाता है। इसका कारण यह है कि आपके पूर्वजों या बड़े बुजुर्गों ने किसी लालच के कारण किसी गर्भवती महिला को मारा होगा या सताया होगा। इसका संकेत यह है कि घर में आपने ऐसे जानवर पाल रखें होंगे जो समूह नहीं रहते हों।
आठवें भाव में गुरू
आठवें भाव में गुरू के प्रभाव से व्यक्ति को कई तरीकों से आर्थिक लाभ भी होता है. उसे वसीयत और बीमा से धन का लाभ हो सकता है. उसकी आर्थिक स्थिति काफी बेहतर होती है और वह काफी सुखी और संपन्न होता है. व्यक्ति का अपने परिजनों से काफी प्रेम होता है और वह उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है. ऐसा जातक अपनी परंपरा को काफी महत्व देता है. गुरू के प्रभाव से व्यक्ति की अच्छे लोगों के साथ भी संगति हो सकती है.इस भाव में अचानक लाभ और हानि भी देखने को मिलती है. नकारात्मक प्रभाव का असर व्यक्ति की सेहत पर भी देखने को मिल सकता है. पेट और लीवर से जुड़ी समस्या भी हो सकती है. इस भाव में गुरू के प्रभाव से उसमें जिद्दीपन भी देखने को मिल सकता है.इसके साथ ही व्यक्ति वकील, क्लर्क, मनोचिकित्सक, लेखन और प्रशासनिक कार्यों से जुड़ा हो सकता है. व्यक्ति की शोध कार्यों में भी रूचि हो सकती है.
Monday, February 3, 2025
कुंभ
Sunday, February 2, 2025
गण्डमूल दोष
४- गंडमूल दोष का असर
यदि कोई बालक गंडमूल नक्षत्र में पैदा होता है तो उसे तथा उसके परिजनों को कई कष्टों का सामना करना पडता है:-
: जातक को स्वास्थ्य संबंधी कष्टों का सामना करना पड़ता है।
: माता-पिता एवं भाई-बहिनों के जीवन पर बाधाएं आती हैं।
: जातक के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
: जातक को जीवनयापन में संघर्ष करना पड़ता है।
: जातक के परिवार में दरिद्रता आती है।
: दुर्घटना का भय बना रहता है।
: जातक भाग्यहीन हो जाता है।
यदि किसी शिशु का जन्म गंडमूल में हुआ है तो जन्म के 27वें दिन ठीक उसी नक्षत्र के आने पर शांति करनी चाहिए। इसके लिए कई तरह से उपाय किए जा सकते हैं:-
: सर्प को दूध पिलायें।
: नाग देव का पूजन करें।
: पितृों के निमित्त दान करें।
: घर में गंडमूल शांति के लिए यज्ञ करें।
: अमावस्या के दिन ब्राह्मण भोजन कराएं।
: किसी मंदिर में शिवलिंग को स्थापित करें।
: प्रत्येक अमावस्या को गौ, स्वर्ण, अन्न आदि का दान करें।
: माता या पिता 6 माह तक विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।
इन सब उपायों के अलावा गंड मूल में जन्में बच्चे के जन्म के ठीक 27वें दिन गंड मूल शांति पूजा करवाई जानी चाहिए, इसके अलावा ब्राह्मणों को दान, दक्षिणा देने और उन्हें भोजन करवाना चाहिए। यदि किसी कारणवश पूजा ना करवाई जा सके तो महीने के जिस भी दिन चंद्रमा जन्म नक्षत्र में मौजूद हो उसी दिन शांति पूजा करवाई लेनी चाहिए।
यदि गंडमूल शांति के उपाय शिशु के जन्म से ठीक 27वें दिन न हो पाएं अथवा किसी कारण से गंडमूल दोष के बारे में आपको विलम्ब से पता चले तो भी आप इसकी शांति के उपाय कर सकते हैं।
गंडमूल दोष से बचने के कुछ ज्योतिषीय उपाय हैं, जो निम्नलिखित हैं:-
- मंत्र जाप: अगर आपके कुंडली में गंडमूल दोष है तो आप शुभ मंत्रों का जाप कर सकते हैं। शनि मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र और नवग्रह मंत्र आपके लिए उपयोगी हो सकते हैं।
- दान: दान करने से इस दोष का प्रभाव कम हो सकता है। शनि की पूजा करने वालों को अनाज, तिल, फूल, राजमा आदि का दान करना चाहिए।
वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या: दोषारोपण की प्रवृत्ति
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प्रिय आत्मन् कहते हैं कि ज्ञान से सभी समस्याओं का समाधान संभव है किंतु वर्तमान में हमारे पास ज्ञान की कोई कमी नहीं है, वेद, पुराण, उपनिषद, ...
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प्रणाम मित्रों शुद्धिकरण के बारे में हम सभी को एक बात अवश्य ही समझनी चाहिए कि - " जब शरीर में अशुद्धि के कारण कोई रोग होता...
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प्रणाम मित्रों साधना, चाहे वह किसी भी मार्ग—ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग या क्रिया योग—के माध्यम से हो, एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है। इस य...