Saturday, February 8, 2025

हलधर भैया

प्रिय आत्मन्
जीव की यात्रा है आत्म संतुष्टि की है, जो जितने में संतुष्ट हो जाए उसकी यात्रा उतनी ही रहती है । किंतु किसी भी विषय पर निष्पक्ष न्याय के लिए हमें पहले द्वैत से ऊपर उठाना पड़ेगा । केवल पढ़ी पढ़ाई, किसी की सुनी सुनाई या फिर अपने पसंद और ना पसंद को केंद्र में रखकर सही गलत का निर्णय नहीं देना चाहिए । यहां कुछ आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अध्ययन हेतु प्रारंभिक विषय दिए जा रहे हैं , जो एक जिज्ञासु व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं । इसके साथ ही हमें नियम और क्रम एवं इनकी उपयोगिता और व्यर्थता का महत्व समझे बिना में आगे नहीं बढ़ना चाहिए ।
१- अंत ही आरंभ है 
२- ज्ञान भक्ति प्रेम की पूर्णता
३- साधना ( स्वयं की खोज , मूल ज्ञान )
४- गुरु 
५- मार्ग 
६- सत्य ( स्थायित्व की खोज )
७- वैराग्य 
८- इच्छापूर्ति 
९- वृत्तीय और उनके विषय
१०- इंद्रियां और इंद्रियों के विषय
११- स्त्री और पुरुष 
१२- मनुष्य जन्म 
१३- मैं की खोज ( कारण शरीर ) 
१४- साधक के गुण 
१५- महत्वपूर्ण परिभाषाएं 
१६- प्रश्न कैसे करें ( तर्क ज्ञान और प्रमाण )
१७- "भाषा शुद्धि" कितनी अनिवार्य है 
१८- अध्यात्म क्या है ? ( विस्तृत समझ )
१९- मूल्यांकन ( समय चक्र अनुसार )
२०- मूल्यांकन ( बौद्धिक स्तर )
२१- प्रश्न किससे करें 
२२- सबके लिए एक नियम नहीं हैं 
२३- द्वैत क्या है ? द्वैत से कैसे निकले ( विस्तृत समझ )

१- यदि आप जिज्ञासु व्यक्ति के रूप में मुझसे जुड़कर मेरा शोध कार्य जानना चाहते हैं तो उसके लिए मेरे ब्लॉग पर बहुत से लेख उपलब्ध हैं जिनका अध्ययन आप सकते हैं । 

२- यदि आप मित्र या आध्यात्मिक साधक के रूप में मुझसे जुड़ना चाहेंगे तो मैं आपको अपने जीवन से जुड़ी वे सभी घटनाएं अनुभव सहित सुनाऊंगा जिनके कारण आज मैं यहां तक पहुंचा ।

३- यदि आप शिष्य के रूप में मुझसे जुड़ना चाहेंगे तो मैं आपकी कमियों को ठीक करके आपको अपने अनुभव तक पहुंचाऊंगा ।

४- आप मेरी कही हुई बातों का कारण जानना चाहते हैं कि कौन सी बात मैंने क्यों कही है तो आप प्रश्नों को स्पष्ट रूप से मुझे प्रश्न भेज सकते हैं ।

शनि और केतु युति प्रथम भाव में

शनि एक सख्त, गंभीर और न्यायिक प्रकृति का प्रतीक है। जबकि, केतु एकान्त और कारावास का प्रतिनिधित्व करता है। कुंडली का पहला या लग्न भाव आपके बाहरी रूप, अहंकार, स्वभाव, आत्मविश्वास और आत्म-अभिव्यक्ति को दर्शाता है। इस भाव में शनि और केतु की युति होने से व्यक्ति वैरागी का व्यक्तित्व धारण करता है।

इस प्रकार, जातक एक गंभीर प्रकृति का व्यक्ति होता है, वह एकांत पसंद करता है, और अपने जीवन में दूसरों को शामिल करना पसंद नहीं करता है।

इस भाव में, शनि-केतु युति व्यक्ति को एक बेहतर सोच प्रदान करता है यथा जातक हर किसी की बेहतरी के लिए सोचता है, और एक आध्यात्मिक जीवन पसंद करता है। ऐसे जातक वे सीमाओं को बनाए रखते हैं और महत्वपूर्ण होने पर ही बातचीत करते हैं। 

पहला भाव सहनशक्ति, सम्मान, स्वास्थ्य और प्रसिद्धि का प्रतीक भी है। शनि की ऊर्जा से प्रेरित कड़ी मेहनत के बावजूद, शनि और केतु के संयोजन से जातक प्रसिद्धि प्राप्त नहीं पते हैं। उनके पास मन की शांति नहीं होती है। 

पंचम भाव में शुक्र

पांचवें त्रिकोण, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में अपनी ही तुला राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को संतान तथा विद्या के क्षेत्र में शक्ति प्राप्त होते हुए भी कुछ कमी बनी रहती है | ऐसा जातक बुद्धिमान तथा चतुर होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ उठाता है |  जातक को बुद्धि द्वारा खूब लाभ होता है, परन्तु शुक्र के व्ययेश होने के कारण आमदनी से खर्च अधिक बना रहता है | ऐसा जातक बहुत बातूनी, चालाक भी होता है | यहां उपस्थित शुक्र जातक के खुशहाली भरे जीवन और संबंधों में बाधा उत्पन्न कर सकता है , इसलिए वे विवाह आदि बातों पर जल्द ध्यान नहीं देते हैं. 

सातवें भाव में राहु 

सातवें केंद्र, स्त्री तथा व्यवसाय के भवन में अपने शत्रु गुरु की धनु राशि पर स्थित नीच के राहु के प्रभाव से जातक को स्त्री के द्वारा विशेष कष्ट प्राप्त होता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | उसे अपनी ग्रहस्थी का संचालन करने के लिए भी हर समय चिंतित एवं परेशान रहना पड़ता है तथा मूत्रेंद्रिय  में भी कोई विकार होता है | ऐसा व्यक्ति स्वयं को परतंत्र तथा परेशान सा भी अनुभव करता रहता है |

पत्नी ऋण : कुंडली में जब सूर्य, चन्द्र या राहु दूसरे अथवा सातवें भाव में हो, तो जातक स्त्री-ऋण से ग्रसित माना जाता है। इसका कारण यह है कि आपके पूर्वजों या बड़े बुजुर्गों ने किसी लालच के कारण किसी गर्भवती महिला को मारा होगा या सताया होगा। इसका संकेत यह है कि घर में आपने ऐसे जानवर पाल रखें होंगे जो समूह नहीं रहते हों।

आठवें भाव में गुरू 

आठवें भाव में गुरू के प्रभाव से व्यक्ति को कई तरीकों से आर्थिक लाभ भी होता है. उसे वसीयत और बीमा से धन का लाभ हो सकता है. उसकी आर्थिक स्थिति काफी बेहतर होती है और वह काफी सुखी और संपन्न होता है. व्यक्ति का अपने परिजनों से काफी प्रेम होता है और वह उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है. ऐसा जातक अपनी परंपरा को काफी महत्व देता है. गुरू के प्रभाव से व्यक्ति की अच्छे लोगों के साथ भी संगति हो सकती है.इस भाव में अचानक लाभ और हानि भी देखने को मिलती है. नकारात्मक प्रभाव का असर व्यक्ति की सेहत पर भी देखने को मिल सकता है. पेट और लीवर से जुड़ी समस्या भी हो सकती है. इस भाव में गुरू के प्रभाव से उसमें जिद्दीपन भी देखने को मिल सकता है.इसके साथ ही व्यक्ति वकील, क्लर्क, मनोचिकित्सक, लेखन और प्रशासनिक कार्यों से जुड़ा हो सकता है. व्यक्ति की शोध कार्यों में भी रूचि हो सकती है.

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