Sunday, April 28, 2024

मैं और मेरा ज्ञान/मैं और मैं का ज्ञान

मुझे मेरे ज्ञान के कारण हमेशा समाज और समाज के लोगों द्वारा उपेक्षित होना पड़ता है , और सबसे ज्यादा तो अपने परिवार के सदस्यों से ही उपेक्षा का सामना करना पड़ता है । जब भी मुझे अपने विषय पर बोलने का मौका मिलता तब अक्षर लोगों का यह प्रश्न राहत कि- हम तो घर गृहस्ती वाले हैं , आप जैसे साधु सन्यासी तो है नहीं । क्या आपका ज्ञान किसी भूखे का पेट भर सकता है ? तब तो आपके ज्ञान की सार्थकता है , वर्ना हम ऐसे ज्ञान का क्या करेंगे ? इसी के साथ और भी एसे ही ना जाने कितने प्रश्नों की बौछार हम पर एक साथ प्रारंभ हो जाती है, ऐसी स्थिति में किसी के प्रश्नों का उत्तर दे पाना वर्तमान समय में संभव नहीं रहता । जिस बात को समझने में मुझे 20 साल लगे उसे मैं घंटे भर में कैसे समझ सकता हूं । 
                                                                  अज्ञेय 🌷

सोचने वाली बात यह है कि भूखे व्यक्ति के पास यह विकल्प नहीं रहता कि वह क्या खाएं क्या ना खाएं , वह तो सबसे पहले जो मिल जाए उससे अपना पेट भरने की सोचता है । और यदि वह मनपसंद भोजन के बारे में सोच रहा है तो फिर वह व्यक्ति भूखा नहीं होगा । 

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए एक मूल्यांकन की श्रेणी बनाई गई है जिसके द्वारा हमें यह ज्ञात होता है कि हम भौतिकवादी हैं, अध्यात्मवादी हैं , या फिर धार्मिक है ।
यह तीनों श्रेणियां अलग-अलग हैं और तीनों श्रेणियां के लोगों 
गुण और दोष भी पाए जाते हैं । 

समाज में सबके आत्म कल्याण के लिए बहुत से मार्ग हैं जिनमें गृहस्थ ,ज्ञान योग , कर्म योग , भक्ति योग ,क्रिया योग ,राजयोग सहज राजयोग , शामिल हैं। जिनमें से हमें अपनी सुविधा रुचि और क्षमता अनुसार कोई एक मार्ग अवश्य चुनना चाहिए । यदि हमें अपने गुरु और परंपरा के बारे में ज्ञान नहीं है तो हम अभी मूर्छा में जी रहे हैं ।

👉 ध्यान दें की लक्ष्मी और शक्ति अंधी होती हैं , वे किसी के पास भी जा सकती हैं ! किंतु सरस्वती हमेशा श्रेष्ठ पुरुषों का वर्णन करती है ।          

हम सबको इन प्रश्नों के उत्तर अवश्य खोजने चाहिए क्योंकि जब तक लोगों को फल ज्ञात नहीं होंगे वह आगे नहीं बढ़ते.....
१- ज्ञान का फल क्या है ?
२- कर्म का फल क्या है ?
३- भक्ति का फल क्या है ?

१- एक भौतिकवादी व्यक्ति के जीवन का क्या उद्देश्य है ?
२- एक धार्मिक व्यक्ति के जीवन का क्या उद्देश्य है ? 
३- एक आध्यात्मिक व्यक्ति के जीवन का क्या उद्देश्य है ? 

१- एक सात्विक व्यक्ति के जीवन का क्या उद्देश्य है ?
२- एक राजसिक व्यक्ति के जीवन का क्या उद्देश्य है ?
३- एक तांत्रिक व्यक्ति के जीवन का क्या उद्देश्य है ?

१- एक मूर्छा में जी रहे व्यक्ति के जीवन का क्या उद्देश्य है ?
२- एक कल्पना में जी रहे व्यक्ति के जीवन का क्या उद्देश्य है ?
३- एक चैतन्य व्यक्ति के जीवन का क्या उद्देश्य है ?

Saturday, April 27, 2024

👉आध्यात्मिक ज्ञान

ज्ञान ग्रहण करने का क्रम - 
१- आध्यात्मिक ज्ञान 
२- धार्मिक ज्ञान 
३- भौतिक विज्ञान

१- आध्यात्मिक ज्ञान क्या है ?
आध्यात्मिक ज्ञान वह ज्ञान है जिसके द्वारा हम जीवन रहस्य को सुलझाते हैं ।

२- आध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता क्यों है ?
यदि हम साधारण रूप में समझे तो जो व्यक्ति जहां है उसका जीवन सुख पूर्वक या दुःखी होकर चलता रहता है, किंतु जब बात वहां से निकलने की आती है तब आध्यात्मिक ज्ञान ही हमारा सहारा बनता है । अतः साधारण भाषा में हम समझ सकते हैं कि कहीं से भी निकलने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान बहुत आवश्यक है ।

३- जिन्हें आध्यात्मिक ज्ञान है उन्हें क्या लाभ है ? 
लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान होने से संसार की नश्वरता का ज्ञान हो जाता है , और वह कभी किसी के प्रति आसक्त नहीं रहते । और अपने कर्तव्य निभाते हुए आनंदपूर्वक अपना जीवन जीते हैं ।

४- जिन्हें आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है उन्हें क्या हानि है ?
वर्तमान समय में प्रत्येक परिवार में हम कलह क्लेश का वातावरण स्पष्ट रूप से देख सकते हैं । जो की आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव के कारण है । आध्यात्मिक ज्ञान की अभाव में व्यक्ति का जीवन उलझकर रह जाता है । वह नहीं समझ पाता कि क्या करें क्या ना करें । ना तो उसे अपने कर्तव्यों का ज्ञान रहता है ! और ना ही अधिकारों का । इच्छाएं भी अनियंत्रित रहती हैं और ऐसी हालत में कई लोग डिप्रेशन का शिकार होते हैं और कई लोग तो आत्महत्या भी कर लेते हैं ।

४- आध्यात्मिक होना क्यों आवश्यक है ?
आध्यत्मिक होना वैसे ही आवश्यक है जैसे किसी छोटे से बीज को जल और खाद की । आध्यत्मिक का अर्थ ही होता है कि अपने को अपनी आत्मा की ओर अग्रसर करना। संसार में रहकर भी हम अपने को इस प्रकार बना ले कि हमारे कर्म निः स्वार्थ होकर मानव कल्याण मे लग जाए, जिससे हम उस परम दिव्य शक्ति के निकटता को प्राप्त कर ले । जब हम किसी के दुःख से दुखी और सुख से प्रसन्न होते हैं, तथा दुसरो पर चाहे वो मानव हो या कोई भी जीव हो उस पर दया, प्रेम और परोपकार की भावना ही हमारी आत्मा को उन्नति की ओर ले जाती हैं। यही से हम वास्तव में एक इंसान, एक सर्व श्रेष्ठ मानव बनते हैं। यह केवल अध्यात्म से ही संभव है, जो हमे ईश्वर के समीप और समीप करता है।हमारे संस्कार, गुण तथा हमारे कर्म अध्यात्म से ही निखरते है।

५- क्या आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है ?
अध्यात्मिक ज्ञान कहीं से प्राप्त नहीं किया जा सकता I दूसरों का ज्ञान आपके लिए उधार का ज्ञान ही साबित होगा l आध्यात्मिकता का अर्थ ही होता है आत्मा का अध्ययन l इस सृष्टि में कितनी आत्माएं विद्यमान है आप उसका अंदाज तक नहीं कर सकते l सभी आत्माओं के सफर का रास्ता तय करने वाला परम परमेश्वर है, जिसकी अपनी सत्ता है और उसकी सत्ता उसके निर्धारित नियमों के अनुसार ही चलती है l आप ज्यादा से ज्यादा सिर्फ अपनी आत्मा के संभाव को जानने का प्रयत्न कर सकते हैं, इस सृष्टि में विद्यमान आत्माओं के सफर का नहीं l अपनी आत्मा के संभाग को जानने के लिए भी आपको नितांत अकेला होना पड़ेगा l उसके बाद ज्ञान प्राप्ति के लिए योग ही आपका सहायक बनेगा ।

६- आध्यात्मिक ज्ञान कैसे प्राप्त करें ?
ज्ञान शास्त्रों में छुपा है। उन शास्त्रों को पढ़ने से, मनन करने से, चिंतन करने से, वह ज्ञान आपको मिलता है। यह प्रक्रिया स्वाध्याय से भी हो सकती है, और गुरु शिष्य परंपरा द्वारा भी। तब आप ज्ञानी पुरुष बन जाते है। लेकिन केवल शास्त्री कहलायेंगे लेकिन आध्यात्मिक नहीं। आध्यात्म इस ज्ञान से बढ़कर कुछ है। यह ज्ञान के बिना भी एक अस्तित्व रखता है। आध्यात्म है यह सोचना की आपकी सत्ता क्या है, और आपसे ऊपर किसकी सत्ता है। यह चिंतन है आपके होने का, और आपके न होंने के बाद क्या होता है उसका। यह भी सत्य है कि आपसे पहले भी सृष्टि थी और आपके बाद भी सृष्टि रहेगी। तो इस बीच आप अस्तित्व में कैसे आये, और फिर कहाँ चले गए। आपके इस अस्तित्व सीमा में आपने क्या किया और क्या करना चाहिए था। यह सब जब इंसान सोचने लगे, और अपने अस्तित्व और उसके कर्तव्यों का सोचने लगे, वही इंसान आध्यात्मिक है। आध्यात्म का एक अर्थ है अद्य + आत्मा अर्थात आज इस आत्मा का विचार, दूसरा अर्थ है आदि + आत्मा अर्थात उस आदि यानी सर्वप्रथम आत्मा का विचार करना जो हम सभी में विद्यमान है। यह ज्ञान से बढ़कर एक चिंतन है। तो आप चुने की ज्ञान मार्ग से अध्यात्म करना है या भक्ति वैराग्य मार्ग से। जो रास्ता ठीक लगे वैसा चुने। कुछ पुस्तके पढ़े, उनका मनन करे। कुछ प्रवचन सुने उनका मनन करे। कुछ स्वाध्याय करे, कुछ स्वयं से बात करे।

Friday, April 26, 2024

सुखी जीवन संबंधी सूत्र

लाल किताब में धर्माचरण और सदाचरण के बल पर ग्रह दोष निवारण के लिए सैकड़ों टोटके बताए गए हैं. लाल किताब के मुताबिक, अगर आप जीवन में खुशहाली पाना चाहते हैं और बुरे दिनों को अपने नज़दीक नहीं आने देना चाहते, तो लाल किताब के कुछ उपाय ज़रूर अपनाएं. लाल किताब के उपायों को श्रद्धापूर्वक कम से कम 60 दिन तक करने से आश्चर्यजनक रूप से चमत्कारी और लाभकारी परिणाम मिलते हैं. 

चिड़चिड़ापन से परेशान होने पर सरसों और लाल मिर्च को लेकर अपने चारों ओर सात बार घुमाएं और फिर इसे घर से दूर जाकर जला दें.
सुबह उठकर स्नान करें और पूजा करें. आरती करते समय दीपक में दो लौंग डालें और फिर इसे पूरे घर में दिखाएं.
घर के बड़े-बुज़ुर्गों की सेवा करें.
गाय की सेवा करें.
सोमवार के दिन शिव मंदिर जाएं और शिवलिंग पर दूध और पानी का मिश्रण चढ़ाएं.
43 दिनों तक गुड़ और गेहूं का दान दें और फिर अगले तीन सालों तक रविवार को मंदिर में दान देते रहें.
शुक्रवार के दिन घर और खुद को साफ़-सुथरा रखें, उपवास करें, घर में खुशबू के लिए इत्र या सेंट का इस्तेमाल करें, महालक्ष्मी की पूजा करें, खटाई का सेवन न करें, लक्ष्मी मंदिर जाकर 11 कमल के फूल अर्पित करें, नौ बत्तियों वाला घी का दीपक जलाएं, सफ़ेद वस्त्र का दान करें, और दो मोती बहते पानी में प्रवाहित करें.


नोट करें 50 उपाय

1- किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को शुरू करने अथवा यात्रा पर निकलने से पूर्व थोड़ा गुड़ खाकर पानी पीयें।

2- घर में बड़ी बुजुर्ग महिलाओं (दादी मां , चाची , बुआ आदि ) को समुचित सम्मान-सेवा द्वारा प्रसन्न रखें।

3- घर में गाय पालें और उसकी यथासंभव सेवा सुश्रुषा करें परन्तु वह गाय काले रंग की होनी चाहिए, सफ़ेद नहीं।

4- रात क सोते समय 5 कागजी बादाम को सिरहाने रखें और दूसरे दिन उन्हें ले जाकर देवमन्दिर में दान कर देवें।

5- घर में अगर गाय भैंस हो तो उसके दूध का उपयोग स्वयं करें या परिवार वाले करें। इस दूध का विक्रय किसी भी हालत में न करें।

6- गर्मी के दिनों में रास्ते पर पथिकों के लिए ठंडा जल पिने की व्यवस्था करें।

7- चांदी की दो ठोस गोलियों को अपने पास सदैव रखें।

8- तंदूर में सिकी रोटी में गुड मिलाकर पालतू कुत्तो को खिलाएं।

9- त्रिधातु (सोना+ चांदी+तांबा) से विधिपूर्वक निर्मित अभिमंत्रित पवित्री (दरिद्रता नाशक मुद्रिका )अपने दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में गुरुवार को धारण करें। यह मुद्रिका अदभुत चमत्कारी होती है।

10- चांदी की बिना जोड़ वाली अंगूठी तर्जनी उंगली में पहने रखें।

11- घर में तोता, मैना आदि को पालें या बाहर के पक्षियों को भी बुलाकर उन्हें खिलाएं पिलायें।

12- पन्ना या हीरा में से कोई एक रत्न अंगूठी में जड़वा कर धारण करें।

13- घर के किसी कोने में चांदी का एक चौकोर टुकड़ा गाड़ देवें।

14- अपने वेतन का एक निश्चित अंश पहले निकालकर तिजोरी, लॉकर या पर्स में रखें और उसे खर्च न करें।

15- प्रतिदिन स्नानादि से निवृत होकर नाभि में केसर का तिलक लगावें।

16- मंदिर में जाकर प्रतिदिन गर्भगृह या उसके परिसर में पोंछा लगाएं।

17- लाल रंग की 43 गुंजाओ को सोने के एक टुकड़े या किसी आभूषण के साथ पीले कपडे में बांधकर अपने घर में किसी पवित्र स्थान में रखें।

18- सांप को कभी ना मारे, बल्कि उसके बिल के पास जाकर, चांदी के कटोरे में दूध रखकर आवें।

19- सरसों का दीपक देवमन्दिर में जलाएं या उसकी व्यवस्था करें।

20- भोजन के पूर्व गौ ग्रास निकाल कर गाय , कौआ अथवा कुत्ते को खिलाएं।

21- गौशाला में जाकर गाय के गले में पीतल की घंटियां बांधे।

22- पत्नी के मस्तक पर स्वर्णाभूषण करवाएं।

23- प्रतिदिन घर के बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद ग्रहण करें।

24- रसोईघर के लिए उपयोगी लोहे की वस्तुओं (जैसे तवा , कढ़ाही , करछुल , छलनी आदि ) का अभावग्रस्त लोगों में दान करें।

25- कौओं और काले कुटटन को मीठी रोटी खिलाएं।

26- किसी भी पशु- पक्षी का शिकार न करें।

27- स्नान करते समय थोड़ा दूध पहले मस्तक पर रखें।

28- आप स्वयं भी कोई न कोई स्वर्णा भूषण शरीर पर अवश्य धारण करें।

29- चार सौ ग्राम धनिया बहती नदी के जल में प्रवाहित करें।

30- घर-आंगन में हरे पौधों के गमले तथा तुलसी का पौधा अवश्य रखें।

31- भोजन बन जाने के बाद चूल्हे की आग को बाहर निकालकर पानी के बजाय दूध से बुझावें।

32- एक लोटा गंगाजल से भरकर तथा उसके अंदर चांदी के दो सिक्के डाल कर बंद कर घर में रखें। (ढक्कन लगाकर)

33- रात को सोते समय सिरहाने एक गिलास में पानी भरकर रखें और सुबह उठकर बिना मुहं धोये उसे पी ले।

34- असली मूंगा रतन का एक टुकड़ा हमेशा ही सिरहाने तकिया के नीचे रखकर रात में सोये।

35- पैरों के दोनों अंगूठों में चांदी का छल्ला पहनकर रहें।

36- दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली में सोने की अंगूठी धारण करें।

37- कान छिदवाकर उसमें सोने के कुण्डल धारण करें।

38- घर में कुत्ता पाले और उसकी सुख- सुविधाओं का ध्यान रखें।

39- काली चीटियों को चीनी मिश्रित आटा खिलाएं।

40- कभी किसी को धोखा देने की नीयत न रखें।

41- एक सुखा नारियल शनिवार को बहती नदी के जल में प्रवाहित करें।

42- कुंवारी कन्याओं की समय –समय पर पूजा किया करें और उन्हें दूध चावल, चांदी का दान देकर उनका आशीर्वाद लें।

43- हनुमान चालीसा या सुन्दरकाण्ड, रामायण का प्रतिदिन पाठ करें।

44- काला सुरमा खुली शीशी में रखकर किसी एकांत स्थान में जाकर जमीन में गाड़ दें।

45- प्रत्येक शनिवार को हनुमान जी के मंदिर जाकर हनुमान जी की प्रतिमा को सिन्दूर का लेप लगाएं।

46- एक पैग शराब भैरों या काल भैरव के मंदिर में जाकर उन्हें अर्पित करें।

47- किसी कूप या तालाब में प्रति शनिवार को लगातार तांबे का एक सिक्का गिराएं। ध्यान रखें आपको कोई देखने न पाएं।

48- तीन अंधे व्यक्तियों को घर पर बुलाकर हर शनिवार को भरपेट खिचड़ी खिलाएं।

49- नारियल के ऊपर एक छेड़ बनाकर उसे तिल और चीनी से भर दें और एकांत स्थान पर जमीन के अंदर इस ढंग से गाड़ देवें की उसका ऊपर वाला छेड़ जमीन से कुछ ऊपर रहे वह ढकने न पावे।

50- प्रतिदिन काले कौओं क अपने भोजन में से ग्रास निकाल कर खाने को देवें।



सावधानियां :- 
1.किसी भी प्रकार का व्यसन और नशा न करें। करते हों तो त्याग दें।
2.ब्याज का कार्य करते हो तो त्याग दें।
3.तेरस, चौदस, अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन पवित्र बने रहें।

4.दादी, सास, मां, बहन, बेटी, पत्नी, मौसी, साली और बुआ से संबंध अच्‍छे रखें।
5.दादा, पिता, ससुर, भाई, काका, मामा, भांजे, साले, बहनोई, भतीजे और भाई से संबंध अच्‍छे रखें।
6.मांस और तामसिक भोजन को त्याग दें और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।

गाय, कुत्ते, चींटी और पक्षियों को भोजन खिलाएं : वृक्ष, चींटी, पक्षी, गाय, कुत्ता, कौवा, आदि प्राणियों के अन्न-जल की व्यवस्था करने से इनकी हर तरह से दुआ मिलती है। इसे वेदों के पंचयज्ञ में से एक 'वैश्वदेव यज्ञ कर्म' कहा गया है। यह सबसे बड़ा पुण्य माना गया है। कछुओं और मछलियों को नित्य आटे की गोलियां खिलाएं और चीटियों को भुने हुए आटे में बूरा मिलाकर बनाई पंजीरी खिलाएं।

* प्रतिदिन कौवे या पक्षियों को दाना डालने से पितृ तृप्त होते हैं। 
* प्रतिदिन चींटियों को दाना डालने से कर्ज और संकट से मुक्ति मिलती है।
* प्रतिदिन कुत्ते को रोटी खिलाने से आकस्मिक संकट दूर रहते हैं।
* प्रतिदिन गाय को रोटी खिलाने से आर्थिक संकट दूर होता है।
 

नारियल का उतारा : शारीरिक कष्ट आने पर पानीदार एक नारियल लें और उसे जिस सदस्य पर संकट हो उसके ऊपर से  21 बार वारें । वारने के बाद उसे किसी देवस्थान पर जाकर अग्नि में जला दें । 5 शनिवार ऐसा करने से जीवन में अचानक आए कष्ट से छुटकारा मिलेगा । 
 

कंबल दान करें : प्रत्येक मकर संक्रांति को काला और सफेद अर्थात एक ही कंबल में यह दोनों रंग होना चाहिए। कोई तीसरा रंग नहीं होना चाहिए अर्थात दोरंगी कंबल को 21 बार खुद पर से वारकर उसे किसी मंदिर में या जरूरतमंद को दान कर दें। इससे कई तरह के फायदे होते हैं।
 

कर्पूर जलाना : प्रतिदिन सुबह और शाम घर में संध्या वंदन के समय कर्पूर जरूर जलाएं। आरती या प्रार्थना के बाद कर्पूर जलाकर उसकी आरती लेने की परंपरा है।

👉मेरे अनुभव

"ज्ञान साधना और मेरे अनुभव"
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सभी साधकों को मेरा प्रणाम🙏

मुझे ना तो शब्दों की माया का ज्ञान है और ना ही अभी इतनी समझ विकसित हुई है कि मैं अध्यात्म के किसी विषय पर व्याख्या कर सकूं । गुरु जी की असीम कृपा और अपनी तुच्छ बुद्धि से जो भी कुछ जानकर अनुभव कर पाया , वह अनुभव आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूं  ।



👉 ज्ञान मार्ग ही पहले क्यों जबकि समाज में अन्य कई मार्ग है जो ईश्वर अनुभूति एवं ईश्वर के दर्शन कराने के दावे करते हैं ।
- इस विषय पर मैं केवल एक ही बात कह सकता हूं कि - 'सही परिभाषा सही ज्ञान' जिसका प्रभाव जीवन में सुख और निश्चिंत्यता के रूप में दिखाई देता है , जबकि इसके विपरीत गलत परिभाषाओं से जो ज्ञान प्राप्त होता है उनका परिणाम दुःखी क्लेशपूर्ण कलह युक्त अतृप्त जीवन के रूप में देखने को मिलता है ।
बाकी मार्गों का तो मैं कुछ नहीं कह सकता किंतु ज्ञान मार्ग ही एक ऐसा आध्यात्मिक मार्ग है ! यदि यहां साधक के पास विश्लेषण की बुद्धि है तो वह आसानी से अपनी सभी शंकाओं का समाधान प्राप्त कर सकता है ।
यहां सिर्फ रसगुल्ले के मीठे होने की जानकारी नहीं दी जाती बल्कि जब तक आप मीठे रसगुल्ले के स्वाद का अनुभव नहीं ले लेते तब तक आपको नहीं छोड़ा जाता । और यह सब गुरु सानिध्य में गुरु कृपा द्वारा ही संभव हो सकता है ।

👉 स्वयं में शिष्य के गुणों का ना होना ।
- मैंने अपनी बुद्धि से अभी तक जो विश्लेषण कर पाया कि -  ना तो कोई ऐसा समय था जब गुरु नहीं थे , और ना ही ऐसा कोई समय था जब मैं नहीं था और ना ही ऐसा कोई समय था जब ज्ञान नहीं था । आज जब गुरु कृपा हुई तो स्वयं की कमी पता चली कि मुझ में ही शिष्य के गुण नहीं थे । शिष्य के गुण अर्थात मुमुक्षुत्व, वैराग्य, जिज्ञासा समर्पण यदि । यदि इतने ही गुण शिष्य में हो तो भी ज्ञान साधना प्रारंभ की जा सकती है । अर्थात गुरु उसे स्वीकार कर लेंगे ।

👉 गुरुक्षेत्र से निकटता ।
- मैंने वीडियो के माध्यम से गुरु जी से  सुना है कि - साधक का जैसे-जैसे अज्ञान मिटता जाता है वैसे-वैसे अपने पराए का भेद भी मिटता जाता है ! इस स्थिति पर में पहुंचने पर साधकों को बहुत से सूक्ष्म अनुभव भी होने लगते हैं ।  शायद मेरे यह अनुभव भी उन्हीं में से एक हो ! कि जब भी कोई प्रश्न या जिज्ञासा अपने मन में लेकर सोता तो कुछ दिनों में गुरुजी इस विषय पर वीडियो डाल देते जो की ज्ञान रत्न की श्रृंखला में  मैं सुनता ।

👉 पूर्व निर्धारण - पूर्व निर्धारण की पुष्टि के लिए मैं अपने जीवन की एक घटना के बारे में चर्चा करना चाहूंगा जो मेरे ज्योतिष के गुरु जी ने मुझसे बताई थी कि-  जब तुम 40+  के हो जाओगे तब तुम एक ऐसे गुरु की शरण में जाओगे जहां तुम्हारे सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे ! और यह घटना मेरे साथ 3 जनवरी 2023 को घटी ! यहां गुरु जी की शरण में मुझे वह पहला और अंतिम ज्ञान मिला जिसके बाद और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता ।

👉 पूर्वाभास होना ।
अपने जीवन में यदि पूर्वाभास की घटनाओं की चर्चा करूं तो ऐसी घटनाएं मेरे जीवन में कई बार घट चुकी है । जिनमें से अभी हाल की ही एक घटना है ! जिस दिन मेरी बोधि वार्ता ग्रुप में परीक्षा होनी थी । तब मुझे  पूर्वाभास हो गया था कि मुझे परीक्षा में कितने नंबर आने वाले हैं ।

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शेष सभी के लिए यही संदेश है कि जो भी अध्यात्म में किसी भी मार्ग के साधक हैं ! यदि आपको वहां संतुष्टि नहीं मिल रही तो एक बार ज्ञान मार्ग का व्यवस्थित कार्यक्रम अवश्य करिए ।
धन्यवाद🙏

Thursday, April 25, 2024

👉 ज्ञान

प्रिय आत्मन् 
मानव जीवन कल्याण के लिए हमारे पास ज्ञान के उपलब्ध श्रोत - चार वेद, 18 पुराण, षट् दर्शन, ज्योतिष, वास्तु एवं अनेक गुप्त विद्याएं और वर्तमान में विज्ञान है ।

उपलब्ध ज्ञान को हमने साधारण भाषा में समझने के लिए कुछ भागों में विभाजित किया है ।

- आध्यात्मिक ज्ञान :- जो हमें ईश्वर से जोड़ता है ।

धार्मिक ज्ञान :- संसार और आध्यात्मिक में संतुलन बनाकर जीवन यापन कैसे करें ।

३- भौतिक ज्ञान :- संसार की विषय वस्तु से संबंधित ज्ञान ।

४- सामाजिक ज्ञान :- जिसे लोगों ने बिना किसी व्यवस्थित पद्धति से अलग-अलग गुरुओं सुनकर रटा-रटाया ज्ञान ग्रहण किया है ! जिसे हम अपनी लोकल भाषा में डुकरिया पुराण कहते हैं ।

ज्ञान का महत्व -
अनुभवों का व्यस्थिकरण ही ज्ञान है I जब तक अनुभव व्यस्थित होकर चित्त में संग्रहित नहीं होते तब तक ज्ञान होना सम्भव नहीं है l  हमारे चित्त में संग्रहित ज्ञान की वज़ह से ही हम अपने जीवन के सभी कार्य बडी सहजता से कर पाते हैं l बिना हमारा अस्तित्व सम्भव नहीं हैं  l आईये जाने - 

१- ज्ञान क्या है ?
स्मृति में अनुभवों के संयोजन से एक संरचना बन जाती है,इस प्रक्रिया को ज्ञान वृत्ति तथा संरचना को ज्ञान कहते हैं। या इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं व्यवस्थित अनुभवों का संयोजन ज्ञान है ।

२- ज्ञान क्यों आवश्यक है ?
ज्ञान अज्ञान को दूर करने और साधक को मूल ज्ञान की अद्वैत अवस्था में स्थित करने के लिए आवश्यक है।

३- ज्ञान कैसे प्राप्त करें ?
गुरु सानिध्य में अपने अपरोक्ष अनुभव और तर्क के आधार पर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं ।

४ - ज्ञान ग्रहण करने का सही क्रम कैसा होना चाहिए ?

१- आध्यात्मिक ज्ञान 
२- धार्मिक ज्ञान 
३- भौतिक ज्ञान 

५- ज्ञान ग्रहण करने की क्या योग्यता है ?
जिज्ञासा, स्थिर बुद्धि , समर्पण, अनुशासन में रहना, गुरु आज्ञा का पालन करना आदि गुणों का होना आवश्यक है।

६- जानकारी और ज्ञान में क्या अंतर है ?
जानकारी - हमें दिन भर में जो भी सूचनाओं प्राप्त होती है वह सब जानकारी है । 
ज्ञान - व्यवस्थित अनुभवों का संयोजन ज्ञान है । अर्थात स्मृति में अनुभवों के संयोजन से एक संरचना बन जाती है,इस प्रक्रिया को ज्ञान वृत्ति तथा संरचना को ज्ञान कहते हैं। 

७- याद रखना - यह एक सरल प्रक्रिया है जिसमे किसी कला विषय या वस्तु की जानकारी को अपनी स्मृति में संचित कर लेना ।

८- सीखना - एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे मनुष्य किसी कला, विषय या वस्तु की जानकारी को प्रायोगिक रूप में अपना कर उससे प्राप्त अनुभव को स्वयं में आत्मसात कर लेता है ।

९- सीखना क्यों आवश्यक है ?
सीखने की यह प्रक्रिया जन्म से मृत्यु पर्यन्त अनवरत रूप से चलती रहती है. सीखने का गुण हमें अन्य जीव जंतु से अलग बनाता है ! सीखने के फलस्वरूप ही व्यक्ति अपने व्यवहार का परिष्कार करता है । जैसे भोजन हमारे शरीर का पोषण करता है, वैसे ही सूचना और निरंतर सीखने से हमारे दिमाग का पोषण होता है। सीखना हमारे लिए बहुत अनिवार्य है, वर्ना पड़े पड़े तो पशु भी समय पूरा करते हैं । सीखने से खुद का आत्मविश्वास बढ़ता है, हम जिम्मेदार बनते हैं ! और यह हमारे उत्तरजीविता के काम आता है ।


नोट-  दिए गए लेख को अच्छी तरह पढ़े ! अपनी जिज्ञासा शंकाओं के समाधान के लिए चर्चाओं में शामिल हों । इसके बाद प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें । इसके लिए आपको 2 दिन का समय मिलेगा ।


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https://surveyheart.com/form/66234a76b3c66c20860bc7f6

                                    ऋषि Agyey ~ 🧘
                      "Spritual mentor and Motivator

जीवन रहस्य भाग - ५१ ( उपासना क्रम )

प्रिय आत्मन् 
हमारे जीवन में यदि किसी भी चीज का क्रम ठीक प्रकार से हो , तो हमें सफलता बहुत ही आसानी से मिल जाती है । अन्यथा जीवन भ भटकने के सिवा हमारे हाथ कुछ नहीं लगता । अतः साधना इसी क्रम में अनिवार्य है ।


१- गुरु भक्ति - सबसे पहले गुरु मंत्र का अनुष्ठान अवश्य करें 

२- कुंडली शोधन - सवा करोड़ गुरु मंत्र के जप से कुंडली का एक भाव शोधित होता है इस प्रकार 150 करोड़ मंत्र जप से कुंडली के 12 भाव शोधित होंगे । इसके लिए गुरु मंत्र का 150 करोड़ विधि वत
जप होना चाहिए ।

३- विष्णु उपासना - मुक्ति के लिए विष्णु उपासना अनिवार्य है ! अतः उनकी भक्ति करते हुए गुरु निर्देश के अनुसार विष्णु उपासना करनी चाहिए ।

४- शिव उपासना-  मुक्ति के ज्ञान के लिए शिव उपासना अनिवार्य है अतः गुरु निर्देशानुसार शिव की भक्ति करते हुए उनकी उपासना करनी चाहिए ।

५- द्वैत का ज्ञान - आगे की यात्रा के लिए शिव और शक्ति दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है , तभी हम आगे की यात्रा करने में सक्षम हो पाएंगे ।

 ६- शक्ति उपासना - माया को विस्तार से जानने समझने के लिए शक्ति उपासना अनिवार्य है अतः गुरु निर्देशानुसार शक्ति की भक्ति करते हुए उनकी उपासना करनी चाहिए ।

जीवन रहस्य भाग - ४१ ( संतुलित दिनचर्या )

प्रिय आत्मन् 
पूर्वकाल की दिनचर्या प्रकृति के अनुरूप थी । दिनचर्या जितनी अधिक प्रकृति के अनुरूप, उतनी ही वह स्वास्थ्य के लिए पूरक होती है । आज वह ऐसी नहीं है, इसलिए मनुष्य नाना प्रकार की व्याधियों से त्रस्त हो गया है । 

अतः हम सभी को यह ध्यान में रखना चाहिए कि ‘विज्ञान द्वारा निर्मित सुख-सुविधाओं से नहीं, अपितु अध्यात्म के आधार पर ही मनुष्य वास्तव में सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है । 

दिनचर्या क्या है - 
प्रातः उठने से लेकर रात को सोने तक किए गए कृत्यों को एकत्रित रूप से ‘दिनचर्या’ कहते हैं । इसी के अंतर्गत नित्य कर्म आते हैं । ‘नित्यकर्म’ वे हैं, जिन्हें करने से कोई पुण्य की प्राप्ति नहीं होती परंतु न करने से पाप का संचय होता है । प्रारंभ में हम दिनचर्या के कुछ नियम डालेंगे जैसे समय से उठाना , नित्य प्राणायाम , सादा और सुपाच्य भोजन , ईष्ट के मंत्रों का जाप और सत्संग शामिल है ,समय से सोना ।

संतुलित दिनचर्या क्यों आवश्यक है-
दिनचर्या के नियमों का पालन करना ही अध्यात्म की नींव है । नियम के पालन से हम प्रकृति के करीब आकर प्रकृति से जुड़ते हैं और प्रकृति हमें परमात्मा से जोड़ती है ।

दिनचर्या से लाभ-
जब हम कोई भी काम प्रतिदिन नियमित करते हैं नियमित रूप से करते हैं तो उसे एक ऊर्जा बनती है और यही ऊर्जा हमारे काम आती है दिनचर्या पालन करने से हमारा मनोबल हमेशा बढ़ा हुआ रहता है । हम ऊर्जा से भरे रहते हैं और एक अच्छा जीवन जीते हैं किसी भी काम को लेकर मानसिक दबाव नहीं रहता यदि कोई विपरीत परिस्थिति आ जाए तो उसमें हम हिम्मत नहीं हारते । 

जो दिनचर्या का पालन नहीं करते उन्हें हमेशा शारीरिक आलस्य घेरे रहता है जिसके कारण वह कभी भी समय पर अपना कोई काम नहीं कर पाते और अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते । 

एक संतुलित दिनचर्या में क्या-क्या होना चाहिए ?
संतुलित दिनचर्या में वह सभी कर्म सम्मिलित हैं जिनसे हमारा संपूर्ण विकास हो । जैसे- शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम एवं उचित खान-पान आवश्यक है । मन को स्वस्थ रखने के लिए प्राणायाम और बुद्धि को स्वस्थ रखने के लिए सत्संग जप , तप, स्वाध्याय होना चाहिए । ध्यान दें कि यदि हमारी दिनचर्या संतुलित नहीं होगी तो जीवन में हमें कोई सुख संतुलित रूप से और समय पर प्राप्त नहीं होगा । 

👉 समाज में दो प्रकार के लोग पाए जाते हैं ! एक दिनचर्या का अनुसरण करने वाले जिन्हें हम ऋषि कहते हैं । जो विश्व कल्याण के लिए सदैव कार्यरत रहते हैं ।
दूसरे दिनचर्या का अनुसरण ना करने वाले जिन्हें मर्यादाओं का कोई ज्ञान नहीं है और ना ही यह जीवन में कोई नियम मानते हैं, इन्हें हम भौतिकवादी लोग कहते हैं । 

उपरोक्त दोनों में स्पष्ट रूप से हमें अंतर ज्ञात होना चाहिए जिससे हमें आगे अध्ययन में समस्या ना हो । अपना मूल्यांकन स्वयं करें कि आप किस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं । वैसे तो जो जहां है ठीक है, हम किसी भी श्रेणी में हो इसमें कोई बुराई वाली बात नहीं है किंतु हमारा लक्ष्य क्या है यह जानना आवश्यक है  



नोट-  दिए गए लेख को अच्छी तरह पढ़े ! अपनी जिज्ञासा शंकाओं के समाधान के लिए चर्चाओं में शामिल हों । इसके बाद प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें । इसके लिए आपको 2 दिन का समय मिलेगा 


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👉मन

वर्तमान समय में हम किस स्थिति से गुजर रहे हैं यह कैसे ज्ञात हो ?
१-कमजोर मनोबल - 
२-भ्रम -
३-द्वंद -
४- अशुद्ध जानकारी
शुद्धिकरण का मतलब है शरीर मन और बुद्धि की अशुद्धियों से छुटकारा पाकर सफ़ाई करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण कहलाता है । 

शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है ?
शरीर मन और बुद्धि सभी तत्वों को अलग-अलग करके व्यवस्थित रूप में रखना शुद्धिकरण कहलाता है । यदि हम कोई भी चरण पूर्ण किए बिना आगे बढ़ जाते हैं तो सफलता संभव है ।

कितने स्तर में शुद्धिकरण आवश्यक है ?
शारीरिक, मानसिक और बद्धिक
तीनों स्तरों में शुद्धिकरण आवश्यक है ।

किसी  भी काम को समय पर पूरा न करना यह एक प्रकार की शारीरिक अशुद्धि है जो कि आलस्य के कारण आती है । 
शरीर की शुद्धि के लिए आहार विहार सुधारे , 

इसी प्रकार मन में विकार आ जाने पर हम समय पर कार्य नहीं कर पाते हैं जैसे अरुचि अनिच्छा भ्रम द्वंद यह सब मन के विकार हैं । इसी प्रकार जब हम मान्यताओं और अंधविश्वास से घिर जाते हैं और सुनाई बातों बातों पर विश्वास करने लगते हैं ।
मन की शुद्धि लिए पूर्णतया व्यसन मुक्त हो अर्थात गलत आदत छोड़ना , एवं नित्य प्राणायाम करें ।

प्राणायाम - साँस लेने की तकनीक प्राण शब्द का तात्पर्य 'ऊर्जा' या 'जीवन स्रोत' से है। यह अक्सर उस सार का वर्णन करता है जो हमें जीवित रखता है, साथ ही हमारे चारों ओर ब्रह्मांड में ऊर्जा का भी वर्णन करता है। प्राण  भी अक्सर सांस का वर्णन करता है, और जिस तरह से हम सांस लेते हैं, उसके साथ काम करके, हम मन को बहुत वास्तविक तरीके से प्रभावित करते हैं। हम प्राणायाम की व्याख्या  कुछ प्रकार से कर सकते हैं। 'प्राण-यम' का अर्थ 'सांस नियंत्रण' या 'सांस संयम', या 'प्राण - अयाम' हो सकता है जिसका अनुवाद 'सांस की स्वतंत्रता', 'सांस का विस्तार' या 'सांस मुक्ति' के रूप में होगा। विभिन्न श्वास तकनीकों के साथ काम करने की शारीरिक क्रिया मन को असंख्य तरीकों से बदल देती है - हम चंद्र भदाना (चंद्रमा भेदी सांस) जैसी शांत प्रथाओं या  कपालभाति  (चमकदार खोपड़ी साफ करने वाली सांस) जैसी अधिक उत्तेजक तकनीकों का चयन कर सकते हैं। 

सांस लेने का प्रत्येक तरीका हमारी स्थिति को बदल देगा, लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम इसे अपने महसूस करने के तरीके को 'नियंत्रित' करने के रूप में देखते हैं या अपने आप को उस अभ्यस्त तरीके से 'मुक्त' करने के रूप में लेते हैं जिस तरह से हमारा दिमाग आमतौर पर होता है।

👉यदि आपने पूरा लेख ध्यान से पढ़ लिया हो तो नीचे दिए गए फॉर्म को ओपन करें और पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरें । कृपया कॉपी पेस्ट ना करें ।


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👉अनुशासन

प्रिय आत्मन्
जीवन में अनुशासन एक मजबूत नींव की तरह है, जिस पर सफलता की इमारत खड़ी होती है। यह हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने, अपने समय का प्रबंधन करने, और एक स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने में मदद करता है। अनुशासन हमें जिम्मेदार, ईमानदार और आत्म-नियंत्रित बनाता है।

अनुशासन की कया परिभाषा है ?
अनुशासन का अर्थ है नियमों और विनियमों का पालन करना, और अपने व्यवहार को नियंत्रित करना। यह आत्म-संयम, जिम्मेदारी और कर्तव्यनिष्ठा का एक संयोजन है।

हमें किसके अनुशासन में रहना चाहिए ?
हमें अपने माता-पिता, और गुरुजनों के, बड़ों और समाज के नियमों का पालन करना चाहिए। हमें अपने लक्ष्यों और मूल्यों के प्रति भी अनुशासित रहना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात, हमें अपने स्वयं के अनुशासन में रहना चाहिए, और अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार होना चाहिए।

अनुशासन में रहने से हमें क्या लाभ होगा ?
सफलता: अनुशासन हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने और सफल होने में मदद करता है।
समय प्रबंधन: अनुशासन हमें अपने समय का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करने में मदद करता है।
स्वास्थ्य: अनुशासन हमें स्वस्थ आदतों को अपनाने और एक स्वस्थ जीवन शैली बनाए रखने में मदद करता है।
संबंध: अनुशासन हमें दूसरों के साथ अच्छे संबंध बनाने और बनाए रखने में मदद करता है।
आत्मविश्वास: अनुशासन हमें आत्म-नियंत्रण और आत्मविश्वास विकसित करने में मदद करता है।
मानसिक शांति: अनुशासन में रहने से मानसिक शांति मिलती है।
व्यक्तित्व विकास: अनुशासन हमारे व्यक्तित्व को निखारता है।

जो अनुशासन में नहीं रहते उन्हें किस प्रकार की हानि होती है ?
असफलता: अनुशासन की कमी से हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल हो सकते हैं।
समय की बर्बादी: अनुशासन की कमी से हम अपने समय को बर्बाद कर सकते हैं।
स्वास्थ्य समस्याएं: अनुशासन की कमी से हम अस्वास्थ्यकर आदतों को अपना सकते हैं और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर सकते हैं।
संबंधों में समस्याएं: अनुशासन की कमी से हम दूसरों के साथ अच्छे संबंध बनाने और बनाए रखने में विफल हो सकते हैं।
आत्मविश्वास की कमी: अनुशासन की कमी से हम आत्म-नियंत्रण और आत्मविश्वास खो सकते हैं।
मानसिक अशांति: अनुशासनहीनता मानसिक अशांति का कारण बन सकती है।
सामाजिक अस्वीकृति: अनुशासनहीन व्यक्ति को समाज में सम्मान नहीं मिलता।

व्यक्तिगत विकास की क्या परिभाषा है ?
व्यक्तिगत विकास का अर्थ है स्वयं को बेहतर बनाने की एक सतत प्रक्रिया। इसमें आपके कौशल, ज्ञान, आदतों और दृष्टिकोण में सुधार करना शामिल है ताकि आप अपने जीवन में अधिक प्रभावी,रुप से सफल हो सकें।
व्यक्तिगत विकास के कुछ प्रमुख पहलू:-
आत्म-जागरूकता: अपनी शक्तियों, कमजोरियों, मूल्यों और विश्वासों को समझना।
लक्ष्य निर्धारण: स्पष्ट और प्राप्त करने योग्य लक्ष्य निर्धारित करना।
कौशल विकास: नए कौशल सीखना और मौजूदा कौशल को बेहतर बनाना।
आदतों में सुधार: सकारात्मक आदतें विकसित करना और नकारात्मक आदतों को तोड़ना।
मानसिक स्वास्थ्य: तनाव का प्रबंधन करना, सकारात्मक मानसिकता विकसित करना और भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहना।
संबंध: मजबूत और स्वस्थ संबंध बनाना।
शारीरिक स्वास्थ्य: स्वस्थ आहार खाना, नियमित रूप से व्यायाम करना और पर्याप्त नींद लेना।
निरंतर सीखना: जीवन भर सीखते रहना और नए अनुभवों के लिए खुले रहना।

व्यक्तिगत विकास क्यों महत्वपूर्ण है ?
यह आपको अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है।
यह आपके आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान को बढ़ाता है।
यह आपके संबंधों को बेहतर बनाता है।
यह आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।
यह आपको अधिक संतुष्ट और खुशहाल जीवन जीने में मदद करता है।
व्यक्तिगत विकास एक यात्रा है, कोई गंतव्य नहीं। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें समय, प्रयास और प्रतिबद्धता लगती है।


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👉साधक के गुण

साधक के गुण 

किसी भी साधक में यह सामान्य गुण होना आवश्यक है 
इससे साधक अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तैयार हो सकता है । इसके आगे ईश्वर और गुरु कृपा ही सहयोग कर सकती है ।

१- जिज्ञासा
जिज्ञासा का मतलब है किसी चीज़ के बारे में ज़्यादा जानने की इच्छा ! जिज्ञासा मानव विकास में मदद करती है और सीखने की प्रक्रिया को बढ़ाती है. जिज्ञासा रखने से हमें सतर्क रहने और अपने बदलते परिवेश के बारे में ज्ञान हासिल करने में मदद मिलती है ।

२- तर्क - बुद्धि की क्षमता है जिसका प्रयोग हम श्रेष्ठ से श्रेष्ठ को खोजने के लिए करते हैं 

३- विश्वास - यह मन की एक भावना है जब हम किसी भी जानकारी को प्रमाणों के आधार पर सत्य मानना विश्वास है ।

४- समर्पण - यह मन की एक स्थिति है जब हमारे मन में किसी के प्रति आदर भाव या प्रेम उत्पन्न होता तो समर्पण स्वत: ही हो जाता है  ।
 
५- अनुशासन - प्रकृति के किसी भी नियम को स्वयं के भौतिक लाभ के लिए न तोड़ना अनुशासन कहलाता है ।

६- वैराग्य - किसीभी विषयवस्तु की नश्वरता को जानकर 
लेना ही वैराग्य है । और उनसे आसक्ति रहित होकर कार्य करना यही बैरागी के लक्षण है । 

७- सारग्रहिता - किसी भी लेख ,कथा, कहानी या घटना को कम से कम शब्दों में उसका मूल उद्देश्य क्या है यह ग्रहण करना सारग्रहिता कहलाता है ।

८- अन्य गुण -
शम - यानी मन की एकाग्रता
दम - यानी इंद्रियनिग्रह
उपरति - यानी निवृत्ति
तितिक्षा - यानी सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मान-अवमान आदि द्वंद्वों के प्रति सहनशीलता
श्रद्धा - यानी शास्त्र, संत और गुरु के वचनों पर, वे जो बताते हैं उस पर, पूरा विश्वास
समाधान - यानी शंकाओं का निवारण करना 


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👉 Ishwa Chepter -2 याद रखना और सीखना

याद रखना - यह एक सरल प्रक्रिया है जिसमे किसी कला विषय या वस्तु की जानकारी को अपनी स्मृति में संचित कर लेना ।

सीखना - एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे मनुष्य किसी कला, विषय या वस्तु की जानकारी को प्रायोगिक रूप में अपना कर उससे प्राप्त अनुभव को स्वयं में आत्मसात कर लेता है ।

१- सीखना क्यों आवश्यक है ?
सीखने की यह प्रक्रिया जन्म से मृत्यु पर्यन्त अनवरत रूप से चलती रहती है. सीखना मानव जीवन की कुंजी है. सीखने के फलस्वरूप ही व्यक्ति अपने व्यवहार का परिष्कार करता है । जैसे भोजन हमारे शरीर का पोषण करता है, वैसे ही सूचना और निरंतर सीखने से हमारे दिमाग का पोषण होता है। 
सीखना हमारे लिए बहुत अनिवार्य है, वर्ना पड़े पड़े तो पशु भी समय पूरा करते हैं । सीखने से खुद का आत्मविश्वास बढ़ता है। और हम जिम्मेदार बनते हैं ।

👉कितना सीखा ( सत्संग )


👉कितना सीखा ( बुद्धि )


👉कितना सीखा  ( दिनचर्या )


👉कितना सीखा  ( अनुशासन )


👉कितना सीखा  ( साधक )


👉कितना सीखा  ( ओज )


👉कितना सीखा ( मन )


👉कितना सीखा ( पंच कोष )


👉कितना सीखा ( साधक के गुण )


👉कितना सीखा ( ज्ञान )


👉कितना सीखा ( गुरु ) 

Wednesday, April 24, 2024

👉मानव जीवन का लक्ष्य

मानव जीवन का लक्ष्य-
लक्ष्य पर आगे बढ़ने से पहले अपनी सभी इच्छाएं पूर्ण कर लें और यदि आपका लक्ष्य और आपकी इच्छा एक ही है तो यह बहुत ही अच्छा संयोग है ।

शरीर छूटने से पहले यह आवश्यक कार्य यह है कि -

१- मुक्ति - सबसे उत्तम तो यही रहेगा की मुक्त होकर अपनी पदवी अनुसार कर्म करें । जैसे - राम और कृष्ण ।
२- आत्मज्ञान - यदि इतना ना हो सके तो जीवन रहते आत्मज्ञान प्राप्त कर लें जैसे नानक, बुद्ध ,कबीर , महावीर रैदास, osho आदि।
३- साधक जीवन - यदि इतना ना हो सके तो सद्गुरु की सानिध्य में रहते हुए आत्मज्ञान के लिए प्रयासरत रहे एवं सत्वगुणी संपत्ति को बचाएं और बचाने वालों की सहायता करें । इसके नीचे तो मनुष्य का पतन हो जाता है ।

पतन-
कोई भी मनुष्य गिरना नहीं चाहता। ऊपर उठना हर किसी को प्रिय है। फिर भी बार-बार पतन होता है। दरअसल हर पतन की शुरुआत अपवित्र विचार से होती है। इंद्रिय जनित सुखों की लालसा से मनुष्य ऐसे विषयों तथा वस्तुओं की कामना करने लगता है, जिनका कोई नैतिक आधार नहीं होता। इसी विषय चिन्तन को लक्ष्य करते हुए गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है, 'विषयों का ध्यान मात्र करने से मनुष्य का संग उन विषयों के साथ हो जाता है।' यहाँ संग का अर्थ घनिष्ठता की एक ऐसी भावना से है कि अब मैं इस पदार्थ को पाए बिना नहीं रह सकूंगा। मैं इसके लिए बना हूँ और यह मेरे लिए। इसे पाने के लिए अगर कोई निम्न आचरण करना पडे़ तो वह भी अच्छा है। एवरी थिंग इज फेयर इन लव एंड वार! इश्क और लड़ाई में सब कुछ जायज है। तब यही वाक्य संसार का सबसे बड़ा सत्य दिखाई देने लगता है। और फिर अच्छी बात और अच्छे संकल्प धरे के धरे रह जाते हैं। जब आँख खुलती है, तब पता लगता है कि पतन के गड्ढे में ऐसे गिरे कि लहूलुहान हो चुका चरित्र सुधर भी जाए, तो भी चोटों के निशान तो रह ही जाएंगे। तब क्या पतन ही मनुष्य की नियति है? क्या यही मान लिया जाए कि उत्थान तो हो ही नहीं सकता। उठने की कोशिश ही बेकार है। गीता में इस प्रकार की धारणा को त्यागने का निर्देश देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा गया है, 'स्वयं का स्वयं के द्वारा उद्धार करना चाहिए, आत्मा (स्वयं) को अवसाद (विषाद) में नहीं डुबाना चाहिए। यह मान लेना कि मैं अब उठ ही नहीं सकता, मैं तो हूँ ही पतनशील, मुझ जैसे घटिया जीव के द्वारा कुछ हो ही नहीं सकता - ऐसा विचार ही आत्मा का अवसाद है। समाज में पापों के बढ़ने का मूल कारण भौतिक पदार्थों को सुख का आधार मानकर उनका संग्रह करना तथा एक दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा है । यद्यपि यह भी सत्य है कि प्रत्येक कि अधिक संग्रह से चिंता एवं वासना में और वृद्धि होती हैं ।


👉मेरे पतन की कहानी - पतन कितना हो सकता है?

१-सामाजिक पतन - समाज में मान प्रतिष्ठा का ना होना ।

२-आर्थिक पतन - धन ना होना कर्जे का जीवन ।

३-मानसिक पतन - चिढ़चिढ़ापन डिप्रेशन ।

४-शारीरिक पतन - रोगी जीवन ।

५-व्यक्तिगत पतन - चारित्रिक दोष ।

६-अध्यात्मिक पतन - जीवन में ईश्वर भक्ति का ना होना ।

१- व्यक्ति प्रतिष्ठान सामाजिक परिवार का सदस्य रहता है ! जहां परिवार के सभी सदस्य ईश्वर के प्रति निष्ठावान, मानसिक और शारीरिक और आर्थिक रूप से स्वस्थ एवं सम्पन्न रहता है । जहां उसे भौतिक सुख सुविधाओं के साथ-साथ अन्य सभी प्रकार की शुभ सुविधाएं मिलती हैं ।

२ - व्यक्ति अपने परिवार से अलग हो जाता है! मान सम्मान में कमी आ जाती है और इसी क्रम में व्यक्ति धीरे-धीरे अकेला होता जाता है।

३ - धन के अभाव एवं झूठी मान प्रतिष्ठा दिखावा करने के लिए वह गलत तरीके से नियम तोड़कर धन कमाता है ।

४ - मानसिक परेशानियां, रोगी एवं कर्ज युक्त जीवन और अंत में आत्महत्या करता है या शत्रुओं द्वारा मार दिया जाता है । 

पतन को रोकने का उपाय -
एक संतुलित दिनचर्या हमारे सभी प्रकार के पतन को रोकने में सक्षम है ।

दिनचर्या -
यदि आपको दिनचर्या फॉलो करने में कोई समस्या नहीं आती तो आपका ऊर्जा स्तर बहुत ऊंचा है ! इसी को हम ओज और उत्साह भी कहते हैं । 

-एक संतुलित दिनचर्या में क्या-क्या होना चाहिए ?
संतुलित दिनचर्या में वह सभी कर्म सम्मिलित हैं जिनसे हमारा संपूर्ण विकास हो । जैसे- शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम एवं उचित खान-पान आवश्यक है । मन को स्वस्थ रखने के लिए प्राणायाम और बुद्धि को स्वस्थ रखने के लिए सत्संग जप , तप, स्वाध्याय होना चाहिए ।ध्यान दें कि यदि हमारी दिनचर्या संतुलित नहीं होगी तो जीवन में हमें कोई सुख संतुलित रूप में प्राप्त नहीं होगा । 
आप सभी अपनी-अपनी दिनचर्या आवश्यक जांचे -

नोट-  दिए गए लेख को अच्छी तरह पढ़े ! अपनी जिज्ञासा शंकाओं के समाधान के लिए चर्चाओं में शामिल हों । इसके बाद प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें । इसके लिए आपको 2 दिन का समय मिलेगा ।


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###tpमूलज्ञान

गुरु जी तरुण प्रधान 
द्वारा प्रस्तुत 
     
## त्रिज्ञान कार्यक्रम
यह पाठ्यक्रम ज्ञान पथ का संक्षिप्त परिचय है। यह तीन मुख्य शिक्षाएँ प्रदान करता है - आत्मज्ञान, माया का ज्ञान और ब्रह्मज्ञान (अद्वैत)।
यह ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार मौखिक रूप से गुरु द्वारा शिष्य को सीधा दिया जाता है। यह विधि एक व्याख्यान नहीं है, बल्कि एक वार्तालाप है। वास्तविक वार्तालाप थोड़ा अलग हो सकता है, छात्र की समझ के आधार पर, नीचे दिया गया पाठ केवल एक दिशानिर्देश है। प्रत्येक दिन एक विषय पर चर्चा की जाती है, जिसमें लगभग ४५ से ६० मिनट लगते हैं। केवल एक योग्य शिक्षक या एक छात्र जिसने ज्ञानमार्ग कार्यक्रम पूरा कर लिया है, इस पाठ्यक्रम को करवाने के लिए सक्षम हैं। जो कार्यक्रम के चरण #७ पर हैं वो साधक भी इसे करवा सकते हैं।
यह सेवा पूरी तरह निशुल्क है और फ़ोन या इंटरनेट पर प्रदान की जाती है।
## सावधानियां
* यह ज्ञान केवल इच्छुक और रुचि रखने वाले, विशेष रूप से ज्ञान के साधक, या आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले लोगों को ही करवाना चाहिए। साधारण लोगों या अपर्याप्त बुद्धि वाले लोगों को यह शिक्षा ग्रहण नहीं करनी चाहिए। प्रतिभाशाली और जिज्ञासु बच्चों को भी पढ़ाया जा सकता है।
* किसी भी परिस्थिति में यह ज्ञान उन लोगों को नहीं दिया जाना चाहिए जो मानसिक या शारीरिक रूप से अयोग्य हैं, या चरमपंथी या संकीर्ण विचार रखते हैं या रूढ़िवादी हैं।
* यह शिक्षण देने वाला व्यक्ति किसी भी अप्रत्याशित परिणाम के लिए स्वयं जिम्मेदार है।
* इस विद्या के एवज में पैसा या कुछ और नहीं मांगना चाहिए। इसे सेवा के रूप में निशुल्क दिया जाना चाहिए।
## परिचय: ज्ञानमार्ग
ज्ञानमार्ग ज्ञान को समर्पित एक आध्यात्मिक मार्ग है, और इस मार्ग पर चलने से अज्ञान का नाश होता है।
यह जानते हुए कि सभी प्रकार की अज्ञानता बंधन और दुख का मूल कारण है, इसे उचित प्रशिक्षण और एक अनुभवी शिक्षक के अधीन ही ग्रहण करना चाहिए। यह एक जीवन शैली है जिसमे हम सदा ज्ञान में रहते हैं। यह एक सीधा, सरल और अंतिम मार्ग है। अंततः यह एक मार्गहीन मार्ग है।
## ज्ञान के साधन
त्रिज्ञान कार्यक्रम
यह पाठ्यक्रम ज्ञान पथ का संक्षिप्त परिचय है। यह तीन मुख्य शिक्षाएँ प्रदान करता है - आत्मज्ञान, माया का ज्ञान और ब्रह्मज्ञान (अद्वैत)।

यह ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार मौखिक रूप से गुरु द्वारा शिष्य को सीधा दिया जाता है। यह विधि एक व्याख्यान नहीं है, बल्कि एक वार्तालाप है। वास्तविक वार्तालाप थोड़ा अलग हो सकता है, छात्र की समझ के आधार पर, नीचे दिया गया पाठ केवल एक दिशानिर्देश है। प्रत्येक दिन एक विषय पर चर्चा की जाती है, जिसमें लगभग ४५ से ६० मिनट लगते हैं। केवल एक योग्य शिक्षक या एक छात्र जिसने ज्ञानमार्ग कार्यक्रम पूरा कर लिया है, इस पाठ्यक्रम को करवाने के लिए सक्षम हैं। जो कार्यक्रम के चरण #७ पर हैं वो साधक भी इसे करवा सकते हैं।

यह सेवा पूरी तरह निशुल्क है और फ़ोन या इंटरनेट पर प्रदान की जाती है।

सावधानियां
यह ज्ञान केवल इच्छुक और रुचि रखने वाले, विशेष रूप से ज्ञान के साधक, या आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले लोगों को ही करवाना चाहिए। साधारण लोगों या अपर्याप्त बुद्धि वाले लोगों को यह शिक्षा ग्रहण नहीं करनी चाहिए। प्रतिभाशाली और जिज्ञासु बच्चों को भी पढ़ाया जा सकता है।

किसी भी परिस्थिति में यह ज्ञान उन लोगों को नहीं दिया जाना चाहिए जो मानसिक या शारीरिक रूप से अयोग्य हैं, या चरमपंथी या संकीर्ण विचार रखते हैं या रूढ़िवादी हैं।

यह शिक्षण देने वाला व्यक्ति किसी भी अप्रत्याशित परिणाम के लिए स्वयं जिम्मेदार है।

इस विद्या के एवज में पैसा या कुछ और नहीं मांगना चाहिए। इसे सेवा के रूप में निशुल्क दिया जाना चाहिए।

परिचय: ज्ञानमार्ग
ज्ञानमार्ग ज्ञान को समर्पित एक आध्यात्मिक मार्ग है, और इस मार्ग पर चलने से अज्ञान का नाश होता है।

यह जानते हुए कि सभी प्रकार की अज्ञानता बंधन और दुख का मूल कारण है, इसे उचित प्रशिक्षण और एक अनुभवी शिक्षक के अधीन ही ग्रहण करना चाहिए। यह एक जीवन शैली है जिसमे हम सदा ज्ञान में रहते हैं। यह एक सीधा, सरल और अंतिम मार्ग है। अंततः यह एक मार्गहीन मार्ग है।

ज्ञान के साधन
ज्ञान कैसे प्राप्त करें? ज्ञान प्राप्त करने के केवल दो ही साधन हैं:

अपरोक्ष अनुभव (प्रत्यक्ष प्रमाण) और
तर्क (अनुमान)
ज्ञानमार्ग के फल / सिद्धियाँ
आत्मज्ञान (आत्म-साक्षात्कार)
ब्रह्मज्ञान यानी एकता का बोध
यह जान लेना कि सभी अनुभव भ्रम हैं
दुखों का अंत
पूर्ण स्वतंत्रता
तृप्ती
मुक्ति
परम आनंद की स्थिति
तेज आध्यात्मिक विकास
और अन्य बहुत सारे लाभ हैं
ज्ञान के प्रकार
ज्ञान तीन प्रकार का होता है:

स्वयं का ज्ञान या आत्मज्ञान। मैं कौन हूँ, या मैं क्या हूँ?
संसार या माया का ज्ञान। क्या यह जगत या शरीर वास्तविक/सत्य है?
एकता का ज्ञान या ब्रह्मज्ञान। सब कुछ एक कैसे है?
पहला दिन : आत्मज्ञान
चलिये हम शुरुआत करते हैं इस प्रश्न से कि मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ और मेरा तत्व क्या है? इसको कैसे जाना जा सकता है? मैं केवल वही जान सकता हूँ जो मेरे अपरोक्ष अनुभव में है, या जिसको तर्क से जाना जा सकता है। और फिर यह जांचना चाहिये कि जो भी जाना जा रहा है, वो मैं हूँ या नहीं?

यह प्रश्न अपने आप से क्रम अनुसार एक के बाद एक पूछे जा सकते हैं।

वस्तुएं
अपरोक्ष अनुभव और तर्क के आधार पर 'वस्तुओं' से मेरा संबंध, निम्न लिखित प्रश्नों से जाना जा सकता है।

मैं अभी कहाँ हूँ?

अभी मेरे सामने क्या है?

क्या मैं वस्तु को देख रहा हूँ या वस्तु मुझे देख रही है? क्या इसमें कोई संदेह है?

क्या मैं कह सकता हूँ कि मैं कोई वस्तु नहीं हूँ? मैं वस्तुओं को देख सकता हूँ, कोई भी वस्तु मुझे नहीं देख सकती है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मैं कोई वस्तु नहीं हो सकता।

इस तरह से अपने अपरोक्ष अनुभव से मैं कह सकता हूं कि जो कुछ भी मैं देख सकता हूँ वह मैं नहीं हो सकता। इसी तरह सुनने, छूने और सोचने पर भी यही बात लागू होती है।

अब अगर हम वस्तु को बदल दें, तो आप क्या कहेंगे?

क्या आप कहेंगे कि वस्तु बदल गई या आप कहेंगे कि मैं बदल गया?

अगर वस्तु बदल गई लेकिन मैं नहीं बदला तो अपने प्रत्यक्ष अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि, अगर वस्तु बदलती है तो वह वस्तु मैं नहीं हूँ।

वस्तु जो भी थी, बदल गई है, फिर भी मैं वही रहता हूँ।

तो हम दो महत्वपूर्ण नियमों पर आते हैं:

मैं जिसका भी अनुभव कर सकता हूँ, मैं वो नहीं हूँ।
यदि कुछ बदलता है, मैं वो नहीं हूँ।
क्या इन दोनों नियमों के संबंध में कोई संदेह है? यह बहुत महत्वपूर्ण है कि इन दोनों नियमों को अच्छी तरह से सत्यापित किया जाए।

अब हमें यह कहने के लिए कि 'यह मैं नहीं हूँ', हर चीज़ की जाँच करने की ज़रूरत नहीं है। मैं यहां तर्क का उपयोग कर सकता हूँ, कोई भी वस्तु मैं नहीं हूँ। जो कुछ भी मैं देख सकता हूँ, या वह जो बदल रहा हैं, वह मैं नहीं हो सकता हूँ।

परिणाम: संसार में कोई भी वस्तु मैं नहीं हूँ। मैं वस्तुओं में नहीं पाया जा सकता हूँ।

शरीर
अपरोक्ष अनुभव और तर्क के आधार पर शरीर से मेरा संबंध क्या है?

आइए अब हम शरीर को देखें और दो नियमों के आधार पर अपने अनुभव और तर्क का उपयोग करें।

क्या आप शरीर को देख रहे हैं या शरीर आपको देख रहा है?

दो नियमों का उपयोग करने से पता चलता है कि यदि मैं शरीर का अनुभव कर सकता हूँ तो यह शरीर मैं नहीं हूँ। अगर यह बदल रहा है, तो भी शरीर मैं नहीं हूँ। शरीर का कोई अंग मैं नहीं हूँ क्योंकि सब कुछ बदल रहा है। यही तर्क शरीर के किसी भी हिस्से पर लागू होता है।

परिणाम: शरीर का कोई अंग मैं नहीं हूँ या मैं यह शरीर नहीं हूँ।

संवेदनाएं
अपरोक्ष अनुभव और तर्क के आधार पर 'संवेदनाओं' से मेरा संबंध क्या है?

आईने में जो मैं देखता हूँ उसे देखने के बजाय, आइए हम शरीर की संवेदनाओं पर ध्यान केंद्रित करें जो मैं महसूस कर सकता हूँ, जैसे दर्द, भूख, नींद, थकान, आदि।

चलो शरीर के दर्द को देखतें हैं। क्या आप दर्द का अनुभव कर रहे हैं या दर्द आपको अनुभव कर रहा है?

क्या दर्द आता-जाता है? क्या वह बदलता है?

दो नियमों का प्रयोग करें और जांचें कि क्या दर्द मैं हूँ?

यदि उत्तर यह है कि मैं प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर दर्द नहीं हूँ, तो मैं तर्क के आधार पर कह सकता हूँ, कि शरीर में कोई भी संवेदना मैं नहीं हूँ।

परिणाम: मैं संवेदनाएं नहीं हूँ। संवेदनाओं में से कोई भी संवेदना मैं नहीं हूँ।

भावनाएं
क्या गुस्सा आता है और चला जाता है?

दो नियमों का प्रयोग करो और जांचो कि क्रोध मैं हूँ या नहीं।

यदि अपरोक्ष अनुभव का उपयोग करके उत्तर यह आता है कि मैं क्रोध नहीं हूँ, तो तर्क का उपयोग करके मैं कह सकता हूँ की भावनाओं में से कोई भी मैं नहीं हूँ।

परिणाम: मैं भावनाएं नहीं हूँ। भावनाओं में से कोई भी भावना मैं नहीं हूँ।

विचार
अपरोक्ष अनुभव और तर्क के आधार पर 'विचारों' से मेरा संबंध क्या है?

क्या मैं विचारों का अनुभव करता हूँ या वे मुझे अनुभव करते हैं?

क्या "मैं यह हूँ या वह हूँ" जैसा विचार भी एक विचार नहीं है? (यह विशेष विचार अहम की वृति है, जो किसी भी चीज को मैं घोषित करती है)। यह अहम वृत्ति मैं को विभिन्न अनुभवों से जोड़ती है और यह विचार भी आता है और चला जाता है।

क्या विचार आते हैं और चले जाते हैं? क्या वे बदलते हैं?

दो नियमों का प्रयोग करें और जांचें कि क्या विचार मैं हूँ। यहाँ तक कि जो यह कहता है कि मैं यह हूँ या मैं वह हूँ वह तर्क के आधार पर मैं नहीं हूँ।

परिणाम: मैं विचार नहीं हूँ। विचारों में कोई भी विचार मैं नहीं हूँ।

इच्छाएं
अपरोक्ष अनुभव और तर्क के आधार पर 'इच्छाओं' से मेरा संबंध क्या है?

क्या मैं इच्छाओं का अनुभव कर रहा हूँ या इच्छाएँ मुझे अनुभव कर रही हैं?

क्या इच्छाएँ आती-जाती रहती हैं?

दो नियमों का प्रयोग करें और जांचें कि क्या मैं कोई इच्छा हूँ।

परिणाम: मैं इच्छाएँ नहीं हूँ। इच्छाओं में कोई भी इच्छा मैं नहीं हूँ।

स्मृतियाँ
अपरोक्ष अनुभव और तर्क के आधार पर स्मृतियों से मेरा संबंध क्या है?

क्या मैं स्मृति का अनुभव कर रहा हूँ या स्मृति मुझे अनुभव कर रही हैं?

क्या स्मृति आती-जाती हैं? क्या स्मृति बदल रही है? क्या मैं बदल रहा हूँ, जब स्मृति बदल रही हैं?

जब मैं भूल जाता हूँ तो क्या मैं कहता हूँ, कि 'मैं नहीं रहा', या मैं कहता हूँ कि 'मैं भूल गया था'?

क्या मुझे यह याद है कि मैंने एक साल पहले क्या पहना था? जब हमें कोई चीज याद नहीं होती, क्या हम यह कहते है की मैं नहीं हूँ, या यह कहते है की मैं भूल गया था? तो अगर मुझे याद नहीं आता कि मैंने एक साल पहले क्या पहना था, या अगर मैं कुछ भूल गया, तो भी मैं वहीं था।

स्मृति में क्या है? मेरा नाम क्या है? किसी ने मुझे नाम दिया है और मेरी स्मृति में वह नाम अंकित है। मैं इसे जल्दी याद कर सकता हूँ लेकिन वह आता तो मेरी स्मृति में से ही है। अगर स्मृति मैं नहीं हूँ, तो मैं मेरा नाम भी नहीं हूँ। यह सिर्फ एक नाम है।

शिक्षा के बारे में आपका क्या मत है? क्या शिक्षा स्मृति में नहीं होती? क्या शिक्षा हमेशा रहती है?

अगर स्मृति चली जाती है, तो शिक्षा भी चली जाती है। मेरा पेशा या कौशल भी मैं नहीं हूँ। यह भी स्मृति में है।

मुझे कैसे अपने संबंधियों माता, पिता, पति, पुत्र आदि के बारे में पता होता है? क्या मेरे संबंधियों की जानकारी मेरी स्मृति में से नहीं आती? अगर स्मृति मिट गई तो क्या में अपने संबंधिओ को पहचान पाऊँगा? स्मृति मिट गई तो संबंध कहां हैं? क्या मैं यह कहूंगा कि मैं ही नहीं हूँ, या मैं यह कहूंगा कि मुझे अपने रिश्तेदारों की याद नहीं है?

यदि स्मृति चली जाती है तो सारे रिश्ते नाते भी खत्म हो जाते हैं।

जाति, धर्म, राष्ट्रीयता आदि की जानकारी कहाँ से आती हैं? क्या वे बचपन में दूसरों द्वारा थोपे गए विचार मात्र नहीं हैं? इनके बारे में मेरे विचार दूसरों द्वारा मुझे बताई गई बातों से ही आकार लेते है, लेकिन मैं इनमें से कुछ भी नहीं हूँ।

परिणाम: मैं स्मृति नहीं हूँ, और स्मृति में जो कुछ भी है, मैं वो नहीं हो सकता हूँ।

लिंग
क्या मैं पुरुष हूँ या स्त्री हूँ? मुझे यह कैसे पता चला? स्वाभाविक है कि अपने शरीर के कारण, क्योंकि दो तरह के शरीर होते हैं - पुरुष का और स्त्री का। पर हम यह पहले ही देख चुके हैं कि मैं शरीर ही नहीं हूँ।

मैं पुरुष हूँ या स्त्री हूँ, यह मुझे शरीर के आधार पर ही बताया जाता है। यदि यह मतारोपण हटा दिया जाये तो मुझे किसी भी तरह का लिंग भेद करने की आवश्यकता नहीं है।

अब सब लिंग भेद, पुरुष स्त्री का भेद, जो एक काल्पनिक मतारोपण मात्र ही है, छूट गया है। यह सब केवल एक स्मृति ही है।

क्या कुछ बचा है, जो मैं कह सकता हूं कि मैं हूं?

मैंने जो कुछ भी सोचा था, वह सब स्मृति का हिस्सा है। और दो नियमों का उपयोग करके मैं पाता हूं कि कोई भी स्मृति मैं नहीं हूं। जो तार्किक रूप से मुझे यह जानने के लिए प्रेरित करता है कि कोई भी अनुभव मैं नहीं हूं। सभी अनुभव स्मृति में संग्रहीत हैं, और यदि स्मृति मैं नहीं हूं तो जो कुछ भी अनुभव किया जा सकता है वह भी मैं नहीं हो सकता।

परिणाम: मैं कोई अनुभव नहीं हूं। कोई भी अनुभव मैं नहीं हूं।

अनुभवकर्ता
अब प्रश्न पूछें- यदि मैं संसार की वस्तु नहीं हूँ, न शरीर हूँ, न संवेदनाएं, न भावनाएं, न विचार, न इच्छाएं, न स्मृति और न ही अनुभव हूँ; तो क्या फिर भी 'मैं' हूँ?

अगर कुछ है ही नहीं, तो सभी अनुभवों को कौन देख रहा है?

मैं तो अभी भी हूँ। मैं ही तो सब कुछ देख रहा हूँ। मैं ही अनुभवकर्ता हूँ। मैं ही साक्षी हूँ। अनुभवकर्ता को केवल होने से जाना जाता है, अनुभव करने से नहीं। मैं कोई अनुभव नहीं हूँ। क्या मैं कभी भी यह कह सकता हूँ कि मैं अनुभवकर्ता नहीं हूँ?

आकार
आइए अब साक्षी के बारे में जानें ।

क्या मैं साक्षी में कोई आकार, रूप, रंग, सामग्री, पदार्थ का अनुभव करता हूँ?

अगर कोई रूप होता तो मेरी आंखें उसे पकड़ लेती। अगर कोई रूप है भी, तो वह रूप मैं नहीं हूँ।

साक्षी अभी भी है। लेकिन ढूंढने पर वहां कुछ मिलता भी नहीं है। साक्षी खाली है, शून्य है। साक्षी का कोई रंग, आकार, रूप, पदार्थ आदि नहीं है, लेकिन वह अभी भी है।

क्या साक्षी में कोई आयतन, ऊर्जा, अवस्था, विद्युत, परमाणु आदि पदार्थ है? इन चीजों को या तो देखा जा सकता है या फिर अनुभव किया जा सकता है, या ये बदल जाती हैं। साक्षी में ऐसा कुछ भी अनुभव नहीं किया जा सकता है।

परिणाम: मैं निराकार हूँ।

परिवर्तन
जैसे ही कोई परिवर्तन होता है हम उसे देख सकते हैं, लेकिन नियम#२ कहता है की जो बदलता है, वह मैं नहीं हूँ।

जो भी परिवर्तन होता है वह अनित्य होता है, और जो नहीं बदलता वह स्थायी होता है। मैं ही हूँ जो स्थायी है, बाकी सब कुछ परिवर्तनशील है।

परिणाम: मैं अपरिवर्तनीय हूँ।

जन्म
मेरा जन्म कब हुआ था?

जन्म बच्चे के शरीर का निर्माण है। यह एक शरीर का जन्म था और अब वह छोटा शरीर चला गया है। एक शरीर का जन्म हुआ और मुझे बताया गया कि मैं पैदा हुआ हूँ। हालाँकि, मैं वह शरीर नहीं हूँ और न ही मैं यह वयस्क शरीर हूँ। यह शरीर अंगों, पदार्थों, भोजन आदि का संग्रह है। मैं यह नहीं कह सकता कि मैं पैदा हुआ था, लेकिन फिर भी मैं तो हूँ।

जन्म परिवर्तन की एक प्रक्रिया मात्र है, लेकिन मैं अपरिवर्तनशील हूँ, इसलिए मेरा जन्म असंभव है।

कोई भी जन्म प्रमाण पत्र मुझे यह नहीं बता सकता कि मेरा (साक्षी) का जन्म कब हुआ था। साक्षी में ऐसा कुछ भी नहीं है जो रूप धारण कर सके, वह निराकार है, इसलिए वह जन्म नहीं ले सकता। केवल शरीर ही पैदा हो सकते हैं, मैं (साक्षी) नहीं।

इसलिए मेरा (साक्षी) जन्म होना असंभव है।

परिणाम: मैं अजन्मा हूँ, मैं जन्महीन हूँ।

आयु और मृत्यु
क्या मैं बूढ़ा हो रहा हूँ?

अगर मैं पैदा ही नहीं हुआ तो मेरी उम्र कैसे हो सकती है?

बुढ़ापा परिवर्तन की एक प्रक्रिया है। लेकिन मैं कभी नहीं बदलता, इसलिए मैं कभी बूढ़ा नहीं होता। साक्षी में ऐसा कुछ भी नहीं है जो समय के साथ बूढ़ा हो सकता है या बिगड़ सकता है।

अगर कुछ पैदा होता है तो क्या वह मर जाएगा?

पेड़ पौधे जीव आदि पैदा होते हैं और मर जाते हैं, मिट्टी वापस मिट्टी में चली जाती है। मनुष्य शरीर जन्म लेते रहते हैं और मरते रहते हैं।

वस्तुओं का निर्माण, संयोजन और विघटन होता रहता है। कुछ शेष नहीं रहता। जो कुछ भी पैदा होता है उसका मरना तय है। मृत्यु भी एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन मात्र है।

अगर मैं पैदा नहीं हुआ तो क्या मैं मर सकता हूँ?

मैं कभी पैदा नहीं हुआ, मैं मर नहीं सकता। मृत्यु भी एक घटना है जो एक रूप का दुसरे रूप में परिवर्तन है।

परिणाम: मैं अविनाशी और अमर हूँ।

मुक्ति और पुनर्जन्म
अगर मेरा जन्म या मृत्यु नहीं होती तो क्या मेरा पुनर्जन्म संभव है?

मैं कभी पैदा नहीं हुआ, मैं कभी नहीं मरूंगा और मेरा कभी पुनर्जन्म नहीं होगा। जो बार-बार जन्म ले रहा है, वह मैं नहीं हूँ।

परंपरागत रूप से मुक्ति क्या है? यह मान्यता है कि व्यक्ति को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होने की आवश्यकता है।

क्या मेरा फिर से जन्म लेना संभव है? नहीं ! तो मैं इस चक्र से पहले से ही मुक्त हूँ।

यहीं इसी क्षण मेरी मुक्ति संभव है।

स्वतंत्रता क्या है: किसी चीज से बंधा नहीं होना ही स्वतंत्रता है। क्या ऐसा कुछ है, जो साक्षी को बाध्य कर रहा है?

क्या मुझे खाने, सोने, आराम करने की ज़रूरत है? क्या कोई मुझे जेल में डाल सकता है?

इस तरह से जांच करने पर, मुझे कोई बंधन या सीमा नहीं मिलती है। मैं असीम हूं।

परिणाम: मैं मुक्त, स्वतंत्र, असीम, और अनंत हूँ।

शांति और आनंद
जब कोई इच्छा नहीं, कोई विचार नहीं, कोई भावना नहीं, कुछ भी नहीं करना है तो क्या मैं शांत नहीं हूँ? क्या ऐसा कुछ है जो इस शांति को भंग करता है? यहां वास्तव में कुछ भी नहीं होता है।

सुख और दुख दोनों का पूर्ण अभाव है। इस अवस्था को परमानंद कहते हैं। यह मेरा वास्तविक स्वरूप है।

परिणाम: मैं नित्य, शान्त और आनंदमय हूँ, जो कभी मिटता नहीं।

प्रेम
अगर मैं आपके द्वारा पूछे गए सभी प्रश्न पूछूं, तो मैं क्या कहूंगा कि 'मैं क्या हूँ'?

क्या आप में और मुझमें मूल रूप से कोई अंतर है?

क्या बोतल का पानी गिलास के पानी से अलग है? जब बोतल और गिलास टूट जाते है, तो क्या हम पानी को अलग कर सकते हैं? जल ही सार है, भिन्न-भिन्न पात्रों में एक ही जल है।

आप जो भी हो, मैं भी वही हूँ। आपमें और मुझमें कोई अंतर नहीं है। मैं अनुभवकर्ता हूँ, और आप भी वही हैं।

सागर में दो लहरें - एक कहती है की मैं पानी हूँ और दूसरी कहती है कि मैं भी पानी हूँ। क्या वे समान हैं या भिन्न हैं? शायद रूप अलग हैं, लेकिन हैं तो वो एक ही।

रूप भिन्न हो सकते हैं जो मैं नहीं हूँ, लेकिन अंत में केवल सार ही रहता है। जब कोई रूप नहीं होता तो हम और आप एक हो जाते हैं। मैं आप बन जाता हूँ, और आप मैं बन जाते हो। क्या एक होने से बेहतर कोई रिश्ता हो सकता है? क्या इससे ज्यादा निकटता हो सकती है? जब दो एक हो जाते हैं तो वह प्रेम होता है। कोई अलगाव नहीं है। हम वास्तव में एक ही साक्षी हैं।

तो संक्षेप में, मैं हूँ:

अजन्मा
अमर
अविनाशी
निराकार
निरंतर
खाली / शून्य
शुद्ध
शाश्वत
स्वतंत्र / मुक्त
शांति
परमानंद
प्रेम
यह मेरा अस्तित्व है, यही मैं हूं।

यही आत्म-साक्षात्कार या आत्मज्ञान है।
👉 अधिक जानकारी के लिए वीडियो देखें 
👉 https://youtu.be/zLJ0ELtd5zQ


दूसरा दिन : मायाज्ञान
हम फिर से वही दो साधन यानी, अपरोक्ष अनुभव और तर्क, का प्रयोग करके देखते हैं कि जो कुछ भी अनुभव में आ सकता है, सभी अनुभव मिथ्या हैं। या यह भी कह सकते हैं कि सभी अनुभव असत्य हैं।

अपरोक्ष अनुभव
आप अपने आप से ही यह प्रश्न एक के बाद एक क्रमानुसार पूछें -

मैं अभी कहां हूँ? (या अभी मेरा शरीर कहां है?)

अभी मेरे सामने क्या है? (उसका नाम क्या है?)

अब केवल इस एक वस्तु पर ही ध्यान केंद्रित करें। क्या मैं वस्तु को देख रहा हूँ, या क्या मैं इस वस्तु का अपरोक्ष अनुभव कर रहा हूँ, या फिर मैं केवल वही जान पा रहा हूँ जो संकेत उस वस्तु के बारे में आंखों के माध्यम से आ रहे हैं?

आप यह अच्छी तरह से जान पाएंगे कि मैं केवल उन्हीं संकेतों का अनुभव कर रहा हूँ जो आँखों के माध्यम से आ रहे हैं।

क्या इसमें कोई संदेह है?

उदाहरण के लिए कल्पना कीजिये कि अभी आपके सामने एक लाल रंग का टमाटर रखा हुआ है।

कोई आपसे पूछे कि इस टमाटर का रंग क्या है? आशा है कि आप यही कहेंगे कि लाल रंग का है।

पर यदि उसी टमाटर पर नीले रंग का प्रकाश पड़ता है, तो अब टमाटर का रंग क्या है?

अब वो काले रंग का प्रतीत होगा। टमाटर लाल रंग का इसलिये प्रतीत हो रहा था क्योंकि टमाटर सूर्य के प्रकाश में से सभी रंग सोख लेता है और केवल लाल रंग ही प्रतिबिम्बित करता है। जब उसपर नीला प्रकाश पड़ता है तो वो सभी रंग सोख लेता है और काले रंग का प्रतीत होता है।

तो टमाटर का असली रंग कौनसा है?

कोई कहेगा की जो रंग सूर्य के प्रकाश में दिखता है वही असली रंग है। कोई कहेगा की असली रंग वही है जब उसपर नारंगी रंग पड़ता है, ना कि जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है या नीला प्रकाश पड़ता है। इस तरह यदि अलग अलग व्यक्ति भिन्न भिन्न रंग के प्रकाश में टमाटर को देखते हैं तो टमाटर का असली रंग कौनसा है?

दरअसल कोई भी रंग वास्तविक नहीं है। यह मनमानी कल्पना मात्र है। अधिकतर लोग मानेंगे कि टमाटर का असली रंग लाल ही है। परन्तु यदि सूर्य का प्रकाश सफेद होने की जगह पर नीला हो जाये तो अधिकतर लोग मानेंगे कि टमाटर का असली रंग काला है। फिर यही सत्य मान लिया जायेगा।

हम उतना ही रुप, आकार और रंग अनुभव करते हैं जो की हमारी इन्द्रियां हमें संकेत देती हैं। जो वास्तविक है उसका अनुभव नहीं किया जा सकता है, उसको कोई जान नहीं सकता है। तो हम यह स्पष्ट समझ सकते हैं कि दरअसल कोई भी रंग वास्तविक नहीं है, यह मनमानी कल्पना मात्र है।

यदि किसी व्यक्ति की आँखों में कोई दोष है जिसके कारण उसको सब कुछ दो दिखाई देता है। और वो कहता है कि एक नहीं यहां दो टमाटर हैं। पर क्या वास्तव में दो टमाटर हैं?

यदि ऐसा दोष सभी व्यक्तियों की आँखों में हो, तो सभी को कितने टमाटर दिखाई देंगे? दो। सत्य केवल एक सहमति या समझौता मात्र ही है।

कुछ लोग ट्रैफिक की बत्ती का रंग नहीं देख सकते हैं। एक जन्म से अंधे व्यक्ति के लिए चाँद और तारों का कोई अस्तित्व नहीं है। यह जगत केवल इन्द्रियों के कारण ही प्रतीत होता है। अलग अलग जीवों में भिन्न भिन्न इन्द्रियां होती हैं। कुछ जीवों में मनुष्य से बेहतर इन्द्रियां भी होती हैं।

कल्पना कीजिये कि आपकी स्पर्श की इन्द्रियों में भी दोष है, और आप जिसको भी छूते हैं वह एक की जगह दो प्रतीत होती है। अब तो आपको कोई संदेह नहीं रहेगा कि यहां एक नहीं दो टमाटर हैं।

टमाटर का भ्रम इन्द्रियों द्वारा बनाया गया है। इन्द्रियों के माध्यम से हमें पता चलता है कि जगत में क्या है। परन्तु जगत वास्तव में क्या है वो कोई नहीं जान सकता है।

यदि किसी को बुखार है तो सभी कुछ स्वादहीन प्रतीत होता है। वास्तव में खाने में कोई स्वाद नहीं होता है। यह तो जिह्वा है जिसके कारण हमें स्वाद का आभास होता है। वास्तव में किसी भी वस्तु में कोई स्वाद नहीं होता है।

एक और उदाहरण से इसको समझते हैं। तीन कप में पानी भरा हुआ है। एक में उबलता हुआ, एक में बर्फीला और जो बीच में है उसमें कमरे के तापमान का।

अब यदि आप गरम पानी में हाथ डालने के बाद बीच वाले कप में हाथ डालेंगे तो आपको वह ठंडा लगेगा। पर यदि आप ठंडे पानी में हाथ डालने के बाद बीच वाले कप में हाथ डालेंगे तो आपको वो गरम लगेगा। तो बीच वाले कप में पानी ठंडा है या गरम है?

उसमें एक कप की तुलना में पानी ठंडा है, और दूसरे कप की तुलना में पानी गरम है। यह सापेक्षिक है। इंद्रिय जनित है। वास्तव में ठंडा गरम कुछ नहीं होता है।

एक और उदाहरण लेते हैं। यदि आप किसी भिखारी को एक वासी रोटी का टुकड़ा फेंककर देते हैं तो उसको कैसा लगेगा? यदि आप उसे दस रुपये देते हैं तो उसे खुशी होगी। अब आप यही रोटी का टुकड़ा या दस रुपये एक बहुत अमीर आदमी को देंगे तो उसे कैसा लगेगा? वह अपमानित और क्रोधित होगा। यह कैसे सम्भव है कि एक ही वस्तु एक व्यक्ति को खुशी देती है और एक को दुख? यह पूर्णतया व्यक्तिनिष्ठ है।

सुख और दुख दोनों नहीं हैं। यदि वो हैं भी तो दोनों किसी पर निर्भर नहीं हैं। दोनों भ्रम या मिथ्या हैं।

यह हमारा अपरोक्ष अनुभव है। अब तर्क पर दृष्टि डालते हैं।

तर्क
यदि मैं कहता हूँ कि मेरा नाम विजय है, और यह मैं हर दिन दोहराता हूँ तो मेरा नाम क्या होगा?

परंतु यदि एक दिन मैं कहूँ कि मेरा नाम राजीव है, दूसरे दिन अशोक और तीसरे दिन गणेश है, तब मेरा नाम क्या होगा? तब कह सकते हैं कि मेरा कोई सही नाम नहीं है क्योंकि यह बदलता रहता है। आप ये देख सकते हैं कि सभी नाम असत्य है।

आप कुछ खरीदना चाहते हैं, एक दिन दुकानदार एक ही चीज का ५० रुपये बताता है, दूसरे दिन ७० रुपये और तीसरे दिन ३० रुपये, हर दिन कीमत बदलता रहता है, तो उस चीज की सही कीमत क्या है? उसकी कोई वास्तविक कीमत नहीं है क्योंकि वो बदलती रहती है।

यदि मुझे कुछ सम्पत्ति खरीदनी है और कोई व्यक्ति मुझे उसका ब्यौरा देता है। पर जब उसके सम्बंधित कागजात देखता हूँ तो कुछ और ही निकलता है। तो क्या मैं उस सम्पत्ति को खरीदूंगा? नहीं, क्योंकि वो जानकारी बदल गई है।

मैं एक अच्छे आदमी से मिलता हूँ, पर एक महीने में मैं यह देखता हूँ कि वो झूठ बोलता है, हेरफेर करता है, गलत काम करता है, अब मुझे उसपर कोई विश्वास नहीं होता है। हम कहते हैं कि वह विश्वसनीय नहीं है। अब क्या मैं उस पर विश्वास रखूँगा? नहीं, क्योंकि वो बदलता रहता है।

एक सामान्य तरीका यह जानने का की कुछ सत्य है या असत्य है, यह है कि हम यह परखें कि वो बदल रहा है या नहीं।

जब मैं समुंद्र को देखता हूँ, तो मैं लहरों को भी देखता हूँ। पर क्या मैं समुंद्र को वहीं छोड़कर केवल लहरें अपने साथ ले जा सकता हूँ? क्या बदल रहा है, लहरें या पानी? क्योंकि लहरों का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है इसलिये वो सत्य नहीं हैं। वो पानी के द्वारा लिया हुआ एक आकार हैं, एक धारणा मात्र हैं। हम पानी की आकृति को ही लहर कहते हैं। पर केवल आकार बदलता रहता है, पानी नहीं।

एक और उदाहरण लेते हैं, मिट्टी और घड़े का। क्या मिट्टी को छोड़कर केवल घड़ा अपने साथ ले जा सकता हूँ? यहां क्या बदल रहा है, आकार या घड़ा? वही मिट्टी कई रूप ले सकती है - घड़ा, दिया, मूर्ति, ईंट आदि, लेकिन मिट्टी में बदलाव नहीं होता है।

एक उदाहरण और है, सोना और आभूषण का। आभूषण का आकार बदलता रहता है, पर सोना वही रहता है, सोने के बिना आभूषण का कोई अस्तित्व नहीं है। आकार बदलता रहता है, तत्व नहीं। तत्व कभी नहीं बदलता है।

ज्ञान मार्ग पर हम कहते हैं कि जो बदल रहा है, तो वो है ही नहीं, वह मिथ्या है, एक विचार मात्र ही है। तत्व ही अपरिवर्तनीय है, वही सत्य माना जा सकता है।

अब हम अपने विभिन्न अनुभवों को देखते हैं। क्या आपके अनुभव में ऐसा कुछ भी है जो बदल नहीं रहा है?

सब कुछ बदल रहा है। इसलिये सभी कुछ असत्य है। मिथ्या है। कुछ भी सत्य नहीं है क्योंकि सबकुछ बदल रहा है, इसलिये सब असत्य है।

केवल एक ही है जो कभी नहीं बदलता है। वो आप ही हैं।

इन्द्रियों के माध्यम से कुछ अनुभव में आता अवश्य है, पर हम यह नहीं जानते हैं कि उसका तत्व क्या है। हम किसी दृश्य को वास्तविक मान लेते हैं क्योंकि सभी को एक ही दृश्य दिखाई देता है। जिनको हमसे भिन्न कुछ दिखता है तो हम कहते हैं कि देखने में कुछ दोष है, मेरे मैं नहीं।

जैसे एक कलाकार एक चित्र बनाता है, उसको उसमें बहुत कुछ दिखता है, एक ग्रामीण व्यक्ति को केवल आड़े तिरछे रंग दिखते हैं। अब क्या चित्र सुन्दर है या कुरूप? सब मानसिक धारणा है। यह इसपर निर्भर करता है कि कौन देख रहा है। सुन्दरता भी एक भ्रम है। क्योंकि सबकी सहमती नहीं है, तो यह नहीं कहा जा सकता है कि यह सुन्दर चित्र है।

नश्वरता
आइए टमाटर का एक और उदाहरण लेते हैं। अगर हम एक टमाटर लें और उसे ५ दिनों के लिए मेज पर रख दें, तो क्या होगा? वो ४-५ दिनों में सड़ जायेगा , पानी और मिट्टी हो जायेगा और फिर पूरा गायब हो जायेगा।

यदि हम सब कुछ वैसा ही रखें जैसा वह है, यानी इंद्रियां जैसी हैं वैसी ही रहने दें, जगत के नियम जैसे हैं वैसे ही रहने दें, यहां तक कि मन और बुद्धि भी जैसा है वैसा ही रहने दें, लेकिन कल्पना करें और केवल समय की गति तेज कर दें। जिस तरह हम किसी चलचित्र को तेजी से आगे बढ़ाते हैं, उसी तरह हम समय की गति को तेजी से आगे बढ़ाने की कल्पना करें। अब मान लीजिए कि समय की गति इतनी बढ़ा दी गई है कि वो टमाटर ५ दिन के बजाये ५ घंटे में सड़ जाता है और वह नहीं रहता है। अब टमाटर के बारे में आपकी क्या सोच है, क्या वह वास्तविक है?

अब हम समय को और तेज करते हैं, और अब टमाटर ५ मिनट में सड़ जाता है। क्या टमाटर आपको अब भी वास्तविक लगता है?

अब हम समय को और तेज करते हैं, और अब टमाटर ५ सेकंड में सड़ जाता है। आप टमाटर को मेज पर रखतें हो, उसे काटने के लिये चाकू उठाते हों, और ५ सेकेंड में वह गायब हो जाता है। अब आप टमाटर के बारे में क्या सोचेंगे? आप सोच सकते हैं कि आप शायद सपना देख रहे थे। आपको संदेह हो सकता है कि क्या आपके पास वास्तव में टमाटर था।

अब समय को और भी तेज कर दो और टमाटर एक पल में चला जाता है। अब क्या कोई टमाटर है?

आप समय की गति को इतना तेज कर सकतें है की टमाटर में होने वाले परिवर्तन को आपकी आंखे न देख सके न ही बुद्धि समझ पाए। इससे पहले कि आप टमाटर को देखें, वह गायब हो जाता है। क्या उसका होना सत्य है ? क्या वो उपयोगी है?

समय को तेज करके हम यह जान सकते की हमें जो वस्तु वास्तविक और उपयोगी लगती है, वह पूरी तरह नकली और निरर्थक है। अगर समय बहुत तेजी से बढ़ता है तो वहाँ कुछ भी नहीं है। यह केवल एक परिवर्तन है। क्या इस विचार से आप सहमत नहीं हैं?

वस्तुओं की स्मृति और उनमे बहुत धीमी गति से होने वाले परिवर्तन की वजह से हमें वह वस्तुएं स्थायी और वास्तविक लगती है। टमाटर के परिवर्तन काल के दौरान, उदाहरण के लिए ५ दिनों तक, वह हमारी स्मृति में रहता है; उत्तरजीविता के लिए यह उपयोगी है, इसलिए यह वास्तविक लगता है।

सब कुछ ऐसा ही है, जब हम समय को तेज करते हैं तो यह एक सपने जैसा हो जाता है। एक सपना तेजी से आगे बढ़ता है और इसका कोई मतलब नहीं होता है। हम कह सकते हैं कि उस सपने में सब कुछ असत्य, झूठा, अर्थहीन था।

अगर आपके सापेक्ष सब कुछ बदलने लगे, तो आप इसे एक सपने के रूप में देखते हैं।

आइए एक और उदाहरण लेते हैं। एक दिन आप बाहर जाते हों और एक सुंदर बगीचा देखते हैं। अगले दिन आप सुंदर बगीचे के स्थान पर एक खंडहर और रेगिस्तान देखते हैं, जैसे कि १०० साल बीत चुके हों। अगले दिन जब आप उठते हैं तो आपको उस रेगिस्तान के स्थान पर एक पहाड़ दिखाई देता है, एक बार और १०० साल बीत चुके होते हैं। क्या आप इस पर विश्वास करेंगे?

क्या सब कुछ पहले से ही ऐसा नहीं हो रहा है? फर्क सिर्फ इतना है कि यह धीरे-धीरे हो रहा है, और जो चीजें धीरे-धीरे बदलती हैं, वे वास्तविक लगती हैं।

विचारों और भावनाओं के साथ भी ऐसा ही होता है। भावनाएं बहुत तेजी से बदलती हैं, विचार और भी ज्यादा तेजी से बदलते हैं। हम उन्हें वास्तविक मानते हैं क्योंकि वे दोहराते हैं। हर अनुभव ऐसा है। अनुभव की स्मृति होती है इसलिए यह वास्तविक लगता है। माया में स्थिरता होती हैं।

इसलिए अगर आप रोज क्रोध में होते हैं, तो क्रोध आपके लिए वास्तविकता बन जाता है। लेकिन अगर आप अपने जीवन में पहली बार क्रोध का अनुभव करते हैं, तो आपको पता नहीं चलेगा कि क्रोध वहां है। क्योंकि आप क्रोध को दोहरा रहे हैं, आप मानते हैं कि वह वास्तविक है। अगर आप क्रोध को दोहराना बंद कर दे, तो वह आपके लिए वास्तविक नहीं रहेगा। स्मृति केवल दोहराव है और इसलिए वास्तविक प्रतीत होती है। कभी-कभी प्रेम, क्रोध आदि भावनाएं उत्तरजीविता के लिए उपयोगी होती है।

क्योंकि स्मृति केवल दोहराव है, हम मान लेते हैं कि यह सच है।

सत्य के मानदंड इस प्रकार मनमाने और व्यक्तिनिष्ठ हैं। कोई भी अपनी समझ और पसंद/नापसंद के हिसाब से कोई भी मानदंड तय कर सकता है।

टमाटर को अगर २० लोग देखें और सब कहें कि यह लाल, गोल और स्वादिष्ट है, तो यह वास्तविक हो जाता है।

क्या होगा यदि आपने सपना देखा कि टमाटर २० लोगों द्वारा देखा गया और सबने यही कहा कि यह लाल, गोल और स्वादिष्ट है, और जब आप जागे, तो क्या वो टमाटर सचमुच में था?

जागृत अवस्था और स्वप्न अवस्था में मानदंड समान था, लेकिन फिर भी एक अवस्था में यह वास्तविक था, दूसरे में नहीं था। वास्तविकता मनमानी है।

स्मृति
कुछ लोग कह सकते हैं कि यद्यपि सभी घटनाओं और चीजों में भारी परिवर्तन होते हैं, वे वास्तविक हैं क्योंकि वे और उनमें होने वाले सभी परिवर्तन हमारी स्मृति में संग्रहीत हैं।

अगर आपकी स्मृति में टमाटर है, तो क्या आप इसे अभी खा सकते हैं? अगर नहीं खा सकते हैं, तो क्या वह वास्तविक है?

स्मृति में जो कुछ भी संग्रहीत है, केवल छाया है। आपकी स्मृति में कुछ भी वास्तविक नहीं है। आपका पूरा जीवन एक छाया है, उसमें कोई व्यक्ति नहीं है, कोई जीवन ही नहीं है। सब कुछ पूरी तरह अवास्तविक है, मिथ्या है। आप कह सकते हैं कि आप चिकित्सक या अभियन्ता या वैज्ञानिक या लेखक आदि है, किसी के बेटे या पति है, आपने अपने जीवन में बहुत कुछ किया है, आप एक महान देश और श्रेष्ठ जाति के हैं; ये सब स्मृति में संग्रहीत है, जो की केवल एक छाया मात्र है।

स्मृति वास्तविक नहीं है। स्मृति में संग्रहीत कुछ भी वास्तविक नहीं है, लेकिन स्मृति उत्तरजीविता के लिए उपयोगी है। यदि आपको जीवित रहने के लिए इसकी आवश्यकता नहीं है, तो इसे त्याग सकते है। आप यह समझ चुके होंगे कि आपको (साक्षी) उत्तरजीविता की आवश्यकता नहीं है, किन्तु इस शरीर को आवश्यकता है। लेकिन शरीर आप नहीं हैं।

आपको स्मृति की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है, आपको जगत की भी जरूरत नहीं है, लेकिन शरीर को जगत की जरूरत है। आपने जगत को वास्तविक मान लिया क्योंकि आप स्मृति को त्याग नहीं सकते।

हमारा जीवन स्मृतिओं से बुना हुआ एक मायाजाल है, और हम उसको सत्य मान कर अपना पूरा जीवन अज्ञान में ही व्यतीत करते है।

जब हम साक्षीभाव में रहते हैं तो हम वही जीते हैं जो सत्य है, यही ज्ञान है। साक्षीभाव में रहकर हम सच और झूठ के बीच अंतर कर सकते हैं।

यही मिथ्या का ज्ञान है, यही माया का ज्ञान है।

साक्षी के अलावा सब कुछ माया है।

👉 अधिक जानकारी के लिए वीडियो देखें 
👉  https://youtu.be/ZdKymum3LOo

 दिन : ब्रह्मज्ञान
यहां हम जांच करते हैं कि:

सब कुछ एक कैसे है?
यहां द्वैत क्यों नहीं है?
अस्तित्व अद्वैत क्यों है?तीसरा
अस्तित्व
पहले अस्तित्व क्या है यह देखते हैं।

जो भी कुछ है वो अस्तित्व ही है। यहां क्या क्या है? आप कहीं भी जायें, आप कुछ भी देखें, आप यही पायेंगे कि अनुभव है और एक अनुभवकर्ता है। और यह दोनों सर्वदा एक साथ ही होते हैं। बस यही मूल है, और यही अस्तित्व है। हम देख सकते हैं कि यह एक ही हैं, और इसी को अस्तित्व कहते हैं।

क्या आपने कभी अनुभव और अनुभवकर्ता के सिवा कुछ और कभी भी देखा है? जैसे ही आप कहते हैं कि अस्तित्व में कुछ है तो आपको उसका अनुभव करना अनिवार्य है। आपको प्रमाण चाहिये होगा, और प्रमाण अनुभव पर ही आधारित होता है। यदि आप कहते हैं कि उसका अनुभव नहीं किया जा सकता पर वो है, तो वही अनुभवकर्ता है। सर्वदा ऐसा ही है। यानी अनुभव मिथ्या है और अनुभवकर्ता सत्य है या तत्व है।

यदि अस्तित्व अनुभव और अनुभवकर्ता ही है, तो अस्तित्व का तत्व क्या है? यदि अनुभव असत्य है और अनुभवकर्ता सत्य है तो अस्तित्व का तत्व अनुभवकर्ता हुआ। अनुभव तो मिथ्या रूप है अर्थात है नहीं। और स्पष्ट रुप से मैं ही अनुभवकर्ता हूँ। इसलिये इस अस्तित्व का तत्व मैं ही हूँ।

सम्पूर्ण अस्तित्व मैं ही हूँ।

क्या इस बात में कोई संदेह है?

सर्वदा साथ साथ
आइये इसको एक और दृष्टिकोण से देखते हैं और कुछ और प्रमाण ढूंढते हैं।

क्या आपने अनुभव को अनुभवकर्ता के बिना कभी भी देखा है? या अनुभवकर्ता कभी भी अनुभव के बिना हो सकता है?

यह दोनों सर्वदा एक साथ ही होते हैं। ऐसा क्यों है? यदि कुछ सर्वदा एक साथ ही है, हम उनको कभी भी भिन्न रुप में देख ही नहीं सकते हैं, तब हम यह कह सकते हैं कि वो एक ही हैं। जैसे कि घड़े को मिट्टी के बिना, आभूषण को सोने के बिना, और लहरों को पानी के बिना कभी देखा नहीं जा सकता है। सोने में आभूषण परिवर्तनीय है, मिट्टी में घड़ा परिवर्तनीय है, और पानी में लहरें परिवर्तनीय हैं।

अनुभव और अनुभवकर्ता में अनुभव परिवर्तनीय हैं, अनुभवकर्ता अपरिवर्तनीय है, और दोनों एक ही हैं। इसलिये जो भी है वह मेरा ही रुप है। इसलिये कोई भी रुप (आकार) मेरे बिना नहीं है। मन अनुभव और अनुभवकर्ता में विभाजन करता है। लेकिन मन तो अपने आप ही एक अनुभव मात्र ही है। अर्थात मिथ्या ही है, और मिथ्या ही कह रहा है कि द्वैत है।

विभाजन
अब हम दो हैं, इसका प्रमाण ढूंढते हैं। क्या अनुभव और अनुभवकर्ता में कोई दूरी है? इस तरह हम अपरोक्ष अनुभव पर आ जाते हैं।

अपने आप से यह सवाल इसी क्रमानुसार पूछें:

आप कहां हैं?

आपके सामने क्या है?

आपके सामने जो भी वस्तु है उसकी अनुभवकर्ता से कितनी दूरी है?

किसी फीते से दूरी को नापें। परंतु यह दूरी शरीर से नहीं बल्कि आपसे यानी अनुभवकर्ता से नापनी पड़ेगी। मन कह रहा है कि वस्तु बाहर कहीं दूर है। अज्ञानवश ये आभास होता है कि मैं यह शरीर हूँ, और शरीर से तो वह वस्तु दूर लगती है , पर आपसे (साक्षी से) कितनी दूर होगी? क्या फीते से ये नापना संभव है?

जहां कहीं भी अनुभवकर्ता है, वहीं पर अनुभव भी है। और वो दोनों सर्वदा अभी हैं और यहीं हैं। बाकी सब केवल मन द्वारा रची गई कोरी कल्पना मात्र है। यदि हर वस्तु वहीं पर है जहां पर आप हो, तो यह सारा संसार वहीं पर है जहां आप हो। बाकी सब केवल इन्द्रियों का रचा मायाजाल है, वहां कुछ है नहीं।

इन्द्रियों के माध्यम से जो भी अनुभव होते हैं सभी मानसिक होते हैं। मुझे आपके अनुभव ज्ञात नहीं हो सकते हैं, आपको मेरे अनुभव ज्ञात नहीं होते हैं। इसलिये हम काव्यात्मक रुप से कह देते हैं, सब कुछ मुझमें ही है।

मुझसे भिन्न कुछ नहीं है। सब कुछ मुझमें ही है। मैं ही अस्तित्व हूँ, सब कुछ मुझमें है। यही अपरोक्ष अनुभव है।

आइए एक और उदाहरण लेते हैं।

क्या अनुभव पहले होता है और अनुभवकर्ता बाद में आता है?

क्या अनुभवकर्ता पहले आता है और अनुभव बाद में?

हर जगह और हर पल, अनुभवकर्ता और अनुभव एक साथ हैं, एक समय हैं। सैद्धांतिक रूप में वे अलग-अलग प्रतीत होते हैं, हालांकि, उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। अनुभव हर पल बदल रहे हैं, और उनमें भिन्नता होती हैं, लेकिन सारे अनुभव अनुभवकर्ता से अलग नहीं हैं।

लहरें बदल रही हैं लेकिन क्या वे पानी से अलग हैं? मिट्टी का आकार बदल जाता है लेकिन क्या घड़े और मिट्टी के बीच अलगाव होता है? मन अनुभव और अनुभवकर्ता में विभाजन करता है, लेकिन वास्तव में दोनों एक ही है।

सीमा
एक और तरीका है यह जानने का की यह सब कहां है?

मेरे और वस्तु के बीच में सीमा रेखा कहां है?

यदि वस्तु बाहर कहीं दूर है, तो कहां पर अनुभवकर्ता शुरू होता है, और कहां पर अनुभव खत्म होता है। मतारोपण के कारण हम वस्तुओं को शरीर से कहीं बाहर देखता हैं, परन्तु शरीर खुद कहां है? हम कह सकते हैं मन के बाहर, पर फिर मन कहां है? कुछ लोग कह सकते हैं कि मन मुझसे बाहर है, मैं मन नहीं हूँ। मेरे और मन के बीच में सीमा रेखा कहां है? आप कह सकते हैं कि वस्तुएं कहीं बाहर हैं पर विचारों के बारे में क्या कहा जा सकता है?

वास्तव में कहीं भी कोई सीमा रेखा नहीं है। अज्ञान के कारण भ्रम है। अनुभव और अनुभवकर्ता एक ही हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, अर्थात वही एकमात्र अस्तित्व मैं ही हूँ।

फिर दूसरे व्यक्ति कौन हैं? वो भी तो यही कहेंगे कि मैं ही अस्तित्व हूँ। तो क्या इसका अर्थ यह है कि अनेक अनुभवकर्ता हैं और अनेक अस्तित्व हैं। ऐसा नहीं हो सकता है। एक ही अनुभवकर्ता जिसको अनगिनत अनुभव हो रहे हैं। अनुभवकर्ता का तत्व क्या है? खालीपन, या शून्यता। अस्तित्व का तत्व क्या है? शून्यता। केवल शून्यता ही है, पर हम केवल अनुभव और अनुभवकर्ता को ही देखते हैं। अस्तित्व शून्यता है, जो स्वयं का ही अनुभव अनेक रूपों में कर रहा है। यही एकता या अद्वैत का ज्ञान है।

अद्वैत
कोई अद्वैत का अनुभव किस तरह कर सकता है?

अद्वैत का कोई अनुभव नहीं होता है। जैसे ही कोई अनुभव होता है, साथ ही अनुभवकर्ता भी होता है। केवल होना मात्र ही है। जो है वही होना ही अद्वैत है। आप अभी इस क्षण भी वह ही हैं। मन अद्वैत में विभाजन करता है, पर मन का ही प्रयोग करके यह जान सकते हैं कि कोई विभाजन नहीं है। मन का स्वभाव है कि वो अद्वैत में विभाजन करता है, और बुद्धि उस विभाजन के आर पार देख सकती है कि और जान सकती है कि दो नहीं है। इसलिए हम कहते हैं कि दो नहीं हैं। केवल अद्वैत ही है। इस होने मात्र को हम अनुभवक्रिया कह सकते हैं।

केवल अनुभवक्रिया मात्र है। आपकी अवस्था अभी भी अनुभवक्रिया की ही है। इसी को अद्वैत की अवस्था भी कहते हैं। इसके अलावा और कोई अवस्था सम्भव नहीं है। यही अस्तित्व की अवस्था है।

वैराग्य से इस स्थिति में बने रहना सम्भव है। एक जगह शांती से बैठ जाइये और विरक्त भाव से अपने ध्यान को फैलने दीजिये, और शरीर, विचार, इच्छाओं और अहम भाव को अपने ध्यान में शामिल कर लीजिये, और आप केवल अनुभवक्रिया को ही देख पायेंगे। यही समाधि है। हम हमेशा समाधि में ही होते हैं, पर मन की गतिविधियों या चित्त वृत्ति उसको छुपा देती है। सब कुछ जागृत अवस्था के पीछे छुप जाता है, परन्तु यदि हम ध्यान देंगे तो पाते हैं कि केवल शून्यता मात्र है। मैं, अहम कहीं नहीं है। यही खाली या शून्य होना है, एक होना, पूर्ण अस्तित्व होना भी यही है। अस्तित्व के परदे पर सब कुछ एक स्वप्न की तरह प्रतीत हो रहा है। यदि आप समाधि में स्थित होना चाहते हैं, तो वो यहीं है और अभी है।

तुम स्वयं ही अद्वय अस्तित्व हो, जो स्वयं को ही मिथ्या रुपी स्वप्न के रुप में अनुभव कर रहे हो।

यही साधना का अन्त है, अध्यात्म का अन्त है, ज्ञान का अन्त है।

👉अधिक जानकारी के लिए वीडियो देखें 
👉 https://youtu.be/we5gWkLWOwc

👉विस्तार पूर्वक जाने 
https://youtube.com/playlist?list=PLGIXB-TUE6CRKyZ1cCKPSvu00Wcd3iba6&si=WNB8BxtkftsGbHUb

👉त्रिज्ञान कार्यक्रम हेतु लिंक पर जाकर पंजीयन करें ।
https://gyanmarg.guru/3d/intro.php 


Tuesday, April 23, 2024

👉सत्संग

सत्संग
आप जहां हो बिल्कुल उचित स्थान पर हो और यह भी हो सकता है कि आप वह जहां हो वहां श्रेष्ठ हो किंतु बात जब वहां से निकल कर शांति और आनंद प्राप्त करने की आती है तब सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं । तब सिर्फ एक ही सहारा दिखाई देता है ईश्वर और ईश्वर से जुड़ने के लिए हमारे पास सिर्फ एक ही मार्ग है सत्संग । और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपने दैनिक जीवन में सत्संग को कितना समय देते हैं । स्वयं मूल्यांकन करें -
१- आराम
२- काम
३- भोग
४- मनोरंजन
५- सत्संग 

१- सत्संग क्या है ?
इस संसार में तीन पदार्थ- ईश्वर, जीव और प्रकृति हैं। इन तीनों के बारे में जहां अच्छी तरह से बताया जाए, उसे सत्संग कहते हैं । श्रेष्ठ और सात्विक जनों का संग करना, उत्ताम पुस्तकों का सत्संग, पवित्र और धार्मिक वातावरण का संग करना, यह सब सत्संग के अंतर्गत आता है। सत्संग हमारे जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है, जितना कि शरीर के लिए भोजन। 

२- सत्संग क्यों आवश्यक है -
हमारा मन पानी जैसा। अक्सर यह देखा गया है कि जैसी संगत में हम रहते हैं हमारा मन वैसा हो जाता है । जहाँ पर भी हम ज्यादा समय गुजारते हैं मन वही ऊर्जा ग्रहण करने लगता है । और अपने जीवन का मूल उद्देश्य भूल जाता है ।  अपने जीवन के मूल उद्देश्य को समझने के लिए सत्संग जीवन में बहुत आवश्यक है ।

३- सत्संग सुनने का मूल उद्देश्य क्या है ?
अपने जीवन के मूल उद्देश्य को समझकर स्वयं का पूर्ण विकास करना है।

सत्संग से लाभ -

सत्संग से विवेक जाग्रत होता है ।

व्यक्तित्व का विकास होता है और आत्मिक विकास होता है.

सत्संग से नीच व्यक्ति भी महान बन सकता है.

सत्संग से मानसिक समस्याओं का इलाज होता है.

सत्संग से कुत्सित विचारों से बचा जा सकता है.

सत्संग के अभाव में हम अपने जीवन का मूल उद्देश्य भूल जाते हैं और जिसके परिणामस्वरूप हम उद्देश्य हीन जीवन एवं स्वयं के सामाजिक , आर्थिक , चारित्रिक पतन के दोषी होते हैं ।

४-मानव जीवन का मूल और उद्देश्य क्या है  ?
मानव जीवन का मूल उद्देश्य स्वयं का पूर्ण विकास एवं आनंद पूर्वक जीवन जीते हुए समाज के अच्छे कार्यों में सहयोग करना है।

५- सत्संग सुनने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए ?
किसी भी व्यक्ति की बातें सुनने से पहले सभी प्रकार से संतुष्ट होलें कि सामने वाला व्यक्ति प्रमाणिक है या नहीं , उनकी कही हुई बातें तर्कसंगत है या नहीं, इसके पश्चात समय व्यर्थ करने के लिए कोई विकल्प नहीं है । फिर तो हमें विश्वास के साथ समर्पण भाव से सत्संग की सारी बातें सुनाई चाहिए और उनका पालन करना चाहिए ।

६- सत्सुसंग सुनने संबंधी सामान्य निर्देश-
जब हम समस्याओं में फंसे हो हमें आसपास कोई सहायता या मददगार नजर नहीं आ रहा हो और हम अपने जीवन में सभी समस्याओं से निकलकर उच्चतम शिखर तक पहुंचाना चाहते हो, इस उद्देश्य को लेकर ही हमें सत्संग सुनना चाहिए और साथ ही कुछ बातें अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए जैसे -
हमें कभी भी ऐसे व्यक्ति से सत्संग की बातें नहीं सुननी चाहिए 
जिसके लिए हमारे मन में श्रद्धा ना हो , 
जिनकी भाषा शैली हमारी समझ में ना आए , 
जो अन्य दूसरे मार्गो की निंदा करते हो , 
जो प्रामाणिक और आचरण सिद्ध ना हो ,  
जिससे हमारी बात ना हो सके , 
जिनके उत्तर प्रमाणिक विधियों पर आधारित ना हो।

७- लोगों को सत्संग से लाभ क्यों नहीं मिलता ?
हम चाहे कितने भी सत्संग सुन ले, चाहे कितने भी ग्रंथ पढ़ ले ,
चाहे कितने भी वीडियो देख ले, जब तक हम स्वयं की शुद्धिकरण नहीं करेंगे , तब तक हम सत्संग से लाभ नहीं ले पाएंगे । शुद्धिकरण अर्थात स्थूल शरीर , सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर तीनों स्तर की शुद्धि। और शुद्धिकरण के लिए सबसे पहले हमें अपने दिनचर्या पर काम करना होगा ।

८- किसी भी बात को समझने के लिए हमें उसे कितनी बार दोहराना आवश्यक है ? 
यह लोगों की अपनी-अपनी बौद्धिक क्षमता है, कई लोग एक ही बार में बात समझ जाते हैं ! और बहुत से लोगो को एक ही बात समझने के लिए उसे बार-बार दोहराना पड़ती है तब जाकर समझ में आती है । कई लोग तो ऐसे होते हैं जिनको बार-बार कहने पर भी उन्हें वह बात समझ में नहीं आती , इसमें कोई बुराई नहीं है ! सबकी अपनी-अपनी बुद्धि का स्तर है । और हर प्राणी अपनी बुद्धि अनुसार ही ज्ञान ग्रहण करता है । किंतु कोई भी ज्ञान ग्रहण करने के लिए उसकी इच्छा अवश्य होनी चाहिए।

९- कैसे ज्ञात हो कि लोगों को सत्संग की बातें समझ में आ रही हैं ?
यदि उन्हें सत्संग की बातें समझ में आ रही है तो वह चिंतन और मनन के पश्चात उन नियमों को अपने जीवन में अवश्य डालेंगे ।

१०- ज्यादातर लोग सत्संगों से दूर क्यों है ? 
सत्संग केविषय में लोगों गों सही जानकारी नहीं रहती , कुछ लोगों को विषय की समझ नहीं रहती , कुछ लोगों को रुचि एवं इच्छा नहीं रहती । कई लोग अपने मनगढ़ंत विचारधारा में फंसे रहते हैं, बहुत से लोगों के पास सत्संग के लिए समय नहीं रहता । 

नोट-  दिए गए लेख को अच्छी तरह पढ़े ! अपनी जिज्ञासा शंकाओं के समाधान के लिए चर्चाओं में शामिल हों । इसके बाद प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें । इसके लिए आपको 2 दिन का समय मिलेगा 

जीवन में यदि सत्संग का महत्व आपने समझ लिया हो तभी आगे के पाठ पूर्ण करें , आगे का कार्यक्रम यहीं छोड़ दें अन्यथा आपका समय बर्बाद होगा ।



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👉 ओज

स्वास्थ्य का महत्व
स्वास्थ्य पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति है। 

१- स्वास्थ्य क्या होता है ?
स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों की अनुपस्थिति का नाम नहीं है। स्वस्थ्य ही जीवन है हमें सर्वांगीण स्वास्थ्य के बारे में जानकारी होना बहुत आवश्यक है।
यदि हम एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण की बात करें तो अपने आपको स्वस्थ कहने का यह अर्थ होता है कि हम अपने जीवन में आनेवाली सभी सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों का प्रबन्धन करने में सफलतापूर्वक सक्षम हों।

२- स्वास्थ शरीर क्यों आवश्यक है ?
जिस प्रकार एक स्वस्थ व्यक्ति अपने पूर्ण भवन का निरीक्षण कर सकता है उसी प्रकार एक स्वस्थ शरीर के द्वारा हम अपने पंचकोषों का निरीक्षण कर उसमें आई विकृति को दूर कर सकते हैं और एक स्वास्थ्य पा सकते हैं ।

१-ओज क्या है ?
आयुर्वेद के अनुसार, हमारे शरीर में सात धातुएं होती हैं। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र । शुक्र धातु सभी धातुओं का सार होती है । 
रस धातु से लेकर शुक्र धातु तक इन सातों धातुओं के सम्मिलित सार को ‘ ओज’ कहा जाता है । 

२- ओज कैसे बनता है ?
रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते। मेदस्यास्थिः ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसंभवः।।

अर्थात् हमारे द्वारा खाया गया जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है। पांच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है। पांच दिन बाद रक्त से मांस, उसमें से 5-5 दिन के अंतर से मेद, अस्थि, मज्जा और अंत में शुक्र बनता है। इस प्रकार आहार से शुक्र बनने में करीब एक महीना लग जाता है। ऐसी शुक्र धातु को 12 वर्ष तक ब्रह्मचर्य द्वारा संरक्षित करने पर यह ओज का रूप धारण करता है ।

३- ओज की रक्षा क्यों आवश्यकता है ?
हमारे शरीर में सब कुछ संतुलित रहे , बीमारियां हमसे दूर रहे , हमारे मन बुद्धि स्वस्थ रहें और हमारी इच्छाओं पर हमारा कंट्रोल रहे । इसलिए हमें सभी प्रकार से अपने ओज की रक्षा करनी चाहिए । 

४- कमजोर ओज के नकारात्मक लक्षण ?
कमजोर ओज के लक्षण -
भौतिक लक्षण :-
आलस्य की अधिकता शरीर और मन का भारीपन
थकान बार-बार बीमार पड़ने की प्रवृत्ति

मानसिक और भावनात्मक:-
मानसिक भ्रम या अस्पष्टता सभी प्रकार की भावनाओं पर कोई कंट्रोल नहीं रहता । मानसिक और बौद्धिक अस्थिरता
ध्यान की कमी लगातार नकारात्मक रवैया अकेलापन

३- ओज बल कैसे बढ़ाएं ?
इसकी खासियत यह है कि इसकी मात्रा बढ़ने से भी किसी तरह का रोग नहीं होता है एवं हमारा संपूर्ण विकास होता है ।अगर आपके शरीर में ओज की कमी है तो आपको ऋतु अनुसार आहार बिहार एवं योग्य अनुभवी व्यक्ति की सलाह अनुसार अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन किया जानाचाहिए ।

नोटदिए गए लेख को अच्छी तरह पढ़े ! अपनी जिज्ञासा शंकाओं के समाधान के लिए चर्चाओं में शामिल हों । इसके बाद प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें । इसके लिए आपको 2 दिन का समय मिलेगा  ।


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Sunday, April 21, 2024

जीवन रहस्य भाग - ५४ ( हमारे कर्तव्य और जिम्मेवारियां )

प्रिय आत्मन् 
किसी भी प्रकार की चर्चा  को आगे बढ़ाने के लिए आपके और हमारे बीच संबंध स्थापित होना अनिवार्य है ! जैसे- गुरु शिष्य , वक्ता श्रोता , मित्रों , संबंधियों का समूह आदि । क्योंकि इसके अभाव में कोई भी चर्चा आगे नहीं बढ़ सकती । 

कई बार सामाजिक लोगों से चर्चा के दौरान वे हमें हमारे कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से अवगत कराते हैं । क्योंकि जिम्मेवारी और कर्तव्य सिर्फ इक तरफा नहीं रहते, इसलिए ऐसे में उन सभी के लिए मेरा यही संदेश रहता है कि - हमने अध्यात्म से संबंधित प्रारंभिक ज्ञान को लेकर यह  पाठ्यक्रम तैयार किया है । आप में से जो भी इस पाठ्यक्रम से जुड़ता है , तो हम भी अपनी जिम्मेवारियां निभाने को आदिकाल से वचनबद्ध हैं ।

Friday, April 19, 2024

👉कर्म रहस्य

प्रिय आत्मन् 
मुक्त होने के लिए जीवन में कर्म रहस्य समझना अति आवश्यक है । वर्तमान में हम जो भी कर्म कर रहे हैं उसका कारण क्या है । यह भी समझना आवश्यक है । या फिर वर्तमान समय में हम जो भी फल भोग रहे हैं यह हमारे किन कर्मों का परिणाम है । क्या हम सुख और आनंद की अनुभूति कर रहे हैं या दुखी हैं और मानसिक चिंता में लिप्त हैं । इन सब बिंदुओं पर विचार करना बहुत ही आवश्यक है ।

कर्म के कारण
जिज्ञासा ,इच्छा ,आवश्यकता, आवेग  स्वभाव , प्रतिकर्म

कर्म और उसके प्रकार
कर्म, अकर्म , विकर्म , शुकर्म , कुकर्म प्रतिकर्म , नित्य कर्म , नैमैतिक कर्म काम्य कर्म,  निषिद्ध कर्म, प्रारब्ध कर्म 

1. कर्म -: कर्म का अर्थ है किसी भी इच्छा से प्रेरित होकर किया गया कार्य ।
2. अकर्म -: अकर्म का अर्थ है निष्क्रियता या कार्य न करना।
3. विकर्म -: विकर्म का अर्थ है देख कर कोई भी कार्य करना या फिर प्रति उत्तर में कोई कार्य करना ।
4. शुकर्म -: शुकर्म का अर्थ है पुण्य कर्म या अच्छे कार्य, इसमें दान, सेवा, सत्य बोलना, परोपकार, धर्म का पालन आदि शामिल हैं।
5. प्रतिकर्म -:  प्रतिकर्म का अर्थ है पश्चाताप या पापों का क्षमा मांगना। यह विकर्मों के लिए क्षमा या प्रायश्चित करने की प्रक्रिया है।
6. नित्य कर्म -:  नित्य कर्म का अर्थ है दैनिक कर्म या रोजमर्रा के कार्य। इसमें स्नान, भोजन, व्यायाम, काम आदि शामिल हैं। ये ऐसे कार्य हैं जो नियमित रूप से किए जाते हैं। नित्य कर्म  करने से पुण्य का संचय नहीं होगा किंतु ना करने से पाप का उदय अवश्य होगा ।
7. नैमित्तिक कर्म -: नैमित्क कर्म का अर्थ है ऐसे कार्य जो किसी विशेष अवसर पर या आवश्यकता पड़ने पर किए जाते हैं, जैसे कि किसी की मदद करना, किसी समारोह में भाग लेना आदि।इन्हें करने से विशेष लाभ नहीं होगा ! किंतु ना करने से पाप का संचय अवश्य होगा ।
8. काम्य कर्म -: काम्य कर्म का अर्थ है इच्छा पूर्ति के लिए किए जाने वाले कार्य, ये ऐसे कार्य हैं जो किसी विशेष इच्छा की पूर्ति के लिए किए जाते हैं, जैसे कि धन प्राप्ति, पदोन्नति, सुख-समृद्धि आदि। इन्हें करने से  इन्हें करने से पुण्य का संचय होगा किन्तु ना करने से पाप का संचय नहीं होगा ।
9. निषिद्ध कर्म -: निषिद्ध कर्म का अर्थ है वर्जित कार्य या ऐसे कार्य जो करने से मना किया गया है, इसमें हिंसा, चोरी, झूठ बोलना, व्यभिचार, मद्यपान आदि शामिल हैं। निषिद्ध कर्म करने से पाप का संचय होगा किन्तु ना करने से पुण्य की प्राप्ति होगी । 
10. प्रारब्ध कर्म -: प्रारब्ध कर्म का अर्थ है पूर्व जन्मों के कर्मों का फल जो इस जीवन में भोगना पड़ता है। यह माना जाता है कि हमारे पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर इस जीवन में हमें सुख-दुख, सफलता-असफलता का अनुभव होता है।
11.संचित कर्म -: सरल शब्दों में: संचित कर्म हमारे पिछले जन्मों के कर्मों का एक बैंक खाता है। जैसे हम बैंक में पैसे जमा करते हैं और निकालते हैं, वैसे ही हम अपने कर्मों को इस बैंक में जमा करते हैं और उनका फल भोगते हैं। संचित कर्म का एक हिस्सा प्रारब्ध कहलाता है, जो इस जन्म में भोगने के लिए निर्धारित होता है।

फल या प्रभाव
वर्तमान समय में हमें सुख एवं आनंद की अनुभूति हो रही है , या हम दुःख और मानसिक चिंताओं में लिप्त हैं । या फिर इससे भी एक अलग अनुभूति है जो कि मूर्छा की अवस्था है । यहां ना तो सुख और आनंद की अनुभूति है , और ना ही दुःख एवं मानसिक चिंताओं की अनुभूति है ।

१- क्या आप शरीर की गतिविधि या प्रक्रियाओं को रोक सकते हैं ?
२-क्या आप मन के विचारों को रोक सकते हैं ?
३- क्या आप काम क्रोध ऐसे ही अन्य वृत्तियों को रोक सकते हैं ?
४- क्या आप प्रतिक्षण हो रहे अनुभवों को रोक सकते हैं ?

गहराई से मनन करने पर यह ज्ञात होता है कि इन सबको नहीं रोका जा सकता ! किंतु इतना अवश्य है कि यह सब हमारे अनुभव में अवश्य आते हैं । और सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि किसके अनुभव में आ रहा है यह सब कुछ  ?

अभी तक हमने अध्यात्म का एक सूत्र जाना कि अहम् का नाश हुए बिना हम ईश्वर से नहीं मिल सकते। किंतु एक महत्वपूर्ण सूत्र यह भी है कि प्रकृति की किसी भी चीज का कभी विनाश नहीं होता ।

सबसे बड़ा समझने योग्य सूत्र यह है कि यहां सिर्फ समर्पण ही संभव है । कौन करेगा किसके प्रति समर्पण ? 

१- शरीर कब और किसके प्रति समर्पित हो सकता है ? 
२- मन कब और किसके प्रति समर्पित हो सकता है ? 
३- बुद्धि कब और किसके प्रति समर्पित हो सकती है ?

यहां पर विद्वानों द्वारा खोजा गया तीसरा बिंदु है संस्कार , संस्कार हमें सभी समस्याओं से बचा लेते है ।
यदि यह रहस्य जान लिया तो प्रकृति से परे जा सकते हैं । किंतु प्रकृति का नाश होना संभव नहीं है ।

आप और आपके शरीर में क्या भेद है ? 
एवं क्या समानताएं हैं ? 

सोते समय इस प्रश्न पर मनन करें और देखें क्या उत्तर आते हैं ।  

वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या: दोषारोपण की प्रवृत्ति

प्रणाम मित्रो वर्तमान समय में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली अधिकांश समस्याओं और विकृतियों के लिए स्...