Wednesday, March 31, 2021
दोस्तों , इस पर टिप्पणी काफी सोच-विचार और गहन मनन करने के बाद देकर जागरुक होने का परिचय दें|
Wednesday, March 24, 2021
ओशो के 20 सूत्र वाक्य, जो आपका जीवन बदल देंगे :
Saturday, March 20, 2021
👉विवाह मुहूर्त निर्धारण में —
आइये जाने की किन गुण दोषों का ध्यान रखें, विवाह मुहूर्त निर्धारण में —
विवाह संस्कार मानव जीवन का एक प्रमुख और सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह संस्कार शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का पालन करते हुए विधि विधानपूर्वक करना चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर और कन्या की जन्म कुंडलियां मिलाकर किए जाने वाले विवाह के मुहूर्त में प्रमुख दोषों का विवेचन प्रस्तुत है।
सामान्य रूप से सभी शुभ कार्यों में वर्जित 21 प्रमुख दोष —
पंचांग शुद्धि अभाव, सूर्योदयास्त या गुरु, शुक्रास्त विभिन्न देश के रीति रिवाज को छोड़कर, संक्रांति दिन, पाप षडवर्ग में लग्न होना, विवाह लग्न में छठे शुक्र व अष्टम में मंगल, त्रिविध गणांत, लग्न कारी योग, विकंगत चंद्रमा, वर-वधू की राशि से अष्टम लग्न, विषघटी, दुर्मुहूर्त पाप ग्रह वार दोष, लतादि दोष, ग्रहण नक्षत्र, उल्पात नक्षत्र, पाप विद्ध नक्षत्र, पापयुत नक्षत्र, पाप नवांश व क्रांतिसाम्य (महापाप)।
विवाह मास सूर्य संक्रमण की मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक, मकर, कुंभ राशियों के चांद्र मासों में विवाह उत्तमोत्तम होता है।
श्रावण, भाद्रपद एवं आश्विन मास विवाह के लिए उत्तम हैं।
विवाह तिथियां द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी एवं त्रयोदशी तिथियां विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। प्रतिपदा (कृष्ण), षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी एवं पूर्णिमा तिथियां विवाह के लिए उत्तम हैं।
विवाह वार सोमवार, बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। रविवार विवाह के लिए उत्तम हैं। विवाह नक्षत्र रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्र एवं रेवती नक्षत्र विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। अश्विनी, चित्रा, श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र विवाह के लिए उत्तम हैं।
विवाह योग प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, धु्रव, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल एवं ब्रह्म योग विवाह के लिए प्रशस्त हैं। विवाह करण बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर और वणिज विवाह के लिए प्रशस्त हैं। शकुनि, चतुष्पद, नाग एवं किंस्तुघ्न करण विवाह के लिए सामान्य हैं। विष्टि करण विवाह के लिए सर्वथा त्याज्य है।
गुरु/शुक्र अस्त विचार गुरु और शुक्र ग्रह यदि अस्त चल रहे हों, तो उसे तारा डूबा कहते हैं। इसलिए गुरु-शुक्र का अस्त काल विवाह मुहूर्त के लिए त्याज्य है। देव शयन विचार जब सूर्य उत्तरायण होता है, उस काल को देवताओं का दिन माना जाता है।
सूर्य दक्षिणायन काल देवताओं की रात्रि मानी जाती है। यही काल देवताओं का शयन काल कहलाता है।
देव शयन काल में भी विवाह मुहूर्त त्याज्य होता है। विवाह में विशेष लत्तादि दोष विवाह लग्न में मुख्य रूप से 10 दोष वर्जित हैं, जो इस प्रकार हैं-
“लत्ता पात युति वेध जामित्र बाणपंचक एकार्गल उपग्रह क्रांतिसाम्य दग्धा।”
इनमें वेध व क्रांतिसाम्य अति गंभीर दोष हैं, अतः विवाह लग्न में इनका त्याग अवश्य करना चाहिए।
1. लत्ता दोष:— लत्ता दोष एक गंभीर दोष है जिसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। इसकी दो स्थितियां होती हैं।
2. पात दोष:– सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसी नक्षत्र में यदि फेरों का समय आ जाए तो पात दोष होता है। मघा, आश्लेषा, चित्रा, अनुराधा, रेवती और श्रवण ये 6 पातकी नक्षत्र हैं। ये सभी सूर्य के संयोग से पतित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त साध्य, हर्षण, शूल, वैधृत, व्यतिपात व गंड इन योगों का अंत यदि उस दिन के नक्षत्र में हो, तो पात दोष होता है। इसे चंडायुध दोष भी कहते हैं। यह प्रायः सभी शुभ कार्यों में वर्जित है।
3. युति दोष:— विवाह नक्षत्र में पाप ग्रह का विचरण या युति हो, तो युति दोष होता है। सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु पाप ग्रह हैं। यदि चंद्र षडवर्ग में श्रेष्ठ, उच्च, स्वक्षेत्री या मित्र हो, तो युति दोष का परिहार हो जाता है। शुभ ग्रहों में बुध और गुरु यदि चंद्र के नक्षत्र में हों और मित्र राशि में हों, तो भी युति दोष नहीं माना जाता। शुक्र की युति को शुभ माना गया है, इसका दोष नहीं लगता है।
युति दोष के शुभ-अशुभ फल इस प्रकार हैं-
4. वेध दोष:— विवाह नक्षत्र का जिस नक्षत्र में वेध हो, उसमें कोई क्रूर या पाप ग्रह चल रहा हो, तो वेध दोष ओर के 12 वें नक्षत्र को सूर्य, तीसरे को मंगल, छठे को बृहस्पति और आठवें को शनि लात मारता है।
दूसरी स्थिति में बायीं ओर के सातवें नक्षत्र को बुध, नौवें को राहु, पांचवें को शुक्र और 22 वें को पूर्ण चंद्र लात मारता है। इसका फल इस प्रकार है। पंचशलाका चक्र में एक रेखा पर पड़ने वाले निम्न नक्षत्रों में ग्रह होने से नक्षत्रों का परस्पर वेध हो जाता है। रोहिणी-अभिजित, भरणी-अनुराधा, उत्तराषाढ़ा-मृगशिरा, श्रवण-मघा, हस्त – उत्तराभाद्रपद, स्वाति-शतभिषा मूल-पुनर्वसु, रेवती – उत्तराफलगुनि , चित्रा-पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा-पुष्य, पूर्वाषाढ़-आद्र्रा, धनिष्ठा-अश्लेषा, अश्विनी-पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा-कृत्तिका का आपस में वेध होता है।।
यदि विवाह नक्षत्र में शुभ ग्रह का वेध हो तो ‘पादवेध’ होता है। पादवेध में पूरा नक्षत्र दूषित नहीं होता, सिर्फ चरण दूषित होता है। यदि नक्षत्र के चतुर्थ चरण पर ग्रह हो, तो सामने वाले नक्षत्र के प्रथम चरण पर वेध होगा। यदि ग्रह द्वितीय चरण पर हो, तो सामने वाले नक्षत्र के तृतीय चरण पर वेध होगा।
विवाह मुहूर्त में पादवेध के काल का ही त्याग करना चाहिए, संपूर्ण नक्षत्र का नहीं। पापग्रहों द्वारा भोगकर छोड़े हुए नक्षत्र को यदि चंद्र भोग ले, तो नक्षत्र शुद्ध होकर वेध दोष दूर हो जाता है।
‘रवि वेधे च वैधकं, पुत्रशोको भवेत कुजे।’
अर्थात सूर्य के वेध में विवाह करने से कन्या विधवा हो जाती है और मंगल वेध से पुत्रशोक होता है। शनि के वेध से मृतसंतान उत्पन्न होती है तथा राहु के वेध से स्त्री व्यभिचारिणी हो जाती है। अतः लग्न में इसका परित्याग अवश्य ही करना चाहिए।
5. यामित्र दोष:— विवाह नक्षत्र से 14 वें नक्षत्र पर कोई ग्रह हो, तो यामित्र या जामित्र दोष लगता है। जामित्र अर्थात सप्तम स्थान। विवाह के समय चंद्र या लग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह हो, तो यह दोष होता है। अतः सप्तम स्थान की शुद्धि आवश्यक होती है। पूर्ण चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र के होने से जामित्र शुभ तथा पाप ग्रहों के होने से अशुभ फलदायक होता है। सप्तम अशुभ ग्रह व्याधि और वैधव्य का कारक होता है।
6. बाण पंचक दोष:— संक्रांति के व्यतीत दिनों (लगभग 16 दिन) में 4 जोड़कर 9 का भाग देने पर शेष 5 रहे तो मृत्यु पंचक दोष होता है। यदि गतांश में 6 जोड़कर 9 का भाग देने 5 शेष बचे, तो रोग पंचक, 3 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो अग्नि पंचक, यदि 1 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो राज पंचक और यदि 8 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो चोर पंचक दोष होता है। यदि शेष 5 नहीं रहे, तो बाण दोष नहीं होगा। यदि रविवार को रोग पंचक लगे तो सोमवार को राज पंचक, मंगल को अग्नि पंचक, शुक्र को चोर पंचक और शनि को मृत्यु पंचक होता है। ये सभी दोष विवाह में वर्जित हैं। रोग और चोर पंचक रात्रि में, राज और अग्नि पंचक दिन में और दोनों की संधि में मृत्यु पंचक वर्जित है। मृत्यु पंचक को छोड़ कर 4 पंचकों में दोष का निर्वाह हो जाता है। लेकिन मृत्यु पंचक सर्वथा वर्जित है। इसमें विवाह नहीं करना चाहिए।
07. एकार्गल दोष:– विष्कुम्भ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिघ, वैधृति ये अशुभ योग विवाह के दिन हों तथा सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र विषम हो तो एकार्गल दोष होता है। इसमें नक्षत्र गणना 28 मानकर की जाती है। इस दोष में खोड़ी (ऽ) लगती है दोष नहीं हो तो रेखा (।) लगाते हैं।
8. उपग्रह दोष: — सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र तक गणना में 5, 7, 8, 10, 14, 15, 18, 19, 21, 22, 23, 24 या 25वें नक्षत्र में कोई ग्रह आए, तो उपग्रह दोष होता है।
9. क्रांतिसाम्य दोष: — जब स्पष्ट चंद्रक्रांति सूर्य क्रांति के बिल्कुल समान हो तब क्रांतिसाम्य दोष होता है। एक ही अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 360 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर वैधृति नामक महापात होता है। विभिन्न अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 180 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर यह व्यतिपात संज्ञक होता है। क्रांतिसाम्य काल का निर्धारण गणित विधि से सिद्धांतोक्त पाताध्यायों के अनुसार किया जाता है।
साधारण तौर पर मेष-सिंह, वृष-मकर, तुला-कुंभ, कन्या-मीन, कर्क-वृश्चिक और धनु-मिथुन इन राशि युग्मों में, एक में सूर्य व एक में चंद्र हो, तो क्रांतिसाम्य दोष संभावित होता है। क्रांतिसाम्य दोष शुभ कार्यों में सभी शुभ गुणों को नष्ट कर देता है। विवाह पटल के अनुसार शस्त्र से कटा, अग्नि में जला या सर्प के विषदंश से पीड़ित व्यक्ति तो जीवित बच सकता है, किंतु क्रांतिसाम्य में विवाह करने पर वर-वधू दोनों ही जीवित नहीं रहते। अतः लग्न शुभ (शुद्ध) होने पर भी उक्त दोषों (क्रांतिसाम्य, वेधदोष) में विवाह नहीं करना चाहिए। सूक्ष्म क्रांति साम्य (महापात) की गणित गणना होती है। इसमें सभी शुभ कार्य वजिर्त हैं।।
10.दग्धा तिथि:— सूर्य राशि से तिथि को वर्जित माना गया है।
नीचे दिए गए तिथि चक्र में जिस माह के सूर्य के नीचे जो तिथि लिखी गई है, वह दग्धा तिथि मानी जाती है। इसमें विवाहादि शुभ कार्य वर्जित हैं। विशेष रूप से त्याज्य चार दोष विवाह लग्न में निम्नोक्त 4 दोष भी त्याज्य हैं–
****मर्म वेध: लग्न में पाप ग्रह होने से मर्म वेध होता है।
****कंटक दोष: त्रिकोण में पाप ग्रह होने से कंटक दोष होता है।
****शल्य दोष: चतुर्थ और दशम में पाप ग्रह होने से शल्य दोष होता है।
****छिद्र दोष: सप्तम भाव में पाप ग्रह होने से छिद्र दोष होता है। ज्येष्ठा विचार ज्येष्ठ मास में उत्पन्न व्यक्ति का ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित होता है। वर और कन्या दोनों का जन्म ज्येष्ठ मास में हुआ हो, तो इस स्थिति में भी ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित है। विवाह के समय तीन ज्येष्ठों का एक साथ होना वर्जित है। दो या चार या छह ज्येष्ठा होने से विवाह हो सकता है।
****सिंह-गुरु वर्जित:– सिंह राशि में गुरु हो तो विवाह वर्जित होता है। लेकिन मेष का सूर्य रहे तो सिंह के गुरु में विवाह हो सकता है।
****होलाष्टक:—फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में होलिका दहन से 8 दिन पहले अर्थात् शुक्लाष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक रहते हैं जो कि शतरुद्रा, विपाशा, इरावती और तीनों पुष्कर को छोड़कर सर्वत्र शुभ हैं, इसलिए इन स्थानों के अतिरिक्त सर्वत्र विवाहादि शुभ कार्य हो सकते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रमुख दोषों का फल इस प्रकार है। व्यतिपात में विवाह होने पर मृत्यु और वंश नाश की संभावना रहती है।
गंडांत में विवाह होने पर मृत्यु, वज्र में विवाह होने पर अग्निदाह, गंड में रोग होता हैं।।
विवाह में लग्न शुद्धि दिन और रात के 24 घंटों में 12 राशियों के 12 लग्न होते हैं। सभी मुहूर्तों में लग्न की सर्वाधिक प्रधानता होती है। विवाह आदि शुभ कार्यों में लग्न का शोधन गंभीरता से किया जाता है। विवाह हेतु वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु लग्न शुभ कहे गए हैं, इन लग्नों में विवाह उत्तम फलदायी होता है। अलग-अलग भावों में स्थित ग्रह विवाह लग्न हेतु अशुभ होते हैं।
इस संदर्भ में एक संक्षिप्त विवरण नीचे की सारणी में दी गई है। इनमें से कुछ ग्रहों की पूजा कराकर लग्न शुद्धि की जा सकती है। इनकी शांति के उपरांत विवाह में तथा दाम्पत्य जीवन में बाधाएं नहीं आतीं।
विवाह लग्न में शुभ ग्रह केंद्र, त्रिकोण या द्वितीय, द्वादश में हों और पाप ग्रह भाव 3, 6 या 11 में स्थित हों तो शुभफल देते हैं। लग्न (प्रथम भाव) से षष्ठ में शुक्र व अष्टम में मंगल अशुभ होता है। सप्तम भाव ग्रह रहित हो, विवाह लग्न से चंद्र भाव 6, 8 या 12 में न हो, तो लग्न शुभ होता है।
****लग्न भंग— मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के लग्न के व्यय भाव में शनि हो, तो उस लग्न में विवाह नहीं करना चाहिए। दशम में मंगल, तृतीय में शुक्र, लग्न में चंद्र या पाप ग्रह हो, लग्नेश, सूर्य, चंद्र छठे भाव में हो अथवा चंद्र, लग्न का स्वामी या कोई शुभ ग्रह आठवें भाव में हो अथवा सप्तम भाव में कोई भी ग्रह हो, तो लग्न भंग होता है।
विवाह लग्न में कन्या, मिथुन, धनु का पूर्वाधि नवांश शुभ होता है, बशर्ते ये अंतिम नवांश में न हो। उक्त राशियों का नवांश हो, तो दम्पति को पुत्र, धन व सौभाग्य की प्रप्ति होती है। वर और कन्या की जन्म राशियों या लग्नों से अष्टम या द्वादश भाव का नवांश यदि अनेक गुणों से युक्त हो तो त्याज्य है।
श्री रामदैवज्ञ के अनुसार, लग्न का स्वामी लग्न में स्थित हो या उसे देखता हो, अथवा नवांश का स्वामी नवांश में स्थित हो या उसे देखता हो, तो वह वर को शुभफल प्रदान करता है। इसी प्रकार नवांश का सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो, तो वधू के लिए शुभ फलदायक होता है।
****कर्तरी दोष एवं परिहार: — विवाह लग्न से दूसरे या 12वें भाव में यदि पाप ग्रह हो, तो कर्तरी दोष होता है, जो कैंची की तरह दोनों ओर से लग्न की शुभता को काटता है। लग्न से द्वितीय स्थान में पापग्रह वक्री और द्वादश में पाप ग्रह मार्गी हो, तो यह दोष महाकर्तरी होता है, इसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। लग्न में बलवान शुभग्रह हो, तो कर्तरी दोष भंग हो जाता है। केंद्र या त्रिकोण में गुरु, शुक्र या बुध हो, या कर्तरीकारक ग्रह नीचस्थ अथवा शत्रुक्षेत्री हो, तो कर्तरी दोष होता है।
****पंगु, अंध, बधिर लग्न:—- तुला और वृश्चिक दिन में तथा धनु एवं मकर रात्रि में बधिर (बहरी) होते हैं। बधिर लग्न में विवाह करने से जीवन दुखमय होता है। मेष, वृष और सिंह दिन में तथा मिथुन, कर्क और कन्या रात्रि में अंधे होते हैं। दिन में कुंभ एवं रात्रि में मीन लग्न पंगु (विकलांग) होता है। पंगु लग्न में विवाह होने पर धन का नाश होता है। दिवा अंध लग्न में कन्या विधवा हो जाती है, जबकि रात्रि अंध लग्न संतान के लिए मृत्युकारक होता है। इसलिए इन दोषपूर्ण लग्नों से बचना चाहिए। किंतु, यदि लग्न का स्वामी या गुरु लग्न को देखता हो, तो पंगु, बधिर आदि लग्न दोष नहीं होते हैं। त्रिबल शुद्धि विचार वर व कन्या की जन्मराशि से सूर्य, चंद्र व गुरु का गोचर नाम त्रिबल विचार है। विवाह मुहूर्त के दिनों में से जिस दिन त्रिबल शुद्धि बन जाए, उसी दिन विवाह निश्चय करके बता देना चाहिए।
कन्या के लिए गुरुबल व वर के लिए सूर्यबल का विचार और चंद्रबल का विचार दोनों के लिए करना चाहिए। सूर्य, चंद्र और गुरु की शुिद्ध होने पर ही विवाह शुभ होता है।
**** वरस्य भास्कर बलं:— विवाह के समय वर के लिए सूर्य का बलवान और शुभ होना अति आवश्यक है। सूर्य के बलवान होने से दाम्पत्य जीवन में पति का पत्नी पर प्रभाव व नियंत्रण रहता है। दोनों में वैचारिक सामंजस्य रहता है एवं जीवन के कठिन समय में संघर्ष करने की क्षमता भी सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य की शुभता से संपूर्ण वैवाहिक जीवन सुखमय होता है।
विवाह के समय वर की जन्म राशि से तीसरे, छठे, 10वें और 11वें भाव में सूर्य का गोचर श्रेष्ठ किंतु चैथे, आठवें और 12वें भाव में अनिष्ट होने के कारण त्याज्य है। पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें और नौवें भाव का सूर्य पूजनीय है अर्थात विवाह से पहले सूर्य की पूजा व लाल दान करने से ही विवाह शुभ हो पाता है। इनमें पहले और सातवें स्थान का सूर्य वर द्वारा विशेष पूज्य माना गया है।
दाम्पत्य जीवन में वर के वर्चस्व के लिए यह आवश्यक है कि सूर्य के उत्तरायण काल, शुक्ल पक्ष व दिवा लग्न में ही विवाह करे। दिवा लग्न में भी अभिजित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ है। सूर्य जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि का लग्न अभिजित लग्न कहलाता है। यह स्थानीय मध्याह्न काल (दोपहर) में पड़ता है। स्थानीय समयानुसार दिन के 12 बजने से 24 मिनट पूर्व 24 मिनट पश्चात तक 48 मिनट का अभिजित मुहूर्त होता है। उत्तम जाति ब्राह्मण व क्षत्रियों के लिए यह विवाह लग्न श्रेष्ठ कही गया है।
दक्षिण भारतीय ब्राह्मण अभिजित लग्न में ही विवाह करते हैं और यही कारण है कि उत्तर भारतीयों की अपेक्षा उनका वैवाहिक जीवन अधिक सफल रहता है। जन्मगत जाति के आधार पर ही नहीं बल्कि जन्म नक्षत्र के अनुसार यदि वर का वर्ण ब्राह्मण या क्षत्रिय हो, तो भी अभिजित लग्न में ही विवाह शुभफलदायी होता है।
विवाह लग्न में सूर्य यदि एकादश भाव में हो, तो यह सोने में सुहागा होता है। विवाह हेतु अन्य लग्न शुद्धि न हो सके, तो अभिजित मुहूर्त या लग्न में विवाह सभी वर्गों के लिए शुभ होता है।
**** कन्यायां गुरौ बलं:— कन्या के दाम्पत्य सुख व पति भाव का कारक गुरु है, इसलिए गुरु की शुद्धि में कन्या का विवाह शुभ होता है। कन्या की जन्म राशि से दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें या 11वें में स्थित गुरु विवाह हेतु शुभ माना जाता है, क्योंकि इन स्थानों में गुरु बलवान होता है। पहले, तीसरे, छठे या 10वें में स्थित गुरु मध्यम होता है, जो पूजा से शुभ हो जाता है।
कन्या से पीला दान करा कर विवाह करना चाहिए। चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु अशुभ होता हैं, यह पूजा से भी शुभ नहीं होता। अतः कन्या की जन्म राशि से चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु विवाह हेतु वर्जित है।
इन स्थानों में गुरु का गोचर वैधव्यप्रद होता है। मिथुन या कन्या राशि में हो, तो कन्या की हानि होती है। कर्क या मकर राशि में हो, तो कन्या के लिए दुखदायी होता है। किंतु उक्त स्थानों में स्वराशि या परमोच्च हो, तो शुभ होता है।
सिंह राशि के नवांश में गुरु हो, तो विवाह नहीं करना चाहिए। कन्या के विवाह हेतु गुरु शुद्धि का इतना गहन विचार तो उस समय किया जाता था जब उसका विवाह दस वर्ष या इससे भी कम की आयु में होता था।
आजकल तो लड़की का विवाह सोलह वर्ष के बाद ही होता है। इस उम्र तक वह कन्या नहीं रहती, वह तो रजस्वला होकर युवती हो जाती है। इसलिए गुरुबल शुद्धि रहने पर भी पूजा देकर लड़की का विवाह कराना शास्त्रसम्मत है। ऐसे में विवाह लग्न शुद्धि के लिए चंद्रबल देखना ही अनिवार्य है।
*****विवाहे चंद्रबलं:– श्री बादरायण के अनुसार गुरु और शुक्र के बाल्य दोष में कन्या का और वृद्धत्व दोष में पुरुष का विनाश होता है। गुरु अस्त हो तो पति का, शुक्रास्त हो, तो कन्या का तथा चंद्रास्त हो, तो दोनों का अनिष्ट होता है। अतः विवाह के समय वर और कन्या दोनों के लिए चंद्रबल शुद्धि आवश्यक है। चंद्र का गोचर दोनों की जन्म राशियों से तीसरे, छठे, सातवें, 10वें या 11वें भाव में शुभ (उत्तम) होता है। पहले, दूसरे, पांचवें, नौवें या 12वें में चंद्रमा पूज्य है। चैथे, आठवें या 12वें स्थान का चंद्र दोनों के लिए अशुभ होता है। विवाह पटल के अनुसार चैथा और 12वां चंद्र ही अशुभ होने के कारण त्याज्य है।
एकार्गलादि विवाह संबंधी दोष चंद्र एवं सूर्य के बलयुक्त होने के कारण नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् दोनों उच्चस्थ या मित्र क्षेत्री होकर विवाह लग्न में बैठे हो, तो समस्त दोष दूर हो जाते हैं। चंद्र बुध के साथ शुभ और गुरु के साथ सुखदायक होता है। विवाह लग्न में चंद्र की निम्नलिखित युतिस्थितियां दोषपूर्ण होती हैं, इनका त्याग करना चाहिए।
****सूर्य-चंद्र की युति – यह युति दंपति को दारिद्र्य दुख देती है।
****चंद्र-मंगल की युति – इस युति के फलस्वरूप मरणांतक पीड़ा होती है।
****चंद्र-शुक्र की युति – इस युति के फलस्वरूप पति पराई स्त्री से प्रेम करता है, अर्थात् पत्नी को सौतन का दुख झेलना पड़ता है।
****चंद्र-शनि की युति – यह युति वैराग्य देती है चंद्र-राहु की युति – राहु से युत चंद्र कलहकारी होता है।
****चंद्र-केतु की युति – यह युति कष्ट प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त यदि विवाह लग्न में चंद्र दो पाप ग्रहों से युत हो तो मृत्यु का कारक होता है। विवाह में गोधूलि विचार भी किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें सभी दोष त्याज्य हैं।
ऎसी मान्यता है कि शनि जो काल का प्रतीक है, समय का निर्णय करता है और बृहस्पति विवाह के लिए आशीर्वाद देता है। इस प्रकार मंगल जो पौरूष, साहस व पराक्रम का प्रतीक है, उसका भी विवाह संबंधित भाव व ग्रहों के ऊपर से विवाह की तिथि की 6 मास की अवधि के गोचर में विचरण होना चाहिए अथवा गोचर से दृष्टि होनी चाहिए। विवाह का समय निश्चित करने के लिए अष्टकवर्ग विधि का प्रयोग किया जाता है।
व्यक्तिगत, सामाजिक तथा राजनैतिक सभी प्रकार के कार्यो को शुभ मुहुर्त में आरंभ करने से सिद्धि व सफलता प्राप्त होती है। अंग्रेजी शासकों से स्वतंत्रता प्राप्ति के 24 घंटे बाद इस महत्वपूर्ण घोषणा के लिए हमारे महान नेताओं ने शुभ मुहुर्त का बेताबी से इंतजार किया था। यही वजह है कि हमारा देश आज संसार का सबसे बडा गणतंत्र और समृद्धशाली देशों की पंक्ति में गिना जाता है।
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आइये जाने की क्यों किया जाता है कुंडली मिलान???
विवाह स्त्री व पुरुष की जीवन यात्रा की शुरुआत मानी जाती है। पुरुष का बाया व स्त्री का दाहिना भाग मिलाकर एक-दूसरे की शक्ति को पूरक बनाने की क्रिया को विवाह कहा जाता है। भगवान शिव और पार्वती को अर्द्धनारीश्वर की संज्ञा देना इसी बात का प्रमाण है। ज्योतिष में चार पुरुषार्थो में काम नाम का पुरुषार्थ विवाह के बाद ही पूर्ण होता है।
**** आइये जाने शुभ मूहूर्त के अनुसार विवाह में वर्जित काल —–
वैवाहिक जीवन की शुभता को बनाये रखने के लिये यह कार्य शुभ समय में करना उतम रहता है. अन्यथा इस परिणय सूत्र की शुभता में कमी होने की संभावनाएं बनती है. कुछ समय काल विवाह के लिये विशेष रुप से शुभ समझे जाते है. इस कार्य के लिये अशुभ या वर्जित समझे जाने वाला भी समय होता है. जिस समय में यह कार्य करना सही नहीं रहता है. आईये देखे की विवाह के वर्जित काल कौन से है.:-
1. नक्षत्र व सूर्य का गोचर —–
27 नक्षत्रों में से 10 नक्षत्रों को विवाह कार्य के लिये नहीं लिया जाता है ! इसमें आर्दा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुणी, उतराफाल्गुणी, हस्त, चित्रा, स्वाती आदि नक्षत्र आते है. इन दस नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र हो व सूर्य़ सिंह राशि में गुरु के नवांश में गोचर कर तो विवाह करना सही नहीं रहता है.
2. जन्म मास, जन्मतिथि व जन्म नक्षत्र में विवाह —-इन तीनों समयावधियों में अपनी बडी सन्तान का विवाह करना सही नहीं रहता है. व जन्म नक्षत्र व जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र, 16वां नक्षत्र, 23 वां नक्षत्र का त्याग करना चाहिए !
3. शुक्र व गुरु का बाल्यवृ्द्धत्व—-शुक्र पूर्व दिशा में उदित होने के बाद तीन दिन तक बाल्यकाल में रहता है. इस अवधि में शुक्र अपने पूर्ण रुप से फल देने में असमर्थ नहीं होता है. इसी प्रकार जब वह पश्चिम दिशा में होता है. 10 दिन तक बाल्यकाल की अवस्था में होता है. शुक्र जब पूर्व दिशा में अस्त होता है. तो अस्त होने से पहले 15 दिन तक फल देने में असमर्थ होता है व पश्चिम में अस्त होने से 5 दिन पूर्व तक वृ्द्धावस्था में होता है. इन सभी समयों में शुक्र की शुभता प्राप्त नहीं हो पाती है.गुर किसी भी दिशा मे उदित या अस्त हों, दोनों ही परिस्थितियों में 15-15 दिनों के लिये बाल्यकाल में वृ्द्धावस्था में होते है.
उपरोक्त दोनों ही योगों में विवाह कार्य संपन्न करने का कार्य नहीं किया जाता है. शुक्र व गुरु दोनों शुभ है. इसके कारण वैवाहिक कार्य के लिये इनका विचार किया जाता है.
4. चन्द्र का शुभ/ अशुभ होना—चन्द्र को अमावस्या से तीन दिन पहले व तीन दिन बाद तक बाल्य काल में होने के कारण इस समय को विवाह कार्य के लिये छोड दिया जाता है. ज्योतिष शास्त्र में यह मान्यता है की शुक्र, गुरु व चन्द्र इन में से कोई भी ग्रह बाल्यकाल में हो तो वह अपने पूर्ण फल देने की स्थिति में न होने के कारण शुभ नहीं होता है. और इस अवधि में विवाह कार्य करने पर इस कार्य की शुभता में कमी होती है.
5. तीन ज्येष्ठा विचार—विवाह कार्य के लिये वर्जित समझा जाने वाला एक अन्य योग है. जिसे त्रिज्येष्ठा के नाम से जाना जाता है. इस योग के अनुसार सबसे बडी संतान का विवाह ज्येष्ठा मास में नहीं करना चाहिए. इस मास में उत्पन्न वर या कन्या का विवाह भी ज्येष्ठा मास में करना सही नहीं रहता है ! ये तीनों ज्येष्ठ मिले तो त्रिज्येष्ठा नामक योग बनता है.
इसके अतिरिक्त तीन ज्येष्ठ बडा लडका, बडी लडकी तथा ज्येष्ठा मास इन सभी का योग शुभ नहीं माना जाता है. एक ज्येष्ठा अर्थात केवल मास या केवल वर या कन्या हो तो यह अशुभ नहीं होता व इसे दोष नहीं समझा जाता है.
6. त्रिबल विचार—इस विचार में गुरु कन्या की जन्म राशि से 1, 8 व 12 भावों में गोचर कर रहा हो तो इसे शुभ नहीं माना जाता है.
गुरु कन्या की जन्म राशि से 3,6 वें राशियों में हों तो कन्या के लिये इसे हितकारी नहीं समझा जाता है. तथा 4, 10 राशियों में हों तो कन्या को विवाह के बाद दु:ख प्राप्त होने कि संभावनाएं बनती है.गुरु के अतिरिक्त सूर्य व चन्द्र का भी गोचर अवश्य देखा जाता है !इन तीनों ग्रहों का गोचर में शुभ होना त्रिबल शुद्धि के नाम से जाना जाता है.
7. चन्द्र बल—चन्द्र का गोचर 4, 8 वें भाव के अतिरिक्त अन्य भावों में होने पर चन्द्र को शुभ समझा जाता है. चन्द्र जब पक्षबली, स्वराशि, उच्चगत, मित्रक्षेत्री होने पर उसे शुभ समझा जाता है अर्थात इस स्थिति में चन्द्र बल का विचार नहीं किया जाता है.
8. सगे भाई बहनों का विचार—एक लडके से दो सगी बहनों का विवाह नहीं किया जाता है. व दो सगे भाईयों का विवाह दो सगी बहनों से नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त दो सगे भाईयों का विवाह या बहनों का विवाह एक ही मुहूर्त समय में नहीं करना चाहिए. जुडंवा भाईयों का विवाह जुडवा बहनों से नहीं करना चाहिए. परन्तु सौतेले भाईयों का विवाह एक ही लग्न समय पर किया जा सकता है. विवाह की शुभता में वृ्द्धि करने के लिये मुहूर्त की शुभता का ध्यान रखा जाता है.
9. पुत्री के बाद पुत्र का विवाह—पुत्री का विवाह करने के 6 सूर्य मासों की अवधि के अन्दर सगे भाई का विवाह किया जाता है. लेकिन पुत्र के बाद पुत्री का विवाह 6 मास की अवधि के मध्य नहीं किया जा सकता है. ऎसा करना अशुभ समझा जाता है. यही नियम उपनयन संस्कार पर भी लागू होता है. पुत्री या पुत्र के विवाह के बाद 6 मास तक उपनयन संस्कार नहीं किया जाता है दो सगे भाईयों या बहनों का विवाह भी 6 मास से पहले नहीं किया जाता है।।
10. गण्ड मूलोत्पन्न का विचार—मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या अपने ससुर के लिये कष्टकारी समझी जाती है. आश्लेषा नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या को अपनी सास के लिये अशुभ माना जाता है. ज्येष्ठा मास की कन्या को जेठ के लिये अच्छा नहीं समझा जाता है. इसके अलावा विशाखा नक्षत्र में जन्म लेने पर कन्या को देवर के लिये अशुभ माना जाता है. इन सभी नक्षत्रों में जन्म लेने वाली कन्या का विवाह करने से पहले इन दोषों का निवारण किया जाता है।।
Wednesday, March 17, 2021
ब्राह्मण शब्द को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। इनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक है। क्यूंकि हिन्दू समाज की सबसे बड़ी कमजोरी जातिवाद है। ब्राह्मण शब्द को सत्य अर्थ को न समझ पाने के कारण जातिवाद को बढ़ावा मिला है।शंका 1: ब्राह्मण की परिभाषा बताये?समाधान: पढने-पढ़ाने से,चिंतन-मनन करने से, ब्रह्मचर्य, अनुशासन, सत्यभाषण आदि व्रतों का पालन करने से,परोपकार आदि सत्कर्म करने से, वेद,विज्ञान आदि पढने से,कर्तव्य का पालन करने से, दान करने से और आदर्शों के प्रति समर्पित रहने से मनुष्य का यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है।-मनुस्मृति 2/2शंका 2: ब्राह्मण जाति है अथवा वर्ण है?समाधान: ब्राह्मण वर्ण है जाति नहीं। वर्ण का अर्थ है चयन या चुनना और सामान्यत: शब्द वरण भी यही अर्थ रखता है। व्यक्ति अपनी रूचि, योग्यता और कर्म के अनुसार इसका स्वयं वरण करता है, इस कारण इसका नाम वर्ण है। वैदिक वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।ब्राह्मण का कर्म है विधिवत पढ़ना और पढ़ाना, यज्ञ करना और कराना, दान प्राप्त करना और सुपात्रों को दान देना।क्षत्रिय का कर्म है विधिवत पढ़ना, यज्ञ करना, प्रजाओं का पालन-पोषण और रक्षा करना, सुपात्रों को दान देना, धन ऐश्वर्य में लिप्त न होकर जितेन्द्रिय रहना।वैश्य का कर्म है पशुओं का लालन-पोषण, सुपात्रों को दान देना, यज्ञ करना,विधिवत अध्ययन करना, व्यापार करना,धन कमाना,खेती करना।शुद्र का कर्म है सभी चारों वर्णों के व्यक्तियों के यहाँ पर सेवा या श्रम करना।शुद्र शब्द को मनु अथवा वेद ने कहीं भी अपमानजनक, नीचा अथवा निकृष्ठ नहीं माना है। मनु के अनुसार चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य एवं शूद्र आर्य है।- मनु 10/4शंका 3: मनुष्यों में कितनी जातियां है ?समाधान: मनुष्यों में केवल एक ही जाति है। वह है "मनुष्य"। अन्य की जाति नहीं है।शंका 4: चार वर्णों का विभाजन का आधार क्या है?समाधान: वर्ण बनाने का मुख्य प्रयोजन कर्म विभाजन है। वर्ण विभाजन का आधार व्यक्ति की योग्यता है। आज भी शिक्षा प्राप्ति के उपरांत व्यक्ति डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि बनता है। जन्म से कोई भी डॉक्टर, इंजीनियर, वकील नहीं होता। इसे ही वर्ण व्यवस्था कहते है।शंका 5: कोई भी ब्राह्मण जन्म से होता है अथवा गुण, कर्म और स्वाभाव से होता है?समाधान: व्यक्ति की योग्यता का निर्धारण शिक्षा प्राप्ति के पश्चात ही होता है। जन्म के आधार पर नहीं होता है। किसी भी व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वाभाव के आधार पर उसके वर्ण का चयन होता हैं। कोई व्यक्ति अनपढ़ हो और अपने आपको ब्राह्मण कहे तो वह गलत है।मनु का उपदेश पढ़िए-जैसे लकड़ी से बना हाथी और चमड़े का बनाया हुआ हरिण सिर्फ़ नाम के लिए ही हाथी और हरिण कहे जाते है वैसे ही बिना पढ़ा ब्राह्मण मात्र नाम का ही ब्राह्मण होता है।-मनुस्मृति 2/157शंका 6: क्या ब्राह्मण पिता की संतान केवल इसलिए ब्राह्मण कहलाती है कि उसके पिता ब्राह्मण है?समाधान: यह भ्रान्ति है कि ब्राह्मण पिता की संतान इसलिए ब्राह्मण कहलाएगी क्यूंकि उसका पिता ब्राह्मण है। जैसे एक डॉक्टर की संतान तभी डॉक्टर कहलाएगी जब वह MBBS उत्तीर्ण कर लेगी। जैसे एक इंजीनियर की संतान तभी इंजीनियर कहलाएगी जब वह BTech उत्तीर्ण कर लेगी। बिना पढ़े नहीं कहलाएगी। वैसे ही ब्राह्मण एक अर्जित जाने वाली पुरानी उपाधि हैं।मनु का उपदेश पढ़िए-माता-पिता से उत्पन्न संतति का माता के गर्भ से प्राप्त जन्म साधारण जन्म है। वास्तविक जन्म तो शिक्षा पूर्ण कर लेने के उपरांत ही होता है। -मनुस्मृति 2/147शंका 7: प्राचीन काल में ब्राह्मण बनने के लिए क्या करना पड़ता था?समाधान: प्राचीन काल में ब्राह्मण बनने के लिए शिक्षित और गुणवान दोनों होना पड़ता था।मनु का उपदेश देखे-वेदों में पारंगत आचार्य द्वारा शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने के उपरांत ही उसका वास्तविक मनुष्य जन्म होता है।-मनुस्मृति 2/148ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन वर्ण विद्याध्ययन से दूसरा जन्म प्राप्त करते हैं। विद्याध्ययन न कर पाने वाला शूद्र, चौथा वर्ण है।-मनुस्मृति 10/4आजकल कुछ लोग केवल इसलिए अपने आपको ब्राह्मण कहकर जाति का अभिमान दिखाते है क्यूंकि उनके पूर्वज ब्राह्मण थे। यह सरासर गलत है। योग्यता अर्जित किये बिना कोई ब्राह्मण नहीं बन सकता। हमारे प्राचीन ब्राह्मण अपने तप से अपनी विद्या से अपने ज्ञान से सम्पूर्ण संसार का मार्गदर्शन करते थे। इसीलिए हमारे आर्यव्रत देश विश्वगुरु था।शंका 8: ब्राह्मण को श्रेष्ठ क्यों माने?समाधान: ब्राह्मण एक गुणवाचक वर्ण है। समाज का सबसे ज्ञानी, बुद्धिमान, शिक्षित, समाज का मार्गदर्शन करने वाला, त्यागी, तपस्वी व्यक्ति ही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी बनता है। इसीलिए ब्राह्मण वर्ण श्रेष्ठ है। वैदिक विचारधारा में ब्राह्मण को अगर सबसे अधिक सम्मान दिया गया है तो ब्राह्मण को सबसे अधिक गलती करने पर दंड भी दिया गया है।मनु का उपदेश देखे-एक ही अपराध के लिए शूद्र को सबसे दंड कम दंड, वैश्य को दोगुना, क्षत्रिय को तीन गुना और ब्राह्मण को सोलह या 128 गुणा दंड मिलता था।- मनु 8/337 एवं 8/338इन श्लोकों के आधार पर कोई भी मनु महाराज को पक्षपाती नहीं कह सकता।शंका 9: क्या शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र बन सकता है?समाधान: ब्राह्मण, शूद्र आदि वर्ण क्यूंकि गुण, कर्म और स्वाभाव के आधार पर विभाजित है। इसलिए इनमें परिवर्तन संभव है। कोई भी व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण नहीं होता। अपितु शिक्षा प्राप्ति के पश्चात उसके वर्ण का निर्धारण होता है।मनु का उपदेश देखे-ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते है। -मनुस्मृति 10/64शरीर और मन से शुद्ध- पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्राह्मण जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है। -मनुस्मृति 9/335जो मनुष्य नित्य प्रात: और सांय ईश्वर आराधना नहीं करता उसको शूद्र समझना चाहिए। -मनुस्मृति 2/103जब तक व्यक्ति वेदों की शिक्षाओं में दीक्षित नहीं होता वह शूद्र के ही समान है।-मनुस्मृति 2/172ब्राह्मण- वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ठ–अतिश्रेष्ठ व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच- नीचतर व्यक्तिओं का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ठ बनता जाता है। इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है। -मनुस्मृति 4/245जो ब्राह्मण,क्षत्रिय या वैश्य वेदों का अध्ययन और पालन छोड़कर अन्य विषयों में ही परिश्रम करता है, वह शूद्र बन जाता है। -मनुस्मृति 2/168शंका 10: क्या आज जो अपने आपको ब्राह्मण कहते है वही हमारी प्राचीन विद्या और ज्ञान की रक्षा करने वाले प्रहरी थे?समाधान: आजकल जो व्यक्ति ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर अगर प्राचीन ब्राह्मणों के समान वैदिक धर्म की रक्षा के लिए पुरुषार्थ कर रहा है तब तो वह निश्चित रूप से ब्राह्मण के समान सम्मान का पात्र है। अगर कोई व्यक्ति ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण धर्म के विपरीत कर्म कर रहा है। तब वह किसी भी प्रकार से ब्राह्मण कहलाने के लायक नहीं है। एक उदहारण लीजिये। एक व्यक्ति यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है, शाकाहारी है, चरित्रवान है और धर्म के लिए पुरुषार्थ करता है। उसका वर्ण ब्राह्मण कहलायेगा चाहे वह शूद्र पिता की संतान हो। उसके विपरीत एक व्यक्ति अनपढ़ है, मांसाहारी है, चरित्रहीन है और किसी भी प्रकार से समाज हित का कोई कार्य नहीं करता, चाहे उसके पिता कितने भी प्रतिष्ठित ब्राह्मण हो, किसी भी प्रकार से ब्राह्मण कहलाने लायक नहीं है। केवल चोटी पहनना और जनेऊ धारण करने भर से कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता। इन दोनों वैदिक व्रतों से जुड़े हुए कर्म अर्थात धर्म का पालन करना अनिवार्य हैं। प्राचीन काल में धर्म रूपी आचरण एवं पुरुषार्थ के कारण ब्राह्मणों का मान था।इस लेख के माध्यम से मैंने वैदिक विचारधारा में ब्राह्मण शब्द को लेकर सभी भ्रांतियों के निराकारण का प्रयास किया हैं। ब्राह्मण शब्द की वेदों में बहुत महत्ता है।मगर इसकी महत्ता का मुख्य कारण जन्मना ब्राह्मण होना नहीं अपितु कर्मणा ब्राह्मण होना है। मध्यकाल में हमारी वैदिक वर्ण व्यवस्था बदल कर जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई। विडंबना यह है कि इस बिगाड़ को हम आज भी दोह रहे है। जातिवाद से हिन्दू समाज की एकता समाप्त हो गई। भाई भाई में द्वेष हो गया। इसी कारण से हम कमजोर हुए तो विदेशी विधर्मियों के गुलाम बने। हिन्दुओं के 1200 वर्षों के दमन का अगर कोई मुख्य कारण है तो वह जातिवाद है। वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। आईये इस जातिवाद रूपी शत्रु को को जड़ से नष्ट करने का संकल्प ले।
Wednesday, March 10, 2021
👉स्वर विज्ञान
*दक्षिणा के नियम*किसी एक ही कर्मकी दक्षिणा देनेमें— दाताके वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) भेदसे दक्षिणामें शास्त्रानुसार अंतर होता है।*#ब्राह्मण_यजमानको—*शास्त्रोक्त नियत दक्षिणा ही देनी चाहिए।*#क्षत्रिय_यजमानको—* दुगुनी दक्षिणा देनी चाहिए।*#वैश्य_यजमान—* तिनगुनी दक्षिणा देवे,और *#शूद्र_यजमान—*(जिनके यहां कुछ शास्त्रीय कर्म करनेका अधिकार है ऐसे सत्शूद्रों) को चौगुनी दक्षिणा देनी चाहिए।*यथोक्तां दक्षिणां दद्याद् ब्राह्मण: क्षत्रियस्तथा।**द्विगुणां वैश्यवर्यस्तु त्रिगुणां शूद्रसत्तम:।**चतुर्गुणां प्रयच्छेत मन्त्रसिद्धिविधीच्छया।।* (#सिद्धान्तसारसंग्रहे)इस श्लोकमें कही गई दक्षिणा साधारण यजमानोंके लिए है। यदि यजमान धनाढ्य या निर्धन है तो उनकी व्यवस्था इस प्रकार है—*धनिको द्विगुणं दद्यात् त्रिगुणन्तु महाधन:।**यवार्द्धं तु दरिद्रेण दातव्यं पुण्यलब्घये।।* *दद्यान्महादरिद्रस्तु तदर्द्ध शुल्कमेव तु।।* (#वाराहपुराण)*#धनिक_यजमान—*अपने वर्णके अनुसार नियत दक्षिणाको दुगुनी देवें।*#महाधनिक_यजमानको—*अपने वर्णके अनुसार कही गई दक्षिणाको तिगुना करके देना चाहिए।*#दरिद्र_यजमानको—*पहले वाले श्लोकमें कही गई साधारण दक्षिणाको अपने वर्णके अनुसार आधी दक्षिणा ही देनी चाहिए।*#महादरिद्र_यजमानको—* पुण्यफलकी प्राप्तिके लिए अपने वर्णके अनुसार निर्णीत दक्षिणाका चौथाई भाग ही देना चाहिए।*यदि इसप्रकार शास्त्रद्वारा कथित दक्षिणा देनेका किसीके पास धन या मन नहीं है, तो उस व्यक्तिको यज्ञादि कर्म नहीं कराना चाहिए*क्योंकि अल्प दक्षिणा देनेसे कर्मका फल प्राप्त नहीं होता, ऐसे व्यक्तियोंको भगवान्नाम संकीर्तन आदि पुण्य कार्य करना चाहिए—*पुण्यान्यन्यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रिय:।**न त्वल्पदक्षिणैर्यज्ञैर्यजन्ते ह कथञ्चन।।* (#मनुस्मृति:- 11/39)*#दक्षिणाहीन_यज्ञ_शत्रु_है*—*अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विज:।**यष्टारं दक्षिणाहीनं नास्ति यज्ञसमो रिपु:।।**#अर्थ—* यज्ञमें अन्नकी ( हवन, दान या भोजनके रूपमें) कमी होनेपर यज्ञ संपूर्ण राष्ट्रको पीड़ा देता है।मंत्रसे हीन (अशुद्धमंत्र, कम मंत्र या ठीक विधि न होने) पर यज्ञ ऋत्विजों (ब्राह्मणों) को पीडा दायक होता है। और शास्त्रके द्वारा निर्णीत दक्षिणामें कमी करनेपर यज्ञ यजमानका नाश करता है। *अतः विधिविहीन यज्ञके समान कोई प्रबल शत्रु नहीं है।* इसलिए यज्ञका संपूर्ण फल प्राप्त करनेके लिए हमें शास्त्रोक्त विधिसे ही यज्ञ करना चाहिए, अन्यथा विधिविहीन यज्ञको तामसयज्ञ कहा गया है—*विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।* *श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।* (#श्रीमद्भागवतगीता-17/13)*#अर्थ—* शास्त्रीय विधि रहित, शुद्ध हवि रहित, मंत्रहीन, श्रद्धा और उचित दक्षिणा रहित यज्ञ तामसयज्ञ कहे गए हैं।अधिक से अधिक दक्षिणा देनेसे कर्मका फल भी अधिक से अधिक प्राप्त होता है ।और अल्प से अल्प दक्षिणा देने पर कर्मका फल भी अल्प होता जाता है। इसलिए पर्याप्त दक्षिणा देनी चाहिए—*यथा यथा बहुं दद्यात्तथा तथा फलं लभेत्।**यथा यथा स्वल्पं दद्यात्तथा तथा फलं लभेत्।।*(#यज्ञमीमांसायां_स्वयंभूपुराणे)*#यज्ञाचार्यकी दूनीदक्षिणा—**सर्वत्र द्विगुणां दद्यादाचार्याय तु दक्षिणाम्।**बहुपूरुषनिष्पाद्ये उत्तमा प्रतिपूरुषम्।।* (#यज्ञमीमांसायाम्) *#दक्षिणा_तत्काल_देवें—**#अर्थ—* दक्षिणा देने में एक मुहूर्तका विलंब करने पर दक्षिणा दुगुनी हो जाती है एक रात बीतने पर 6 गुनी तीन रात बीतने पर 10 गुनी 1 सप्ताह व्यतीत होने पर 20 गुनी एक महीना बीतने पर लाख गुनी 1 वर्ष व्यतीत होने पर करोड़ गुनी दक्षिणा हो जाती है।जिसे यजमान कभी भी नहीं दे सकता।इस प्रकार यजमानके द्वारा कराया गया कर्म भी निष्फल हो जाता है।और वह यजमान दक्षिणा न देनेके पातकसे ब्रह्मस्वापहारी (ब्राह्मणका धन अपहरण करने वाला), कर्मका नाश करने वाला, अपवित्र, दरिद्र, व्याधि युक्त हो जाता है।उसके घरसे लक्ष्मीजी भी कठिन शाप देकर अन्यत्र चली जाती हैं।पितृगण भी उसके दिए हुए श्राद्ध, तर्पण आदिको ग्रहण नहीं करते।और देवगण उसकी पूजा तथा आहुति स्वीकार नहीं करते। और अंतमें वह ब्रह्मस्वापहारी कुंभीपाक नामक नरकमें जाता है—*मुहूर्ते समतीते च द्विगुणा सा भवेद् ध्रुवम्।**एकरात्रे व्यतीते तु भवेद्र सगुणा च सा।।**त्रिरात्रे वै दशगुणं सप्ताहे द्विगुणा तत:।**मासे लक्षगुणा प्रोक्ता ब्रह्मणानां च वर्द्धते।।**संवत्सरे व्यतीते तु सा त्रिकोटिगुणा भवेत्।**कर्म तद् यजमानानां सर्वं वै निष्फलं भवेत्।।**तद् गृहाद्याति लक्ष्मीश्च शापं दत्वा सुदारुणम्।**पितरो नैव गृह्णन्ति तद्दत्तं श्राद्धतर्पणम्।।**#दक्षिणा_जरूर_लेवें—**दाता ददाति नो दानं ग्रहीता तन्न याचते।**उभौ तौ नरकं यातश्छिन्नरज्जुर्यथा घट:।।**#अर्थ—* देने वाला यदि दक्षिणा न देवे और ग्रहण करने वाला यदि दक्षिणा आदि न मांगे तो - ऐसी स्थितिमें दोनों ही नर्कके अधिकारी होते हैं।जिस प्रकार रस्सी टूट जाने पर भरे हुए घटके साथ उतनी भी जल में डूब जाता है उस घटके साथ उससे बंधी हुई उतनी रस्सी भी जाती है।ऐसा नहीं है कि ये नियम अन्यों पर ही लागू होंगे, यदि कोई ब्राह्मण भी यज्ञ करवाता है तो उसे भी दक्षिणा देनेमें ये ही नियम पालन करना चाहिए
Monday, March 1, 2021
👉"हिन्दू"* शब्द की खोज -
वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या: दोषारोपण की प्रवृत्ति
प्रणाम मित्रो वर्तमान समय में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली अधिकांश समस्याओं और विकृतियों के लिए स्...
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प्रिय आत्मन् कहते हैं कि ज्ञान से सभी समस्याओं का समाधान संभव है किंतु वर्तमान में हमारे पास ज्ञान की कोई कमी नहीं है, वेद, पुराण, उपनिषद, ...
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प्रणाम मित्रों शुद्धिकरण के बारे में हम सभी को एक बात अवश्य ही समझनी चाहिए कि - " जब शरीर में अशुद्धि के कारण कोई रोग होता...
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प्रणाम मित्रों साधना, चाहे वह किसी भी मार्ग—ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग या क्रिया योग—के माध्यम से हो, एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है। इस य...