Monday, September 23, 2024

समस्याओं का समाधान .....


प्रिय आत्मन्
वर्तमान समय में लोगों ने अपने जीवन में ज्ञान को बहुत ही उपेक्षित और महत्वहीन कर रखा है । उन्हें लगता है उन्हें सब कुछ पहले से ही पता है , और वे कभी भी ज्ञानार्जन के लिए प्रयत्न नहीं करते ।


👉ध्यान दें कि अपने जीवन में आई किसी भी समस्या के  समाधान के लिए हम कितनी विधियां अपना सकते हैं ?

१- शक्ति - यदि हम शक्ति से समस्या का समाधान करते हैं तो कुछ ही समय के लिए समस्याओं से मुक्त हो सकते हैं , और कई बार तो संदेश भी रहता है कि समस्या सही हुई है या नहीं ।

२- धन - यदि हम धन से किसी भी समस्या का समाधान करते हैं तो कुछ समय अंतराल तक समस्याएं हमसे दूर रहती हैं किंतु विपरीत समय आने पर हम पर हावी हो जाती हैं ।

३- ज्ञान- यदि हम ज्ञान से किसी समस्या का समाधान करते हैं तो लगभग हमेशा के लिए समस्याएं समाप्त ही हो जाती हैं । 

४- छल- यदि हम किसी समस्या का समाधान षड्यंत्र या छल से करते हैं तो इसके विपरीत परिणाम प्राप्त होते हैं ।

यदि इन सभी को अपना कर किसी समस्या का समाधान किया जाए तो.... अपना अनुभव अवश्य लिखें ।


अपना कीमती समय निकाल कर लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏

Monday, September 16, 2024

मेरा शोध कार्य

प्रिय आत्मन् 
अभी भारत देश में लोगों को बौद्धिक रूप से पूर्ण विकसित होने में कई हजार वर्षों का समय लगेगा ! करण की वह अभी अहम् भाव , राग और द्वेष से मुक्त नहीं हुआ है , अपनी ही बनाई हुई मान्यताओं और अंधविश्वास में बंधा हुआ है , उसकी बुद्धि भौतिक लाभ और चमत्कार से ऊपर कुछ सोच ही नहीं पाती , इस कारण उसे अन्य विषयों का ना तो ज्ञान है और ना ही उनमें रुचि । यही कारण है कि कई बार मेरी कही हुई बातें लोगों की समझ में नहीं आती और फिर भी मुझसे दोबारा नहीं मिलते ।

अपना कीमती समय निकाल कर लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏

Monday, September 9, 2024

आध्यात्मिक पथ ( साधना के चार स्तर )

प्रिय आत्मन् 
समाज में लोगों की आध्यात्मिक प्रगति ना होने का महत्व पूर्ण कारण यह है कि वे अपने जीवन में केवल चमत्कारिक गुरुओं से ही प्रभावित रहते हैं । वे कभी भी ठीक ढंग से अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए कोई भी काम पूरा नहीं कर पाता जैसे -
आध्यात्म से जुड़ना- क्योंकि जीवन में सद्गुरु नहीं है ।
ईश्वर से जुड़ना - क्योंकि जीवन में कोई नियम और साधना नहीं है ।
सेवा कार्य - क्योंकि अभी भी मन में राग और द्वेष है ।
कर्तव्य पालन - स्वयं के कर्तव्य कर्मों का ज्ञान नहीं है । 
इच्छा पूर्ति - आवश्यकता, इच्छा और लक्ष्य में स्पष्ट अंतर ज्ञात न होना । और इसी तरह द्वंद में फंसकर पूरा जीवन निकला देता है । 

आध्यात्मिक साधना के चार स्तर

१ - समर्पण - अच्छी तरह जांच परख लें , और इसके बाद जिसके ऊपर पूर्ण श्रद्धा विश्वास हो उसे ही समर्पित हो ।

२ - शुद्धिकरण- बिना समर्पण के शुद्धिकरण संभव नहीं है ! प्रत्येक मार्ग में अलग-अलग स्तर की शुद्धि पर जोर दिया जाता है । यह उस विषय से संबंधित गुरु से सीख सकते हैं ।

३- ज्ञान - बिना शुद्धिकरण के ज्ञान होना संभव नहीं है, साधक के मन में कहीं ना कहीं कोई ना कोई शंका बनी ही रहती है । 

४- मुक्ति - बिना ज्ञान के मुक्त होना संभव नहीं है, और अंत में ज्ञान को भी छोड़ दिया जाता है जिससे पूर्ण मुक्त अवस्था का अनुभव होने लगता है ।

कर्तव्य पालन - बिना ज्ञान के, बिना मुक्त हुए कोई भी व्यक्ति ठीक तरह से ना तो अपना कर्तव्य पालन कर सकता है और ना ही अपना धर्म निभा सकता है ! इसलिए ईश्वर से जुड़कर अपना जीवन सफल बनाने के लिए क्रमबद्ध तरीके से साधना अनिवार्य है ।

Sunday, September 8, 2024

जीवन रहस्य भाग - ५५ ( इच्छा पूर्ति के ५ मार्ग )


प्रिय आत्मन् 
इच्छाओं के बिना जीवन संभव नहीं है , कोई भी इच्छा अच्छी या बुरी नहीं होती । उसको पूरा करने का मार्ग अवश्य ही अच्छा या बुरा हो सकता है , भौतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक यह सभी इच्छाएं हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। किंतु हमें जीवन में सही इच्छा के चुनाव का क्रम आवश्य ज्ञात होना चाहिए। यदि हम अपने गंतव्य तक पहुंचे बिना ही इच्छाहीन जीवन व्यतीत कर रहे हैं, तो इसका नुकसान यह हो सकता है कि लोग हमारे समय और धन का दुरुपयोग करेंगे ।

👉भौतिक इच्छाएं
भौतिक इच्छाएं हमारे शारीरिक और मानसिक सुख के लिए संबंधित होती हैं। ये इच्छाएं हमारे दैनिक जीवन में संतुष्टि और सुख प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए:

- धन और संपत्ति प्राप्त करना
- एक अच्छा घर और परिवार होना
- स्वस्थ और सुखी जीवन जीना
- यात्रा और नए अनुभव प्राप्त करना
- एक अच्छी नौकरी या व्यवसाय होना

भौतिक इच्छाएं हमारे जीवन को सुखी और संतुष्ट बनाने में मदद करती हैं, लेकिन ये इच्छाएं हमेशा स्थायी नहीं होती हैं और समय के साथ बदलती रहती हैं।

👉धार्मिक इच्छाएं
धार्मिक इच्छाएं हमारे आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों से संबंधित होती हैं। ये इच्छाएं हमें अपने धर्म और समाज के प्रति जिम्मेदार और समर्पित बनाने में मदद करती हैं। उदाहरण के लिए:

- अपने धर्म के अनुसार जीवन जीना
- दान और सेवा करना
- अपने समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना
- अपने धर्म के प्रति समर्पित और जिम्मेदार होना
- अपने जीवन में नैतिकता और सदाचार को बढ़ावा देना

धार्मिक इच्छाएं हमें अपने जीवन में अर्थ और उद्देश्य प्रदान करती हैं और हमें अपने समाज और धर्म के प्रति जिम्मेदार बनाने में मदद करती हैं।

👉आध्यात्मिक इच्छाएं
आध्यात्मिक इच्छाएं हमारे आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षरता से संबंधित होती हैं। ये इच्छाएं हमें अपने जीवन में अर्थ और उद्देश्य प्रदान करती हैं और हमें अपने आत्मा के साथ जुड़ने में मदद करती हैं। उदाहरण के लिए:

- आत्म-ज्ञान प्राप्त करना
- अपने जीवन में अर्थ और उद्देश्य प्राप्त करना
- अपने आत्मा के साथ जुड़ना
- शांति और आनंद प्राप्त करना
- अपने जीवन में आध्यात्मिक विकास करना

आध्यात्मिक इच्छाएं हमें अपने जीवन में अर्थ और उद्देश्य प्रदान करती हैं और हमें अपने आत्मा के साथ जुड़ने में मदद करती हैं। ये इच्छाएं हमें अपने जीवन में शांति और आनंद प्राप्त करने में मदद करती हैं।

अपनी इच्छा पूर्ति के लोग अक्सर यह ५ मार्ग अपनाते हैं-:

१- कृपा - कृपा का आधार प्रेम है, जो हमसे प्रेम करता है वह हम पर कृपा करने में जरा भी संकोच नहीं करेगा । जब हम उसकी भक्ति करते हैं , तो वह हमें मनोवांछित फल देने की कृपा करता है । ध्यान दें कि इस मार्ग का अनुसरण करने से हमारी हमेशा उन्नति ही होगी ।

२- परिश्रम - परिश्रम का आधार है स्वयं पर विश्वास , जब हम पर किसी की कृपा नहीं होती , तब हम अपनी इच्छा पूर्ति परिश्रम करके पूरी करते हैं । इस मार्ग का अनुसरण करने से ना ही उत्थान होता है और ना ही पतन । हम जहां हैं वहीं रहेंगे 

३- जुगाड़ - जब स्वयं में योग्यता ना हो तब लोग इस मार्ग का अनुसरण करते हैं । हो सकता है कि इस मार्ग का अनुसरण करने पर कुछ समय के लिए आपके अनुकूल परिस्थितियों हो जाएं किंतु इस मार्ग में स्थायित्व नहीं है । आपकी स्थिति कभी भी विपरीत हो सकती है ।

४- छल - जब स्वयं में योग्यता ना हो तब लोग इस मार्ग का अनुसरण करते हैं । छल का आधार है अतृप्त इच्छाएं, जब हम पर किसी की कृपा ना हो और हम परिश्रम करने को भी तैयार ना हो , तब हम अपनी इच्छा पूर्ति छल से पूरी करते हैं । ध्यान दें कि इस मार्ग का अनुसरण करने से हमारा पतन होगा ।

५- बल द्वारा - इसका आधार अनियंत्रित इच्छाएं होने के साथ-साथ अनियंत्रित शक्ति होना है । इससे समाज का शोषण होने के साथ-साथ स्वयं का पतन भी होता है ।

Q- किसी की कृपा कैसे प्राप्त हो ? 
यह कार्य बड़ा ही मुश्किल है , किसी की कृपा प्राप्त करने के लिए उसे जुड़ना अनिवार्य है और जुड़ने के लिए उससे प्रेम और उसके प्रति समर्पण अनिवार्य है , इसके पश्चात उसके आयाम के नियमों का अनुसरण करना अनिवार्य है , तब जाकर वे आप से जुड़ते हैं और अपनी कृपा बरसाते हैं । अब यह हम पर निर्भर करता है कि अपने जीवन में हमें क्या चाहिए और हम किससे जुड़ना चाहते हैं । जीवन के जिस उम्र में यह सूत्र समझ में आ जाए उसके बाद ही वास्तविक उन्नति संभव होगी ।

चाहे भौतिक जगत हो या आध्यात्मिक जगत, हर जगह यही नियम लागू होते हैं । 




👉कुछ लोग अपने इगो ( अहम् ) के कारण समर्पण भाव नहीं रखते इसलिए उनकी उन्नति नहीं होती ।


जीवन रहस्य भाग - ५४ ( सबके लिए एक नियम नहीं है )

प्रिय आत्मन 
अक्सर आप लोग जब भी हमसे मिलते तब हमसे नियमों के बारे में अधिक सुनते हो ,और कभी-कभी यह भी संभावना रहती है कि आप सब हमारे क्रियाकलापों को देखकर संशय में पड़ जाते हैं कि ये नियमों की इतनी बातें करते हैं और स्वयं नियमों का पालन नहीं करते । तो आप सबको  नियमों का महत्व आसानी से समझाने के लिए इनका वर्गीकरण किया गया है आशा करता हूं कि आप इसे अवश्य समझेंगे । स्वयं मनन करें कि अभी हम किस चरण में हैं  ?

पहला चरण:- इस चरण में साधक किसी गुरु के मार्गदर्शन में नहीं होता, इसलिए नियम बहुत सख्त होते हैं। यहाँ वैदिक कर्मकांड (जैसे पूजा-पाठ, अनुष्ठान) और संतुलित दिनचर्या (जैसे समय पर उठना, खान-पान, ध्यान आदि) का कठोरता से पालन करना होता है। कोई लचीलापन नहीं होता, क्योंकि यह चरण अनुशासन की नींव रखता है।
उदाहरण:- यह ऐसा है जैसे स्कूल के शुरुआती दिनों में बच्चे को सख्त नियमों से पढ़ाई और व्यवहार सिखाया जाता है।

दूसरा चरण:- इस चरण में साधक को गुरु मिल जाता है, जो उसे अनुकूल मार्गदर्शन देता है। गुरु के बताए नियमों का पालन अनिवार्य होता है। वैदिक कर्मकांड के नियमों में कुछ ढील मिल सकती है, लेकिन संतुलित दिनचर्या (जैसे नियमित साधना, स्वस्थ जीवनशैली) का पालन अभी भी सख्ती से करना होता है।
उदाहरण:- यह कॉलेज के समय जैसा है, जहाँ शिक्षक के मार्गदर्शन में पढ़ाई होती है, लेकिन कुछ स्वतंत्रता भी मिलती है।

तृतीय चरण:- इस चरण में साधक का अंतःकरण गुरु मंत्र और साधना से शुद्ध हो चुका होता है। अब केवल प्रकृति के नियमों (जैसे सात्विक जीवन, पर्यावरण के साथ संतुलन) का पालन करना होता है। यहाँ साधक स्वयं इतना जागरूक हो जाता है कि उसे बाहरी नियमों की सख्ती की जरूरत नहीं रहती।
उदाहरण:- यह एक परिपक्व व्यक्ति की तरह है, जो स्वयं सही-गलत का निर्णय ले सकता है और प्राकृतिक रूप से संतुलित जीवन जीता है।

स्वयं मनन करने के लिए हमें आत्म-निरीक्षण करना होगा :- 
१- क्या हम अभी भी सख्त अनुशासन और वैदिक कर्मकांडों का पालन कर रहे हैं? (पहला चरण)
२- क्या हमें गुरु का मार्गदर्शन मिल चुका है और हम उनकी शिक्षाओं का पालन कर रहे हैं? (दूसरा चरण)या 
३- क्या हमारा अंतःकरण इतना शुद्ध हो चुका है कि हम स्वाभाविक रूप से प्राकृतिक नियमों के साथ जी रहे हैं? (तृतीय चरण)

निष्कर्ष: यह वर्गीकरण हमें यह समझने में मदद करता है कि नियम हमारी आध्यात्मिक प्रगति के लिए एक सीढ़ी की तरह हैं। हर चरण में नियमों का उद्देश्य हमें अनुशासित और जागरूक बनाना है, ताकि हम अंततः स्वयं के भीतर संतुलन और शुद्धता प्राप्त कर सकें। यदि आप चाहें, तो मैं आपके साथ मिलकर यह विश्लेषण कर सकता हूँ कि आप व्यक्तिगत रूप से किस चरण में हैं। कृपया बताएँ कि क्या आप इसके लिए और मार्गदर्शन चाहेंगे !

यदि आपके अपने जीवन से संबंधित कोई अनसुलझे प्रश्न हों तो हमें लिए व्हाट्सएप करें - 
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अपना कीमती समय निकालकर लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏


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