प्रणाम मित्रो
वर्तमान समय में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली अधिकांश समस्याओं और विकृतियों के लिए स्वयं को उत्तरदायी नहीं मानता। यदि उसके जीवन में असफलता आती है, संबंध टूटते हैं, मानसिक अशांति होती है या चरित्र में विकृति आती है, तो वह सबसे पहले किसी दूसरे व्यक्ति, परिवार, समाज या परिस्थितियों को दोष देता है। वह यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता कि उसके अपने निर्णय और कर्म भी उसके जीवन को प्रभावित करते हैं।
आज का युग सोशल मीडिया का युग है। सोशल मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह लोगों की सोच, इच्छाओं और जीवनशैली को भी प्रभावित करता है। मनुष्य जिस प्रकार के दृश्य, विचार और व्यवहार को बार-बार देखता है, धीरे-धीरे उसी को सामान्य मानने लगता है। फिर वह अनजाने में उसका अनुकरण भी करने लगता है।
यहीं से एक अंधी दौड़ प्रारंभ होती है। यह दौड़ ज्ञान, चरित्र या आत्मविकास की नहीं, बल्कि इच्छाओं की पूर्ति की दौड़ बन जाती है। व्यक्ति यह नहीं सोचता कि उसकी इच्छा उचित है या अनुचित, समाज और परिवार के लिए हितकारी है या अहितकारी। उसके लिए केवल अपनी इच्छा सर्वोपरि हो जाती है।
यही वह बिंदु है जहाँ से मानव जीवन की अनेक विकृतियाँ जन्म लेती हैं। जब इच्छाएँ विवेक और मर्यादा से बड़ी हो जाती हैं, तब आत्मसंयम समाप्त होने लगता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने कर्तव्यों को भूलकर केवल अधिकारों की बात करता है, अपनी गलतियों का दोष दूसरों पर डालता है और समाज में असंतुलन बढ़ने लगता है।
इसलिए समाधान दूसरों को दोष देने में नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण में है। जब प्रत्येक व्यक्ति यह स्वीकार करेगा कि "मेरे जीवन के निर्माण में मेरे विचार, मेरे निर्णय और मेरे कर्म की भी महत्वपूर्ण भूमिका है," तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।
याद रखें—
> "इच्छाओं का दास बनने से विकृतियाँ जन्म लेती हैं,
विवेक और मर्यादा का पालन करने से व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
समाज तभी सुधरेगा, जब प्रत्येक व्यक्ति दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलने का साहस करेगा।"
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