Monday, October 21, 2024

उपासना

मन्त्र जप :- मन्त्र के निरन्तर जप को साधना कहते है, मंत्र जप तीन प्रकार के बताए गए हैं।

मंत्र जप कितने प्रकार के होते हैं ?

मुख्य रूप से निम्नलिखित तरीके से मंत्र योग साधन किये जाते हैं –

  1. नित्य :- प्रातः काल एवं सायं काल में किसी गुरू द्वारा उपदिष्ट मन्त्र का जप नित्य प्रति करना।
  2. नैमित्त :- किसी विशेष आध्यात्मिक मुहूर्त एवं पूजा के अवसर पर इस जप को किया जाता है।
  3. काम्य :- मन में किसी विशेष इच्छा की पूर्ति के लिए मन्त्र विशेष का जप करना।
  4. निषिद्ध :- किसी अनधिकारी गुरु से सीखा मन्त्र या मिश्रित मन्त्र अथवा गलत ढंग से उच्चरित मन्त्र निषिद्ध कहलाते हैं।
  5. प्रायश्चित जप :- किसी किये हुए कार्य के प्रायश्चित के निमित्त जप किये जाते हैं उन्हें प्रायश्चित जप कहते हैं।
  6. अचल :- स्थिरता पूर्वक बैठक कर जो जप किया जाता है उसे अचल जप कहते हैं।
  7. चल :- कभी-कभी चलते-चलते या खड़े होकर अथवा किसी कार्य को करते समय भी जो जप चलते रहते हैं, उसे ‘‘चल जप’’ कहते हैं।
  8. वाचिका :- जिस जप को बार-बार उच्च ध्वनि में किया जाता है उसे वाचिका-जप कहते हैं।
  9. उपांशु :- होठों में बुदबुदा कर जिस मन्त्र का जप किया जाता है उसे उपांशु कहते हैं।
  10. मनस्त :- इस जप में वाणी से नहीं बोला जाता, बल्कि सिर्फ मन में वैचारिक धरातल पर जप चलता रहता है।
  11. अखण्ड जप :- अखण्ड जप की साधना कई घण्टों तक अबाध गति से चलती रहती है।
  12. अजपा :- मन्त्र के अर्थ को मन में धारण करते हुए उसमें लय हो जाना अजपा जप कहलाता है।
  13. प्रदक्षिणा :- किसी पवित्र स्थान विशेष के चारों ओर घूमते हुए जो जप किया जाता है, इसे प्रदक्षिणा जप कहते हैं।

गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
त्व्यापि गापित्वयं हि न देयं यस्य कस्यचित्॥

आसन :

साधना में आसन का महत्वपूर्ण स्थान है। आसन दो तरह का निर्देश दर्शाता है, एक बैठने के स्थान और दूसरा बैठने के प्रकार को। वर्तमान युग में समतल भूमि पर पशु चर्म बिछा कर उस पर पद्मासन या इससे मिलते-जुलते आसन में घण्टों तक बैठना हर किसी के बस की बात नहीं है, क्योंकि लोग कुर्सी पर बैठने के आदी हैं।

आसन का तात्पर्य किसी भी बैठने की मुद्रा से है, जिसमें पैरों को असुविधा न हो, रीढ़ की हड्डी सीधी रहे, शरीर के अन्दर के अंगों पर ज्यादा दबाव न पड़े, मन एकाग्र रहे। मन स्थिर रहना ही साधना है। गलत आसन में बैठकर मन एकाग्र नहीं रह पता। बैठने के आसन में ऊनी आसन का प्रयोग करें तो सर्वश्रेष्ठ है।

शिव गीता अनुसार :

  • ऊनी आसन पर बैठकर जप करने से समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है।
  • व्याग्रचर्म के आसन पर बैठकर जप करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • काले चर्म के आसन पर बैठकर जप करने से मुक्ति होती है।
  • कुशा के आसन पर बैठकर जप करने से ज्ञान की प्राप्ति होता है।
  • पत्तों के आसन पर बैठकर जप करने से दीर्घायु प्राप्त होती है।
  • पत्थर के आसन पर बैठकर जप करने से दुःख प्राप्त होता है।
  • काष्ठ के आसन पर बैठकर जप करने से रोग प्राप्त होता है।
  • तृणासन के आसन पर बैठकर जप करने से यश, मान, लक्ष्मी की हानि होती है।
  • बांस के आसन पर बैठकर जप करने से दरिद्रता प्राप्त होती है।
  • भूमि के ऊपर बैठकर जप करने से कोई मनोरथ पूरा नहीं होता, उससे किसी भी साधना में सफलता नहीं मिलती।

“वस्त्रासने तु दरिद्रयं पाषाणे व्याधिपीडनम्”

किसी भी मंत्र का जाप करने से पहले मंत्र विधान के निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए, फिर आप तुरंत परिणाम देख सकते हैं।

मंत्र विधान: मुहूर्त, दिशा, लकड़ी की चौकी, आसन, माला की व्यवस्था मंत्र साधना के प्रकार के अनुसार की जानी चाहिए।

1) पवित्रीकरण: पवित्रीकरण के लिए बायीं हथेली पर जल लेकर उसे दाहिनी हथेली से ढक लें और निम्न मंत्र का जाप करें। तत्पश्चात जल को अपने पूरे शरीर पर छिड़कें।

ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतो स पिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: आकर्षक अभ्यन्तर: शुचि॥   

2) कुल्ला करना: आंतरिक पवित्रता के लिए एक बर्तन में पानी लें और चम्मच की मदद से हर मंत्र के बाद तीन बार पानी पिएं। ऐसा करने से आपका मन, वाणी और कर्म शुद्ध हो जाएंगे।

ॐ अमृतोपस्त्रनामसि स्वाहा।
ॐ अमृतलाविधानमसि स्वाहा।
ॐ सत्यं यश: श्रीमन्यि श्री: श्रेयतां स्वाहा।
ॐ नारायणाय नम: ” बोल कर हाथ धो ले।

3) प्राणायाम: धीरे-धीरे सांस अंदर लें और कुछ देर तक अंदर ही रोके रखें तथा धीरे-धीरे सांस बाहर छोड़ें। इस प्रक्रिया को प्राणायाम कहते हैं। निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करने के बाद सांस अंदर लेते समय आपको यह महसूस करना चाहिए कि सांस अंदर लेने से आपको शक्ति और इंद्रियां मिल रही हैं और सांस बाहर छोड़ते समय यह महसूस करना चाहिए कि हवा के साथ सारे पाप और बुरी आदतें बाहर जा रही हैं।

ॐ भू: ॐ भुव: ॐ स्व: ॐ मह:।
ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्यम्।
ॐ तत्सवितुर्रेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
ॐ अपोज्योतिर्सोअमृतं बह्मभूर्भुव स्व: ॐ।

4) शारीरिक प्रतिज्ञा: बाएं हाथ की हथेली पर जल लें और दाएं हाथ की पांचों अंगुलियों को जोड़कर जल में डालें और शरीर के विभिन्न अंगों को स्पर्श करें और महसूस करें कि आपके शरीर के सभी अंग पवित्र और स्वादिष्ट हो रहे हैं। इससे शरीर के अंगों में शक्ति आएगी और वे समझदार बनेंगे।

ॐ वधार्गमे अस्येऽस्तु (मुख को स्पर्श करें) ॐ नासोऽर्मे प्राणोऽस्तु (नासिका के दोनों छिद्रों को स्पर्श करें) ॐ अक्षनोर्मे चक्षुरस्तु (मोक्ष को स्पर्श करें) ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु (मुख को स्पर्श करें) ॐ बह्वोर्मे बलमस्तु (नासिका के दोनों छिद्रों को स्पर्श करें) स्पर्श करें) ॐ उवोर्मे ओजोऽस्तु (शरीर के सभी अंगों को स्पर्श करें) ॐ अरिष्टानि अङ्गानि सन्तु (शरीर के सभी अंगों को स्पर्श करें)
 
 

 
  

5) आसन की पूजा: किसी भी मंत्र का जाप करने से पहले आसन की पूजा करना आवश्यक है। इसके लिए निम्न मंत्र का जाप करें तथा आसन के नीचे त्रिकोण बनाकर उस पर चावल, फूल तथा थोड़ा जल डालकर पृथ्वी से प्रार्थना करें ताकि पृथ्वी का दोष दूर हो जाए।

ॐ ह्रीं क्लीं शक्ति शक्ति कमलासनाय नम:। ॐ पृथ्वी! त्वया घृतलोका देवी! त्वं विष्णुना घृत त्वं च धारय मां देवी! पवित्रं कुरु चासनम्। ॐ आधार शक्तये नमः ॐ कूर्मासनाय नमः ॐ अनंतसनाय नमः ॐ विमलासनाय नमः ॐ आत्मासनाय नमः।                 

6) दिशा-संकेत: निम्न मंत्र का जाप करते हुए सभी दिशाओं में जल और चावल छिड़कें और फिर एड़ी से तीन बार धरती पर वार करें। इससे नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाएगी और सिद्धि में कोई बाधा नहीं आएगी।

ॐ अपसर्पन्तु ते भूत: ये भूत: भूमि संस्थिता:। ये भूतः विघ्नकर्तारस्ते नाशयन्तु शिवाज्ञयः। अप्क्रमन्तु भूतानि पिशाचम्: सर्वतो दिशम्। सर्वेषामविरोधेन पूजा कर्म समारभे ॥
       
   

7) संकल्प: इसका अर्थ है कि बिना लक्ष्य के कोई भी व्यक्ति लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता, इसलिए जप से पहले संकल्प अवश्य लेना चाहिए। अपनी दाहिनी हथेली पर जल, एक सिक्का, चावल और संकल्प लें। साधना में पहले दिन संकल्प लें। आप पहले दिन ही पूरी अवधि के लिए संकल्प कर सकते हैं और हथेली का जल ज़मीन पर गिरा सकते हैं। - मंत्र विधान। 



Sunday, October 20, 2024

मेरा पतन

प्रिय आत्मन् 
एक व्यक्तिक विशेषकर एक परिवार के प्रमुख के जीवन में आने वाली उन गंभीर चुनौतियों को बखूबी बयां करता है जो धीरे-धीरे उसे एक गहरे खाई में धकेल सकती हैं।
आइए इन बिंदुओं को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं:
 * परिवार की मान-प्रतिष्ठा पर ग्रहण: यह पहला संकेत है कि कुछ गड़बड़ है। यह आर्थिक संकट, सामाजिक बहिष्कार, या किसी व्यक्तिगत गलती के कारण हो सकता है।
 * कुटुंबियों से दूरी: जब परिवार का आधार कमजोर पड़ने लगता है, तो व्यक्ति अकेला महसूस करने लगता है। यह अक्सर आर्थिक तंगी या पारिवारिक कलह के कारण होता है।
 * अपूर्ण इच्छाओं के साथ जीवन: जब व्यक्ति अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाता, तो निराशा और हताशा का भाव पैदा होता है।
 * कर्ज का बोझ: कर्ज न केवल आर्थिक बोझ होता है बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ाता है। यह व्यक्ति को लगातार चिंता और डर में रखता है।
 * अकेलापन और असहायता: जब व्यक्ति को लगता है कि उसके पास कोई नहीं है, तो वह बहुत कमजोर महसूस करता है। यह अक्सर आत्महत्या जैसे गंभीर विचारों को जन्म दे सकता है।
इन समस्याओं के पीछे कई कारण हो सकते हैं:
 * आर्थिक संकट: बेरोजगारी, कम आय, अचानक खर्च, आदि।
 * सामाजिक दबाव: समाज की अपेक्षाएं, तुलना, आदि।
 * व्यक्तिगत कमजोरियां: निर्णय लेने में गलतियाँ, लतें, आदि।
 * मनोवैज्ञानिक समस्याएं: अवसाद, चिंता, आदि।
इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए क्या किया जा सकता है?
 * समस्या को स्वीकार करें: पहले यह स्वीकार करना जरूरी है कि समस्या है।
 * सहायता लें: परिवार, दोस्तों, या किसी पेशेवर से मदद लें।
 * बजट बनाएं: अगर आर्थिक समस्या है, तो बजट बनाकर खर्चों पर नियंत्रण करें।
 * नई कौशल सीखें: अपनी आय बढ़ाने के लिए नई कौशल सीखें।
 * सकारात्मक सोच रखें: खुद पर विश्वास रखें और सकारात्मक सोचें।
 * मनोवैज्ञानिक सहायता लें: अगर अवसाद या चिंता जैसी समस्या है, तो मनोवैज्ञानिक से सहायता लें।
याद रखें: आप अकेले नहीं हैं। इस तरह की समस्याओं से कई लोग गुजरते हैं। लेकिन सही दृष्टिकोण और प्रयास से आप इस स्थिति से बाहर निकल सकते हैं।
अगर आपको लगता है कि आप आत्महत्या के बारे में सोच रहे हैं, तो कृपया किसी भी हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें।
यह लेख सिर्फ सूचना के उद्देश्य से है और किसी भी तरह से चिकित्सकीय सलाह नहीं है। किसी भी गंभीर समस्या के लिए कृपया किसी पेशेवर से संपर्क करें।
क्या आप इस विषय पर और अधिक जानना चाहते हैं?

पतन का क्रम 
१- पूरे परिवार की ,‌मान, प्रतिष्ठा ,पद, ऐश्वर्या पर ग्रहण लगना ।
२- अपने कुटुंबियों और उनसे मिलने वाली सहायता का न मिलाना ।
३- अपने एकल परिवार के साथ अपूर्ण इच्छाओं सहित जीवन जीना ।
४- अपने एकल परिवार पर लगातार कर्ज की स्थिति का बढ़ना और अपनी छोटी-छोटी जरूरत को पूरा करने में भी समस्याओं का आना । 
५- अकेले रहना एवं मुसीबत में सहायता के लिए कोई कोई ना देखना 
६- कर्ज युक्त जीवन अपूर्ण इच्छाएं एवं मन में आत्महत्या के विचार आना 

अपना कीमती समय निकाल कर लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏

Tuesday, October 15, 2024

vastu nots

लाल किताब के द्वारा आप अपने घर के वास्तु को भी जान सकते हैं। इस लेख में लाल किताब की कुंडली के हर भाव से घर के वास्तु पर प्रकाश डाला गया है।

लाल किताब में वास्तु शब्द की व्याखया तो प्राप्त नहीं होती है लेकिन वास्तु संबंधी सूत्र - उपाय अवश्य मिलते हैं। लाल किताब द्वारा मकान की कुंडली बनाई जा सकती है। दिशाओं के अनुसार मकान की प्रत्येक वस्तु को ग्रहों में बांटा गया है।


मुखय द्वार (रोशनी), सूर्य, अंधेरा स्थान-शनि, जल स्थान - चंद्रमा, रसोई (अग्नि) मंगल, पूजा घर - बृहस्पति, शौचालय - राहु, कच्ची जमीन - शुक्र, जीना (सीढ़ियां) बुध ग्रह के संबंध है।


पहला भाव : जन्म कुंडली के पहले भाव का संबंध ड्राइंगरूम (बैठक) से होता है। जहां पर बैठकर हम अन्य व्यक्तियों से बातचीत करते हैं। यदि पहले घर में मंदे ग्रहों का प्रभाव हो तो ऐसे व्यक्ति की बैठक में अवश्य ही वास्तु दोष होता है।

दूसरा भाव : जन्म कुंडली के दूसरे भाव से मकान के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। मकान कैसा होगा, उसका आकार-प्रकार एवं विस्तार छोटा होगा या बड़ा, इसका विचार कुंडली के दूसरे भाव से किया जाता है। दूसरे भाव में किसी भी प्रकार के ग्रह दोषों के कारण गृह वास्तु में आकार संबंधी दोष एवं कष्ट उत्पन्न होते हैं।

तीसरा भाव : जन्मकुंडली के तीसरे भाव का संबंध मकान में उपलब्ध सुख-सुविधाओं की वस्तुओं एवं साधनों से होता है। यदि तीसरे भाव में शुभ ग्रह बली स्थिति में हो, तो ऐसे व्यक्ति के पास सुख-ऐश्वर्य के साधन बहुत सुलभ होते हैं। तीसरे भाव का संबंध घर में रखे हुए हथियारों से भी है। यदि घर में टूटे हुए हथियार रखें, तो ऐसे व्यक्ति को तीसरे घर में बैठे शुभ ग्रहों का नेक फल नहीं मिलता है। उसकी सुख-सुविधा के साधनों में कमी आ जाती है। छोटे भाई-बहिनों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

चौथा भाव : जन्मकुंडली के चौथे भाव से घर में नल, कुआं, जल का स्रोत, पानी रखने की जगह का विचार किया जाता है। घर में रस भरे फलदार वृक्षें का विचार भी चौथे भाव से किया जाता है। यदि चौथे भाव में पाप ग्रह अशुभ प्रभाव उत्पन्न कर रहे हों, तो ऐसे घरों में रस वाले फल के पौधे नहीं लगाने चाहिए। ऐसे व्यक्ति को पानी, दूध और कपड़े के व्यवसाय में हानि होती है।

पांचवा भाव : जन्मकुंडली में पांचवे भाव का संबंध मकान की पूर्वी दीवार से होता है। उसके साथ बुद्धि, विद्या प्राप्त करने एवं ग्रंथों का अध्ययन करने के स्थान का विचार भी पंचम भाव से किया जाताहै। पंचम भाव की अशुभ स्थिति एवं अशुभ ग्रहों से घर में अध्ययन करने के स्थान में अवश्य ही वास्तु दोष होता है, साथ ही घर में बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता है तथा विद्या के मार्ग में बाधाएं आती हैं।

छठा भाव : जन्मकुंडली में छठे भाव का संबंध मकान में बने तहखाने से होता है। छठे भाव में पाप ग्रहों का प्रभाव होने पर घर में तहखाना नहीं होना चाहिए, अन्यथा व्यक्ति निरंतर अवनति की ओर जाता है।

सातवां भाव : जन्मकुंडली में सातवां भाव उस स्थान को प्रदर्शित करता है, जहां पर व्यक्ति का जन्म होता है। जन्म स्थान के शहर या गांव के बारे में भी कुंडली का सातवां भाव बताता है। घर में गूदेदार फल वाले वृक्षों का विचार भी कुंडली के सातवें भाव से किया जाता है।

आठवां भाव : जन्मकुंडली के आठवें भाव से मकान की दक्षिणी दीवार की स्थिति का पता चलता है। मकान के आसपास का वातावरण एवं दवाईयां रखने के स्थान का पता भी इसी भाव से लगाया जाता है। मकान में अग्नि का स्थान व मकान की छत का विचार भी इसी भाव से किया जाता है। ऐसे पौधों एवं वृक्षों जिनमें न फल लगते हों, न फूल लगते हों उनका विचार आठवें भाव से किया जाता है। आठवें भाव में यदि मंदे या अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो ऐसे मकान के आसपास के वातावरण, छत आदि में अवश्य ही कोई न कोई वास्तु दोष है।

नौवां भाव : जन्मकुंडली के नौवें भाव से मकान में पूजा-पाठ के स्थान यानी मकान में मंदिर के बारे में विचार किया जाता है। मकान में बुजुर्ग व्यक्तियों का कमरा कैसा होगा, इस बारे में भी नौवें भाव से ही विचार किया जाता है। नौवां भाव में किसी भी प्रकार के अशुभ ग्रहों का दोष या नौवां भाव की अशुभ स्थिति होने पर मकान कें मंदिर में अवश्य ही कोई न कोई वास्तु दोष होता है।

दशम भाव : जन्मकुंडली के दसवें भाव का संबंध मकान की पश्चिम दिशा से होता है। मकान बनाने में लगे ईंट-पत्थर एवं लकड़ी-लौहे का विचार भी इसी भाव से किया जाता है।

ग्यारहवां : जन्मकुंडली के ग्यारहवें भाव से मकान की बाहरी सजावट और सुंदरता का विचार किया जाता है। यदि ग्यारहवें भाव में शुभ ग्रह स्थित हों, तो ऐसे व्यक्ति का मकान बाहर से देखने में अच्छा लगता है।

बारहवां भाव : जन्मकुंडली के बारहवें भाव से मकान में शयनकक्ष का विचार किया जाता है। पति-पत्नी के शयनकक्ष (बैड-रूम) में संबंध कैसे रहेंगे, व्यक्ति को नींद का सुख कैसा मिलेगा, आदि का विचार बारहवें भाव से ही होता है। बारहवें भाव से आस-पड़ोस के मकानों के संदर्भ में भी विचार किया जाता है। बारहवें भाव में अशुभ ग्रहों के स्थित होने पर पति-पत्नी के बीच में अनबन रहती है तथा व्यक्ति को नींद ठीक से नहीं आती ।

Monday, October 14, 2024

👉प्रश्न कर्ता और उसकी श्रेणियां

            "Ishwa spiritual motivation"
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प्रिय आत्मन्
जैसा कि आप सभी जानते हैं , मानव जीवन को सुखमय बनाने के लिए समाज में बहुत से विकल्प है ! जैसे-  कुछ लोग चमत्कारिक सिद्ध गुरुओं में विश्वास रखते हैं तो कुछ लोग तंत्र मंत्र और टोने- टोटके में विश्वास रखते हैं ! कुछ लोग ज्योतिष वास्तु जैसी विद्या में विश्वास रखते हैं तो वहीं कुछ लोग तामसिक विद्या आदि में विश्वास रखते हैं ! जिसको जैसी सुविधा वैसा मार्ग अपनाना चाहिए । आपको अपने अनुकूल विषयों से जुड़ना ही लिए श्रेष्ठ मार्ग है ।

१- हमारे मन में प्रश्न क्यों आते हैं ?
जीवन में भ्रम और अज्ञान अधिक होने के कारण प्रश्न आना स्भाविक है , यदि हमें अपने प्रश्नों के सही उत्तर नहीं मिलते तो हम जीवन भर 
ऐसे ही भटकते रहेंगे अतः सही समय आने पर सही व्यक्ति से अपने प्रश्न अवश्य करें ।

२- प्रश्न करने का अधिकारी कौन ?
जो व्यक्ति प्रश्न का कारण और उद्देश्य स्पष्ट कर सके एवं स्वयं को प्रमाणों के आधार पर व्यक्त कर सके उसे ही प्रश्न पूछने का अधिकार है । 

३- प्रश्न की परिभाषा क्या है ?
अपने मूल स्वभाव से उठने वाली प्रत्येक जिज्ञासा अर्थात अर्थपूर्ण विषयों के बारे में जानने की इच्छा को प्रश्न कहते हैं । बिना सच्ची जिज्ञासा के प्रश्न करना पाखंड कहा गया है ।

४- हमें प्रश्न क्यों करना चाहिए ?
हमारे प्रश्नों का सीधा संबंध हमारी प्रगति से है । जैसे हमारे प्रश्न होंगे वैसे ही हमारी प्रगति होगी । प्रश्न किसी के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, यह हमको अपनी ताकत और कमजोरियों के बारे में जानने में सक्षम बनाते है। हमारे जीवन में प्रगति प्रश्नों के कारण ही होती है । प्रश्न हमारी उपस्थिति का एहसास कराते हैं। जब हम आस पास कुछ देखते हैं तो प्रश्न करते हैं । यह सीखने का सबसे अच्छा तरीका हैं  ! प्रश्न जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं। जिज्ञासा के बाद कार्य करने से उत्तर मिलता है । और इस पूरी प्रक्रिया को सीखना कहा जाता है। 

५- प्रश्न कितने प्रकार के होते हैं ?
किसी भी विषय की पूर्ण जानकारी के लिए जब हम ७ प्रकार से प्रश्न करते हैं  तब जाकर हम उसे विषय के मूल तत्व तक पहुंचते हैं । और हमें तब उस विषय की समग्रता का अनुभव होता है । प्रश्नों के प्रकार इस प्रकार है -
१- क्या - परिभाषा 
२- क्यों - कारण
३- कैसे - प्रक्रिया 
४- कब - समय 
५- कहां - स्थान 
६- कौन - व्यक्ति 
७- कितना - मात्रा
परिणाम - लाभ और हानि जो प्रत्यक्ष अनुभव हों ।

👉प्रश्न पूछने के लिए आवश्यक निर्देश -
समय बहुत कीमती है अतः इसे बिल्कुल भी व्यर्थ ना गंवायें ।किसी भी प्रकार का प्रश्न पूछने से पहले हमें प्रश्न का कारण और उद्देश्य अवश्य स्पष्ट रूप से ज्ञात होना चाहिए 

👉 इसके आगे स्वयं अपना मूल्यांकन करें और देखें कि आपके प्रश्न किस श्रेणी के हैं  ? और आप में स्वयं के विकास की कितनी संभावना है ।

👉६ - प्रश्न कर्ता और उनके प्रश्नों के उद्देश्य-

कौन मनुष्य रूप में जीवन के किस तल पर जी रहा है यह उसके प्रश्नों से स्पष्ट हो जाता है। 

गुरु - गुरु के प्रश्न करने का केवल एक ही उद्देश्य है आपकी प्रगति ।

जिज्ञासु साधक - जिज्ञासु के प्रश्न करने का उद्देश्य है कि वह सब कुछ जानना चाहता है ।

आम इंसान - दिमाग की खुजली शांत करने के लिए । जिसका उसकी प्रगति से कोई संबंध नहीं रहता ।

सामाजिक लोग - ये लोग आपके ज्ञान का स्तर जांच ,परख कर आपको नीचा दिखाने के लिए फिजूल के प्रश्न पूछते हैं।

मार्ग से भटक जाने पर भी कई लोग प्रश्न पूंछते है ।

७- प्रश्न कैसे और किससे पूंछना चाहिए ?
जब भी हमारे मन में कोई प्रश्न शंका या जिज्ञासा प्रकट हो तो हमें इसके निवारण के लिए अपने गुरु के पास ही जाना चाहिए  ( गुरु अर्थात जो अपने शिष्यों को बिना भौतिक लाभ के सही मार्गदर्शन देता हो, सर्व समर्थ तत्वदर्शी हो ) जिनके भी गुरु नहीं है उन सभी के लिए हमारा यही संदेश है कि समय रहते किसी तत्वदर्शी योग्य समर्थ गुरु की शरण में जाएं । और उनसे ही जुड़कर अपनी शंकाओं का समाधान करना उचित है । स्मरण रखें की गुरु आपके ही विचारधारा का होना चाहिए । इसके अभाव में आप यूं ही भटकते रहेंगे ।
किसी से भी कोई भी प्रश्न पूछने या मार्गदर्शन प्राप्त करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि मुझे मार्गदर्शन ( ज्ञान ) चाहिए या जानकारी । किसी से भी मार्गदर्शन लेने से पूर्व कुछ बातें अवश्य ध्यान रखें  ! जैसे - आपका उस व्यक्ति से गुरु शिष्य या प्रेम, विश्वास ,श्रद्धा ,भक्ति के आधार पर संबंध स्थापित होना चाहिए । वह व्यक्ति आपके मार्ग का हो अर्थात आपके गुण और विचार उससे मिलना चाहिए । आपको चाहिए कि आप सामने वाले व्यक्ति की बातों पर पूर्ण विश्वास करते हो और उनका दृढ़ता से पालन करने की इच्छा रखते हो । तभी हमारे जीवन में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे । अन्यथा सिर्फ जानकारी के लिए हम सबके पास गूगल बाबा है , वहां  आपको हर प्रकार की जानकारी मिल जाएगी ।

अपना कीमती समय निकाल कर लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद  🙏
            
                                                         Rishi Agyey~🧘

Sunday, October 13, 2024

👉समाधि

१- समाधि क्या है ?
चित्त की समस्त वृत्तियों के निरोध होने पर चित्त की स्थिर एवं उत्कृष्ट अवस्था होती है । या दूसरे शब्दों में कहें तो समाधि शब्द दो शब्दों से मिल कर बना है - ‘सम’ और ‘धी’। ‘सम’ का मतलब है एक जैसा होना, और ‘धी’ का मतलब बुद्धि है। अगर आप बुद्धि के एक समान स्तर पर पहुँच जायें, जहाँ आप बुद्धि से कोई फर्क नहीं करते, हरेक चीज़ को एक जैसा देखते हैं, तो उसे समाधि कहते हैं। 

२- समाधि कैसे लगाएं ?
योग के आठ अंगों को एक-एक करके क्रम से पार करना होता है ये आठ अंग हैं:-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान , समाधि । यह सभी प्रयोग किसी भी योग्य प्रमाणिक गुरु के सानिध्य में करना चाहिए ।

३- समाधि और ध्यान में क्या अन्तर है?
समाधि योग का अंतिम चरण है , जहां साधक के मां के सभी विचार अस्तित्व में लीन हो जाते हैं और यह बताने वाला कोई नहीं रहता कि मैं कौन हूं । जबकि ध्यान योग का सातवां चरण है यहां साधक समाधि के लिए अपने नियत लक्ष्य पर ध्यान लगाने के लिए अभ्यास करता है ।

४- समाधि कितने प्रकार की होती है ?

योग में समाधि के कुछ प्रकार हैं:-

1. वितर्क के अनुसार समाधि- यदि किसी स्थूल वस्तु या प्राकृतिक पंचतत्व की पूजा करते समय मन सूर्य, चंद्रमा, ग्रह या राम, कृष्ण आदि की मूर्तियों में लीन रहता है, तो इसे वितर्क समाधि कहा जाता है ।

2. चिंतनशील समाधि- स्थूल वस्तुओं पर मन को एकाग्र करने के बाद छोटे-छोटे पदार्थों, छोटे-छोटे रूपों, रसों, गंधों, शब्दों आदि के भावनात्मक चिंतन से जो समाधि होती है उसे चिंतनशील या चिंतनशील समाधि कहते हैं।
 
3. आनंद समाधि- आनंद समाधि में विचार भी शून्य हो जाते हैं और केवल आनंद का अनुभव ही रह जाता है।

4. अस्मितानुगत समाधि- अस्मित अहंकार कहलाता है। इस प्रकार की समाधि से सुख भी नष्ट हो जाता है। उसमें केवल अपनेपन की भावना रह जाती है और सभी भावनाएँ लुप्त हो जाती हैं। इसे अस्मित समाधि कहते हैं। उसमें केवल अहंकार रह जाता है। पतंजलि इस समाधि को सर्वोच्च समाधि मानते हैं।

४- समाधि के लक्षण क्या हैं ?
समाधि प्राप्त करने के लिए तीन पहलू एक साथ आते हैं, यानी मन, ध्यान का विषय और ध्यान की प्रक्रिया ( ध्यान )। ये तीनों मिलकर शुद्ध चेतना में लीन हो जाते हैं। शुद्ध लीनता की इस अवस्था में, जिसे समाधि कहते हैं, मन को उतार-चढ़ाव (चित्त वृत्तियों) की अनुपस्थिति, मन और अहंकार से परे, पूर्ण जागरूकता और सामान्य चेतना के सार्वभौमिक चेतना के साथ विलय की स्थिति के रूप में वर्णित किया जा सकता है। वास्तविकता की प्रकृति का सच्चा अहसास होता है। 
- समाधि में साधक भौतिक जगत से सम्पर्क कट जाता है ।
- समाधि में साधक का मन विचारों से खाली हो जाता है ।
एवं वह सार्वभौमिक चेतना के साथ एकाकार हो जाता है  ।
- समाधि में समय और स्थान का बोध नहीं होता.  
- साधक को अपना-पराया, मान-अपमान जैसी चिंता नहीं रहती ।

५- सिद्धियों के प्रकार 
समाधि द्वारा प्राप्त आठ सिद्धियों का वर्णन योग दर्शन में किया गया है।
अणिमा : शरीर को अणु के समान बना लेना ।
लघिमा : शरीर को रुई के समान हल्का बना लेना ।
महिमा : शरीर को अत्यधिक शक्तिशाली लंबा चौड़ा बना लेना। 
प्राप्ति : चंद्रमा को मानसिक रूप से अंगुली के अग्रभाग से छूकर महसूस करना।
प्राकाम्य : योगी की जो भी इच्छा होगी उसका पूर्ण हो जाना।
वशित्व : पृथ्वी आदि पंचभूत तथा उनसे उत्पन्न कुछ पदार्थों को वश में कर लेना।
ईशितृत्व : इस भूमि आदि से बने कुछ पदार्थों को लेकर नये पदार्थों का निर्माण कर लेना।
यत्रकामावसायित्व : सत्य संकल्प से जो कार्य योगी के ज्ञान बल से किए जा सकते हैं उनको उत्पन्न करने की इच्छा करना तथा उनको जिस स्थिति में चाहे रखना।

इस प्रकार योग दर्शन में सिद्धि की महत्ता को बताया गया है लेकिन यह सभी सिद्धियां अंतिम लक्ष्य मोक्ष में बाधक होती हैं इसलिए इन सिद्धियों के जाल में साधक योगी को फंसना नहीं चाहिए तथा केवल अंतिम लक्ष्य आत्मा से परमात्मा के मिलन को महत्व देना चाहिए।





Wednesday, October 9, 2024

परिवार

१- परिवारक है ?
परिवार वह है जहां व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक साथ आते हैं । किंतु दुनिया के अधिकांश भागों में वह सम्मिलित वासवाले रक्त संबंधियों का समूह है जिसमें विवाह और दत्तक प्रथा स्वीकृत व्यक्ति भी सम्मिलित हैं  ।    

२- हमें परिवार की आवश्यकता क्यों है  ?
परिवार इंसान की ज़िंदगी में सबसे बड़ी प्रयोगशाला होती है। बच्चा जन्म लेने के बाद परिवार में ही रहता है। परिवार के सदस्यों के बीच ही उसका मानसिक और बौद्धिक विकास होता है। परिवार से हमारे गुण व अवगुण की शुरुआत होती है। हमारे सबसे पहले गुरु माता-पिता ही होते हैं। हम उन्हीं से बोलना और चलना सीखते हैं । यदि पारिवारिक माहौल अच्छा रहता है, तो हम पॉजिटिविटी के साथ जीवन में आगे बढ़ते हैं, लेकिन यदि परिवार का माहौल ठीक नहीं रहता है, तो हम नेगेटिविटी की ओर बढ़ जाते हैं ।

अकेले रहने से हनियां ?
इंसान को हमेशा सामाजिक होने की सलाह दी जाती है ताकि कभी अगर वह मुसीबतों में फंसता भी है तो लोगों  सहायता मिलती रहे । किंतु अकेले रहने वालों लोगों में अक्सर हमें मानसिक रोगों, अनिद्रा आदि समस्याएं देखने को मिलती है ।


Tuesday, October 8, 2024

आध्यात्मिक चर्चाओं में भाग न लेने का कारण

प्रणाम मित्रों 
आध्यात्मिक चर्चाओं में भाग न लेने का कारण 
यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि वास्तव में सत्य क्या है यह कोई नहीं जानना चाहता । वह सिर्फ अपनी मान्यताओं का प्रमाण ही खोजता है । जहां उसे प्रमाण मिल जाए वह उसे सही मानता है और बाकी सब को गलत की श्रेणी में रखता है 

सामाजिक लोगों के अध्यात्मिक ज्ञान का स्तर उनके ही क्रियाकलापों से ज्ञात हो जाता है जैसे - 

1- चर्चाओं में भागना लेना पड़े इसलिए सूचनाओं को अनदेखा करते हैं। एवं स्वयं को बहुत ही व्यस्त दर्शाते हैं।

२- बहुत से लोगों को विषय का ज्ञान नहीं होता, मनोबल इतना मजबूत नहीं होता और अपने विचार सबके सामने व्यक्त करने में बहुत ही संकोच रहता है, जिसके कारण वे चर्चाओं में भाग लेने से कतराते हैं l 

३- कुछ लोग मान्मयताओं एवं मत मतान्तरों में फंसे हुए हैं । उन्हें अपनी ही विचारधारा सही लगती है इस कारण वे अन्य किसी विचारधारा को स्वीकार नहीं कर पाते और चर्चाओं में भाग नहीं लेते।

४- कुछ लोगों ने तो अपना पुराण अलग से ही बना रखा है, वह उसके आगे किसी की नहीं मानते और यहीं से इस सूत्र का पता चलता है कि हर व्यक्ति सिर्फ स्वयं के अनुभव को ही  सत्य मानता है और उसे ही अपने जीवन में महत्व देता है।

5- चर्चाओं में भाग न लेने का कारण पूछने पर कुछ लोग यह कहते पाए गए हैं कि अभी हम संसार में हैं और सांसारिक जिम्मेदारियों को पूरा करना है, यह ईश्वर, अध्यात्म की बातें तो सांसारिक जिम्मेवारी पूरी करने के बाद ही हो सकती हैं।

६-  लोगों को लगता है कि भगवान केवल अपनी इच्छा पूरी करवाने का साधन है। जिनके सामने कुछ दान ,दक्षिणा फूल , फल की रिश्वत देकर अपनी इच्छा को पूरा करवा सकते है। और यही परम सत्य है। ऐसी मान्यताएं लोगो में फैली हुई है।

आईए जानते हैं कि आप किस कारण से आध्यात्मिक चर्चाओं में भाग नहीं ले पाते l दी गई लिंक ओपन करें एवं पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें l

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Monday, October 7, 2024

👉शुद्धिकरण

प्रणाम मित्रों 
शुद्धिकरण के बारे में हम सभी को एक बात अवश्य ही समझनी चाहिए कि - "जब शरीर में अशुद्धि के कारण कोई रोग होता है तो हम डॉक्टर के पास जाते हैं , इसी प्रकार यदि हमारे मन में कोई अशुद्धि है तो हमें अपने प्रत्यक्ष गुरु के पास जाना चाहिए।

१- शुद्धिकरण कार्यक्रम क्या है ?
त्रिस्तरीय ( शरीर, मन, बुद्धि ) शुद्धिकरण एक आध्यात्मिक ज्ञान आधारित श्रंखला है। जो की पूर्णतया निशुल्क एवं योग्यता आधारित है । जहां हम चर्चाओं के माध्यम से जीवन के कठिनतम् प्रश्नों के उत्तर जानकर उसे सुलझाने का प्रयास करेंगे ।

२- त्रिस्तरीय ( शरीर, मन, बुद्धि ) शुद्धिकरण की आवश्यकता क्यों है ?
सुखी निश्चिंत जीवन कैसे जिए इसके लिए वर्तमान समय में बहुत से लोग प्रत्यक्ष गुरु से ना जुड़कर सोशल मीडिया से सीख रहे हैं जिसके कारण वह मानसिक रूप से बुरी तरह उलझ चुके हैं और अपने लक्ष्य वास्तविक लक्ष्य से भटक गए हैं । अतः आज लोगों की वर्तमान में मानसिक स्थिति को देखते हुए इस कार्यक्रम का आयोजन किया है । 

३- इस कार्यक्रम को पूर्ण करने से क्या लाभ होगा और 
इस कार्यक्रम से हम कैसे जुड़ सकते हैं ?
इस कार्यक्रम पूर्ण करने से सिर्फ शारीरिक मानसिक और बौद्धिक अशुद्धि दूर होने के पश्चात हमें यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि हम गलती कहां कर रहे हैं , जिससे हम बिना समय गवाएं अपनी गल्तियों को सुधार कर अपने लक्ष्य तक आसानी से पहुंच सकते हैं । 
आप में से जिनको आध्यात्मिक विषयों में रुचि है वह अपना "सत्यापन" कार्यक्रम पूर्ण करके इस कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं । सभी सुविधाएं ऑनलाइन उपलब्ध रहेगी । इस कार्यक्रम से किसी भी प्रकार के भौतिक लाभ की आशा ना रखें ।

४- शुद्धीकरण' का क्या अर्थ होता है ?
किसी भी प्रकार के विजातीय तत्व से मुक्त होना शुद्धिकरण कहलाता है ।

५- शुद्धिकरण क्यों आवश्यक है ? 
सत्य कभी दो नहीं होते सत्य एक ही होता है, हमने अपने शोध कार्य में पाया कि समाजिक लोग किसी भी विषय पर मनमानी बातें करते हैं जिससे वे कभी सत्य क्या है यह नहीं जान पाते,
इसीलिए त्रिस्तरीय शुद्धिकरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया है , क्योंकि बिना शुद्धिकरण के सत्य तक पहुंचना संभव नहीं है , मूल तत्व ( स्वभाव ) को जानने के लिए शुद्धिकरण आवश्यक है ।

६- मूल तत्व या मूल स्वभाव को जानना क्यों आवश्यक है  ?
मूल तत्व को जाने बिना हमारी गणनाओं में भिन्नता आती है जिससे हम सही परिणाम अर्थात सत्य तक नहीं पहुंच पाते ।

७- शुद्धिकरण कितने स्तर तक करना आवश्यक है ?
शुद्धिकरण निम्न स्तर पर होना आवश्यक है - 
शरीर , मन, विचार, भावनाएं, बुद्धि, स्मृति ( कारण शरीर )  

८- शुद्धिकरण के कितने मार्ग हैं ?
शुद्धिकरण के कई मार्ग हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं -
योग - जिसके अंतर्गत शरीर शुद्धि के लिए यम , नियम, आसन, प्राणायाम , प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि हैं।
ज्ञान - ज्ञान मार्ग बुद्धि आधारित है और यहां बुद्धि के शुद्धिकरण पर विशेष तौर पर ध्यान दिया जाता है ।
भक्ति - भक्ति मार्ग में साधक समर्पण भाव से अपने ईस्ट आराध्या के नाम जप का स्मरण कर शुद्धिकरण करता है ।

९- अशुद्धियां कैसे हो जाती है ? इन्हें कैसे शुद्ध करें ? 
शरीर - मनमाना, इच्छा अनुसार खान-पान एवं आचरण, 
जिसके कारण शरीर अशुद्ध हो जाता है । इसे दूर करने के लिए ऋतु अनुसार प्राणायाम, आहार-विहार एवं दिनचर्या व्यवस्थित करनी चाहिए ।
मन- मन हमारी इन्द्रियों का राजा है, निरंतर इंद्रियों से संबंधित विषयों का चिंतन करने से मन अशुद्ध हो जाता है, इसे हम ध्यान और अपने इष्ट के नाम का जप द्वारा शुद्ध कर सकते हैं । जब हमारा मन शुद्ध हो जाता है तो विचार और भावनाएं स्वत: ही शुद्ध हो जाएगी ।
बुद्धि - सुनी सुनाई बिना प्रमाणिक बातों का अनुसरण करने से हमारी बुद्धि दूषित हो जाती है । सात्विक आहार ,सत्संग , श्रवण, चिंतन, मनन एवं शंका समाधान से हमारी बुद्धि शुद्ध होती है।
स्मृति- जो अतृप्त वासनाएं, इच्छाएं वर्तमान में पूरी नहीं होती , वे सभी हमारी स्मृति में संचित रहती हैं , यही संचित अतृप्त वासनाएं, इच्छाएं हमें जन्म जन्मांतर तक भटकाती रहतीं हैं, जिसके कारण हमारा मन कभी भी ईश्वर को जानने समझने और उन तक पहुंचने के लिए उत्सुक नहीं रहता । इसलिए यदि सम्भव हो तो बिना नियम तोड़े पहले उन्हें पूरा कर लें ।

१०- उपरोक्त शुद्धिकरण में कितना समय लगेगा ?
यदि आपके जीवन में सद्गुरु हैं तो आपकी अपनी क्षमता अनुसार ३ वर्ष से लेकर १२ वर्ष तक का समय लगेगा ।
और यदि जीवन में सद्गुरु नहीं है तो छोटी-छोटी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनंत जन्म भटकना पड़ेगा  ।

११- शुद्धिकरण की क्या विधि है ? 
हमने अपने कार्यक्रम को पूर्ण करने के लिए इसे ५ चरणों में बांटा है -:
श्रवण - विषय से संबंधित जानकारी एकत्र करना
मनन - प्राप्त जानकारी पर मनन करें कि - क्या वह सत्य है या नहीं 
प्रयोग - प्राप्त जानकारी को अपने गुरु के सानिध्य में प्रयोग करें ।
परिणाम - अनुकूल या प्रतिकूल परिणाम प्राप्त।
सत्यापन - परिणाम अनुकूल हो या प्रतिकूल हो अपने अनुभव के आधार पर उसे सत्यापित करें ।

👉शुद्धिकरण सधना से संबंधित विषय -

१- वृत्तियां 

२- विचार 

३- भावनाएं 

४- विकार

५- संगत

६- आदतें 

७- गुण

८- कर्म

९- संस्कार 

१०- बुद्धि 

११- अपना प्रारब्ध जाने 

१२- दिनचर्या 

१३- नियम

१४- अनुशासन 

१५- संधिकाल

१६- संकल्प शक्ति 

१७- साधक के गुण 

१८- ४० दिवसीय प्रयोग आरंभ करें-
१९- प्रमाण पत्र
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2025/02/blog-post_10.html

२०- Ishwa संदेश 
https://guruplusmerafree.blogspot.com/2024/11/blog-post_9.html

Thursday, October 3, 2024

👉प्रश्न कैसे और किससे पूछना चाहिए ?

प्रिय आत्मन्
जैसा कि आप सभी जानते हैं , मानव जीवन को सुखमय बनाने के लिए समाज में बहुत से विकल्प है ! जैसे-  कुछ लोग चमत्कारिक सिद्ध गुरुओं में विश्वास रखते हैं तो कुछ लोग तंत्र मंत्र और टोने- टोटके में विश्वास रखते हैं ! कुछ लोग ज्योतिष वास्तु जैसी विद्या में विश्वास रखते हैं तो वहीं कुछ लोग तामसिक विद्या जैसे तंत्र क्रिया आदि में विश्वास रखते हैं ! जिसको जैसी सुविधा वैसा मार्ग अपनाना चाहिए । आपको अपने अनुकूल विषयों से जुड़ना ही लिए श्रेष्ठ रहेगा ।

प्रश्न कैसे और किससे पूंछना चाहिए ?
जब भी हमारे मन में कोई प्रश्न शंका या जिज्ञासा प्रकट हो तो हमें इसके निवारण के लिए अपने गुरु के पास ही जाना चाहिए  ( गुरु अर्थात जो अपने शिष्यों को बिना भौतिक लाभ के सही मार्गदर्शन देता हो, सर्व समर्थ तत्वदर्शी हो ) जिनके भी गुरु नहीं है उन सभी के लिए हमारा यही संदेश है कि समय रहते किसी तत्वदर्शी योग्य समर्थ गुरु की शरण में जाएं । और उनसे ही जुड़कर अपनी शंकाओं का समाधान करना उचित है ।  स्मरण रखें की गुरु आपके ही विचारधारा का होना चाहिए । इसके अभाव में आप यूं ही भटकते रहेंगे ।
किसी से भी कोई भी प्रश्न पूछने या मार्गदर्शन प्राप्त करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि मुझे मार्गदर्शन ( ज्ञान ) चाहिए या जानकारी । किसी से भी मार्गदर्शन लेने से पूर्व कुछ बातें अवश्य ध्यान रखें  ! जैसे - आपका उस व्यक्ति से गुरु शिष्य या प्रेम, विश्वास ,श्रद्धा ,भक्ति के आधार पर संबंध स्थापित होना चाहिए । वह व्यक्ति आपके मार्ग का हो अर्थात आपके गुण और विचार उससे मिलना चाहिए । आपको चाहिए कि आप सामने वाले व्यक्ति की बातों पर पूर्ण विश्वास करते हो और उनका दृढ़ता से पालन करने की इच्छा रखते हो । तभी हमारे जीवन में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे । अन्यथा सिर्फ जानकारी के लिए हम सबके पास गूगल बाबा है , वहां  आपको हर प्रकार की जानकारी मिल जाएगी ।

 अपना कीमती समय निकाल कर लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद  🙏

👉यदि आप हमसे जुड़कर हमारी सेवाओं का लाभ लेना चाहते हैं तो दिए गए फॉर्म में मांगी गई जानकारी भरकर सबमिट करें ।

👉 Please copy and open this link 
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Wednesday, October 2, 2024

👉व्रत

प्रणाम मित्रों 
व्यक्ति को अपने जीवन में किसी भी प्रकार की सफलता को प्राप्त करने के लिए ऊर्जा, दृढ़ संकल्प और नियमों की आवश्यकता पड़ती है। जितनी अधिक ऊर्जा उतना मजबूत संकल्प होगा, व्यक्ति उतने ही जल्दी समाज के हर क्षेत्र में सफल होगा ।

१- व्रत क्या है ? 
व्रत अपने शरीर मन बुद्धि को शुद्ध करने का एक बहुत ही सरल माध्यम है , क्योंकि जब तक हम शुद्ध नहीं होंगे तब तक ईश्वर से नहीं जुड़ पाएंगे । व्रत में संयम, संकल्प और नियम निहित होता है। व्रत में सफलता के लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है 

२- व्रत क्यों आवश्यक है ?
हर किसी व्यक्ति के लिए व्रत आवश्यक नहीं है , जो ईश्वर से जुड़ना चाहते उनकी कृपा प्राप्त करना चाहते हैं केवल वही व्रत करें। 
विद्वानों के अनुसार व्रत-क्रिया को संकल्प, सत्कर्म अनुष्ठान भी कहा जाता है। व्रत करने से मनुष्य की अंतरात्मा शुद्ध होती है। इससे ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति तथा पवित्रता की वृद्धि होती है ।

मनुष्यों के कल्याण के लिए, उनके अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक दुःखों को दूर करने के लिए, हमारे तपस्वी ऋषियों ने अनेक साधन नियत किए हैं। उनमें से एक साधन व्रत-उपवास भी है। व्रत व्यक्ति के जीवन को पवित्र बनान एवं अपने दुर्गुणों को समाप्त करने के लिए आवश्यक है । 

व्रत करने से हमारे अच्छे स्वास्थ्य के कारण शारीरिक बल के साथ साथ मनोबल और आत्मबल भी बढ़ता है। हमारी आध्यात्मिक उन्नति होती है। हमारे अंदर के काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, नफरत, स्वार्थ जैसे अनेक विकार दूर होते हैं और हमारे अंदर दया, करुणा, प्रेम, सहनशीलता, सहयोग की भावना बढ़ती है। जिससे हम स्वयं के साथ साथ, देश, समाज, विश्व और समस्त मानव-जाति के कल्याण में भागीदार बनने में समर्थ होते हैं।

३- व्रत कितने प्रकार के होते हैं ?

व्रतों के प्रकार - व्रतोंका उद्देश्य, उनके पालनकी विधि, उनकी फलप्राप्ति इत्यादिके अनुसार व्रतोंके विभिन्न प्रकार हैं ।

काम्य अर्थात सकाम व्रत - एक विशिष्ट कामना हेतु किए गए व्रतको ‘सकाम व्रत’ कहते हैं । कौनसी कामनाके लिए कौनसा व्रत करना चाहिए, यह पुराण एवं तंत्रग्रंथमें बताया गया है । सकाम व्रत नैमित्तिक व्रत है । मुहूर्त तथा दिनशुद्धि देखकर विशिष्ट तिथिपर ही सकाम व्रत किए जाते हैं । ‘सत्यनारायण एवं सत्यदत्त व्रतसे कामना शीघ्र पूर्ण होती है’, ऐसी धारणाके कारण अधिकांश लोग यह व्रत रखते हैं । व्रतोंसे उस व्रतके अधिष्ठाता देवता प्रसन्न होते हैं एवं उनकी कृपासे व्रतका फल मिलता है ।

निष्काम व्रत :- यह शब्द व्यावहारिक विषयोंकी कामना न रखनेके संदर्भमें ही है । निष्काम उपासनामें भी ईश्वरप्राप्ति अथवा मोक्षकी इच्छा होती है । परंतु निष्काम उपासनामें ऐसी भावना होती है कि जो ईश्वरकी इच्छा, वैसीही हमारी इच्छा हो ।

नैमित्तिक व्रत :-  वर्णाश्रमके अनुसार करने योग्य कर्तव्य, जैसे ब्रह्मचर्य, पूजा, संध्या इत्यादि प्रतिदिन करने चाहिए । नैमित्तिक व्रत निश्चित तिथियोंपर ही करते हैं, जैसे वटसावित्री, मंगलागौरी, हरितालिका, गणेश चतुर्थी इत्यादि ।

इंद्रियानुसार व्रत :- इनमें उपवास करना, एकभुक्त रहना, हिंसा न करना इत्यादि कायिक अर्थात शारीरिक नामजप करना, सत्य बोलना, मृदुभाषण करना इत्यादि । वाचिक तथा ब्रह्मचर्य पालन, मनसे भी हिंसा न करना, क्रोध न आने देना इत्यादि मानसिक व्रत होते है ।

कालानुसार व्रत :-  कालके अनुसार व्रतोंके अयन, संवत्सर, मास, पक्ष एवं पंचांग अर्थात तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण इत्यादि वर्ग बनते हैं ।

देवतानुसार व्रत :- जिस देवताकी उपासना करनी है, उसके अनुसार गणेशव्रत, सूर्यव्रत, शिवव्रत, विष्णुव्रत, देवीव्रत जैसे व्रत भी होते हैं । अब तक हमने व्रतोंके विविध प्रकार देखे । अधिकांश व्रत स्त्री एवं पुरुष, दोनों रख सकते हैं; परंतु हरितालिका, वटसावित्री जैसे कुछ व्रत केवल स्त्रियोंके लिए ही हैं ।

१. कायिक व्रत - कायिक व्रत में हम शरीर हिंसा या अत्याचार की भावना का त्याग कर दें-दूसरों को सताएं नहीं। 
२. वाचिक व्रत - वाचिक व्रत में किसी को अप्रिय वचन न बोलें, किसी की चुगली निंदा न करें ।
३. मानसिक व्रत - मानसिक व्रत के अंतर्गत हम अपने मन के शुद्धीकरण की तरफ प्रयास करें। मन में काम, क्रोध, लोभ, मद, ईष्र्या, राग-द्वेष को त्याग दें । 

. पुण्यसंचय के एकादशी आदि 'नित्य' व्रत, पापों के नाश के लिये, मन के स्वामी चंद्रमा की प्रसन्नता के लिये चांद्रायण (चंद्र तिथियों के अनुसार) आदि 'नैमित्तिक' व्रत, सुख-सौभाग्यादि के वटसावित्री आदि 'काम्य' व्रत माने गये हैं।

४- व्रत और उपवास में अंतर
अंतर तो है - व्रत में भोजन ले सकते हैं परन्तु उपवास में निराहार रहना पड़ता है। संस्कृत में 'उप' का अर्थ है 'समीप' और 'वास' का अर्थ है बैठना - यानि परमात्मा का ध्यान लगाना, उनकी जप-स्तुति करना। जब शुद्ध मन से आप ईश्वर के पास रहने की कोशिश करते हैं तो इसे उपवास कहते हैं। कुछ या सभी भोजन, पेय या दोनों के लिये बिना कुछ अवधि तक रहना उपवास कहलाता है। उपवास पूर्ण या आंशिक हो सकता है। यह बहुत छोटी अवधि से लेकर महीनो तक का हो सकता है। 

५- क्या मैं व्रत के दौरान रात्रि 12 बजे के बाद सामान्य भोजन कर सकता हूँ ? 

वैदिक संस्कृति अनुसार सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक व्रत किया जाता है। तो असली उपवास उसी दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक उपवास क औपचारिकताओं के साथ अपने अनुष्ठान को जारी रखना चाहिए । 

६- क्या उल्टी आने पर व्रत टूट जाता है ?

कारण कि व्रत रहने पर भी शरीर अपनी नैसर्गिक क्रियाओं को रोकता नहीं है। समय-समय पर भूख प्यास और मल मूत्र विसर्जन की आवश्यकता पड़ती है। उल्टी भी यदि किसी की तबीयत खराब है, तो उसको आ सकती है। उसका व्रत की पवित्रता भंग होने से कोई संबंध नहीं है। फिर भी यदि स्वास्थ्य ठीक ना हो तो किसी भी प्रकार का व्रत या उपवास नहीं रखना चाहिए।

७- व्रत कैसे रखें ?

आजकल व्रत का अर्थ ढेर सारा फलाहारी खाना और सजना-धजना, आराम करना मान लिया गया है जबकि शास्त्र में व्रत संबंधी नियम बताए गए हैं। 

1- व्रत का संकल्प लेने वाले व्यक्ति को व्रत के दिन सुबह जल्दी से उठकर दैनिक क्रियाओं को करते हुए स्नान करना चाहिए उसके बाद साफ वस्त्र धारण करना चाहिए.

2- जिस विशेष दिन पर व्रत रखें उस दिन उससे संबंध रखने वाले देवी-देवता की पूजा आराधना जरूर करनी चाहिए.

3- जिस दिन विशेष पर व्रत रखने का संकल्प आपने लिया हुआ उस दिन व्रती को दिन के समय नहीं सोना चाहिए.

4- व्रती को व्रत के दिन बार-बार खाने अर्थात अपने चटोरे पन की आदत पर नियंत्रण रखना चाहिए । व्रत पर अन्न का त्याग करना चाहिए और केवल जल और फलाहार ही ग्रहण करें. इस व्रत पूर्ण माना जाता है ।

5- व्रत रखने पर व्यक्ति को हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए. किसी को बेवजह परेशान नहीं करना चाहिए. इसके अलावा व्रत पर चोरी आदि नहीं करनी चाहिए. व्रती को व्रत रखने के दौरान किसी सी निंदा या बुराई नहीं करनी चाहिए.

6 – यदि हो सके तो व्रत वाले दिन व्रती को गरीबों को दान अवश्य करना चाहिए और असहायों की हमेशा मदद करें. व्रत के दिन भगवान के मंत्रों का दिनभर जाप करते रहना चाहिए.

7- व्यक्ति को व्रत की समाप्ति के बाद हमेशा मूंग की दाल का पानी एवं सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए. साथ ही व्रत के बाद हल्का ही भोजन ग्रहण करना चाहिए ।


👉यदि आपके कोई प्रश्न हो तो मुझे मेरे व्हाट्सएप -  9752420899 नंबर पर भेज ।

यदि आप चाहते हैं कि आपकी बात एक ही बार में सुन ली जाए और जल्द ही आपको आपके अनुकूल परिणाम प्राप्त हो तो आपको भी चाहिए कि शुद्धिकरण पश्चात आप भी संबंधित देव/देवी को समर्पित होकर उसके निर्देशों का पालन करने में तत्परता दिखाएं ।


                                   ऋषि Agyey ~ 🧘
                      "Spritual mentor and Motivator

Tuesday, October 1, 2024

पितृ मोक्ष अमावस्या संदेश

प्रणाम मित्रों
मनुष्य के पूर्ण विकास एवं आत्म कल्याण के लिए जितना भी ज्ञान आवश्यक है ,उन सभी विषयों पर मैंने अपना शोध कार्य एक व्यवस्थित पाठ्यक्रम के रूप में आप सभी के लिए अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर दिया है ! आप
यह सामग्री हमारे ब्लॉग से निशुल्क प्राप्त कर सकते हैं ।                                     आप में से जो भी मुझसे सलाह लेकर या पूछ कर कार्य करते हैं उन सभी के लिए मेरा यही सुझाव है कि आप सभी यह कार्य अपने-अपने गुरु से पूछ कर ही करें, तो आप सभी को अधिक लाभ होगा । क्योंकि मैं आपका गुरु नहीं हूं और मेरा मार्ग अलग है ऐसी स्थिति में मेरे बताए हुए नियमों, सूत्रों या परामर्श से आपको किसी भी प्रकार का कोई भी भौतिक ,धार्मिक या आध्यात्मिक लाभ नहीं होगा । इसके बावजूद भी यदि आप मुझसे जुड़ना चाहें तो मेरे कार्यक्रम "जीवन रहस्य" के माध्यम से आप सभी मुझसे जुड़ सकते हैं ।

अपना कीमती समय निकाल कर लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏

👉कार्यक्रम में शामिल होने के लिए नीचे दिये हुए फॉर्म को भरकर सबमिट करें ।

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वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या: दोषारोपण की प्रवृत्ति

प्रणाम मित्रो वर्तमान समय में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली अधिकांश समस्याओं और विकृतियों के लिए स्...