Monday, October 21, 2024

उपासना

मन्त्र जप :- मन्त्र के निरन्तर जप को साधना कहते है, मंत्र जप तीन प्रकार के बताए गए हैं।

मंत्र जप कितने प्रकार के होते हैं ?

मुख्य रूप से निम्नलिखित तरीके से मंत्र योग साधन किये जाते हैं –

  1. नित्य :- प्रातः काल एवं सायं काल में किसी गुरू द्वारा उपदिष्ट मन्त्र का जप नित्य प्रति करना।
  2. नैमित्त :- किसी विशेष आध्यात्मिक मुहूर्त एवं पूजा के अवसर पर इस जप को किया जाता है।
  3. काम्य :- मन में किसी विशेष इच्छा की पूर्ति के लिए मन्त्र विशेष का जप करना।
  4. निषिद्ध :- किसी अनधिकारी गुरु से सीखा मन्त्र या मिश्रित मन्त्र अथवा गलत ढंग से उच्चरित मन्त्र निषिद्ध कहलाते हैं।
  5. प्रायश्चित जप :- किसी किये हुए कार्य के प्रायश्चित के निमित्त जप किये जाते हैं उन्हें प्रायश्चित जप कहते हैं।
  6. अचल :- स्थिरता पूर्वक बैठक कर जो जप किया जाता है उसे अचल जप कहते हैं।
  7. चल :- कभी-कभी चलते-चलते या खड़े होकर अथवा किसी कार्य को करते समय भी जो जप चलते रहते हैं, उसे ‘‘चल जप’’ कहते हैं।
  8. वाचिका :- जिस जप को बार-बार उच्च ध्वनि में किया जाता है उसे वाचिका-जप कहते हैं।
  9. उपांशु :- होठों में बुदबुदा कर जिस मन्त्र का जप किया जाता है उसे उपांशु कहते हैं।
  10. मनस्त :- इस जप में वाणी से नहीं बोला जाता, बल्कि सिर्फ मन में वैचारिक धरातल पर जप चलता रहता है।
  11. अखण्ड जप :- अखण्ड जप की साधना कई घण्टों तक अबाध गति से चलती रहती है।
  12. अजपा :- मन्त्र के अर्थ को मन में धारण करते हुए उसमें लय हो जाना अजपा जप कहलाता है।
  13. प्रदक्षिणा :- किसी पवित्र स्थान विशेष के चारों ओर घूमते हुए जो जप किया जाता है, इसे प्रदक्षिणा जप कहते हैं।

गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
त्व्यापि गापित्वयं हि न देयं यस्य कस्यचित्॥

आसन :

साधना में आसन का महत्वपूर्ण स्थान है। आसन दो तरह का निर्देश दर्शाता है, एक बैठने के स्थान और दूसरा बैठने के प्रकार को। वर्तमान युग में समतल भूमि पर पशु चर्म बिछा कर उस पर पद्मासन या इससे मिलते-जुलते आसन में घण्टों तक बैठना हर किसी के बस की बात नहीं है, क्योंकि लोग कुर्सी पर बैठने के आदी हैं।

आसन का तात्पर्य किसी भी बैठने की मुद्रा से है, जिसमें पैरों को असुविधा न हो, रीढ़ की हड्डी सीधी रहे, शरीर के अन्दर के अंगों पर ज्यादा दबाव न पड़े, मन एकाग्र रहे। मन स्थिर रहना ही साधना है। गलत आसन में बैठकर मन एकाग्र नहीं रह पता। बैठने के आसन में ऊनी आसन का प्रयोग करें तो सर्वश्रेष्ठ है।

शिव गीता अनुसार :

  • ऊनी आसन पर बैठकर जप करने से समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है।
  • व्याग्रचर्म के आसन पर बैठकर जप करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • काले चर्म के आसन पर बैठकर जप करने से मुक्ति होती है।
  • कुशा के आसन पर बैठकर जप करने से ज्ञान की प्राप्ति होता है।
  • पत्तों के आसन पर बैठकर जप करने से दीर्घायु प्राप्त होती है।
  • पत्थर के आसन पर बैठकर जप करने से दुःख प्राप्त होता है।
  • काष्ठ के आसन पर बैठकर जप करने से रोग प्राप्त होता है।
  • तृणासन के आसन पर बैठकर जप करने से यश, मान, लक्ष्मी की हानि होती है।
  • बांस के आसन पर बैठकर जप करने से दरिद्रता प्राप्त होती है।
  • भूमि के ऊपर बैठकर जप करने से कोई मनोरथ पूरा नहीं होता, उससे किसी भी साधना में सफलता नहीं मिलती।

“वस्त्रासने तु दरिद्रयं पाषाणे व्याधिपीडनम्”

किसी भी मंत्र का जाप करने से पहले मंत्र विधान के निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए, फिर आप तुरंत परिणाम देख सकते हैं।

मंत्र विधान: मुहूर्त, दिशा, लकड़ी की चौकी, आसन, माला की व्यवस्था मंत्र साधना के प्रकार के अनुसार की जानी चाहिए।

1) पवित्रीकरण: पवित्रीकरण के लिए बायीं हथेली पर जल लेकर उसे दाहिनी हथेली से ढक लें और निम्न मंत्र का जाप करें। तत्पश्चात जल को अपने पूरे शरीर पर छिड़कें।

ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतो स पिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: आकर्षक अभ्यन्तर: शुचि॥   

2) कुल्ला करना: आंतरिक पवित्रता के लिए एक बर्तन में पानी लें और चम्मच की मदद से हर मंत्र के बाद तीन बार पानी पिएं। ऐसा करने से आपका मन, वाणी और कर्म शुद्ध हो जाएंगे।

ॐ अमृतोपस्त्रनामसि स्वाहा।
ॐ अमृतलाविधानमसि स्वाहा।
ॐ सत्यं यश: श्रीमन्यि श्री: श्रेयतां स्वाहा।
ॐ नारायणाय नम: ” बोल कर हाथ धो ले।

3) प्राणायाम: धीरे-धीरे सांस अंदर लें और कुछ देर तक अंदर ही रोके रखें तथा धीरे-धीरे सांस बाहर छोड़ें। इस प्रक्रिया को प्राणायाम कहते हैं। निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करने के बाद सांस अंदर लेते समय आपको यह महसूस करना चाहिए कि सांस अंदर लेने से आपको शक्ति और इंद्रियां मिल रही हैं और सांस बाहर छोड़ते समय यह महसूस करना चाहिए कि हवा के साथ सारे पाप और बुरी आदतें बाहर जा रही हैं।

ॐ भू: ॐ भुव: ॐ स्व: ॐ मह:।
ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्यम्।
ॐ तत्सवितुर्रेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
ॐ अपोज्योतिर्सोअमृतं बह्मभूर्भुव स्व: ॐ।

4) शारीरिक प्रतिज्ञा: बाएं हाथ की हथेली पर जल लें और दाएं हाथ की पांचों अंगुलियों को जोड़कर जल में डालें और शरीर के विभिन्न अंगों को स्पर्श करें और महसूस करें कि आपके शरीर के सभी अंग पवित्र और स्वादिष्ट हो रहे हैं। इससे शरीर के अंगों में शक्ति आएगी और वे समझदार बनेंगे।

ॐ वधार्गमे अस्येऽस्तु (मुख को स्पर्श करें) ॐ नासोऽर्मे प्राणोऽस्तु (नासिका के दोनों छिद्रों को स्पर्श करें) ॐ अक्षनोर्मे चक्षुरस्तु (मोक्ष को स्पर्श करें) ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु (मुख को स्पर्श करें) ॐ बह्वोर्मे बलमस्तु (नासिका के दोनों छिद्रों को स्पर्श करें) स्पर्श करें) ॐ उवोर्मे ओजोऽस्तु (शरीर के सभी अंगों को स्पर्श करें) ॐ अरिष्टानि अङ्गानि सन्तु (शरीर के सभी अंगों को स्पर्श करें)
 
 

 
  

5) आसन की पूजा: किसी भी मंत्र का जाप करने से पहले आसन की पूजा करना आवश्यक है। इसके लिए निम्न मंत्र का जाप करें तथा आसन के नीचे त्रिकोण बनाकर उस पर चावल, फूल तथा थोड़ा जल डालकर पृथ्वी से प्रार्थना करें ताकि पृथ्वी का दोष दूर हो जाए।

ॐ ह्रीं क्लीं शक्ति शक्ति कमलासनाय नम:। ॐ पृथ्वी! त्वया घृतलोका देवी! त्वं विष्णुना घृत त्वं च धारय मां देवी! पवित्रं कुरु चासनम्। ॐ आधार शक्तये नमः ॐ कूर्मासनाय नमः ॐ अनंतसनाय नमः ॐ विमलासनाय नमः ॐ आत्मासनाय नमः।                 

6) दिशा-संकेत: निम्न मंत्र का जाप करते हुए सभी दिशाओं में जल और चावल छिड़कें और फिर एड़ी से तीन बार धरती पर वार करें। इससे नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाएगी और सिद्धि में कोई बाधा नहीं आएगी।

ॐ अपसर्पन्तु ते भूत: ये भूत: भूमि संस्थिता:। ये भूतः विघ्नकर्तारस्ते नाशयन्तु शिवाज्ञयः। अप्क्रमन्तु भूतानि पिशाचम्: सर्वतो दिशम्। सर्वेषामविरोधेन पूजा कर्म समारभे ॥
       
   

7) संकल्प: इसका अर्थ है कि बिना लक्ष्य के कोई भी व्यक्ति लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता, इसलिए जप से पहले संकल्प अवश्य लेना चाहिए। अपनी दाहिनी हथेली पर जल, एक सिक्का, चावल और संकल्प लें। साधना में पहले दिन संकल्प लें। आप पहले दिन ही पूरी अवधि के लिए संकल्प कर सकते हैं और हथेली का जल ज़मीन पर गिरा सकते हैं। - मंत्र विधान। 



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