सभी साधकों को प्रणाम
मानव जीवन की सार्थकता निरंतर आत्म-निरीक्षण और आत्म-बोध में निहित है। स्व-मूल्यांकन के ये चार सूत्र हमारे अस्तित्व की गहराइयों को मापने के पैमाने हैं। जब तक हम यह नहीं जानते कि हम कहाँ खड़े हैं, तब तक हम अपनी मंजिल की ओर सही दिशा में कदम नहीं बढ़ा सकते। यह विवेचना हमें अपनी वर्तमान स्थिति को तटस्थ भाव से देखने और उसमें सुधार करने की प्रेरणा देती है।
प्रथम विचारणीय बिंदु हमारी मान्यता और आंतरिक निष्ठा का है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और शक्ति—ये उस एक ही परम चेतना के विभिन्न क्रियात्मक रूप हैं। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि कौन बड़ा है, बल्कि यह है कि आपका अंतर्मन किस ऊर्जा के साथ लयबद्ध होता है? क्या आप सृजन की शक्ति से जुड़ाव महसूस करते हैं, या व्यवस्था और पालन के नियम आपको आकर्षित करते हैं? क्या आप परिवर्तन और वैराग्य के अधिपति शिव के प्रति समर्पित हैं, या उस आदि शक्ति की अनंत ऊर्जा में स्वयं को पाते हैं? आपकी यह मान्यता आपके जीवन के दृष्टिकोण और कार्य करने की शैली को निर्धारित करती है।
द्वितीय आयाम वर्णाश्रम का है, जो समय और उत्तरदायित्व के संतुलन का मार्ग है। वर्तमान समय में आप स्वयं को किस भूमिका में पाते हैं? क्या आप एक विद्यार्थी की भांति केवल सीखने और स्वयं को गढ़ने में लगे हैं? क्या आप गृहस्थ बनकर परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का बोझ उठा रहे हैं? अथवा आप वानप्रस्थ की उस दहलीज पर हैं जहाँ मोह का त्याग कर समाज को अपना अनुभव सौंपने की तैयारी की जाती है? या फिर आप एक संन्यासी की तरह पूरी तरह से अंतर्मुखी होकर उस परम तत्व की खोज में निकल पड़े हैं? अपनी वर्तमान अवस्था का सही बोध ही कर्म की कुशलता है।
तृतीय पक्ष हमारे बौद्धिक स्तर का है, जो हमारे विवेक की शुद्धता को दर्शाता है। क्या हमारी बुद्धि अभी अविकसित या जड़ है, जो केवल इंद्रियों के सुख और तुच्छ स्वार्थों में उलझी रहती है? क्या हम एक सामाजिक बुद्धि के स्तर पर हैं, जो लोक-व्यवहार और मर्यादाओं को तो समझती है, परंतु सत्य की गहराई से अनभिज्ञ है? साधना का वास्तविक लक्ष्य 'प्रज्ञा बुद्धि' को प्राप्त करना है। प्रज्ञा वह स्थिर और निर्मल दृष्टि है जो हमें संसार के प्रपंचों से ऊपर उठाकर सत्य के साक्षात दर्शन कराती है।
चतुर्थ और अंतिम बिंदु हमारे मानसिक स्तर का है। हमारी चेतना वर्तमान में किस धरातल पर निवास कर रही है? क्या हम अज्ञान की मूर्छित अवस्था में हैं, जहाँ जीवन केवल आदतों के वश चल रहा है? क्या हम कल्पनाओं के संसार में खोए हुए हैं, जहाँ यथार्थ का कोई स्थान नहीं? अथवा हम जागृत अवस्था में प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ हर कर्म होशपूर्वक होता है? जब यह जागरण अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है, तब आनंदमय अवस्था का उदय होता है। यही वह स्थिति है जहाँ दुःख का लेशमात्र भी शेष नहीं रहता।
इन चार बिंदुओं पर किया गया निष्पक्ष मूल्यांकन ही साधक को अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्मज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है।
साधकों के लिए चिंतन हेतु प्रश्न:
१- आप जिस भी इष्ट को मानते हैं, क्या उनके गुण आपके दैनिक व्यवहार में परिलक्षित होते हैं?
२- क्या आप अपने वर्तमान आश्रम के कर्तव्यों का निर्वहन बिना किसी शिकायत और मोह के कर पा रहे हैं?
३- अपनी बुद्धि को जड़ता से प्रज्ञा की ओर ले जाने के लिए आप प्रतिदिन क्या ठोस प्रयास कर रहे हैं?
४- मानसिक स्तर पर जागृत अवस्था को बनाए रखने के लिए आपके जीवन में अनुशासन का क्या महत्व है?
सभी साधकों की आंतरिक जागृति और निरंतर उन्नति की मंगलकामना के साथ।