सभी साधकों को प्रणाम
मानव जीवन की यात्रा में लक्ष्य का निर्धारण एक अत्यंत महत्वपूर्ण सोपान है। संसार का प्रत्येक प्राणी किसी न किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु निरंतर कर्मरत रहता है, परंतु वास्तविकता यह है कि केवल लक्ष्य को आंखों के सामने रख लेने मात्र से उसकी प्राप्ति संभव नहीं होती। हमारे जीवन में लक्ष्य के चिंतन से कहीं अधिक उसकी प्राप्ति की प्रक्रिया का ज्ञान होना अनिवार्य है। जब हम केवल गंतव्य के विषय में सोचते रहते हैं और उस तक पहुँचने के मार्ग, साधन और विधि से अनभिज्ञ होते हैं, तो यह स्थिति हमारे मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होती है। एक जागरूक और उत्तरदायी साधक वही है जो परिणाम की चिंता में डूबने के बजाय उस मार्ग की सूक्ष्मताओं को समझने का प्रयास करता है जो उसे अभीष्ट तक ले जाएगा।
प्रक्रिया का ज्ञान न होना मनुष्य को भ्रम और अंधकार की ओर धकेलता है। यदि हमें यह ज्ञात नहीं है कि किसी कार्य का मूल कारण क्या है, उसे पूर्ण करने की सही विधि क्या है और उस विधि के पालन से अंततः क्या परिणाम प्राप्त होगा, तो हम अनजाने में ही छल, कपट और लोभ के जाल में फंस जाते हैं। प्रक्रिया को छो़ड़कर सीधे परिणाम की इच्छा रखना ही अहंकार को जन्म देता है, जबकि चरण-दर-चरण विधि को पूर्ण करना वास्तविक पुरुषार्थ है। जो व्यक्ति प्रक्रिया की उपेक्षा करता है, वह निश्चित रूप से अपने बहुमूल्य समय और ऊर्जा का अपव्यय कर रहा है। जीवन की सार्थकता चमत्कारिक घटनाओं या केवल मनोरंजन की कहानियों में नहीं, बल्कि विषय की गहराई को समझने और उसकी उपयोगिता को अपने जीवन में उतारने की जिज्ञासा में निहित है। जब हम सत्य मार्ग की प्रक्रिया को अपनाते हैं, तभी हमें वह स्थिर और कल्याणकारी फल प्राप्त होता है जिसकी हम कामना करते हैं।
साधकों के लिए चिंतन हेतु प्रश्न:
क्या आप अपने वर्तमान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निर्धारित चरणबद्ध प्रक्रिया से पूर्णतः परिचित हैं?
क्या लक्ष्य प्राप्ति की व्याकुलता आपको प्रक्रिया के प्रति लापरवाह बना रही है?
प्रक्रिया का पालन करते समय क्या आप लोभ और अहंकार जैसे विकारों से मुक्त रहकर पुरुषार्थ कर पा रहे हैं?
No comments:
Post a Comment