सभी साधकों को प्रणाम
अध्यात्म के पथ पर अग्रसर होने के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि हमारे कर्म और हमारी पात्रता के बीच की सबसे बड़ी बाधा क्या है। प्रायः संसार में हम सदाचार और शिष्टता को ही अंतिम लक्ष्य मान लेते हैं। एक व्यक्ति समाज की दृष्टि में सज्जन हो सकता है, परोपकारी हो सकता है और नैतिक मूल्यों का पालन करने वाला भी हो सकता है, परंतु यदि उसके इन समस्त शुभ कार्यों के पीछे 'मैं' का भाव दृढ़ है, तो वह ईश्वरीय विधान के सूक्ष्म हिसाब-किताब से मुक्त नहीं हो पाता। इसका कारण यह है कि अहंकार केवल बुराई में ही वास नहीं करता, वह अच्छाई का मुखौटा पहनकर और भी अधिक सूक्ष्म हो जाता है। जब हमें अपनी सज्जनता का गर्व होने लगता है, तब वह अहंकार ही हमें उस परम सत्ता के चरणों में झुकने से रोक देता है।
समर्पण कोई विवशता नहीं, बल्कि एक गहरी समझ है। यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसका कर्ता मैं नहीं हूँ। अहंकार सदा परिणामों पर अधिकार जताना चाहता है और यही अधिकार भाव हमें ईश्वरीय न्याय की परिधि से बाहर रखता है। आध्यात्मिक यात्रा का वास्तविक आरंभ तभी होता है जब साधक अपने अहंकार का विसर्जन कर पूर्णतः समर्पित हो जाता है। इस समर्पण के उपरांत ही जीवन में न्याय का उदय होता है, जहाँ साधक अपने प्रत्येक कर्म को निष्पक्ष भाव से देख पाता है।
न्याय की इस अवस्था से गुजरने के बाद ही पूर्ण शुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है, जिसे हम आत्म शुद्धि कहते हैं। यह वह अवस्था है जहाँ अंतःकरण के समस्त मल, विक्षेप और सूक्ष्म संस्कार भस्म हो जाते हैं। बिना पूर्ण शुद्धि के चित्त उस परम चेतना को प्रतिबिंबित करने के योग्य नहीं बनता। अतः इस यात्रा में सज्जनता केवल एक पड़ाव है, अंतिम गंतव्य तो वह पूर्ण शुद्धि है जो केवल निरहंकार और समर्पित भाव से ही संभव है।
साधकों के लिए आत्म-चिंतन हेतु प्रश्न:
१- क्या आपकी सज्जनता आपके भीतर सूक्ष्म गर्व को जन्म दे रही है जो आपको झुकने से रोकता है?
२- क्या आप अपने शुभ कर्मों के परिणामों को ईश्वर को सौंपने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं?
३- आपके दैनिक जीवन में वह कौन सी परिस्थिति है जहाँ आपका अहंकार समर्पण के मार्ग में बाधा बनता है?
शुभम।
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