Tuesday, February 17, 2026

जीवन रहस्यम् - ९२ -( लेन-देन कर्म बंधन का आधार है )

प्रणाम मित्रों,
सृष्टि का यह अटल विधान अत्यंत सूक्ष्म और न्यायपूर्ण है। जिसे हम चालाकी या बौद्धिक श्रेष्ठता समझकर किसी वस्तु या सेवा का कम मूल्य चुकाते हैं, वह वास्तव में एक अदृश्य ऋण का सृजन होता है। जब हम अपनी सुख-सुविधाओं के लिए दूसरे के श्रम, समय या संसाधनों का उचित हर्जाना नहीं देते, तब प्रकृति उस शेष राशि को हमारे कर्मों के खाते में 'देयता' के रूप में अंकित कर देती है। यह ऋण केवल धन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भावनाएं और ऊर्जा भी सम्मिलित हैं।
इसके विपरीत, जब हम किसी वस्तु की वास्तविक उपयोगिता से अधिक मूल्य चुकाते हैं या निस्वार्थ भाव से अतिरिक्त अर्पण करते हैं, तब हम ब्रह्मांड के 'लेनदार' बन जाते हैं। यह चक्र एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जहाँ प्रत्येक क्रिया अपनी प्रतिक्रिया को जन्म देती है। वर्तमान में प्राप्त होने वाले सुख भी हमारे पूर्व में किए गए किसी 'अतिरिक्त भुगतान' का ही प्रतिफल होते हैं। यह संतुलन ही संसार की गतिशीलता को बनाए रखता है, जहाँ न तो कुछ व्यर्थ जाता है और न ही कुछ बिना कारण प्राप्त होता है।
साधकों के लिए आत्म-चिन्तन हेतु प्रश्न:
क्या आज के पूरे दिन में आपने किसी व्यक्ति के श्रम का उचित सम्मान और मूल्य दिया, या कहीं अपनी बुद्धि का प्रयोग करके उसे कम आंकने का प्रयास किया?
जब आप किसी सेवा का लाभ उठाते हैं, तो क्या आपके मन में कृतज्ञता का भाव होता है या आप उसे अपना अधिकार मानकर केवल न्यूनतम मूल्य देने का विचार करते हैं?
क्या आप अपने वर्तमान सुखों को केवल अपनी मेहनत का फल मानते हैं, या यह अनुभव करते हैं कि इनके पीछे प्रकृति का कोई पुराना हिसाब चुकता हो रहा है?
सृष्टि के इस न्याय पर पूर्ण विश्वास ही हमें सजग और ईमानदार बनाता है।

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