Sunday, September 30, 2018

ЁЯСЙрдЕрдХाрд▓ рдоृрдд्рдпु рд╕े рдмрдЪрдиे рд╣ेрддु 100% рдХाрд░рдЧрд░ рдЙрдкाрдп :-

👉अकाल मृत्यु से बचने हेतु 100% कारगर उपाय :-

जो एक बार रोज सुबह घर से निकलते समय महा मृत्युंजय मंत्र जप कर के निकलता है , उसको एक्सीडेंट से अकाल मृत्यु में फिसलने का भय नहीं रहता |
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👉मंत्र :-
ॐ हौं जूँ सः । ॐ भूर्भुवः स्वः । ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम् उर्व्वारुकमिव बन्धानान्मृत्यो मृक्षीय मामृतात् । ॐ स्वः भुवः भूः ॐ । सः जूँ हौं ॐ ।

अथवा तो :
दीपावली के बाद आने वाली देव-जगी एकादशी के दिन , संध्या के समय कपूर आरती करने से वर्ष भर अकाल-मृत्यु से रक्षा होती है; एक्सीडेंट, आदि उत्पातों से रक्षा होती है |
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Thursday, September 20, 2018

ЁЯСЙрдПрдХ рдЙрдкрдпोрдЧी рдиोрдЯ рд╢ेрдпрд░ рдХрд░рдиा рдЪाрд╣рддा рд╣ूँ .

एक उपयोगी नोट शेयर करना चाहता हूँ .

हिन्दी की मात्राओं में अक्सर हम अन्जाने में गलती कर बैठते हैं . एक बहुत ही सुंदर नोट मिला आप सभी से साझा करने का मन हुआ.... लीजिए ..

♧ आओ हिन्दी सुधारें ♧

हिन्दी लिखने वाले अक़्सर 'ई' और 'यी' में, 'ए' और 'ये' में और 'एँ' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं...।

कहाँ क्या इस्तेमाल होगा, इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...।

> जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं क्रियाएँ नहीं... जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई-बुझाई...।

> इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है... इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...। इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...। 'नई' ग़लत है , सही शब्द 'नयी' है... मूल शब्द 'नया' है , उससे 'नयी' बनेगा...।

> क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...?
( 'मिलाई' ग़लत है...।)
आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...।
( 'जताई' ग़लत है...।)
उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...। ('पाई' ग़लत है...।)

> अब आइए 'ए' और 'ये' के प्रयोग पर...।
बच्चों ने प्रतियोगिता के दौरान सुन्दर चित्र बनाये...। ( 'बनाए' नहीं...। )
लोगों ने नेताओं के सामने अपने-अपने दुखड़े गाये...। ( 'गाए' नहीं...। )
> दीवाली के दिन लखनऊ में लोगों ने अपने-अपने घर सजाये...। ( 'सजाए' नहीं...। )

> तो फिर प्रश्न उठता है कि 'ए' का प्रयोग कहाँ होगा..?

> `ए' वहाँ आएगा जहाँ अनुरोध या रिक्वेस्ट की बात होगी...।

> अब आप काम देखिए, मैं चलता हूँ...। ( 'देखिये' नहीं...। )
आप लोग अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी के विषय में सोचिए...। ( 'सोचिये' नहीं...। )
नवेद! ऐसा विचार मन में न लाइए...। ( 'लाइये' ग़लत है...। )

> अब आख़िर (अन्त) में 'यें' और 'एँ' की बात... यहाँ भी अनुरोध का नियम ही लागू होगा... रिक्वेस्ट की जाएगी तो 'एँ' लगेगा , 'यें' नहीं...।
आप लोग कृपया यहाँ आएँ...। ( 'आयें' नहीं...। )
जी बताएँ , मैं आपके लिए क्या करूँ ? ( 'बतायें' नहीं...। )
>मम्मी , आप डैडी को समझाएँ..।( 'समझायें' नहीं..। )

अन्त में सही-ग़लत का एक लिटमस टेस्ट... एकदम आसान सा... जहाँ आपने 'एँ' या 'ए' लगाया है , वहाँ 'या' लगाकर देखें...। क्या कोई शब्द बनता है ? यदि नहीं , तो आप ग़लत लिख रहे हैं...।

> आजकल लोग 'शुभकामनायें' लिखते हैं... इसे 'शुभकामनाया' कर दीजिए...। 'शुभकामनाया' तो कुछ होता नहीं , इसलिए 'शुभकामनायें' भी नहीं होगा...।
'दुआयें' भी इसलिए ग़लत हैं और 'सदायें' भी... 'देखिये' , 'बोलिये' , 'सोचिये' इसीलिए ग़लत हैं क्योंकि 'देखिया' ,

'बोलिया' , 'सोचिया' कुछ नहीं होते...।

साभार शिक्षक परिवार

*हिन्दी दिवस की मंगलकामनाएं*

Wednesday, September 19, 2018

ЁЯСЙрд╕ुрдмрд╣ рдХी рдЖрд░рддी рдоाрддा рд╡ैрд╖्рдгोрджेрд╡ी рдХी

सुबह की आरती माता वैष्णोदेवी की

ॐ श्री गणेशाय नमः

ॐ वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ,निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकडार्येषु सर्वदा:!!

अथ सप्तशलोकी दुर्गा
                     शिव उवाच-
देवि त्मं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।
क्लौ  हि कार्यसिद्धैयर्थमुपायं ब्रूही यत्नत:॥
                 देव्युवाच-
शृणु देव प्रवक्ष्यामि क्लौ सर्वेष्टसाधनम् ।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुति: प्रकाश्ते ।।

ॐ अस्य श्रीदुर्गा सप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य
नारायण ऋषि:
अनुष्टुप छन्दः श्री महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता:
श्री दुर्गाप्रित्यर्थं सप्तशलोकीदुर्गापाठे विनियोग:

ॐ ज्ञानिनामपि चितांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥१॥
दु्र्ग स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्रयदु:खभयहारिणि का तवन्दया
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचिता ॥२॥
सर्वमङ्रलमाङ्रल्ये शिवे        सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते
॥३॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते
॥४।।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते
॥ ५ ॥
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्यश्रयतां प्रयान्ति ।।६ ॥
सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्
॥ ७ ॥

श्री दुर्गाष्टोत्तरश्तनामस्तोत्रम्
                ईश्वर उवाच
शतनाम प्रवक्ष्यामि श्रृणुष्व कमलानने ।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती
॥  १ ॥
ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी ।
अार्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी
॥ २ ।।

पिनाकधारिणी चित्रा  चण्डघण्टा महातपा: ।
मनो बुद्धिरहंकारा चितरूपा चिता चिति: ।। ३ ।।

सर्वमन्त्रमयी सता सत्यानन्दस्वरूपिणी ।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागति: ।। ४ ।।

शाम्भवी देवमाता च रत्नप्रिया सदा ।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी
।। ५ ॥

अर्पणानेकर्वणा च पाटला पाटलावती ।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी
।।  ६ ।।

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी ।
वनदुर्गा च मातङ्री मतड्रमुनिपूजिता
॥ ७ ।।

ब्राह्मी मोहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा ।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीशच पुरुषाकृति: ।। ८ ।।

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा ।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ।। ९ ॥

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी ।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी
।। १० ॥

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी ।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारणी तथा
।। ११ ॥

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी ।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यति:
।। १२ ॥

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा ।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला ॥ १३ ॥

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रितपस्विन ।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी
॥ १४ ॥

शिवदूती कराली च अनन्ता परेमेश्वरी ।
कात्यायनी च सवित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी
॥ १५॥

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम् ।
नासाध्यं विद्यते देवी त्रिषु लोकेषु पार्वती
॥ १६ ॥

धनं धान्यं संतु जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं शाशावतीम्
।। १७ ॥

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।

पूजयते् परया भक्तया पठेन्नामशाताष्टकम्
॥ १८ ॥

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवी सर्वै: सुरवरैरपि ।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवापनुयात् ।। १९ ॥   

  गोराचनालक्तककुङमेन  
                  सिन्दूरकर्पूरमधुत्रेयण ।

विलख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो
भवेत् सदा धारयते पुरारि: ॥ २० ॥

भौमावास्यनिशामग्रे चन्द्रे शताभिषां गते ।
विलख्य प्रपेठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम् ॥ ३१ ॥

अथ देब्या: कवचम्

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषि: अनुष्टुप् छन्द:, चामुण्डा देवता,
अङ्रन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तवम्, श्री जगदम्बाप्रीत्यर्थे
सप्तशतीपाठाङ्रत्वेन जपे विनियोग:

              ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

               मार्कण्डेय उवाच

ॐ यद्गुह्मं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्  ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रुही पितामाह  ।। १ ॥
                  ब्रह्मोवाच

अस्ति गुह्मतमं विप्र
                     सर्वभूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने   ।। २ ।।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्   ।। ३ ॥

पञचमं स्कन्दमातेति षष्टं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रिति महागौरीति चाष्टमम्  ॥ ४ ।।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता: ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्राह्मणैव महात्मना ॥ ५ ॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गति रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ता: शरणं गता:
॥ ६ ॥

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे ।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदु:खभयं न हि ॥ ७ ॥

यैस्तु भक्तया स्मृता नयंन तेषां वृद्धि प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवशि रक्षसे तान्न संशय: ।। ८ ॥

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ।। ९ ।।

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखीवाहना ।
लक्ष्मी:पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ।। १० ।।

श्वेतरूपधरा  देवी ईश्वरी वृषवाहना ।
ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता ।। ११ ॥

इत्येता मात्र: सर्वा सर्वयोगसमन्विता:

नानाभरणशोभाढ्या        नानारत्नोपशोभिता: ।। १२ ॥

दृश्यन्ते रथमारुढा देव्या क्रोधसमाकुला्: ।
शखं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ।। १३ ।।

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्रमायुधमुत्तंमम् ।। १४ ।।

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥१५ ।।

नमस्तेस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥ १६ ॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्येय्यामग्निदेवता ।। १७ ।।

दक्षिणेवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी ।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ।।१८ ॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी
ऊधर्वं ब्राह्मणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ।। १९ ॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना ।
जया मे चाग्रत: पातु विजया पातु पृष्ठत: ॥ २० ॥

अजिता वामपाश्र्वे तु दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मुध्र्नि व्यवस्थिता ॥ २१ ॥

मालाधरी लालाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्य यमघण्टा च नासिके ।। २२ ॥

शखिंनी चक्षुषोर्मध्य श्रोत्रयोर्द्वावासिनी ।
कपालौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ॥ २३ ॥

नासिकायां सुगन्धा  च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ।। १४ ॥

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघण्टा च माहामाया च तालुके ॥ २५ ॥
कामाक्षी चिबकं रक्षेद् वाचं सर्वमङ्रला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥ २६ ॥

नीलग्रीवा बहि: कण्ठे नलिकां नलकबूरी ।
स्कन्धयो: खड्गिनी रक्षेद् बाहु मे वज्रधारिणी ॥२७ ॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ।। २८ ॥

स्तंनो रक्षेन्महादेवी मन: शोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदेरे शूलधारिणी ।। २९ ॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्मं गुह्मश्वरी
तथा ।
पूतना कामिका मेढ्रं गूदे महिषवाहिनी ।। ३० ॥

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायीनी
।। ३१ ।।

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी ।
पादाङ्रुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ।। ३२ ॥

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोध्र्वकेशिनी ।
रोमकूपेषु कौबरी त्वचं वागीश्वरी तथा ।। ३३ ।।

रत्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसी पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ।। ३४ ॥

पद्मावती  पद्मकोशे कफे चूडामणिस्ता ।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ।। ३५ ॥

शुक्रं ब्रह्मणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी
तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ।। ३६ ॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ।।३७ ॥

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ।। ३८ ।।

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यश: कीर्ति च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ॥ ३९ ॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान्  रक्षेन्महालक्ष्मीभार्यां रक्षतु भैरवी ॥ ३० ॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा ।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वत: स्थिता ।। ४१ ।।

रक्षाहीनं तु यतस्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी  ।। ४२ ।।

पदमेकं न गच्छेत्तु यदिच्छेच्छुभमात्मन: ।

कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ॥ ४३ ॥

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजय: सार्वकामिक: ।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्येत भूतले पुमान् ॥ ४५ ।।

निर्भयो जायते मतर्य: संग्रामेष्वराजिता: ।
त्रैलोक्य तु भवेत्पूज्य: कवचेनावृत:पुमान् ॥ ४५ ॥

इदं तू देव्या: कवचं देवानामपि दुर्लभम ।
य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्धयं श्रद्धायान्वित: ।। ४६।।

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजित: ।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जित: ॥ ४७ ।।

नश्यन्ति व्याधय: सर्वे लूताविस्फोटकादय: ।
स्थावरं जङ्रमं चैव कृत्रिमं ( यद्विषम् ॥ ४८ ।।

अभिचारिणि सर्वाणि मनत्रयन्त्राणि भूतले ।
भूचरा खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिका: ॥ ४९ ॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला: ।। ५० ॥

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा: ।
ब्रह्मराक्षसवेताला: कूष्माण्डा भैरवादय : ॥ ५१ ।।

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।
मानोन्नतिर्ववेद् राज्ञस्तेजोवद्धिकरं
परम् ॥ ५२ ।।

यशसा वर्धते सोपि किर्तिमण्डितभूतले ।
जपेत्सप्तशतीं चण्डी कृत्वा तु कवचं पुरा ॥ ५३ ॥

यावद्भूमण्डलं धते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संतति: पुत्रपौत्रिकी ॥ ५४।।

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।
प्राप्नोति पुरुषों नित्यं महामायाप्रसादत: ॥ ५५॥

लभते परमं रुपमें शिवेन सह मोदते ।। ॐ ॥ ५६ ॥

अथर्गलास्तोत्रम्
     ॐ अस्य श्री अर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य
     विष्णुर्ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द: श्री
    महालक्ष्मीदेंवता, श्री जगदम्बाप्रीतये 
    सप्तशतीपाठाङ्रत्वेन जपे विनियोग: ।।

            ॐ नमश्चण्डिकायै ।।

               मार्कण्डेय उवाच
ॐ जयन्ती मङ्रला काली भद्रकाली   कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु  ते ।। १ ॥
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तु ।। २।।

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नम: ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि  ।। ३ ।।

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां दिखदे नम: ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। ४ ।।

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देह द्विषो जहि ।। ५ ।।

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूमाक्षस्य च मर्दिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि  ।। ६ ।।

वन्दिताङघ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि  ।। ७ ।।

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि  ।। ८ ।।

नतेभ्या: सर्वदा भक्तया चण्डिके दुरितापहे ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि   ।। ९ ।।

स्तुवद्भ्यो भक्तपूर्वं त्वां चण्डिके
                            व्याधिनाशिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि  ।। १० ।।

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तित: ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। ११ ।।

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि में परमं सुखम् ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १२ ।।

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकै: ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १३ ।।

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्  ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि   ।। १४ ।।

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेम्बिके ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि  ।। १५ ।।

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं करु ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १६ ।।

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि   ।। १७ ।।

चतुर्भजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि   ।। १८ ।।

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्तया सदाम्बिके ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि     ।। १९ ।।

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरी ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि   ।। २० ।।

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। २१।।

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि  ।। २२।।

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेम्बिके ।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि   ।। २३ ।।

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणिम् ।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ।। २४ ।।

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नर: ।
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्  ॥ ॐ ॥ २५ ॥

अथ कीलकम

ॐ अस्य श्री कीलकमन्त्रस्य शिव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्रीमहासरस्वती देवता,  श्रीजगदम्बा-
प्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्रत्वेन जपे विनियोग: ॥

           ॐ नमश्चण्डिकायै॥

              मार्कण्डेय उवाच
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाये त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।
श्रेय प्राप्तिनिमित्ताय नम: सोमार्धधारिणे ।। १ ॥

सर्वमेतद्बिज्ञानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् ।
सोपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्पर: ॥२ ॥

सिद्धयन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि ।
एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति ।। ३ ॥

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते ।
विना जाप्येन सिद्धयति सर्वमुच्चाटनादिकम् ॥ ४ ॥

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशक्मिमां हर: ।
कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ॥ ६ ॥

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार स: ।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ॥ ६ ॥

सोपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशय: ।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहित: ॥ ७ ॥

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवन कीलितम् ॥ ८ ॥

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम् ।
स सिद्ध: स गण: सोपि गन्धर्वो जायते नर: ॥ ९ ॥

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते ।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥ १० ॥

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वित न कुर्वाणो विनश्यति ।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधै: ॥ ११ ॥

सौभाग्यादि  च यत्किञ्चिद्  दृश्यते ललनाजने ।
तत्सर्व तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ।। १२ ॥

शनैस्तु जप्यमानेस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकै: ।
भवत्येव समग्रापि तत: प्रारभ्यमेव तत् ॥ १३ ॥

ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पद: ।
शत्रुहानि: परो मोक्ष: स्तूयते सा न किं जनै: ॥ॐ॥ १४ ॥

श्री महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम्

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनी विश्वविनोदिनी नन्दनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोधिनिवासिनि
विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १ ।।

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्विषमोषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिंधुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। २ ।।

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते ।
शिखरिशिरोमणि तुंगहिमालय
श्रृंगनिजालयमध्यगते
मधुमधुरे मधुकैटभंगजिनि कैटभभंजिनि रासरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरूण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते ।
निजभजुदण्ड निपातित खण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृतप्रथमाधिपते ।
दूरित दुरीहदुराशय दुर्मति दानवदूतकृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। ५ ॥

अयि शरणागतवैरिवधूवरवीरवराभय
दायिकरे
त्रिभुवन मस्तकशूलविरोधि शिरोधिकृतामल शूलकरे
दुमिदुमितामरदुंदुभिनाद महो मुखरीकृत तिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। ६ ॥

अयि निज हुंकृतिमात्र निराकृत धूम्र विलोचन धू्म्रशते
समर विशोषितशोणितबीजसमुद्,-
भवशोणित बीजलते ।
शिव शिव शुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पित भूतपिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। ७ ॥

धनुरनुसंग रणक्षणसंग परिस्फुरदंग नटत्कटके
कनकपिशंग पृषत्कनिषंगरसद्-
भटश्रृंग हताबटुके
कृतचतुरंग बलक्षितिरंग घटदबहुरंग रटदबटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। ८ ॥

जय जय जप्यजये जय शब्दपरस्तुति तत्परविश्वनुते
झण झणझिमझिम झिंकृतनूपुर सिंजित मोहितभुतपते ।
नटित नटार्धनटिनट नायक नाटित नाट्यसुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। ९ ॥

अयि सुमन: सुमन: सुमन: सुमन: सुमनोहर कान्तियुते
श्रित रजनीरजनीरजनीरजनीरजनी-
कर वक्त्रवृते ।
सुनयन विभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमर भ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १० ॥

सहित महाहवमल्लमतल्लिकमल्लितरल्क मल्लरते ।
विरचितवल्लिकपल्लिकमल्लिकभिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते ।
सितकृत पुल्लसमुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। ११ ॥

अविरल गण्डगलन्मदमेदुरमत्तमतंगजराजपतेत्रिभुवनभूषणभूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजनलालसमानसमोहनमन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १२ ।।

कमलदलामल कोमलकान्तिकलाकलितामलभाललते
सकलविलासकलानिलयक्रम
केलिचलत्कलहंसकुले ।
अलिकुलसंकुलकुवलयमण्डलमौलिमिलदबकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १३ ॥

करमुरलीवरवीजितकूजितलज्जितकोकिलमंजुमते
मिलितपुलिन्दमनोहरगुंजितरंजिशैलनिकुंजकते ।
निजगुणभूतमहाशबरीगण सदगुणसंभृतकेलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १४ ॥

कटितटपीतदुकूलविचित्रमयूख
तिरस्कृतचन्द्ररुचे
प्रणत सुरासुरमौलिमणिस्फुर दंशुल सन्नख चन्द्ररुचे ।
जितकनकाचलमौलिपदोर्जित निर्भर कुजंर कुंभकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १५ ॥

विजित सहस्रकरैकसहस्रकरैकसहस्रकैरक- नुते
कृतसुरतारकसंगरतारकसंगरतरक
सूनुसते ।
सुरथसमाधिसमानसमाधिसमाधि
समाधि सुजातरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १६ ।।

पदकमलं कृरणानिलये वरिवस्याति योनुदिनं स शिवे
अयि कमले कमलानिलय कमलानिलय: स कथ न भवेत् ।
तव पदमेव परंपदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १७ ।।

कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनु सिंचिनुतेगुण रंगभुवं
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरंभसुखानु- भवम् ।
तवचरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासी शिवं
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १८ ।।

तव विमलेन्दु कुलं वदेनन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमू पूरूहूत पुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखी क्रियते ।
मम तु मतं शिवनाम धने भवती कृपया किंतु क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। १८ ॥

अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररी करूतादरूतापमपाकुरूते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।। २० ॥

क्षमा - प्रार्थना
अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेहर्निशं मया । दासोय्यमिती मां मत्वा क्षमस्व परमेश्‍वरि ॥ १ ॥

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां चैव न जानामि  क्षम्यतां परमेश्‍वरि ॥२॥

मन्त्रहीनं  क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्‍वरी ।
यत्पूजितं मया देवी परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ ३॥

अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।
यां गतिं समवाप्न्नोति न तां ब्रहादयः सुराः ॥४॥ 

सापराधोस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके । इदानीमनुकम्प्योहं यथेच्छसि तथा करू ॥ ५॥ 

अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यञ्यूनमधिकं कृतम् ।
तत्सर्व श्वम्यतां देवी प्रसीद परमेश्‍वरि ॥६॥

कामेश्‍वरि जगन्नातः सच्चिदानन्दविग्रह ।
ग्रहणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्‍वरी ।। ७॥

गुहातिगुहागोप्त्री त्मं गृहाणास्मत्कृतमं जपम ।
सिद्धिभर्रवतु मे देवी त्वत्प्रसादात्सुरश्‍वरि ॥ ८ ॥     
                                                                                                                       ****----------॥  श्रीदु्र्गार्पणमस्तु   ॥

आरती वेला - आरती वेला

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी मैया जय मगंल करनी मैया जय आनन्द करनी।
तुमको निशदिन ध्यावत, मैया जी को निशदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमदको
मैया टीको मृगमदको ।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे मैया रक्ताम्बर राजै ।
रक्त-पुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी  मैया खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती
मैया नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर, कोटिक चद्रं दिवाकर सम राजत ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती  मैया महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे 
मैया शोणित बीज हरे ।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी
मैया तुम कमलारानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू  मैया नृत्य करत भैंरू  ।
बाजत ताल मृदंगा, अौर बाजत डमरू ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता
मैया तुम ही हो भरता ।
भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पति
करता ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी 
मैया वरमुद्रा धारी ।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती मैया अगर कपूर बाती ।
श्री मालकेतु में राजत, श्री मालकेतु कोटि रतन ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी
श्री अंबेजी की आरती, मैया जी की आरती जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी, कहत हरिहर स्वामी मनवांछित फल' पावे
ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी मैया जय मगंल करनी मैया जय आनन्द करनी। तुम को निशदिन ध्यावत हरी ब्रह्मा शिवरी

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दुर्गा सप्तशती के दुर्लभ प्रयोग
दुर्गा शप्तशती आज के कलयुग में एक बहुत ही प्रभावी और तीव्र प्रभाव देने वाला चरित्र है इसको यदि समुचित तरीके से प्रयोग किया जाये तो एक व्यक्ति को उसके सभी प्रश्नों और समस्यायों का निवारण इसके श्लोकों में निहित है -!

मेरा अपना मानना तो ये हैं की इस पुस्तक कि जरुरत हर एक घर में है और साथ ही इसके विधानों कि जानकारी भी प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है -!

लेकिन विधि का विधान भी बहुत बड़ा है – मैंने स्पष्ट देखा है कि यदि आपके भाग्य में कष्ट लिखा हुआ है तो सामने आपका समाधान लिए हुए कोई व्यक्ति खड़ा है और बार – बार दोहरा रहा है कि ऐसे कर लो तो समस्यायों से मुक्त हो जाओगे लेकिन आपके पास समय ही नहीं होता कि आप किसी कि बात सुन सकें या किसी विधान को कर सकें -!

आज का समाज इतना भौतिक हो गया है कि सभी खुश रहना चाहते हैं लेकिन खुद को खुश रखने के लिए जब प्रयास करने कि बारी आती है तो प्रतिनिधि तलाश करने लग जाते हैं जो उनके बदले कुछ ले देकर जो भी करना है कर दे और जिसका फल उन्हें तत्काल मिल जाये ।

लेकिन कोई भी ये नहीं सोचता कि ऐसा कैसे सम्भव हो सकता कि करे कोई और पाये कोई और – इसलिए अपने लिए समय आप ही निकालें – इस दुनिया का नियम है और सबको पता भी है की जितनी मेहनत आप करेंगे – सुख भी उसका उतना ही आप भोगेंगे – इसलिए जहाँ जरुरत महसूस हो वहाँ अपने पुरोहित या जानकारों कि मदद अवश्य लें और कोई भी साधना उनके मार्गदर्शन नहीं करें संकोच न करें – लेकिन जहाँ जरुरत न हो वहाँ हर विधान को खुद ही पूरा करने कि कोशिश करें – क्या पता आप जिस उद्देश्य से या जिस इच्छा कि पूर्ति के लिए धन देकर प्रतिनिधि खरीद रहे हैं वह प्रतिनिधि जिस विधान को करेगा तो उतनी आर्द्र भावना को व्यक्त करेगा भी या नहीं -!

फिर क्या होगा ? परिणाम भी उसी भावना के अनुसार मिलेगा ना क्योंकि किसी भी साधना या आराधना में भावना प्रधान होती है -!

नवरात्रों का आगमन होने ही वाला है इस क्रम में मैं कुछ विशिष्ट उपाय जो शप्तशती कि पुस्तक साथ रखकर किये जा सकते हैं वर्णित करने जा रहा हूँ – आशा करता हूँ कि माँ महामाया आप सबको उन्नति और समस्यारहित जिंदगी का वरदान अवश्य प्रदान करेंगी

दुर्गा सप्तशती से कामनापूर्ति :-

१. लक्ष्मी, ऐश्वर्य, धन संबंधी प्रयोगों के लिए पीले रंग के आसन का प्रयोग करें

२. वशीकरण, उच्चाटन आदि प्रयोगों के लिए काले रंग के आसन का प्रयोग करें

३. बल, शक्ति आदि प्रयोगों के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें

४. सात्विक साधनाओं, प्रयोगों के लिए कुश के बने आसन का प्रयोग करें

५. वस्त्र- लक्ष्मी संबंधी प्रयोगों में आप पीले वस्त्रों का ही प्रयोग करें

६. यदि पीले वस्त्र न हो तो मात्र धोती पहन लें एवं ऊपर शाल लपेट लें

७. आप चाहे तो धोती को केशर के पानी में भिगोंकर पीला भी रंग सकते हैं

हवन करने से आपको ये लाभ मिलते हैं :-

१. जायफल से कीर्ति

२. किशमिश से कार्य की सिद्धि

३. आंवले से सुख और

४. केले से आभूषण की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार फलों से अर्ध्य देकर यथाविधि हवन करें

अ. खांड

ब. घी

स गेंहू

ड. शहद

य. जौ

र. तिल

ल. बिल्वपत्र

व. नारियल

म. किशमिश

 
झ. कदंब से हवन करें

५. गेंहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है

६. खीर से परिवार वृद्धि

७. चम्पा के पुष्पों से धन और सुख की प्राप्ति होती है

८. आवंले से कीर्ति

९. केले से पुत्र प्राप्ति होती है

१०. कमल से राज सम्मान

११. किशमिश से सुख और संपत्ति की प्राप्ति होती है

१२. खांड, घी, नारियल, शहद, जौं और तिल इनसे तथा फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है

विधि :-

व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य को अत्यंत नम्रता के साथ प्रमाण करें और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दें। इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। नवरात्र व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

नवार्ण मंत्र को मंत्रराज कहा गया है और इसके प्रयोग भी अनुभूत होते हैं :-

नर्वाण मंत्र :-

।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।

परेशानियों के अन्त के लिए :-

।। क्लीं ह्रीं ऐं चामुण्डायै विच्चे ।।

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए :-

।। ओंम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।

शीघ्र विवाह के लिए :-

।। क्लीं ऐं ह्रीं चामुण्डायै विच्चे ।।

सप्त-दिवसीय श्रीदुर्गा-सप्तशती-पाठ

सप्तशती :- जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि ऐसा चरित्र या एक ऐसा संग्रह जो सात सौ (श्लोकों) का समूह है – दुर्गा शप्तशती में कुल सात सौ श्लोकों का संग्रह है -!

इसमें पाठ करने का जो क्रम बताया गया है वह निम्न प्रकार है :-

दिनअध्यायप्रथमअध्याय १द्वितीयअध्याय २ – ३तृतीयअध्याय ४चतुर्थअध्याय ५ – ६ – ७ – ८पँचमअध्याय ९ -१०षष्ठअध्याय ११सप्तमअध्याय १२ – १३

इस प्रकार से सात दिनों में तेरहों अध्यायों का पाठ किया जाता है -!

१. पहले दिन एक अध्याय

२. दूसरे दिन दो अध्याय

३. तीसरे दिन एक अध्याय

४. चौथे दिन चार अध्याय

५. पाँचवे दिन दो अध्याय

६. छठवें दिन एक अध्याय

७. सातवें दिन दो अध्याय

पाठ कर सात दिनों में श्रीदुर्गा-सप्तशती के तीनो चरितों का पाठ कर सकते हैं

श्रीदुर्गा-सप्तशती-पाठ विधि :-

सबसे पहले अपने सामने ‘गुरु’ और गणेश जी आदि को मन-ही-मन प्रणाम करते हुए दीपक को जलाकर स्थापित करना चाहिए। फिर उस दीपक की ज्योति में भगवती दुर्गा का ध्यान करना चाहिए।

ध्यान :-

ॐ विद्युद्दाम-सम-प्रभां मृग-पति-स्कन्ध-स्थितां भीषणाम्।
कन्याभिः करवाल-खेट-विलसद्-हस्ताभिरासेविताम् ।।
हस्तैश्चक्र-गदाऽसि-खेट-विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीम्।
विभ्राणामनलात्मिकां शशि-धरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ।।

ध्यान के पश्चात् पंचोपचार / दशोपचार / षोडशोपचार से माता का पूजन करें – इसके बाद उपरोक्त वर्णित विधि के अनुसार शप्तशती का पाठ करें :-

पंचोपचार पूजन / दशोपचार पूजन / षोडशोपचार पूजन

आत्मशुद्धि

संकल्प

शापोद्धार

कवच

अर्गला

कीलक

शप्तशती पाठ ( दिवस भेद क्रम में )

तत्पश्चात माता से क्षमा प्रार्थना करें – क्षमा प्रार्थना का स्तोत्र भी आपको शप्तशती में ही मिल जायेगा – !

इसके द्वारा ज्ञान की सातों भूमिकाओं :-

१. शुभेच्छा

२. विचारणा

३. तनु-मानसा

४. सत्त्वापति

५. असंसक्ति

६. पदार्थाभाविनी

७. तुर्यगा

सहज रुप से परिष्कृत एवं संवर्धित होती है

इसके अतिरिक्त किस प्रकार कि समस्या निवारण के लिए कितने पाठ करें इसका विवरण निम्न प्रकार है :-

ग्रह-शान्ति हेतु ५ बार

महा-भय-निवारण हेतु ७ बार

सम्पत्ति-प्राप्ति हेतु ११ बार

पुत्र-पौत्र-प्राप्ति हेतु १६ बार

राज-भय-निवारण – १७ या १८ बार

शत्रु-स्तम्भन हेतु – १७ या १८ बार

भीषण संकट – १०० बार

असाध्य रोग – १०० बार

वंश-नाश – १०० बार

मृत्यु – १०० बार

धन-नाशादि उपद्रव शान्ति के लिए १०० बार

दुर्गा शप्तशती के अध्याय और कामना पूर्ति :-

तो अब हम बात करते हैं कि दुर्गा शप्तशती के किस अध्याय से किस कामना कि पूर्ति होती है :-

प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।
द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।सप्तम अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।अष्टम अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।नवम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।एकादश अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये।

वैदिक आहुति विधान एवं सामग्री :-

प्रथम अध्याय :- एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना ।

द्वितीय अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार इसमें गुग्गुल और शामिल कर लें

तृतीय अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 38 के लिए शहद प्रयोग करें

चतुर्थ अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 1 से 11 मिश्री व खीर विशेष रूप से सम्मिलित करें
चतुर्थ अध्याय के मंत्र संख्या 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों की आहुति नहीं करना चाहिए ऐसा करने से देह नाश होता है – इस कारण इन चार मंत्रों के स्थान पर “ॐ नमः चण्डिकायै स्वाहा” बोलकर आहुति दें तथा मंत्रों का केवल पाठ करें इनका पाठ करने से सब प्रकार का भय नष्ट हो जाता है।

पंचम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 9 में कपूर – पुष्प – ऋतुफल की आहुति दें

षष्टम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 23 के लिए भोजपत्र कि आहुति दें

सप्तम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 10 दो जायफल श्लोक संख्या 19 में सफेद चन्दन श्लोक संख्या 27 में जौ का प्रयोग करें

अष्टम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 54 एवं 62 लाल चंदन

नवम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 37 में 1 बेलफल 40 में गन्ना प्रयोग करें

दशम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 5 में समुन्द्र झाग/फेन 31 में कत्था प्रयोग करें

एकादश अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 2 से 23 तक पुष्प व खीर श्लोक संख्या 29 में गिलोय 31 में भोज पत्र 39 में पीली सरसों 42 में माखन मिश्री 44 मे अनार व अनार का फूल श्लोक संख्या 49 में पालक श्लोक संख्या 54 एवं 55 मे फूल और चावल

द्वादश अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 10 मे नीबू काटकर रोली लगाकर और पेठा श्लोक संख्या 13 में काली मिर्च श्लोक संख्या श्लोक संख्या 18 में कुशा श्लोक संख्या 19 में जायफल और कमल गट्टा श्लोक संख्या 20 में ऋतु फल, फूल, चावल और चन्दन श्लोक संख्या 21 पर हलवा और पुरी श्लोक संख्या 40 पर कमल गट्टा, मखाने और बादाम श्लोक संख्या 41 पर इत्र, फूल और चावल

त्रयोदश अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 27 से 29 तक फल व फूल

इष्ट आरती विधान :-

कई बार हम सब लोग जानकारी के अभाव में मन मर्जी के अनुसार आरती उतारते रहते हैं जबकि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारने का विधान होता है –
चार बार चरणों में दो बार नाभि पर एक बार मुख पर सात बार पूरे शरीर पर इस प्रकार चौदह बार आरती की जाती है – जहां तक हो सके विषम संख्या अर्थात १,३,५,७ बत्तियॉं बनाकर ही आरती की जानी चाहिये

किस मातृका शक्ति कि साधना करने से क्या प्राप्त होता है आइये अब इस पर एक , डालते हैं :-

शैलपुत्री साधना- भौतिक एवं आध्यात्मिक इच्छा पूर्ति।
ब्रहा्रचारिणी साधना- विजय एवं आरोग्य की प्राप्ति।
चंद्रघण्टा साधना- पाप-ताप व बाधाओं से मुक्ति हेतु।
कूष्माण्डा साधना- आयु, यश, बल व ऐश्वर्य की प्राप्ति।
स्कंद साधना- कुंठा, कलह एवं द्वेष से मुक्ति।
कात्यायनी साधना- धर्म, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति तथा भय नाशक।
कालरात्रि साधना- व्यापार/रोजगार/सर्विस संबधी इच्छा पूर्ति।
महागौरी साधना- मनपसंद जीवन साथी व शीघ्र विवाह के लिए।
सिद्धिदात्री साधना- समस्त साधनाओं में सिद्ध व मनोरथ पूर्ति।
*टीप =किसी भी साधना को अपने कुल पुरोहित या योग्य ब्राह्मण या गुरु के मार्गदर्शन में ही करें।छोटी सी गलती परिणाम बदल देती हैं।*
जय माँ महाकाली

рд╡рд░्рддрдоाрди рд╕рдордп рдХी рд╕рдмрд╕े рдмрдб़ी рд╕рдорд╕्рдпा: рджोрд╖ाрд░ोрдкрдг рдХी рдк्рд░рд╡ृрдд्рддि

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