प्रिय आत्मन्
समाज में लोगों की आध्यात्मिक प्रगति ना होने का महत्व पूर्ण कारण यह है कि वे अपने जीवन में केवल चमत्कारिक गुरुओं से ही प्रभावित रहते हैं । वे कभी भी ठीक ढंग से अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए कोई भी काम पूरा नहीं कर पाता जैसे -
आध्यात्म से जुड़ना- क्योंकि जीवन में सद्गुरु नहीं है ।
ईश्वर से जुड़ना - क्योंकि जीवन में कोई नियम और साधना नहीं है ।
सेवा कार्य - क्योंकि अभी भी मन में राग और द्वेष है ।
कर्तव्य पालन - स्वयं के कर्तव्य कर्मों का ज्ञान नहीं है ।
इच्छा पूर्ति - आवश्यकता, इच्छा और लक्ष्य में स्पष्ट अंतर ज्ञात न होना । और इसी तरह द्वंद में फंसकर पूरा जीवन निकला देता है ।
आध्यात्मिक साधना के चार स्तर
१ - समर्पण - अच्छी तरह जांच परख लें , और इसके बाद जिसके ऊपर पूर्ण श्रद्धा विश्वास हो उसे ही समर्पित हो ।
२ - शुद्धिकरण- बिना समर्पण के शुद्धिकरण संभव नहीं है ! प्रत्येक मार्ग में अलग-अलग स्तर की शुद्धि पर जोर दिया जाता है । यह उस विषय से संबंधित गुरु से सीख सकते हैं ।
३- ज्ञान - बिना शुद्धिकरण के ज्ञान होना संभव नहीं है, साधक के मन में कहीं ना कहीं कोई ना कोई शंका बनी ही रहती है ।
४- मुक्ति - बिना ज्ञान के मुक्त होना संभव नहीं है, और अंत में ज्ञान को भी छोड़ दिया जाता है जिससे पूर्ण मुक्त अवस्था का अनुभव होने लगता है ।
कर्तव्य पालन - बिना ज्ञान के, बिना मुक्त हुए कोई भी व्यक्ति ठीक तरह से ना तो अपना कर्तव्य पालन कर सकता है और ना ही अपना धर्म निभा सकता है ! इसलिए ईश्वर से जुड़कर अपना जीवन सफल बनाने के लिए क्रमबद्ध तरीके से साधना अनिवार्य है ।
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