प्रिय आत्मन्
मानव जीवन में मित्रता एक ऐसा रिश्ता है जो हमारे अस्तित्व को सार्थकता प्रदान करता है। मित्र हमारे जीवन के हर पहलू में साथ देते हैं, चाहे वह खुशी के पल हों या दुख की घड़ियां। लेकिन सभी मित्र एक समान नहीं होते। हर मित्र का महत्व और स्थान अलग होता है। खास मित्र हमारे लिए सबसे मूल्यवान होते हैं, जो बिना शर्त हमारे साथ रहते हैं। सामाजिक मित्र केवल स्वार्थ के लिए हमारे पास आते हैं, जबकि समाज में रहने वाले मित्र समय के साथ हमसे दूर हो जाते हैं। हमें अपने मित्रों की इन श्रेणियों को समझना चाहिए और यह पहचानना चाहिए कि कौन से मित्र हमारे जीवन में सच्चा योगदान देते हैं। सच्चे और खास मित्रों को पहचानकर उन्हें संजोना हमारे जीवन को और भी सुंदर बना सकता है। मित्रों को उनके व्यवहार, उनके साथ हमारे रिश्ते की प्रकृति और उनके महत्व के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में बांटा जा सकता है। इस लेख में, हम मित्रों की तीन मुख्य श्रेणियों- खास मित्र, सामाजिक मित्र और समाज में रहने वाले मित्र- पर चर्चा करेंगे।
1. खास मित्र :- खास मित्र वे होते हैं जो हमारे दिल के सबसे करीब होते हैं। ये हमारे सुख-दुख में शामिल होते हैं और हमारे गुणों व भावनाओं से अच्छी तरह परिचित होते हैं। ये मित्र हर समय हमारी सहायता के लिए तैयार रहते हैं, चाहे परिस्थितियां कितनी भी जटिल क्यों न हों। इनका रिश्ता लाभ-हानि से परे होता है और यह केवल आदर व प्रेम पर आधारित होता है। ऐसे मित्र हमारे जीवन में एक मजबूत नींव की तरह होते हैं।
उदाहरण :- एक खास मित्र वह हो सकता है जो आपके साथ बचपन से है। जब आप किसी परीक्षा में असफल हो गए थे, तो उसने आपको हौसला दिया और जब आपने कोई उपलब्धि हासिल की, तो वह आपकी खुशी में शामिल हुआ। वह बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहता है। ऐसे मित्र जीवन में बहुत कम मिलते हैं और इनकी कीमत अनमोल होती है।
2. सामाजिक मित्र :- सामाजिक मित्र वे होते हैं जो केवल काम पड़ने पर ही हमें याद करते हैं। इनका हमारे साथ रिश्ता सिर्फ भौतिक लाभ पर टिका होता है। ये मित्र तब तक हमसे संपर्क करते हैं जब उन्हें हमसे कुछ सहायता चाहिए होती है। जैसे ही उनका उद्देश्य पूरा हो जाता है, वे हमसे दूरी बना लेते हैं। ऐसे रिश्तों में गहराई या भावनात्मक जुड़ाव की कमी होती है।
उदाहरण :- कार्यस्थल पर एक सहकर्मी, किसी बीमा कंपनी में काम करने वाले या फिर किसी एम एल एम कंपनी से जुड़े हुये लोग । इन्हें हमारी जब याद आती है जब उनको अपना बिजनेस निकलना हो या फिर उन्हें अपनी चेन बनानी हो । यदि हम उनके कार्यों में रुचि नहीं दिखाते तब इनका बर्ताव हमारे प्रति ऐसा होता है कि यह हमें जानते ही नहीं और ना ही फिर भी हमसे दोबारा मिलते हैं । ऐसे मित्रों से हमें सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि इनका आधार स्वार्थ होता है।
3. समाज में रहने वाले मित्र :- ये वे मित्र हैं जो किसी कारणवश हमसे दूर हो गए हैं। समय, स्थान या जीवन की बदलती परिस्थितियों ने हमें इनसे अलग कर दिया। अब ये हमारे हित-अनहित की भावना से भी दूर हैं। ये मित्र कभी हमारे जीवन का हिस्सा थे, लेकिन अब इनका हमारे वर्तमान से कोई विशेष जुड़ाव नहीं रह गया है।
उदाहरण :- आपके स्कूल के वे दोस्त जिनके साथ आपने खूब समय बिताया, लेकिन अब आप अलग-अलग शहरों में रहते हैं और संपर्क टूट गया है। इनके साथ पुरानी यादें जुड़ी हैं, पर आज के जीवन में इनकी भूमिका नहीं के बराबर है।
जब भी हम चेतना की अवस्था में किसी से कोई भी रिश्ता बनाएं तो हमें सबसे पहले यह ध्यान देना अनिवार्य है कि हमारे किसी भी रिश्ते का आधार क्या है ?
१ - प्रेम
२ - धर्म
३ - अनुवांशिकता (DNA )
४ - इच्छा
५ - आवश्यकता
६ - सजातीय गुण
७ - मित्रता
८- समझौता
९- भौतिक सुखों की लालसा
१०- या कोई जबरदस्ती थोपा गया रिश्ता ।
किसी से जुड़ने से पहले स्वयं जांचे कि -
१- क्या हमारे विचार एक समान हैं ?
२- क्या हमारे गुण एक समान है ?
३- क्या हमारी पसंद एक समान है ?
४- क्या हमारी चर्चाओं के विषय एक समान है ?
५- क्या हमारी दिनचर्या एक समान है ?
६- क्या हमारा कार्य क्षेत्र एक है ?
७- क्या हमारा लक्ष्य एक समान है ?
८- क्या हमारा मार्ग एक समान है ?
इसी आधार पर रिश्तो के मजबूत होने की संभावना रहती है ।ध्यान दें कि रिश्ता वही मान्य होता है जो दोनों ओर से स्वीकार किया जाए । और जिन रिश्तों का आधार प्रेम और समर्पण हो वह रिस्ते कभी नहीं टूटते ।
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