Wednesday, May 15, 2024

#साधक के गुण

आध्यात्मिक शोध से हमने सीखा है कि हमारा जन्म दो कारणों से होता है :

१. प्रारब्ध भोग भोगना और

२. आध्यात्मिक उन्नति करना ।

प्रारब्ध एक ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर प्रायः हमारा नियंत्रण नहीं रहता;किंतु हम अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए गंभीरता से प्रयत्न कर सकते हैं । ऐसे प्रयत्न करने में, आध्यात्मिक उन्नति को अपने जीवन का उद्देश्य बनाने में और स्वयं में कुछ विशिष्ट गुण अपनाने से हमें सहायता मिलती है । इस लेख में हमने साधक किसे कहें, आध्यात्मिक यात्रा में सहायता के लिए साधक में कौन-से गुण होने चाहिए और वह उन गुणों का विकास कैसे कर सकता है, का विवेचन किया है ।

२. साधक किसे कहें ?

१. जो अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रतिदिन सत्यनिष्ठा से गंभीर प्रयास करता है ।

२. जिसमें आध्यात्मिक उन्नति की तीव्र लगन हो और

३. जो प्रतिदिन साधना की गुणवत्ता और मात्रा, दोनों बढाने का प्रयास करता है ।

३. साधक और सामान्य व्यक्ति में अंतर
सच्चा साधक बनने के लिए आध्यात्मिक अंर्तमुखता अथवा ईश्वर पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है । आध्यात्मिक अंर्तमुखता से शनैः-शनैः पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि का अस्तित्व घटता जाता है । जबकि दूसरी ओर सामान्य व्यक्ति अपनी पंचज्ञानेंद्रियां, मन एवं बुद्धि का अस्तित्व बढाने के लिए श्रम करते हैं । 
साधक के गुण जिज्ञासा समर्पण आचरण में लाना दृढ़ता एवं शंकाओं का समाधान करना ।

४- साधक के गुण ?
किसी भी साधक में यह सामान्य गुण होना आवश्यक है 
इससे साधक अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तैयार हो सकता है । इसके आगे ईश्वर और गुरु कृपा ही सहयोग कर सकती है ।

१- जिज्ञासा
 - जिज्ञासा का मतलब है किसी चीज़ के बारे में ज़्यादा जानने की इच्छा ! जिज्ञासा मानव विकास में मदद करती है और सीखने की प्रक्रिया को बढ़ाती है. जिज्ञासा रखने से हमें सतर्क रहने और अपने बदलते परिवेश के बारे में ज्ञान हासिल करने में मदद मिलती है ।

२- तर्क - बुद्धि की क्षमता है जिसका प्रयोग हम श्रेष्ठ से श्रेष्ठ को खोजने के लिए करते हैं 

३- विश्वास - यह मन की एक भावना है जब हम किसी भी जानकारी को प्रमाणों के आधार पर सत्य मानना विश्वास है ।

४- समर्पण - यह मन की एक स्थिति है जब हमारे मन में किसी के प्रति आदर भाव या प्रेम उत्पन्न होता तो समर्पण स्वत: ही हो जाता है  ।
 
५- अनुशासन - प्रकृति के किसी भी नियम को स्वयं के भौतिक लाभ के लिए न तोड़ना अनुशासन कहलाता है ।

६- वैराग्य - किसी भी विषयवस्तु की नश्वरता को जान  
लेना ही वैराग्य है । और उनसे आसक्ति रहित होकर कार्य करना यही बैरागी के लक्षण है । 

७- विरक्ति - यह एक ऐसी भावना है जहां व्यक्ति किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति आकर्षण या मोह को खो देता है। लेकिन यह वैराग्य की तुलना में अधिक व्यक्तिगत और भावनात्मक होता है।

८- सारग्रहिता - किसी भी लेख ,कथा, कहानी या घटना को कम से कम शब्दों में उसका मूल उद्देश्य क्या है यह ग्रहण करना सारग्रहिता कहलाता है ।

९- न्यूनतावादी - जब तक एक साधक अपने परम लक्ष्य तक ना पहुंच जाए तब तक उसमें भौतिक इच्छाएं ना के बराबर होनी चाहिए । और भौतिक आवश्यकताएं इतनी हो कि स्वयं का भरण पोषण हो जाए ।

१० - अन्य गुण -
शम - यानी मन की एकाग्रता
दम - यानी इंद्रियनिग्रह
उपरति - यानी निवृत्ति
तितिक्षा - यानी सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मान-अवमान आदि द्वंद्वों के प्रति सहनशीलता
श्रद्धा - यानी शास्त्र, संत और गुरु के वचनों पर, वे जो बताते हैं उस पर, पूरा विश्वास
समाधान - यानी शंकाओं का निवारण करना 


नोट-  दिए गए लेख को अच्छी तरह पढ़े ! अपनी जिज्ञासा शंकाओं के समाधान के लिए चर्चाओं में शामिल हों । इसके बाद प्रश्न पत्र में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर अपनी समझ अनुसार भरकर सबमिट करें । इसके लिए आपको 2 दिन का समय मिलेगा ।

👉 प्रश्न पत्र के लिए लिंक पर क्लिक करें ।
https://surveyheart.com/form/6628e636d3ef0c7249a4a07e

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