दो अवस्थाओं के मिलने का समय संधि काल होता है। जैसे- प्रात: काल और संध्याकाल ।
२- संधिकाल कितने प्रकार के होते हैं ?
दिन और रात मिलाकर 8 प्रकार की संधि होती है जिसे अष्ट प्रहर कहते हैं। एक प्रहर एक घटी 24 मिनट की होता है। दिन के चार और रात के चार प्रहर मिलाकर कुल आठ प्रहर हुए।
३- संधिकाल विस्तार से -
दिन के चार प्रहर- पूर्वान्ह, मध्यान्ह, अपरान्ह और सायंकाल।
रात के चार प्रहर- प्रदोष, निशिथ, त्रियामा एवं उषा।
1. पूर्वान्ह (6 बजे से 9 बजे तक),
2. मध्यान्ह (9 बजे से 12 बजे तक),
3. अपरान्ह (12 बजे से 3 बजे तक),
4. सायंकाल (3 बजे से 6 बजे तक),
5. प्रदोष (6 बजे से 9 बजे तक),
6. निशीथ (9 बजे से 12 बजे तक),
7. त्रियामा (12 बजे से 3 बजे तक) एवं
8. उषाकाल (3 बजे से 6 बजे तक)
- दो तिथियों के बीच के समय को संधिकाल कहते हैं।
- इसके अलावा दो पक्ष के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं जैसे अमावस्या और पूर्णिमा।
- दो माह के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
- दो ऋतु्तों के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
- दो अनयों अर्थात उत्तरायण और दक्षिणायन के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
- दो संवत्सर के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
- दो युग के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
- जन्म और मृत्यु और मृत्यु और जन्म के बीच के काल को भी संधिकाल कहते हैं।
- दो श्वासों के बीच जो अंतराल है उसे भी संधिकाल कहते हैं।
४- पहर की गणना कैसे करें ?
सूर्योदय के समय दिन का पहला प्रहर प्रारंभ होता है जिसे पूर्वान्ह कहा जाता है। दिन का दूसरा प्रहर जब सूरज सिर पर आ जाता है तब तक रहता है जिसे मध्याह्न कहते हैं। इसके बाद अपरान्ह (दोपहर बाद) का समय शुरू होता है, जो लगभग 4 बजे तक चलता है। 4 बजे बाद दिन अस्त तक सायंकाल चलता है। इसी प्रकार क्रमश: प्रदोष, निशिथ एवं उषा काल। सायंकाल के बाद ही प्रार्थना करना चाहिए।
५- संधिकाल के नियम मानना क्यों आवश्यकहै ?
जिस प्रकार दो ऋतुओं, दो मौसमों के संधिकाल में प्रकृति विचलित हो जाती है ठीक उसी प्रकार दो प्रहरों के संधिकाल में हमारा मन, मस्तिष्क भी कुछ अनबैलेंस हो जाता है। इसलिए उस समय लिया गया निर्णय फलीभूत नहीं होता।
६- संधि काल में करने योग्य कार्य ?
सूर्य उदय और अस्त के समय संध्या वंदन की जाती है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि आदि से निवृत होकर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना एवं नाम जप करें ।
७- संधि काल में निषिद्ध कार्य ?
संध्या काल में शनि, राहु और केतु के साथ ही शिव के गण सक्रिय रहते हैं, संध्याकालीन नियम न मानने से जहां एक ओर बरकत चली जाती है वहीं व्यक्ति कई तरह के संकटों से घिर जाता है। अतः हम सभी को संध्याकालीन नियमों का पालन आवश्यक रूप से करना चाहिए ।
1.सोना ,2.सहवास करना , 3.खाना-पीना ,4.यात्रा करना
5.असत्य बोलना 6.क्रोध करना ,7.शाप देना ,8.झगड़े करना
9.गालियां देना या अभद्र बोलना , 10.शपथ लेना
11.धन लेना या देना, 12.रोना या जोर-जोर से हंसना
13.वेद मंत्रों का पाठ करना , 14.कोई शुभ कार्य करना
15.चौखट पर खड़े होना ।
८- संधिकल और संध्या काल में क्या अंतर है ?
संधिकाल व संध्याकाल काफी अंतर है, संध्याकाल संधिकाल का एक प्रहर या प्रकार है, जिसमें ईश्वर की उपासना विशेष लाभदायी मानी जाती है , जबकि संधिकाल दो प्रहर, के मिलन के समय को कहते हैं, जैसे रात व सुबह, के मिलन का समय संधिकाल कहते है ।
९- संध्या वंदन कितने प्रकार से कर सकते हैं ?
श्रद्धालु भक्त भगवत प्राप्ति के अपने तय मार्ग व श्रद्धा के अनुसार संध्या वंदन पांच प्रकार से किया जा सकता है, जिनमें प्रार्थना, पूजा-आरती, ध्यान, हवन व कीर्तन शामिल है ।
१०- संध्या उपासना कैसे करें ?
कोई खाद्य वस्तु खाए बिना स्नान कर या हाथ पैर धोकर गाय के घी का दीपक जलाएं. इसके बाद गायत्री मंत्र का जाप करें. फिर अपने गुरु या स्थायी रूप से जपने वाले मंत्र का जाप कर तेल या घी का दीपक जलाकर आरती करें. फिर धूप या आरती को पूरे घर में घुमाएं. भगवान को भोग लगाने के बाद ही रात्रिकालीन भोजन करें.११- संध्या वंदन कहां करें ?
संध्या पूजा घर में भी की जा सकती है, पर ऋषि आख्यानों के अनुसार, घर के मुकाबले गायों के स्थान पर संध्या वंदन का सौ गुना, नदी किनारे लाख गुना तथा शिव स्थान पर अनंत गुना फल मिलता है.१२- जो संधि काल अनुसार कार्य करते हैं उन्हें क्या लाभ है ?
संधि काल अनुसार काम करके हम एक संभावना पैदा करते हैं की प्रकृति के प्रवाह से जुड़ सके, क्योंकि प्रकृति परमात्मा से जुड़ी है, इस प्रकार हम नियमों का पालन करके परमात्मा से जुड़ सकते हैं ।
१३- जो संधि काल अनुसार काम नहीं करते अर्थात मनमानी काम करते हैं उन्हें क्या हानि है ?
ऐसे लोग नियति द्वारा स्वचालित हैं और अपने प्रारब्ध की ओर आगे बढ़ रहे हैं , मनमानी किया हुआ कार्य हमें हमारे प्रारब्ध तक पहुंचना है ।
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