प्रिय साधकगण,
आज हम एक ऐसे विषय पर विचार करेंगे जो देखने में बहुत सूक्ष्म है, परंतु मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन की दिशा तय करता है। यह विषय है— आत्ममुग्धता और आत्मज्ञान का अंतर।
अक्सर लोग आत्ममुग्धता को आत्मविश्वास समझ बैठते हैं और आत्मज्ञान को केवल पुस्तकीय ज्ञान मान लेते हैं। जबकि सत्य इससे कहीं अधिक गहरा है।
आत्ममुग्ध व्यक्ति अपने व्यक्तित्व, अपनी उपलब्धियों, अपने ज्ञान और अपनी विशेषताओं से इतना प्रभावित हो जाता है कि उसे संसार में स्वयं के अतिरिक्त कुछ विशेष दिखाई नहीं देता। उसका मन निरंतर इस बात में लगा रहता है कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं, उसकी कितनी प्रशंसा करते हैं, उसे कितना सम्मान देते हैं। उसका केंद्र स्वयं का अहंकार होता है।
इसके विपरीत आत्मज्ञानी व्यक्ति स्वयं को जानने की यात्रा पर निकलता है। वह संसार को बदलने से पहले अपने मन को देखता है। वह दूसरों की कमियों की अपेक्षा अपनी कमजोरियों को पहचानने का प्रयास करता है। आत्मज्ञानी का लक्ष्य प्रशंसा प्राप्त करना नहीं, बल्कि सत्य को जानना होता है।
आत्ममुग्ध व्यक्ति कहता है— "मैं जानता हूँ।" आत्मज्ञानी कहता है— "मैं जानना चाहता हूँ।"
आत्ममुग्ध व्यक्ति सम्मान मांगता है। आत्मज्ञानी सम्मान का अधिकारी बन जाता है।
आत्ममुग्ध व्यक्ति अपनी छवि की रक्षा करता है। आत्मज्ञानी अपने चरित्र का निर्माण करता है।
आध्यात्मिक मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि सूक्ष्म अहंकार है। जब मनुष्य यह मानने लगता है कि वह सबसे अधिक ज्ञानी है, सबसे अधिक धार्मिक है, सबसे अधिक योग्य है, तभी उसकी आध्यात्मिक यात्रा रुकने लगती है। जिस पात्र को लगता है कि वह पूर्ण भर चुका है, उसमें नया जल नहीं भरा जा सकता।
संतों ने कहा है कि ज्ञान का प्रथम लक्षण विनम्रता है। यदि ज्ञान बढ़ रहा है और विनम्रता घट रही है, तो समझ लेना चाहिए कि ज्ञान नहीं, अहंकार बढ़ रहा है।
आत्मज्ञान का मार्ग भीतर की ओर जाता है। वहाँ व्यक्ति को यह अनुभव होने लगता है कि जो कुछ भी है, वह ईश्वर की कृपा है। तब "मैं" छोटा होने लगता है और सत्य बड़ा होने लगता है।
इसलिए हमें स्वयं से पूछना चाहिए— क्या मैं प्रशंसा का भूखा हूँ या सत्य का साधक? क्या मैं लोगों को प्रभावित करना चाहता हूँ या स्वयं को समझना चाहता हूँ? क्या मैं अहंकार को पोषित कर रहा हूँ या आत्मा को जागृत कर रहा हूँ?
जिस दिन यह प्रश्न ईमानदारी से पूछ लिया जाएगा, उसी दिन आत्ममुग्धता से आत्मज्ञान की यात्रा प्रारंभ हो जाएगी।
धन्यवाद।
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