प्रणाम मित्रों
आज समाज में अक्सर कहा जाता है— "तर्क-वितर्क मत करो।" इस वाक्य को सुन-सुनकर लोगों के मन में यह धारणा बन गई कि तर्क करना ही गलत है। जबकि सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है।
तर्क ज्ञान का द्वार है, कुतर्क अज्ञान का....
तर्क का अर्थ है— सत्य तक पहुँचने के लिए बुद्धि, प्रमाण और विवेक का सहारा लेना।
कुतर्क का अर्थ है— सत्य सामने होने पर भी अहंकार, जिद या स्वार्थ के कारण गलत बात को सही सिद्ध करने का प्रयास करना।
हमारे ऋषि-मुनियों ने कभी तर्क का विरोध नहीं किया। भारत की दर्शन परंपरा में न्याय दर्शन का आधार ही तर्क है। उपनिषदों में गुरु और शिष्य के बीच प्रश्न, जिज्ञासा और तर्कपूर्ण संवाद हुए हैं। यदि तर्क गलत होता, तो ज्ञान की इतनी समृद्ध परंपरा विकसित ही नहीं होती।
समस्या तर्क से नहीं, अहंकारपूर्ण कुतर्क से होती है। जब व्यक्ति सत्य जानने के लिए प्रश्न करता है, वह तर्क है। लेकिन जब व्यक्ति केवल स्वयं को सही सिद्ध करने के लिए बहस करता है, वह कुतर्क बन जाता है।
इसलिए हमें लोगों से यह नहीं कहना चाहिए कि "तर्क मत करो।" बल्कि कहना चाहिए—
"तर्क करो, पर कुतर्क मत करो।"
तर्क से ज्ञान बढ़ता है, भ्रम दूर होता है और सत्य प्रकट होता है।
कुतर्क से विवाद बढ़ता है, संबंध टूटते हैं और अहंकार मजबूत होता है।
अंत में यही संदेश है—
तर्क सत्य की खोज है,
कुतर्क अहंकार की रक्षा है।
तर्क ज्ञान देता है,
कुतर्क केवल विवाद देता है।
इसलिए तर्क अवश्य करें, पर कुतर्क कभी न करें।
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