Monday, May 13, 2024

वैराग्य

वैराग्यहिन्दूबौद्ध तथा जैन आदि दर्शनों में प्रचलित प्रसिद्ध अवधारणा है जिसका मोटा अर्थ संसार की उन वस्तुओं एवं कर्मों से विरत होना है जिसमें सामान्य लोग लगे रहते हैं।

जब हम संसार के दुःख दर्दों को, जन्म मृत्यु को, चिंता बीमारियों को,भय और निराशा को अपनी विवेक विचार से, गंभीरता से सोचते हैं। उसपर विचार करते हैं तो अंतर्मन में वैराग्य उत्पन्न होता है।

जब हम हाड़ मांस हड्डियों की थैली यानी हमारा नाशवान शरीर और नाशवान प्रकृति को अपने विवेक से समझते हैं तो अंतर्मन में वैराग्य उत्पन्न होता है।

वैराग्य शांति का जन्म दाता है। ऐसी और इस प्रकार के समझ की विकसित होने पर अंतर्मन में वैराग्य उत्पन्न होता है। 
 

यतमान : जिसमें विषयों को छोड़ने का प्रयत्न तो रहता है, किन्तु छोड़ नहीं पाता यह यतमान वैराग्य है।

व्यतिरेकी : शब्दादि विषयों में से कुछ का राग तो हट जाये किन्तु कुछ का न हटे तब व्यतिरेकी वैराग्य समझना चाहिए।

एकेन्द्रिय : मन भी एक इन्द्रिय है। जब इन्द्रियों के विषयों का आकर्षण तो न रहे, किन्तु मन में उनका चिन्तन हो तब एकेन्द्रिय वैराग्य होता है। इस अवस्था में प्रतिज्ञा के बल से ही मन और इन्द्रियों का निग्रह होता है।

वशीकार : वशीकार वैराग्य होने पर मन और इन्द्रियाँ अपने अधीन हो जाती हैं तथा अनेक प्रकार के चमत्कार भी होने लगते हैं। यहाँ तक तो ‘अपर वैराग्य’ हुआ।

पर वैराग्य-

जब गुणों का कोई आकर्षण नहीं रहता, सर्वज्ञता और चमत्कारों से भी वैराग्य होकर स्वरुप में स्थिति रहती है तब ‘पर वैराग्य’ होता है अथवा एकाग्रता से जो सुख होता है उसको भी त्याग देना, गुणातीत हो जाना ही ‘पर वैराग्य’ है।


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