Monday, May 13, 2024

गृहस्थ जीवन

गृहस्थ का सामान्य अर्थ "परिवार क साथ घर में घर के लिए रहना" अथवा "घरवाला" होता है।[1] हिन्दू आश्रम पद्धति आधारित आयु आधारित चार आश्रमों में यह दूसरा आश्रम होता है। [2] यह अविवाहित जीवन के अन्त और वैवाहिक जीवन की शुरुआत से होता है जिसमें घर की जिम्मेदारियाँ, परिवार का उत्थान, बच्चों की शिक्षा और धार्मिक सामाजिक जीवन एवं परिवार केन्द्रित कार्य शामिल होते हैं।

विवाह करना आवश्यक क्यों है?

जिस मनुष्य के मन में भोगेच्छा है या जो अपनी वंश परंपरा को आगे बढ़ाना चाहता है तो ऐसे व्यक्ति को विवाह करना चाहिये क्योंकि गृहस्थ आश्रम ही सब आश्रमों का पालक है। मनुष्य शरीर और गृहस्थ आश्रम उद्धार करने का खास जरिया है। भोग भोगने और आराम करने के लिए यह मनुष्य शरीर नहीं हे। प्राणी मात्र की हित की भावना रखते हुए गृहस्थ आश्रम में रहना चाहिये और अपनी शक्ति के अनुसार तन, मन, धन, बुद्धि आदि के द्वारा दूसरों को सुख पहुंचाना चाहिये। दूसरों की सुख-सुविधा के लिए त्याग करना मनुष्यता है। इसी के साथ ईश्वर का सतत चिंतन-मनन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। वैदिक रीति से या समाज में मान्य अन्य रीति रिवाज से संपन्न विवाह की मान्यता समाज में होती है। भारतीय समाज में बिना विवाह संपन्न किये स्त्री-पुरुष का साथ में रहना उचित नहीं माना जाता है। उन्हें समाज में आदर प्राप्त नहीं होता।

इसलिए यदि उपरोक्तानुसार विवाह करना आवश्यक है तो अपनी वंश-परंपरा के अनुसार विधि-विधान से विवाह संपन्न कराना चाहिये। वैवाहिक जीवन का ज्योतिषीय विश्लेषण जन्म पत्रिका में सप्तम स्थान विवाह स्थल माना जाता है। लड़का हो या लड़की - उस स्थान में गये हुए विभिन्न ग्रहों के गुण, धर्म-स्वभाव, सौम्य-क्रूर ग्रह, पाप ग्रह आदि की व्याख्या करके वैवाहिक जीवन का विचार किया जाता है। इसी के साथ यह भी याद रखने योग्य बात है कि प्रत्येक प्राणी अपने भाग्य के अनुसार फल भोगता है। कर्म के सिद्धांत के अनुसार कन्या बड़ी हो जाय तो भी विवाह की विशेष चिंता नहीं करनी चाहिये क्योंकि वह कन्या अपना प्रारब्ध लेकर आयी है और उसकों अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति उसके प्रारब्ध के अनुसार मिलेगी।


माता-पिता को तो उसके विवाह के विषय में यह विचार करना है कि जहां कन्या सुखी रहे, वहीं उसका विवाह संपन्न करना है। ऐसा विचार करना माता-पिता का कर्तव्य है। परंतु हम उसकों सुखी कर देंगे, उसको अच्छा परिवार मिल ही जायेगा, यह हमारे वश की बात नहीं है। हमें अपने कर्तव्य का पालन करना है, पर चिंता नहीं होनी चाहिये। निम्नलिखित ज्योतिष योग वाले व्यक्ति का वैवाहिक जीवन उसकी पत्नी के पतिव्रत धर्म का पालन करने के कारण सुखी रहता है। ऐसे योग वाले व्यक्ति बिरले ही होते हैं। यदि किसी लड़के की जन्म-पत्रिका में ऐसा योग हो और जन्मपत्रिका लड़के-लड़की की उत्तम मिलती हो तो विवाह संपन्न करना शुभ रहता है।


संसार-व्यवहार कब न करें ?
विवाहित दंपत्ति भी संयम-नियम से रहें, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए रहें ।
सभी पक्षों की अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमी-इन सभी तिथियों में स्त्री समागम करने से नीच योनि एवं नरकों की प्राप्ति होती है । (महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्वः 104.29.30)
दिन मेंऔरदोनों संध्याओं के समय जो सोता है या स्त्री-सहवास करता है, वह सात जन्मों तक रोगी और दरिद्र होता है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खंडः 75.80)
निषिद्ध रात्रियाँ-पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चंद्रगहण, उत्तरायण, जन्माष्टमी, रामनवमी, होली, शिवरात्रि, नवरात्रि आदि पर्वों की रात्रि, श्राद्ध के दिन, चतुर्मास, प्रदोषकाल, क्षयतिथि (दो तिथियों का समन्वय काल) एवं मासिक धर्म के चार दिन समागम नहीं करना चाहिए । शास्त्रवर्णित मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए ।
माता-पिता की मृत्युतिथि, स्वयं की जन्मतिथि, नक्षत्रों की संधि (दो नक्षत्रों के बीच का समय) तथा अश्विनी, रेवती, भरणी, मघा मूल इन नक्षत्रों में समागम वर्जित है ।
जो लोग दिन में स्त्री-सहवास करते हैं वे सचमुच अपने प्राणों को ही क्षीण करते हैं । (प्रश्नोपनिषद् 1.13)
परस्त्री सेवन से मनुष्य की आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है । इसलिए किसी भी वर्ण के पुरुष को परायी स्त्री से संसर्ग नहीं करना चाहिए । इसके समान आयु को नष्ट करने वाला संसार में दूसरा कोई कार्य नहीं है । स्त्रियों के शरीर में जितने रोमकूप होते हैं उतने ही हजार वर्षों तक व्यभिचारी पुरुषों को नरक में रहना पड़ता है ।
यदि पत्नी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय तथा उसे भी अपने निकट न बुलायें । शास्त्र की अवज्ञा करने से गृहस्थी अधिक समय तक सुखी जीवन नहीं जी सकते ।

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