प्रिय आत्मन्
जैसा कि आप सभी जानते हैं , मानव जीवन को सुखमय बनाने के लिए समाज में बहुत से विकल्प है ! जैसे- कुछ लोग चमत्कारिक सिद्ध गुरुओं में विश्वास रखते हैं तो कुछ लोग तंत्र मंत्र और टोने- टोटके में विश्वास रखते हैं ! कुछ लोग ज्योतिष वास्तु जैसी विद्या में विश्वास रखते हैं तो वहीं कुछ लोग तामसिक विद्या जैसे तंत्र क्रिया आदि में विश्वास रखते हैं! जिसको जैसी सुविधा वैसा मार्ग अपनाना चाहिए । यदि आप ज्योतिष विद्या से अपने जीवन में अनुकूल परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं तो ज्योतिष का प्रारंभिक ज्ञान आवश्यक है । यदि ज्योतिष विषय की प्रारंभिक जानकारी और रुचि नहीं है तो यह सब आपके लिए व्यर्थ है । आपको यहां अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए । आपको अपने अनुकूल विषयों से जुड़ना ही लिए श्रेष्ठ रहेगा ।
१-कुंडली क्या है ?
कुंडली पत्रिका का एक भाग है । कुंडली अर्थात व्यक्ति के जन्म के समय आकाश में विद्यमान ग्रहों का आकृतिबद्ध मानचित्र । कुंडली के १२ स्थानों में ग्रह एवं राशि दर्शाई होती हैं । कुंडली से ‘व्यक्ति के जन्म के समय आकाश में कौनसा ग्रह किस दिशा में था ? वह किस राशि में था ? वे ग्रह एक-दूसरे से कितने अंश दूर थे ?’, आदि जानकारी तुरंत समझ में आती है । पत्रिका में लग्नकुंडली, राशिकुंडली, वर्गकुंडली इत्यादि विविध प्रकार की कुंडलियां दी होती हैं । उनका उपयोग ज्योतिषी भविष्य का दिग्दर्शन करते हुए विविध कारणों के लिए करते हैं ।
२-जन्मपत्रिका बनवाने का महत्त्व
जन्मकुंडली दिशा एवं काल का मनुष्य से होनेवाला संबंध दर्शाती है । पूर्वजन्मों में किए हुए अच्छे एवं बुरे कर्मों का फल मनुष्य प्रारब्धरूप में अगले जन्मों में भोगता है । व्यक्ति का प्रारब्ध जानने का कुंडली एक माध्यम है । जन्मकुंडली द्वारा जीवन की उपलब्धियां, काल की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता, सुख-दुःख, अरिष्ट इत्यादि का बोध होता है । इसलिए अपने जीवन का स्वरूप समझने के लिए जन्मपत्रिका सहायक होती है ।
३-बालक का जन्म होने के उपरांत कितने दिनों में जन्मपत्रिका बनवा लें ?
बालक का जन्म होने के उपरांत तुरंत ही अर्थात २-३ दिनों में ही जन्मपत्रिका बनवा लें; कारण जन्मपत्रिका बनाते समय ‘बालक का जन्म किस योग पर हुआ’, यह ज्योतिषी देखते हैं । कुछ अशुभ तिथि, नक्षत्र एवं योगों पर जन्म होने पर शिशु को उसका कष्ट न हो, इसलिए शास्त्र ने जननशांति करने के लिए कहा है । यह जननशांति जन्म के बारहवें दिन की जाती है । जन्मपत्रिका बनाने में देर होने पर जननशांति का निर्धारित काल बदल जाता है । जननशांति अधिक विलंब से करने पर उसकी परिणामकारकता भी अल्प हो जाती है ।
४-जन्मपत्रिका बनानेवाले ज्योतिष को कौनसी जानकारी दें ?
जन्मपत्रिका अभ्यासू एवं सदाचरणी ज्योतिष से बनवा लें । ज्योतिष को शिशु की जन्मदिनांक, जन्म का समय एवं जन्मस्थल की अचूक जानकारी दें; कारण इन तीन बातों पर जन्मपत्रिका बनाई जाती है । नवजात शिशु के विषय में कुछ विचित्र लगे, तो वह भी ज्योतिष को बताएं, उदा. शिशु के जन्म से ही दांत होना, अवयव अधिक अथवा अल्प होना इत्यादि ।
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