Tuesday, May 14, 2024

सद्गुरु

जीवन में सद्गुरु- 

आपने इसे कई अलग-अलग तरीकों से सुना है, जब आप तैयार होंगे तो गुरु आएंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि उसे एक व्यक्ति के रूप में आना होगा। इसका सीधा सा मतलब है कि जब आप खुले हैं, जब आप तैयार हैं, यह ऊर्जा, यह उपस्थिति जो हमेशा प्रवेश करने और जीवन को खिलने की कोशिश कर रही है - सूरज की रोशनी की तरह, हमेशा यह तलाश कर रही है कि हर पत्ते, हर फूल, हर जीवन को कैसे छुआ जाए और कैसे बनाया जाए यह खिलता है - ठीक वैसे ही जैसे यह खोज रहा है, क्योंकि यह किसी व्यक्ति का नहीं है, यह किसी व्यक्ति का नहीं है - यह अनुग्रह का स्वभाव है। आपको बस अपने खुलेपन की दिशा में काम करना है।

सच्चे सद्गुरु की पहचान अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी जो शुद्धाचरण रखते हैं, जो नित्य नियमित रूप से नादानुसंधान का अभ्यास करते हैं और जो सन्तमत (संतों के ज्ञान) को अच्छी तरह समझा सकते हैं, उनमें श्रद्धा रखनी और उनको गुरु धारण करना अनुचित नहीं । दूसरे-दूसरे गुण कितने भी अधिक हों, परन्तु यदि आचरण में शुद्धता नहीं पायी जाय, तो वह गुरु मानने योग्य नहीं । यदि ऐसे को पहले गुरु माना भी हो, तो उसका दुराचरण जान लेने पर उससे अलग रहना ही अच्छा है। उसकी जानकारी अच्छी होने पर भी आचरणहीनता के कारण उसका संग करना योग्य नहीं। और गुणों की अपेक्षा गुरु के आचरण का प्रभाव शिष्यों पर अधिक पड़ता है। और गुणों के सहित शुद्धाचरण का गुरु में होना ही उसकी गरुता और गुरुता है, नहीं तो वह गरु (गाय-बैल) है। क्या शुद्धाचरण और क्या गुरु होने योग्य दूसरे-दूसरे गुण, किसी में भी कमी होने से वह झूठा गुरु है।"

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि सच्चे सद्गुरु पँच महापाप ( व्यभिचार, चोरी, नशा, हिंसा और झूठ) से दूर रहते हैं । वे काम, क्रोधादि षट् विकारों के शिकार नहीं होते। आत्मज्ञानी होने पर भी वे नियमित ध्यान-उपासना करते हैं। वे आंतरिक ब्रह्मज्योति और ब्रह्मनाद ( सत्तनाम, सारशब्द) का अनुभव ज्ञान रखते हैं और दूसरे को बतलाते हैं। ईश्वर का साक्षात्कार हो जाने के कारण वे सगुण-निर्गुण के रहस्य को समझाने में समर्थ होते हैं।

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