पाप के बारे में गलत धारणाएं -
"मैं बस ऐसा ही हूँ। यह मेरी गलती नहीं है!"
"जब तक मुझे अच्छा लगता है, यह पाप नहीं है।"
"यह तभी पाप है जब इससे किसी और को नुकसान पहुँचता है, लेकिन मैं किसी को नुकसान नहीं पहुँचा रहा हूँ!"
"अगर हर कोई ऐसा करता है, तो यह पाप नहीं है!"
"मैं बस ऐसा ही हूँ। यह मेरी गलती नहीं है!"
"जब तक मुझे अच्छा लगता है, यह पाप नहीं है।"
"यह तभी पाप है जब इससे किसी और को नुकसान पहुँचता है, लेकिन मैं किसी को नुकसान नहीं पहुँचा रहा हूँ!"
"अगर हर कोई ऐसा करता है, तो यह पाप नहीं है!"
१- पाप क्या है ?
जो कोई पाप करता है, वह नियमों को अवश्य ही तोड़ता है, अतः हम कह सकते हैं कि पाप मनुष्य द्वारा किये गए वे सभी कार्य, जो किसी भी प्रकृति को बाधित करते हों, अध्यात्मिक एवं सामाजिक मूल्यों का ह्रास करते हों, या आर्थिक एवं प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करते हों, पाप की श्रेणी में आते हैं। वह व्यक्ति, जो पाप करता है, पापी कहलाता है।
२- पाप क्यों करते हैं ?
मनुष्य के मन में, इंद्रियों में बुद्धि में, अहम् में और विषयों में कामना का वास होता है। कामना मनुष्य से पाप कराती है और कामना से उत्पन्न होने वाला क्रोध और लोभ यही मनुष्य को पाप में लगाते हैं ओर पाप से दुखी होता है, दुर्गति में जाता है।
३- यदि भगवान सर्वशक्तिमान है तो मेरे मन से यह इच्छा क्यों नहीं दूर कर देते ताकि मैं पाप करना बंद कर दूँ ?
ईश्वर कुछ नहीं करता , हम सबकी प्रकृति पहले से ही निश्चित ही जो इसके विपरित जाकर ईश्वर की अवज्ञा करके प्रकृति में विकृति फैलाता है उसके लिए स्वतह दण्ड प्रक्रिया है।
४- - पुण्य क्या है ?
सुखद भविष्य की कामना से किया गया वह कर्म जिससे परोपकार हो और कर्ता के मन में खुशी की भावना उत्पन्न होती है । अर्थात मन में किसी भी प्रकार का भायना हो ।
No comments:
Post a Comment