Tuesday, May 14, 2024

साधना


साधना : कोई कार्य सिद्ध करने के लिए किया जाने वाला कठिन परिश्रम ।

वा 0 प्र0 - अर्जुन की साधना ने उसे एक बड़ा धनुर्धर बना दिया ।

आराधना : किसी देवता या इष्ट देव के प्रति की गई दया की याचना ।

वा 0 प्र0 - चीर हरण के समय द्रौपदी ने कृष्ण की आराधना की ।

उपासना : एकनिष्ठ साधना ( एकनिष्ठ का अर्थ है- एक ही पर श्रद्धा एवं निष्ठा रखने वाला)

वा 0 प्र0 - मीरा ने कृष्ण की उपासना की ।


साधना — विभिन्न साधनों की सहायता से लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास साधना है । मोटे तौर पर अपने को ठीक करना साधना है अर्थात् सिद्ध करना। सिद्धि लक्ष्य का अंत है । बिना साधना के किसी भी मार्ग पर हम आगे नहीं बढ़ सकते, न ही लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। एक कलाकार कला की साधना करता है, पहलवान कुश्ती आदि से अपने शरीर की साधना करता है, विद्यार्थी पढ़ाई की साधना करता है, संगीतकार संगीत की साधना करता है, कुम्हार बर्तन बनाने की साधना करता है, भक्त भक्ति की साधना करता है।

स्नान, जप , कर्मकांड, यज्ञ , तप , ध्यान आदि साधना के अंग हैं। साधना के लिए शरीर और मन का स्वस्थ होना आवश्यक है। युग निर्माण योजना के अनुसार साधना के तीन रूप हैं — उपासना, साधना और आराधना। उपासना भगवान के पास बैठने का नाम है। साधना में आसन , प्राणायाम अपने दोष दुर्गुणों का परिष्कार आते हैं और आराधना भगवान के गुणों को अपने अंदर धारण करने का नाम है।

ध्यान भगवान को अपने अंदर देखना है। ध्यान के दो भेद हैं — साकार और निराकार। साकार ध्यान में भगवान की छवि को भृकुटी, हृदय आदि में देखना है। निराकार ध्यान में त्राटक , नाद योग आदि आते हैं। जलते हुए दीपक, सूर्य, चन्द्रमा की अनुभूति त्राटक है। ध्यान मन को एकाग्र करके समाधि की ओर ले जाता है।

पूजा ईश्वर को नमन वंदन करने का नाम है। शरीर की शुद्धि के लिए षट्कर्म — पवित्रीकरण, आचमन , शिखा बंधन , प्राणायाम, न्यास और पृथ्वी पूजन है। इसके बाद तिलक लगाया जाता है। संकल्प सूत्र बांधा जाता है। संक्षिप्त पूजन में भगवान को जल , तिलक , फूल, अक्षत , नैवेद्य चढ़ाकर कहा जाता है — अमुक देवं या देवीं आवाह्यामि स्थापयामि पूजयामि ध्यायामि ।‌‌ विस्तार से पूजन करना हो तो १६ प्रकार से किया जाता है। इसमें आवाहन , स्थापन , आसन , पाद्य, स्नान, आचमन , अर्घ्य, वस्त्र , यज्ञोपवीत, तिलक, अक्षत , पुष्प , धूप , दीप , नैवेद्य, तांबूल/ पूगीफल और दक्षिणा दिए जाते हैं।

साधना कोई भी हो , उसमें तन्मयता का होना आवश्यक है तभी सफलता मिलेगी।



उपासना , पूजा, साधना और प्रार्थना में अन्तर को समझने के लिए इन चारों को समझना आवश्यक है । इनको जानने पर इनमें क्या अन्तर है ? यह स्वत: ही स्पष्ट हो जाएगा । देखिए —

१— उपासना —— उपासना से मतलब है ईश्वर के समीप बैठना । उप= समीप और आसना = बैठना । अर्थात् ध्यान अवस्था में बैठकर ईश्वर के गुणों का मनन करते हुए ईश्वर का सामीप्य अनुभव करना ।

२- पूजा —— पूजा शब्द को लेकर बहुत भ्रम है । प्रायः मूर्ति की धूपबत्ती करके उसको भोग लगाने को पूजा मान लिया जाता है । इस हिसाब से तो मेरे जैसे लोग जो मूर्ति पूजा नहीं करते वे पूजा कर ही नहीं सकते हैं ? पूजा को समझना आसान होगा यदि हम पहले पूजा के उद्देश्य को समझेंगे । लोग पूजा इसलिए करते हैं कि उनकी पूजा से ईश्वर प्रसन्न हो जाएं । दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए लोग पूजा करते हैं । अब प्रश्न है कि पूजा कैसे की जाए जिससे ईश्वर प्रसन्न हों? इसे एक उदाहरण से समझिए । एक गुरु के दो शिष्य हैं ।एक उनके लिए अपनी इच्छा से जो उसे स्वयं को अच्छा लगता है भोजन, वस्त्र आदि देता है । भले ही गुरु को उनकी आवश्यकता हो या न हो । लेकिन गुरु की आज्ञाओं का पालन नहीं करता है , दी गई शिक्षाओं को ध्यान से नहीं सुनता है ,न ही उनका दिया गया पाठ याद करता है । लेकिन दूसरा शिष्य गुरु के लिए कोई सामान तो नहीं लाता है लेकिन उनकी आज्ञा का पालन बड़ी तत्परता से करता है । जैसी शिक्षाएं देते हैं उनका आचरण करता है , प्रतिदिन पाठ स्मरण करता है । मैं समझता हूं कि निस्संदेह इनमें से दूसरा छात्र गुरु को अधिक प्रिय होगा । इससे सिद्ध होता है कि हमें वह आचरण करना चाहिए जिससे हम ईश्वर के प्रिय हो सकें। इसके लिए हमें उसके लिए धूपबत्ती छोड़कर उसकी शिक्षाओं और आज्ञाओं को मानना चाहिए । यही वास्तविक पूजा है ।

४-प्रार्थना— किसी अच्छे कार्य को पूर्ण करने के लिए अपनी ओर से भरपूर प्रयत्न करते हुए सर्व नियन्ता परमेश्वर से कार्य सिद्धि की कामना करना प्रार्थना है । अर्थात् अपने पुरुषार्थ करने के बाद ही करनी चाहिए। ऐसी प्रार्थना कभी नहीं करनी चाहिए और न ही परमेश्वर उनको स्वीकार करता है जैसे से परमेश्वर आप मेरे शत्रुओं का नाश या मेरे प्रतिद्वंद्वी की पराजय ,मुझ को सबसे बड़ा बना दीजिए । क्योंकि दोनों ओर से ऐसी ही प्रार्थनाएं हों तो क्या परमेश्वर दोनों का नाश वा दोनों की पराजय करा दे ?

आशा है आपको यह पढ़कर इन सभी में क्या अन्तर है इसे समझने में सहायता अवश्य मिलेगी ।


बना पूजा-पाठ और साधना के ईश्वर की प्राप्ति कैसे की जा सकती है, क्या कोई तरीका है?

ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का मार्ग है cultivation,,

ईश्वर ने पहले से ही कृपा बरसाई हुई है,, अगर आप उस चीज़ को समझ जाते हैं,, जान लेते है फिर ईश्वर से आप कुछ भी माँगना बन्द कर देंगे. क्योंकि तब आप जान चुके हैं कि ईश्वर ने आपको क्या दिया हुआ है,, उस इश्वर प्रदत चीज़ के सामने,, दुनिया की सब चीज़ फीकी है..

उदाहरण के तौर पर,, आप राजा के सामने हों, और राजा बोले कि जो माँगना है मांग ले,, मैं वो सब दे दूँगा,, अपना राज्य भी मांग ले तो भी मना नहीं करूंगा..

तब आप अगर मांगने वाला आदमी कहे कि मुझे 1 किलो चना दे दो,, तो आप उस मांगने वाले व्यक्ति को क्या कहेंगे,, अरे सामने राजा है और उसे चने मांग रहे हो..

वैसे भगवान ने तुम्हें वो अनमोल क़ीमती चीज़ पहले से दी हुई है जिसका कोई मोल ही नहीं है,, वो है स्वांस,, human birth,,..

जिसे और कोई तुम्हें दे ही नहीं सकता,, भगवान ने और भी बहुत सारी ऐसे चीजे दी हुई हैं कि जो अनमोल है वह है स्वांस और वह दिए जा रहा है, दिए जा रहा है तुम्हारे बिन मांगे ही वो दिए जा रहा है रात दिन,, देने मे वो कोई कमी नहीं कर रहा है,, देने मे कोई कंजूसी भी नहीं कर रहा है,, जिस दिन ये देना बंद कर दिया उस दिन पूरा रेत का बना सब कुछ ढह जायेगा,, जिस दिन स्वांस का अना बंद हो जाएगा,, उस दिन समझ पाओगे की भगवान ने क्या दिया था..

भगवान ने तो वह कृपा पहले से कर दी है जिसके आगे और कुछ कृपा मांगना बनता ही नहीं है,,, आपका दिल /दिमाग उस कृपा को भूल चुका है,, संसार की रेस में,,

अब समय ये है की उसकी कृपा को बस याद करो और उसे हर श्वास का धन्यवाद दो,, यही है ईश्वर की सबसे बढ़ी अनमोल कृपा,, जो सदैव बरस रहीं है,, रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं है,, और जिस दिन रुक गया,, कृपा मांगने के काबिल ही नहीं रहोगे |


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