Saturday, August 11, 2018

ЁЯСЙ рдЬ्рдЮाрди рдХी рдмाрддें

गुरुरग्निर्द्वि जातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ।।१।।

1. ब्राह्मणों को अग्नि की पूजा करनी चाहिए . दुसरे लोगों को ब्राह्मण की पूजा करनी चाहिए . पत्नी को  पति की पूजा करनी चाहिए तथा  दोपहर के भोजन के लिए जो अतिथि आये उसकी सभी को पूजा करनी चाहिए .

यथा चतुर्भिः कनकं पराक्ष्यते
निघर्षणं छेदनतापताडनैः ।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्य़ते
त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा ।।२।।

2. सोने की परख उसे घिस कर, काट कर, गरम कर के और पीट कर की जाती है. उसी तरह व्यक्ति का परीक्षण वह कितना त्याग करता है, उसका आचरण कैसा है, उसमे गुण कौनसे है और उसका व्यवहार कैसा है इससे होता है.

तावद्भयेन भेतव्यं यावद् भयमनागतम् ।
आगतं तु भयं वीक्ष्यं प्रहर्तव्यमशंकया ।।३।।

3. यदि आप पर मुसीबत आती नहीं है तो उससे सावधान रहे. लेकिन यदि मुसीबत आ जाती है तो किसी भी तरह उससे छुटकारा पाए.

एकोदरसमुद् भूता एकनक्षत्रजातकाः ।
न भवन्ति समाः शीला यथा बदरिकण्टकाः ।।४।।

4. अनेक व्यक्ति जो एक ही गर्भ से पैदा हुए है या एक ही नक्षत्र में पैदा हुए है वे एकसे नहीं रहते. उसी प्रकार जैसे बेर के झाड के सभी बेर एक से नहीं रहते.

निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामो मण्डनप्रियः ।
नाऽविदग्धः प्रियंब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः ।।५।।

5. वह व्यक्ति जिसके हाथ स्वच्छ है कार्यालय में काम नहीं करना चाहता. जिस ने अपनी कामना को ख़तम कर दिया है, वह शारीरिक शृंगार नहीं करता, जो आधा पढ़ा हुआ व्यक्ति है वो मीठे बोल बोल नहीं सकता. जो सीधी बात करता है वह धोका नहीं दे सकता.

मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः ।
वरांगना कुलस्त्रीणां सुभगानां च दुर्भगा ।।६।।

6. मूढ़ लोग बुद्धिमानो से इर्ष्या करते है. गलत मार्ग पर चलने वाली औरत पवित्र स्त्री से इर्ष्या करती है. बदसूरत औरत खुबसूरत औरत से इर्ष्या करती है.

आलस्योपगता विद्या परहस्तगतं धनम् ।
अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम् ।।७।।

7. खाली बैठने से अभ्यास का नाश होता है. दुसरो को देखभाल करने के लिए देने से पैसा नष्ट होता है. गलत ढंग से बुवाई करने वाला किसान अपने बीजो का नाश करता है. यदि सेनापति नहीं है तो सेना का नाश होता है.

अभ्यासाध्दार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते ।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते ।।८।।

8. जो वैदिक ज्ञान की निंदा करते है, शास्र्त सम्मत जीवनशैली की मजाक उड़ाते है, शांतीपूर्ण स्वभाव के लोगो की मजाक उड़ाते है, बिना किसी आवश्यकता के दुःख को प्राप्त होते है.

वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते ।
मृदुना रक्ष्यते भूपः सत्स्त्रिया रक्ष्यते गृहम् ।।९।।

9.  व्यक्ति अकेले ही पैदा होता है. अकेले ही मरता है. अपने कर्मो के शुभ अशुभ परिणाम अकेले ही भोगता है. अकेले ही नरक में जाता है या सदगति प्राप्त करता है.

अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा ।
अन्यथा वदता शांतंलोकाःक्लिश्यन्ति चाऽन्यथा ।।१०।।

10. वासना के समान दुष्कर कोई रोग नहीं. मोह के समान कोई शत्रु नहीं. क्रोध के समान अग्नि नहीं. स्वरुप ज्ञान के समान कोई बोध नहीं.

दारिद्र्यनाशनं दान शीलं दुर्गतिनाशनम् ।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी ।।११।।

11.दान गरीबी को ख़त्म करता है. अच्छा आचरण दुःख को मिटाता है. विवेक अज्ञान को नष्ट करता है. जानकारी भय को समाप्त करती है.

नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः ।
नास्ति कोपसमो वहि नर्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम् ।।१२।।

12. जिसने अपने स्वरुप को जान लिया उसके लिए स्वर्ग तो तिनके के समान है. एक पराक्रमी योद्धा अपने जीवन को तुच्छ मानता है. जिसने अपनी कामना को जीत लिया उसके लिए स्त्री भोग का विषय नहीं. उसके लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तुच्छ है जिसके मन में कोई आसक्ति नहीं.

जन्ममृत्युं हि यात्येको भुनक्त्येकं शुभाशुभम् ।
नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम् ।।१३।।

13. जब आप सफ़र पर जाते हो तो विद्यार्जन ही आपका मित्र है. घर में पत्नी मित्र है. बीमार होने पर दवा मित्र है. अर्जित पुण्य मृत्यु के बाद एकमात्र मित्र है.

तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम् ।
जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत् ।।१४।।

14. समुद्र में होने वाली वर्षा व्यर्थ है. जिसका पेट भरा हुआ है उसके लिए अन्न व्यर्थ है. पैसे वाले आदमी के लिए भेट वस्तु का कोई अर्थ नहीं. दिन के समय जलता दिया व्यर्थ है.

विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च ।
व्यधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ।।१५।।

15. वर्षा के जल के समान कोई जल नहीं. खुदकी शक्ति के समान कोई शक्ति नहीं. नेत्र ज्योति के समान कोई प्रकाश नहीं. अन्न से बढ़कर कोई संपत्ति नहीं.

वृथा वृष्टिस्समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम् ।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपोऽदीवाऽपि च ।।१६।।

16. निर्धन को धन की कामना. पशु को वाणी की कामना. लोगो को स्वर्ग की कामना. देव लोगो को मुक्ति की कामना.

नास्ति मेघसमं तोयं नास्ति चात्मसमं बलम् ।
नास्तिचक्षुः समं तेजो नास्ति धान्यसमं प्रियम् ।।१७।।

17. सत्य की शक्ति ही इस दुनिया को धारण करती है. सत्य की शक्ति से ही सूर्य प्रकाशमान है, हवाए चलती है, सही में सब कुछ सत्य पर आश्रित है.

अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदः ।
मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्तिदेवताः ।।१८।।

18. लक्ष्मी जो संपत्ति की देवता है, वह चंचला है. हमारी श्वास भी चंचला है. हम कितना समय जियेंगे इसका कोई ठिकाना नहीं. हम कहा रहेंगे यह भी पक्का नहीं. कोई बात यहाँ पर पक्की है तो यह है की हमारा अर्जित पुण्य कितना है.

स्त्येन धार्यते पृथ्वी स्त्येन तपते रविः ।
स्त्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ।।१९।।

19. आदमियों में नाई सबसे धूर्त है. कौवा पक्षीयों में धूर्त है. लोमड़ी प्राणीयो में धूर्त है. औरतो में लम्पट औरत सबसे धूर्त है.

चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणश्चले जीवितमन्दिरे ।
चलाऽचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः ।।२०।।

20. ये सब आपके पिता है...१. जिसने आपको जन्म दिया. २. जिसने आपका यज्ञोपवित संस्कार किया. ३. जिसने आपको पढाया. ४. जिसने आपको भोजन दिया. ५. जिसने आपको भयपूर्ण परिस्थितियों में बचाया.

नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः ।
चतुष्पदां श्रृगालस्तु स्त्रीणां धुर्ता च मालिनी ।।२१।।

21. इन सब को  आपनी माता समझें .१. राजा की पत्नी २. गुरु की पत्नी ३. मित्र की पत्नी ४. पत्नी की माँ ५. आपकी माँ.

जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति ।
अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः ।।२२।।

22. अर्जित विद्या अभ्यास से सुरक्षित रहती है.
घर की इज्जत अच्छे व्यवहार से सुरक्षित रहती है.
अच्छे गुणों से इज्जतदार आदमी को मान मिलता है.
किसीभी व्यक्ति का गुस्सा उसकी आँखों में दिखता है.

राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्र पत्नी तथैव च ।
पत्नी माता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृता ।।२३।।

23. धर्मं की रक्षा पैसे से होती है.
ज्ञान की रक्षा जमकर आजमाने से होती है.
राजा से रक्षा उसकी बात मानने से होती है.
घर की रक्षा एक दक्ष गृहिणी से होती है.

👉 स्कान्दोत्तरखण्ड उमामहेश्वरसंवाद

चातुर्यवान्विवेकी च अध्यात्मज्ञानवान् शुचिः |
मानसं निर्मलं यस्य गुरुत्वं तस्य शोभते ||

जो चतुर हों, विवेकी हों, अध्यात्म के ज्ञाता हों, पवित्र हों तथा निर्मल मानसवाले हों उनमें गुरुत्व शोभा पाता है | (161)

गुरवो निर्मलाः शान्ताः साधवो मितभाषिणः |
कामक्रोधविनिर्मुक्ताः सदाचारा जितेन्द्रियाः ||

गुरु निर्मल, शांत, साधु स्वभाव के, मितभाषी, काम-क्रोध से अत्यंत रहित, सदाचारी और जितेन्द्रिय होते हैं |

सूचकादि प्रभेदेन गुरवो बहुधा स्मृताः |
स्वयं समयक् परीक्ष्याथ तत्वनिष्ठं भजेत्सुधीः ||

सूचक आदि भेद से अनेक गुरु कहे गये हैं | बिद्धिमान् मनुष्य को स्वयं योग्य विचार करके तत्वनिष्ठ सदगुरु की शरण लेनी चाहिए| (163)

वर्णजालमिदं तद्वद्बाह्यशास्त्रं तु लौकिकम् |
यस्मिन् देवि समभ्यस्तं स गुरुः सूचकः स्मृतः ||

हे देवी ! वर्ण और अक्षरों से सिद्ध करनेवाले बाह्य लौकिक शास्त्रों का जिसको अभ्यास हो वह गुरु सूचक गुरु कहलाता है| (164)

💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫

👉 गाय से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी

1. गौ माता जिस जगह खड़ी रहकर आनंदपूर्वक चैन की सांस लेती है । वहां वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं ।

2. गौ माता में तैंतीस कोटी देवी देवताओं का वास है ।

3. जिस जगह गौ माता खुशी से रभांने लगे उस देवी देवता पुष्प वर्षा करते हैं ।

4. गौ माता के गले में घंटी जरूर बांधे ; गाय के गले में बंधी घंटी बजने से गौ आरती होती है ।

5. जो व्यक्ति गौ माता की सेवा पूजा करता है उस पर आने वाली सभी प्रकार की विपदाओं को गौ माता हर लेती है ।

6. गौ माता के खुर्र में नागदेवता का वास होता है । जहां गौ माता विचरण करती है उस जगह सांप बिच्छू नहीं आते ।

7. गौ माता के गोबर में लक्ष्मी जी का वास होता है ।

8. गौ माता के मुत्र में गंगाजी का वास होता है ।

9. गौ माता के गोबर से बने उपलों का रोजाना घर दूकान मंदिर परिसरों पर धुप करने से वातावरण शुद्ध होता है सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

10. गौ माता के एक आंख में सुर्य व दूसरी आंख में चन्द्र देव का वास होता है ।

11. गाय इस धरती पर साक्षात देवता है ।

12. गौ माता अन्नपूर्णा देवी है कामधेनु है । मनोकामना पूर्ण करने वाली है ।

13. गौ माता के दुध मे सुवर्ण तत्व पाया जाता है जो रोगों की क्षमता को कम करता है।

14. गौ माता की पूंछ में हनुमानजी का वास होता है । किसी व्यक्ति को बुरी नजर हो जाये तो गौ माता की पूंछ से झाड़ा लगाने से नजर उतर जाती है ।

15. गौ माता की पीठ पर एक उभरा हुआ कुबड़ होता है । उस कुबड़ में सूर्य केतु नाड़ी होती है । रोजाना सुबह आधा घंटा गौ माता की कुबड़ में हाथ फेरने से रोगों का नाश होता है ।

16. गौ माता का दूध अमृत है।

17. गौ माता धर्म की धुरी है। गौ माता के बिना धर्म कि कल्पना नहीं की जा सकती ।

18. गौ माता जगत जननी है।

19. गौ माता पृथ्वी का रूप है।

20. गौ माता सर्वो देवमयी सर्वोवेदमयी है । गौ माता के बिना देवों वेदों की पूजा अधुरी है ।

21. एक गौ माता को चारा खिलाने से तैंतीस कोटी देवी देवताओं को भोग लग जाता है ।

22. गौ माता से ही मनुष्यों के गौत्र की स्थापना हुई है ।

23. गौ माता चौदह रत्नों में एक रत्न है ।

24. गौ माता साक्षात् मां भवानी का रूप है ।

25. गौ माता के पंचगव्य के बिना पूजा पाठ हवन सफल नहीं होते हैं ।

26. गौ माता के दूध घी मख्खन दही गोबर गोमुत्र से बने पंचगव्य हजारों रोगों की दवा है । इसके सेवन से असाध्य रोग मिट जाते हैं ।

27. गौ माता को घर पर रखकर सेवा करने वाला सुखी आध्यात्मिक जीवन जीता है । उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती ।

28. तन मन धन से जो मनुष्य गौ सेवा करता है । वो वैतरणी गौ माता की पुछ पकड कर पार करता है। उन्हें गौ लोकधाम में वास मिलता है ।

28. गौ माता के गोबर से ईंधन तैयार होता है ।

29. गौ माता सभी देवी देवताओं मनुष्यों की आराध्य है; इष्ट देव है ।

30. साकेत स्वर्ग इन्द्र लोक से भी उच्चा गौ लोक धाम है।

31. गौ माता के बिना संसार की रचना अधुरी है ।

32. गौ माता में दिव्य शक्तियां होने से संसार का संतुलन बना रहता है ।

33. गाय माता के गौवंशो से भूमि को जोत कर की गई खेती सर्वश्रेष्ट खेती होती है ।

34. गौ माता जीवन भर दुध पिलाने वाली माता है । गौ माता को जननी से भी उच्चा दर्जा दिया गया है ।

35. जहां गौ माता निवास करती है वह स्थान तीर्थ धाम बन जाता है ।

36. गौ माता कि सेवा परिक्रमा करने से सभी तीर्थो के पुण्यों का लाभ मिलता है ।

37. जिस व्यक्ति के भाग्य की रेखा सोई हुई हो तो वो व्यक्ति अपनी हथेली में गुड़ को रखकर गौ माता को जीभ से चटाये गौ माता की जीभ हथेली पर रखे गुड़ को चाटने से व्यक्ति की सोई हुई भाग्य रेखा खुल जाती है ।

38. गौ माता के चारो चरणों के बीच से निकल कर परिक्रमा करने से इंसान भय मुक्त हो जाता है ।

39. गाय माता आनंदपूर्वक सासें लेती है; छोडती है । वहां से नकारात्मक ऊर्जा भाग जाती है और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है जिससे वातावरण शुद्ध होता है ।

40. गौ माता के गर्भ से ही महान विद्वान धर्म रक्षक गौ कर्ण जी महाराज पैदा हुए थे ।

41. गौ माता की सेवा के लिए ही इस धरा पर देवी देवताओं ने अवतार लिये हैं ।

42. जब गौ माता बछड़े को जन्म देती तब पहला दूध बांझ स्त्री को पिलाने से उनका बांझपन मिट जाता है ।

43. स्वस्थ गौ माता का गौ मूत्र को रोजाना दो तोला सात पट कपड़े में छानकर सेवन करने से सारे रोग मिट जाते हैं ।

44. गौ माता वात्सल्य भरी निगाहों से जिसे भी देखती है उनके ऊपर गौकृपा हो जाती है ।

45. गाय इस संसार का प्राण है ।

46. काली गाय की पूजा करने से नौ ग्रह शांत रहते हैं । जो ध्यानपूर्वक धर्म के साथ गौ पूजन करता है उनको शत्रु दोषों से छुटकारा मिलता है ।

47. गाय धार्मिक ; आर्थिक ; सांस्कृतिक व अध्यात्मिक दृष्टि से सर्वगुण संपन्न है ।

48. गाय एक चलता फिरता मंदिर है । हमारे सनातन धर्म में तैंतीस कोटि देवी देवता है । हम रोजाना तैंतीस कोटि देवी देवताओं के मंदिर जा कर उनके दर्शन नहीं कर सकते पर गौ माता के दर्शन से सभी देवी देवताओं के दर्शन हो जाते हैं ।

49. कोई भी शुभ कार्य अटका हुआ हो बार बार प्रयत्न करने पर भी सफल नहीं हो रहा हो तो गौ माता के कान में कहिये रूका हुआ काम बन जायेगा ।

50. जो व्यक्ति मोक्ष गौ लोक धाम चाहता हो उसे गौ व्रती बनना चाहिए ।

51. गौ माता सर्व सुखों की दातार है ।

हे मां आप अनंत ! आपके गुण अनंत ! इतना मुझमें सामर्थ्य नहीं कि मैं आपके गुणों का बखान कर सकूं l

💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫

👉 अद्वैतवेदांत सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर

👉प्रश्न- जब जीव ही ब्रह्म है, जीव और ब्रह्म में भेद नही तो देव पूजा और सन्ध्या उपासना से क्या तात्पर्य ?

उत्तर-संध्यादि नित्यकर्म के अधिकारी निरूपण प्रसंग पर गीताभाष्य में आचार्य ने कहा - संध्यादि कौन करता हैं ? एक प्रकार के लोग हैं नास्तिक जैसे चार्वाक इत्यादि, जो वेद का प्रामाण्य नहीं मानते, देहभिन्न आत्मा स्वीकार नहीं करते, कर्मवाद, स्वर्ग, जन्मान्तर इत्यादि स्वीकार नही करते - अतः स्वभावतः ही नित्यकर्म नहीं करते ; दुसरे प्रकार के लोग यह सब स्वीकार करते हैं परन्तु उनमें आत्मज्ञान नहीं हुआ हैं और अज्ञान के कारण देह-इन्द्रियादि अनात्म वस्तुयों में अहम्-ममत्वज्ञान करके स्वयं को कर्ता और भोक्ता समझते हैं - यही लोग नित्यकर्म के अधिकारी हैं।
संध्यादि नित्यकर्म का उद्देश्य हैं चित्तशुद्धि , नित्यकर्म द्वारा अंतःकरण में वर्तमान मलदोष का नाश होता हैं और भगवदुपासना से चित्तविक्षेप निवृत्त होकर एकाग्रचित्त होता हैं - ब्रह्मविचार या वेदान्त का अधिकारी होनेके लिए शुद्ध एवं एकाग्र चित्त होना आवश्यक हैं, अन्यथा विचारमार्ग की अधिकारी नहीं होता ; इसलिए अधिकारी को नित्यकर्म का अनुष्ठान और ईश्वरोपासना करना चाहिए, न करने से प्रत्यवाय होगा जो आत्मज्ञान के मार्ग में पुनराय प्रतिबन्धक बनेगा ।

ज्ञानी स्वयं को देहेन्द्रियादि से भिन्न नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त आत्मस्वरुप बोध करते हैं, कर्तृत्व-भोक्तृत्व का अभिमान स्वतः ही छूट जाता हैं , इसलिए ज्ञानी देहरक्षाहेतु अथवा लोकसंग्रहहेतु जो भी कर्मों करे, उससे वह सर्वथा निर्लिप्त ही रहता हैं, कर्म का लेशमात्र संस्पर्श तक नहीं होता हैं ज्ञानी में - यही नैष्कर्म्य हैं !

इसे सरल से उदहारण से समझिये

जैसे काँटा बिद्ध होनेपर दुसरी काँटा लेकर उस बिद्ध काँटा को निकाला जाता हैं और फिर दोनों काँटों का परित्याग किया जाता हैं, उसी प्रकार परमार्थतः नित्यमुक्त आत्मस्वरुप न जानते हुए जो स्वयं को " मैं मायाधीन बद्ध-जीव हूँ " ऐसा भ्रम में पढ़े हैं , उसके लिए शास्त्र ने मायाधीश ईश्वर की कल्पना कर उसकी उपासना का विधान करता हैं , जो पूर्वोक्त भ्रम की निवृत्ति में सहायक बनता हैं।

👉अहं_और_आध्यात्मिक_स्तर

व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर का एक महत्त्वपूर्ण मापदंड है, उसके अहं की मात्रा । इसका अर्थ है उसकी आत्मा के सर्व ओर विद्यमान अंधकार कितना हट गया है तथा उसका अपनी अंतरात्मा के साथ कितना तादात्म्य स्थापित हुआ है ।आत्मा के सर्व ओर विद्यमान अहं (अंधकार) का अर्थ है;  मनुष्य की वह प्रवृत्ति जो उसका तादात्म्य केवल पंज्ञानेंद्रिय, मन और बुद्धितक ही सीमित रखती है । यह अहं अर्थात अपने वास्तविक अस्तित्व का (आत्मा का) आध्यात्मिक अज्ञान । हमारी आधुनिक शिक्षाप्रणाली और समाज हमें यही सिखाते हैं कि हमारा अस्तित्व, हमारी देह, मन एवं बुद्धि तक ही सीमित है । हमारा वास्तविक अस्तित्त्व हमारी अंतरात्मा है, इस तथ्य से हम अनभिज्ञ रहते हैं ।
अध्यात्मशास्त्र के अध्ययन से हम अपनी बुद्धि से यह समझ पाते हैं कि हमारे भीतर आत्मा है;  किंतु न ही हमें उसका भान होता है, न ही हम उसे अनुभव कर पाते हैं । जब हम साधना आरंभ करते हैं, यह अहं का अंधकार छंटने लगता है तथा जब हम आध्यात्मिक शिखर पर पहुंचते हैं, तब हमनी अंतरात्मा से पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं ।
साधना आरंभ करने पर हमारा अहं क्षीण होने लगता है । इसका हमारे बढते आध्यात्मिक स्तर से सीधा संबंध होता है ।

👉 ज्ञान की सात भूमिकाएँ

शुभेच्छा
आत्मकल्याण हेतु श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ गुरु के शरणागत होकर उनके उपदेशानुसार शास्त्रो का अध्ययन करके आत्म विचार और आत्मा साक्षात्कार
की उत्कृष्ट इच्छा ।

सुविचारणा
सद्गुरु के उपदेशो तथा मोक्षशास्त्रो का चिन्तन एवं मनन ।

3 तनुमानसा
श्रवण , मनन , और निदिध्यासन से शब्दादि विषयो के
प्रति जो अनासक्ति होती है एवं सविकल्प समाधि मे
अभ्यास से बुद्धि की जो तनुता सूक्ष्मता प्राप्त होती है वही तनुमानसा है।

4 सत्वापत्ति
उपर्युक्त तीन से साक्षात्कार पर्यन्त स्थिति अर्थात् निर्विकल्प समाधिरुप स्थिति ही सत्वापत्ति है। ज्ञान
की चौथी भूमिका वाला पुरुष ब्रह्मविद कहलाता है ।

5 असंसक्ति
चित्त-विषयक परमानन्द और नित्य अपरोक्ष ऐसी ब्रह्मात्म भावना का साक्षात्कार रुप चमत्कार असंसक्ति है । इसमेँ अविद्या तथा उसके कार्यो का सम्बन्ध नहीँ होता ।

पदार्थभाविनी -
पदार्थो की दृढ अप्रतीति होती है वह पदार्थभाविनी है ।

तुर्यगा -
तीनो अवस्था से मुक्त होना तुर्यगा है । ब्रह्म को जिस अवस्था मेँ आत्मरुप और अखण्ड जाने वही अवस्था तुर्यगा है । प्रथम तीन भूमिकाएँ साधनकोटि की है और
अन्य चार ज्ञानकोटि की है l तीन भूमिकाओ तक सगुण
ब्रह्म का चिन्तन करो ज्ञान की पाँचवी भूमिका तक पहुँचने पर जड चेतन की ग्रन्थि छूट जाती है और आत्मा का अनुभव होने लगता है l आत्मा शरीर से भिन्न है इन भूमिकाओ मेँ उत्तरोत्तर देहभान भूलता हुआ उन्मत्त दशा प्राप्त होती है ..।

👉 शास्त्रज्ञान और अनुभवज्ञान

(((स गुरुमेवाभिगच्छेत्  श्रीत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्)))

कुछ विद्वानों का कथन है कि धर्म ब्रह्म तथा नरक स्वर्गादि अलौकिक विषयों का ज्ञान लौकिक प्रत्यक्षादि प्रमाणों (यथार्थज्ञान के साधनों)से तथा वर्तमान के सर्वमान्य भौतिक विज्ञान से भी संभव नहीं है।अतः धर्मादि का ज्ञान तो अलौकिक अनादि तथा अपौरुषेय वेदों तथा वेदानुसारी स्मृति पुराणादि शास्त्रों से ही होता है।
          इसलिए जिसने वेदादि शास्त्रों का तात्पर्य निर्णय उपक्रम  उपसंहार  अर्थवादोपत्ति आदि षट् प्रमाणों द्वारा गुरुमुख से सम्यक् अध्ययन किया है,वह विद्वान् ही धर्म_ब्रह्म आदि के विषय में जो ज्ञानोपदेश करता है उसका ही ज्ञान सत्य हो सकता है।इसी लिए मनु महाराज ने अति स्पष्ट शब्दों में कहा है!

      आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना।
    यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मो वेद नेतरः।।(मनु.स्मृ.१२-१०६)

अर्थात्--जो वेद शास्त्र अविरोधी तर्कों से आर्ष उपदेशों का अनुसन्धान करता है,वही धर्म को जानता है, दूसरे नहीं।।
         इससे यह स्पष्ट हो जाता है,कि शास्त्रज्ञान ही सत्यज्ञान होने से शास्त्रज्ञान सम्पन्न विद्वान् ही कल्याण के पात्र होंगे ; केवल अनुभव ज्ञान का बखान करने वाले नहीं होंगें!
     👉 इसे यूं समझना चाहिए कि जैसे--
भलीभांति अध्ययन मनन परिशीलन करने वाले विद्वान् वैद्य ही रोगों का सही सही निदान औषध,पथ्य, कुपथ्य आदि का ठीक ठीक  विधान तथा शंकाओं का ठीक ठीक समाधान कर सकते हैं।दूसरा नहीं।
        जैसे यह एक निर्विवाद परम सत्य है, वैसे ही वेदादिशास्त्रमात्रगम्य धर्म  ब्रह्मादि का ज्ञान ,वेदादिज्ञान सम्पन्न विद्वान् ही प्रदान कर सकते है। वही धर्मादि के विषय में होने वाली शंकाओं का से।सम्यक् समाधान भी कर सकते हैं,दूसरा नहीं।
         किन्तु  कल्याण तो शास्त्रज्ञान के अनुसार धर्म भक्ति ज्ञान का  अनुष्ठान (पालन, आचरण) करने वालों का ही होता है।केवल शास्त्रज्ञान का बखान करने वालों का  नहीं होता।यही कारण है कि भागवत जी में स्पष्ट शब्दों में कहा है

     पंडिता बहवो राजन् बहुज्ञाः संशयच्छिदाः।
     सदस्पतयोप्येके असंतोषात् पतन्त्यधः।।(भाग.७-१५-२१)

अर्थात्--हे राजन् !बहुत शास्त्रों का बखान(प्रवचन) करने वाले, संशयों का छेदन करने में समर्थ ,सभापति बनने वाले बहुत से पंडित  असंतोष के कारण अधः पतन को प्राप्त होते हैं।
           जैसे आयुर्वेद का सम्यक् ज्ञान रखने वाले वैद्य भी यदि उसके आसार आहार विहार ,औषधि सेवन  पथ्यपालन न करे तो वह रोगमुक्त नहीं होसकता।उसी प्रकार  वेदादिशाश्त्रों का विद्वान् भी उसके अनुसार अनुष्ठान न करे तो कल्याण नहीं होगा।
         इसी संदर्भ में कोई कोई यह कहते हैं कि जिसे तत्व का अपरोक्षात्मक अनुभव ज्ञान हुआ है या भगवान् का साक्षात् दर्शन हुआ है,वे ही शास्त्रवचनों का यथार्थ अर्थ बतला सकते हैं, केवल विद्वत्ता के बल पर शास्त्र का यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता है।
           यह कथन विचारणीय है।जैसे किसी औषधि से जिसने अपना ज्वर दूर करके  अपरोक्ष #रोगमुक्ति को प्राप्त करलिया है,वह व्यक्ति भी सम्पूर्ण आयुर्वेद की तो बात ही क्या एक ज्वर प्रकरण के सम्पूर्ण वचनों का ठीक ठीक अर्थ नहीं बता सकता है।तथा भिन्न भिन्न रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को रोगमुक्ति के लिए  कोई  उपाय या उपचार भी नहीं बता सकता है।।
           वैसे ही जिसने किसी साधन द्वारा भगवान् का साक्षात्कार करके अपना कल्याण कर लिया है,वह भी सम्पूर्ण शास्त्रों की तो बात ही क्या एक लघुकाय गीताजी के सम्पूर्ण शब्दों का  ठीक ठीक अर्थ नहीं बता सकता।

👉सारांश यह कि शास्त्रज्ञानवान् ही शास्त्रीय
    धर्मादि  विषयक शंकाओंका समाधान बता
    सकते हैं।
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

No comments:

Post a Comment

рд╡рд░्рддрдоाрди рд╕рдордп рдХी рд╕рдмрд╕े рдмрдб़ी рд╕рдорд╕्рдпा: рджोрд╖ाрд░ोрдкрдг рдХी рдк्рд░рд╡ृрдд्рддि

рдк्рд░рдгाрдо рдоिрдд्рд░ो рд╡рд░्рддрдоाрди рд╕рдордп рдоें рдордиुрд╖्рдп рдХी рд╕рдмрд╕े рдмрдб़ी рд╕рдорд╕्рдпा рдпрд╣ рд╣ै рдХि рд╡рд╣ рдЕрдкрдиे рдЬीрд╡рди рдоें рдЙрдд्рдкрди्рди рд╣ोрдиे рд╡ाрд▓ी рдЕрдзिрдХांрд╢ рд╕рдорд╕्рдпाрдУं рдФрд░ рд╡िрдХृрддिрдпों рдХे рд▓िрдП рд╕्...