Sunday, August 12, 2018

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हरियाली तीज व्रत कथा | व्रत विधि और महत्व
☀ 13 - Aug - 2018
☀ New Delhi, India

एस्ट्रो क्लीनिक एण्ड क्लब:
🚩श्री गणेशाय नम:🚩
📜 दैनिक पंचांग 📜

☀ पंचांग   
🔅 तिथि :
            द्वितीया  08:38:27
            तृतीया  29:46:36
🔅 नक्षत्र  पूर्वा फाल्गुनी  19:09:34
🔅 करण :
           कौलव  08:38:27
           तैतिल  19:08:46
🔅 पक्ष  शुक्ल 
🔅 योग  शिव  24:19:44
🔅 वार  सोमवार 

☀ सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ   
🔅 सूर्योदय  05:48:55 
🔅 चन्द्रोदय  07:40:00 
🔅 चन्द्र राशि  सिंह - 24:39:31 तक 
🔅 सूर्यास्त  19:02:50 
🔅 चन्द्रास्त  20:41:59 
🔅 ऋतु  वर्षा 

☀ हिन्दू मास एवं वर्ष   
🔅 शक सम्वत  1940  विलम्बी
🔅 कलि सम्वत  5120 
🔅 दिन काल  13:13:55 
🔅 विक्रम सम्वत  2075 
🔅 मास अमांत  श्रावण 
🔅 मास पूर्णिमांत  श्रावण 

☀ शुभ और अशुभ समय   
☀ शुभ समय   
🔅 अभिजित  11:59:24 - 12:52:20
☀ अशुभ समय   
🔅 दुष्टमुहूर्त :
                    12:52:20 - 13:45:15
                    15:31:07 - 16:24:02
🔅 कंटक  08:27:41 - 09:20:37
🔅 यमघण्ट  11:59:24 - 12:52:20
🔅 राहु काल  07:28:09 - 09:07:23
🔅 कुलिक  15:31:07 - 16:24:02
🔅 कालवेला या अर्द्धयाम  10:13:33 - 11:06:28
🔅 यमगण्ड  10:46:38 - 12:25:52
🔅 गुलिक काल  14:05:06 - 15:44:21
☀ दिशा शूल   
🔅 दिशा शूल  पूर्व 

☀ चन्द्रबल और ताराबल   
☀ ताराबल 
🔅 अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, आद्रा, पुष्य, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवण, शतभिषा, उत्तरभाद्रपदा 
☀ चन्द्रबल 
🔅 मिथुन, सिंह, तुला, वृश्चिक, कुम्भ, मीन 

एस्ट्रो क्लीनिक एण्ड क्लब

🚩श्री गणेशाय नम:🚩
   📜 चोघडिया 📜

🔅अमृत  05:49:37 -   07:28:46
🔅काल  07:28:46 -   09:07:55
🔅शुभ  09:07:55 -   10:47:04
🔅रोग  10:47:04 -   12:26:13
🔅उद्वेग  12:26:13 -   14:05:22
🔅चल  14:05:22 -   15:44:31
🔅लाभ  15:44:31 -   17:23:40
🔅अमृत  17:23:40 -   19:02:49
🔅चल  19:02:50 -   20:23:45
🔅रोग  20:23:45 -   21:44:40
🔅काल  21:44:40 -   23:05:35
🔅लाभ  23:05:35 -   24:26:30
🔅उद्वेग  24:26:30 -   25:47:25
🔅शुभ  25:47:25 -   27:08:20
🔅अमृत  27:08:20 -   28:29:15
🔅चल  28:29:15 -   29:50:10

हरियाली तीज पूजा विधि, व्रत के खास नियम

हरियाली तीज 13/08/2018 की व्रत और पूजा के कुछ खास नियम हैं। माना जाता है कि इस खास नियम के बिना हरियाली तीज व्रत पूरा नहीं होता है। हरियाली तीज के दिन ही पार्वती और शिव का पुनर्मिलन माना जाता है। शास्त्रों में कथा है कि इस दिन भगवान शिव और पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था।

इस दिन निर्जला उपवास और शिव-पार्वती की पूजा का विधान है। हरियाली तीज के दिन लड़कियां और सुहागिन महिलाएं अपने होने वाली पति या पति की लंबी आयु के लिए निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखती हैं। व्रत रखकर महिलाएं और लड़कियां पूरे 16 श्रृंगार करके भगवान भोलेनाथ और मात पार्वती की पूजा करती हैं !

अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। भगवान शंकर-पार्वती की बालू की मूर्ति इसके लिए भगवान शंकर-पार्वती की बालू से मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है और उनकी शादी की जाती है। अगर घर में संभव ना हो तो महिलाएं और लड़कियां मंदिर में जाकर माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं।
हरियाली तीज 2018 में कब है?

हरियाली तीज पूजा विधि
हरियाली तीज के उपवास नियम क्या हैं?
हरियाली तीज पर देवी पार्वती और भगवान शिव के पुनर्मिलन को चिन्हित करने के लिए, महिलाएं एक व्रत या उपवास जिसका नाम निशिवासर निर्जला व्रत, रखती हैं। इस उपवास के लिए कुछ विशिष्ट नियम हैं जिनका व्रत करने वाले भक्तों द्वारा पालन किया जाना आवश्यक है। इस व्रत में, महिलाओं को 24 घंटे की अवधि के लिए भोजन और पानी खाने से रोक दिया जाता है, जब तक वे उपवास तोड़ें नहीं।

इस उपवास को निर्जला उपवास कहा जाता है क्योंकि महिलाओं को पानी की एक बूंद का उपभोग करने की अनुमति नहीं होती है। अगले दिन जब सभी अनुष्ठान ठीक से पूरा हो जाते हैं, तब यह व्रत पूरा हो जाता है।

हरियाली तीज की पूजा विधि क्या है....?
हरियाली तीज पूजा करने के लिए सबसे शुभ समय सुबह का होता है। महिलाओं को सुबह उठने के बाद अपनी आत्माओं को शुद्ध करने के लिए पवित्र स्नान करने की आवश्यकता होती है।वे एक विशेष परिधान के साथ एक नई दुल्हन की तरह खूबसूरती से तैयार होती हैं जिसमें साड़ी, गहने, हीना, बिंदी और चूड़ियाँ शामिल होते हैं। निर्जला तीज उपवास को देखते हुए महिलाएं देवी पार्वती और भगवान शिव की पूजा करने के लिए मंदिरों में जाती हैं। मंदिरों में विभिन्न अनुष्ठानों को पूरा करने के बाद, महिलाएं अपने पतियों के चरणों को छूती हैं। सूर्यास्त से पहले, महिलाएं स्नान करती हैं और दुल्हन की तरह खूबसूरती से तैयार होती हैं।
उसके बाद, अनुष्ठान फिर से शुरू हो जाते हैं और महिलाएं देवी पार्वती और भगवान शिव की मूर्तियों को मिट्टी और रेत के माध्यम से बनाती हैं। इन मूर्तियों को पूजा स्थान पर रखा जाता है। वे देवताओं को धूप की छड़ें, फूल और बिल्व पत्तियां चढाती हैं। इसके बाद तीज गीतों का गायन और हरियाली तीज कथा का अभिलेख होता है जो भगवान शिव और देवी पार्वती की कहानी और देवी शैलपुत्री के रूप में उनके अवतार का वर्णन करता है।
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हरियाली तीज व्रत कथा | व्रत विधि और महत्व
श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज मनाई जाती है। इसे छोटी तीज, हरतालिका तीज या श्रावणी तीज के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था। हरियाली तीज सम्बंधित कथा का वर्णन लिंग महापुराण में मिलता है। माना जाता है कि इस कथा को भगवान शिव ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म के बारे में याद दिलाने के लिए सुनाया था। कथा कुछ इस प्रकार है–

👉 हरियाली तीज व्रत कथा

शिवजी कहते हैं - हे पार्वती। बहुत समय पहले तुमने हिमालय पर मुझे वर के रूप में पाने के लिए घोर तप किया था। इस दौरान तुमने अन्न-जल त्याग कर सूखे पत्ते चबाकर दिन व्यतीत किया था। मौसम की परवाह किए बिना तुमने निरंतर तप किया। तुम्हारी इस स्थिति को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुःखी और नाराज़ थे। ऐसी स्थिति में नारदजी तुम्हारे घर पधारे। जब तुम्हारे पिता ने उनसे आगमन का कारण पूछा तो नारदजी बोले – ‘हे गिरिराज! मैं भगवान् विष्णु के भेजने पर यहाँ आया हूँ। आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना चाहते हैं। इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूँ।’ नारदजी की बात सुनकर पर्वतराज अति प्रसन्नता के साथ बोले- हे नारदजी। यदि स्वयं भगवान विष्णु मेरी कन्या से विवाह करना चाहते हैं तो इससे बड़ी कोई बात नहीं हो सकती। मैं इस विवाह के लिए तैयार हूं।” शिवजी पार्वती जी से कहते हैं, “तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी, विष्णुजी के पास गए और यह शुभ समाचार सुनाया। लेकिन जब तुम्हें इस विवाह के बारे में पता चला तो तुम्हें बहुत दुख हुआ। तुम मुझे यानि कैलाशपति शिव को मन से अपना पति मान चुकी थी। तुमने अपने व्याकुल मन की बात अपनी सहेली को बताई। तुम्हारी सहेली ने सुझाव दिया कि वह तुम्हें एक घनघोर वन में ले जाकर छुपा देगी और वहां रहकर तुम शिवजी को प्राप्त करने की साधना करना। इसके बाद तुम्हारे पिता तुम्हें घर में न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए। वह सोचने लगे कि यदि विष्णुजी बारात लेकर आ गए और तुम घर पर ना मिली तो क्या होगा। उन्होंने तुम्हारी खोज में धरती-पाताल एक करवा दिए लेकिन तुम ना मिली। तुम वन में एक गुफा के भीतर मेरी आराधना में लीन थी। श्रावण तृतीय शुक्ल को तुमने रेत से एक शिवलिंग का निर्माण कर मेरी आराधना कि जिससे प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारी मनोकामना पूर्ण की। इसके बाद तुमने अपने पिता से कहा कि ‘पिताजी, मैंने अपने जीवन का लंबा समय भगवान शिव की तपस्या में बिताया है। और भगवान शिव ने मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर मुझे स्वीकार भी कर लिया है। अब मैं आपके साथ एक ही शर्त पर चलूंगी कि आप मेरा विवाह भगवान शिव के साथ ही करेंगे।” पर्वत राज ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार कर ली और तुम्हें घर वापस ले गये। कुछ समय बाद उन्होंने पूरे विधि – विधान के साथ हमारा विवाह किया।” भगवान् शिव ने इसके बाद बताया कि – “हे पार्वती! श्रावण शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह संभव हो सका। इस व्रत का महत्त्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मन वांछित फल देता हूं। भगवान शिव ने पार्वती जी से कहा कि इस व्रत को जो भी स्त्री पूर्ण श्रद्धा से करेंगी उसे तुम्हारी तरह अचल l मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती हैं, वह अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करती हैं। साथ ही यह पर्व दांपत्य जीवन में खुशी बरकरार रखने के उद्देश्य से भी मनाया जाता है। उत्तर भारत के कई राज्यों खासकर राजस्थान में इस दिन मेहंदी लगाने और झुला-झूलने की प्रथा है। भगवान शिव और देवी पार्वती ने इस तिथि को सुहागन स्त्रियों के लिए सौभाग्य का दिन होने का वरदान दिया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो सुहागन स्त्रियां सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं उनका सुहाग लंबे समय तक बना रहता है। इस तीज को कुछ स्थानों पर कज्जली तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस तीज से एक दिन पहले नवविवाहित कन्याओं के लिए उनके सुसराल से श्रृंगार सामग्री आती है। महिलाएं इन्हीं से अपना श्रृंगार करके देवी पार्वती की और भगवान शिव की बालू की बनी प्रतिमा की पूजा करती हैं। इस व्रत में तीन चीजों का त्याग आवश्यक माना जाता है पहला पति से छल कपट, दूसरा झूठ और दुर्व्यवहार, तीसरा परनिंदा।
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