Friday, January 23, 2026

८ पहर और उनका महत्व

प्रिय आत्मन् 
दिन के चार प्रहर सूर्योदय से सूर्यास्त तक और रात के चार प्रहर सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक होते हैं। ये प्रहर न केवल समय मापन के लिए हैं, बल्कि पूजा-पाठ, जप-तप, ध्यान, मुहूर्त और दैनिक कार्यों के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

👉 दिन के चार प्रहर :- 

1. पूर्वान्ह -
समय :- सूर्योदय से लगभग 3 घंटे बाद तक (उदाहरण: सुबह 6 बजे से 9 बजे तक)।  
  महत्व :- यह समय सबसे शुद्ध और सात्विक माना जाता है। ब्राह्म मुहूर्त के बाद का समय होने से ध्यान, योग, जप, स्नान, संध्या-वंदन और स्वाध्याय के लिए उत्तम है। इस प्रहर में किए गए कार्य सफल होते हैं और मन शांत रहता है।

2. मध्यान्ह -
 समय :- पूर्वान्ह के बाद से दोपहर तक (उदाहरण: सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक)।  
महत्व :- यह समय कार्यशीलता और ऊर्जा का होता है। मध्याह्न स्नान, पूजा और भोजन के लिए शुभ माना जाता है। कई महत्वपूर्ण मुहूर्त और अभिजीत मुहूर्त इसी प्रहर में आते हैं। व्यापार-व्यवहार और शुभ कार्यों के लिए अच्छा समय।

3. अपरान्ह
समय :- दोपहर के बाद से शाम की ओर (उदाहरण: दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक)।  
महत्व :- यह समय थोड़ा राजसिक होता है। विश्राम, भोजन और साधारण कार्यों के लिए उपयुक्त। कुछ शास्त्रों में इस प्रहर में नए कार्य शुरू न करने की सलाह दी जाती है, लेकिन पूजा और ध्यान जारी रखा जा सकता है।

4. सायंकाल 
 समय :- अपरान्ह के बाद सूर्यास्त तक (उदाहरण: दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक)। 
महत्व :- संध्या पूजा, दीपदान और आरती का प्रमुख समय। यह संक्रमण काल है, इसलिए सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। देवताओं की उपासना और परिवार के साथ समय बिताने के लिए अच्छा। इस प्रहर में सोना वर्जित माना जाता है।

👉रात के चार प्रहर :-

5. प्रदोष
समय :- सूर्यास्त से लगभग 3 घंटे बाद तक (उदाहरण: शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक)।  
महत्व :- प्रदोष व्रत और भगवान शिव की पूजा का विशेष समय। यह शुभ और देव पूजन के लिए उत्तम माना जाता है। इस प्रहर में सोना नहीं चाहिए, क्योंकि यह तामसिक प्रवृत्ति बढ़ाता है। ध्यान और भजन के लिए अच्छा।

6. निशिथ
समय :- प्रदोष के बाद मध्यरात्रि तक (उदाहरण: रात 9 बजे से 12 बजे तक)।  
महत्व :- यह समय तांत्रिक साधनाओं और गुप्त क्रियाओं के लिए जाना जाता है। सात्विक व्यक्ति के लिए विश्राम का समय, लेकिन कुछ शास्त्रों में निशीथ पूजा (विशेषकर शिव या दुर्गा) का महत्व है। इस प्रहर में जागरण शुभ फलदायी होता है।

7. त्रियामा
 समय :- मध्यरात्रि के बाद भोर से पहले (उदाहरण: रात 12 बजे से 3 बजे तक)।  
महत्व :- यह सबसे तामसिक प्रहर माना जाता है। तांत्रिक और नकारात्मक क्रियाएं इसी समय होती हैं। साधारण व्यक्ति को इस प्रहर में सोते रहना चाहिए, लेकिन जागरण करने वाले साधकों के लिए गहन ध्यान का समय। कुछ स्थानों पर इसे सबसे कठिन और रहस्यमय प्रहर कहा जाता है।

8. उषा
समय : - त्रियामा के बाद सूर्योदय तक (उदाहरण: रात 3 बजे से सुबह 6 बजे तक)।  
महत्व :- यह समय फिर से सात्विक हो जाता है। ब्राह्म मुहूर्त इसी प्रहर में आता है, जो ध्यान, जप और साधना के लिए सर्वोत्तम है। उषा पूजा, संध्या-वंदन और नए दिन की शुरुआत का समय। इस प्रहर में जागना स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति के लिए लाभदायक है।


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