प्रिय आत्मन्
हर व्यक्ति के लिए सुखी जीवन के मानदंड अलग-अलग होते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस वातावरण में, किन विषयों और परिस्थितियों में स्वयं को सबसे अधिक आरामदायक महसूस करता है।
किंतु इन व्यक्तिगत मानदंडों से अलग एक महत्वपूर्ण प्रश्न है:
हमारा जीवन उत्थान की ओर जा रहा है या पतन की ओर ?
यदि जीवन में ऐसा समय आए कि हम स्वयं को सही मानते हों, फिर भी दुख, कष्ट, परेशानी और असंतुलन दूर न हो रहे हों, तो निम्नलिखित परिभाषाओं और अवधारणाओं की स्वयं जांच कर लेनी चाहिए। इससे ईश्वर या अपनों से कोई शिकायत नहीं रहेगी
१- संस्कार
२- कर्म
३- प्रारब्ध
४- भाग्य
साथ ही, एक स्त्री या पुरुष को यह समझना आवश्यक है कि किस कीमत के बदले उन्हें कौन-सा सुख प्राप्त होता है।
इन बिंदुओं पर आत्म-निरीक्षण से जीवन की दिशा स्पष्ट हो सकती है और अनावश्यक शिकायतों से मुक्ति मिल सकती है।
संपूर्ण ज्योतिष का आधार कर्म ज्ञान ( कर्म और कर्म फल ) -
कर्म और कर्म फल :- हम अपने जीवन में जब भी कोई कर्म करते हैं और उसके अनुकूल या अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, तो एक बार गहराई से यह जांचना चाहिए कि उस कर्म के पीछे हमारा मूल कारण क्या है ?
क्योंकि कारण ही परिणाम को निर्धारित करता है– कारण बदलने से परिणाम स्वतः बदल जाता है।
कर्म के पीछे सामान्य कारण निम्नलिखित हो सकते हैं:-
१- भय के कारण :– सजा से डरकर किया गया कार्य।
२- लालच के कारण :– अधिक लाभ, धन, प्रसिद्धि या सुख की चाह में किया गया कार्य।
३- औपचारिकता के कारण :– केवल रस्म निभाने या दिखावे के लिए किया गया कार्य।
उपरोक्त कारणों से किया गया कर्म भले ही पूरा हो जाए, किंतु उसका पूरा फल नहीं मिलता।
कर्म का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब हम उसे समर्पण भाव से करें :– बिना किसी स्वार्थ के, पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ, इसे ईश्वर या जीवन के बड़े उद्देश्य को अर्पित करके।
इसलिए, अगली बार जब परिणाम अपेक्षा से भिन्न आएं, तो कर्म के कारण को पहले जांच करें । कारण शुद्ध होगा तो परिणाम स्वतः श्रेष्ठ होगा।
धन्यवाद।
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