प्रणाम मित्रों
आज हम गरुड़ पुराण के महात्म्य पर संक्षिप्त व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। गरुड़ पुराण हिंदू धर्म के अठारह महापुराणों में से एक है और वैष्णव संप्रदाय का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के बीच संवाद के रूप में रचित है। इस पुराण का मुख्य उद्देश्य जीवन, मृत्यु, कर्म, धर्म और मोक्ष के गहन रहस्यों को सरलता से समझाना है। आइए, इसके महात्म्य को संक्षेप में समझते हैं।
सबसे पहले, गरुड़ पुराण आध्यात्मिक ज्ञान का खजाना है। यह हमें सिखाता है कि आत्मा अमर है, और कर्मों के आधार पर पुनर्जन्म का चक्र चलता रहता है। यह पुराण कर्मफल के सिद्धांत को रेखांकित करता है, जिसमें हमारे अच्छे और बुरे कर्म ही हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं। यह हमें भक्ति, दान, तप और धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है।
दूसरा, गरुड़ पुराण मृत्यु और परलोक की प्रक्रिया को विस्तार से समझाता है। इसके प्रेत खंड में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा, यमलोक, स्वर्ग-नरक, और पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण की विधियों का उल्लेख है। यह बताता है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि आत्मा की एक नई यात्रा का प्रारंभ है। इसलिए, हिंदू संस्कृति में अंतिम संस्कार और पितृकर्म के लिए यह ग्रंथ मार्गदर्शक माना जाता है।
तीसरा, यह पुराण वैष्णव भक्ति का प्रचार करता है। भगवान विष्णु की महिमा, उनके अवतारों—विशेषकर श्रीकृष्ण और श्रीराम—के चरित्र, और भक्ति के महत्व पर बल देता है। यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति और शुद्ध हृदय से किया गया कर्म ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
गरुड़ पुराण का पाठ विशेषकर मृत्यु के बाद या धार्मिक अवसरों पर किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसके पाठ से पापों का नाश होता है, पितरों को शांति मिलती है, और मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है। यह ग्रंथ हमें नैतिक जीवन जीने, दूसरों की भलाई करने, और भगवान के प्रति श्रद्धा रखने की प्रेरणा देता है।
इसके तीन प्रमुख खंड हैं: आचार खंड, जो धर्म और कर्म का वर्णन करता है; प्रेत खंड, जो मृत्यु और परलोक की प्रक्रिया को समझाता है; और ब्रह्म खंड, जो मोक्ष और आध्यात्मिक ज्ञान पर केंद्रित है।
अंत में, गरुड़ पुराण हमें जीवन और मृत्यु के चक्र को समझने और एक सार्थक जीवन जीने का मार्ग दिखाता है। यह सिखाता है कि भक्ति, कर्म, और ज्ञान के समन्वय से ही हम परम सत्य तक पहुंच सकते हैं। इस पुराण का पठन-पाठन श्रद्धा और समझ के साथ करना चाहिए, क्योंकि यह न केवल धार्मिक, बल्कि जीवन के हर पहलू में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
इति गरुड़ पुराण के महात्म्य का संक्षिप्त व्याख्यान समाप्त। धन्यवाद।
महत्व:
प्रथम अध्याय गरुड़ पुराण का आधार प्रस्तुत करता है। यह धर्म, कर्म, और मोक्ष के मार्ग को समझने की नींव रखता है। गरुड़ और विष्णु का संवाद भक्तों को यह विश्वास दिलाता है कि सच्ची भक्ति और शुद्ध कर्म से जीवन सार्थक बनाया जा सकता है। यह अध्याय पुराण के गहन विषयों को सरलता से प्रस्तुत कर आगे के अध्यायों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है।
नमस्ते, आज हम गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय का संक्षिप्त व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। यह अध्याय, जो आचार खंड का हिस्सा है, इस पुराण का प्रवेश द्वार है और इसके उद्देश्य व महत्व को रेखांकित करता है। यह भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के संवाद के रूप में शुरू होता है। आइए, इसके सार को समझें।
प्रथम अध्याय की शुरुआत नैमिषारण्य में सूतजी द्वारा शौनक आदि ऋषियों को यह पुराण सुनाने की तैयारी से होती है। इस संदर्भ में, गरुड़ भगवान विष्णु से गहन प्रश्न पूछते हैं। वे जानना चाहते हैं कि सृष्टि कैसे बनी, जीवों का जीवन और मृत्यु का चक्र कैसे काम करता है, और परलोक की यात्रा क्या है। साथ ही, वे कर्म, धर्म, और मोक्ष के मार्ग तथा पितृकर्म के महत्व के बारे में पूछते हैं।
भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं कि यह पुराण जीवन, मृत्यु, और परम सत्य के रहस्यों को समझाने का एक अनमोल साधन है। वे सृष्टि के सृजन, पालन, और संहार के चक्र का वर्णन करते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु, और शिव के कार्यों से संचालित होता है। वे कर्मफल के सिद्धांत पर जोर देते हैं, कि जीव अपने अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार सुख-दुख भोगता है और पुनर्जन्म का चक्र चलता रहता है।
यह अध्याय पुराण के महत्व को भी स्पष्ट करता है। विष्णु कहते हैं कि गरुड़ पुराण का पाठ पापों का नाश करता है, पितरों को शांति देता है, और भक्ति के माध्यम से मोक्ष का मार्ग खोलता है। यह ग्रंथ केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि आयुर्वेद, ज्योतिष, और नीति जैसे व्यावहारिक ज्ञान का भी स्रोत है।
प्रथम अध्याय पुराण के तीन खंडों—आचार, प्रेत, और ब्रह्म खंड—का संक्षिप्त परिचय देता है। यह भक्ति, कर्म, और ज्ञान के समन्वय को प्रोत्साहित करता है, ताकि मनुष्य सार्थक जीवन जी सके।
अंत में, यह अध्याय हमें सिखाता है कि जीवन और मृत्यु के रहस्यों को समझने के लिए श्रद्धा और भक्ति आवश्यक है। यह पुराण का आधार तैयार करता है और आगे के गहन विषयों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। गरुड़ पुराण का प्रथम अध्याय हमें यह विश्वास दिलाता है कि सच्चा कर्म और भगवान विष्णु की भक्ति से हम परम सत्य तक पहुंच सकते हैं।
इस प्रकार, प्रथम अध्याय गरुड़ पुराण के उद्देश्य और महात्म्य को स्पष्ट करता है, जो श्रद्धालुओं को जीवन और मृत्यु के रहस्यों को समझने की प्रेरणा देता है।
इति गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय का संक्षिप्त व्याख्यान समाप्त। धन्यवाद।
### **महत्व**:
दूसरा अध्याय सृष्टि के रहस्य और कर्म के महत्व को समझाने के साथ-साथ मनुष्य को धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक सुख नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति है।
इस प्रकार, गरुड़ पुराण का दूसरा अध्याय सृष्टि, कर्म, और भक्ति के त्रिवेणी संगम को प्रस्तुत करता है। यह हमें अपने कर्मों के प्रति सजग रहने और भगवान विष्णु की शरण में जीवन को सार्थक बनाने का संदेश देता है।
सकती है? जब तक देहाभिमान (देह को अपना स्वरुप फेल) होता है, जब तक ममता रहती है, जब तक प्रयत्नों का वेग रहता है, जब तक संकल्प की कल्पना होती है, जब तक मन स्थिर नहीं होता, जब तक शास्त्र का चिंतन नहीं होता और जब तक गुरु की कृपा प्राप्त नहीं होती, तब तक तत्त्वज्ञान की चर्चा ही कहाँ होती है?
तप, व्रत, तीर्थ, जप, गृह तथा पूजा आदि सत्कर्मों का अनुष्ठान तथा वेद, शास्त्र तथा आगम की कथा तब तक उपयोगी है, जब तक जीव को तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं होता। इसलिए तार्क्ष्य ! यदि आपके मोक्ष की इच्छा हो तो सर्वदा संपूर्ण प्रयासों के सभी चरणों में अनुष्ठान करके तत्त्वज्ञान की प्राप्ति में संलग्न रहना चाहिए।
जो प्राणी (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) ताप त्रय से सदा संत रहता है, उसे मोक्ष वृक्ष की छाया का आश्रय लेना चाहिए। जिस मोक्षवृक्ष का पुष्प धर्म और ज्ञानस्वरूप है तथा फल स्वर्ग एवं मोक्ष है। इसलिए श्रीगुरु मुख से आत्मतत्त्वविषयक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान हो जाने पर जीव इस घोर संसार बंधन से सुख अंधकार मुक्त हो जाता है।
हे तार्क्ष्य ;- मैं तत्त्वज्ञानी पुरुष के द्वारा जाने वाले अंतिम ग्रंथ के विषय में हथियार रखता हूँ, सुनो ! जिस उपाय से जीव को ब्रह्मनिर्वाणसंज्ञक मोक्ष की प्राप्ति होती है। अंतकाल के आ जाने पर पुरुष भय को ठीक करने के लिए अनासक्तिरूपी शस्त्र से देह-गेहादि विषय की ममत्व को काटा जाता है। वह धीर पुरुष घर से पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करके पवित्र और एकांत देश में स्वीकृत आसन ग्रहण करके बैठ जाए और शुद्ध परम त्रिवृत ब्रह्माक्षर अर्थात ओंकार का मन से अभ्यास करे और ब्रह्मबीज स्वरूप ओंकार का सारगर्भित स्मरण करके श्वास को पवित्र मन को नियंत्रित करे।
बुद्धि रूपी सारथी की सहायता से मन रूपी सारथी की सहायता से इंद्रियों को विषयों से नियंत्रित कर ले और कर्मों के द्वारा आक्षेपित मन को बुद्धि की सहायता से शुभ अर्थ में अर्थात परब्रह्म का चिंतन में लगा दे। मैं ब्रह्म हूं, मैं परम धाम हूं और परम पदरूपी ब्रह्म मैं हूं - ऐसी समीक्षा करके आत्मा अपनी को निष्कल परमात्मा में लगा दे और 'ओम्' इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता है और मेरा स्मरण करता है जो मनुष्य देह-त्याग करता है, वह इस संसार से तर जाता है और परम गति प्राप्त करता है। मन और मोह से अनुपयोगी तथा आशक्ति से उत्पन्न होने वाले दोषों को प्राप्त करने वाले, सुख-दुःखदि द्वन्द्वों से मुक्त ज्ञानी पुरुष उस शाश्वत जहानी परम पद को प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति राग और द्वेष रूपी मालों का अपमान करने वाले ज्ञानरूप मठ और सत्यस्वरूप जलवाले मानसतीर्थ में स्नान करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
जो वैराग्य को धारण करके अन्य भावों का परित्याग करता है, वह केवल मदविषयक भावना के द्वारा मेरा भजन करता है, ऐसा पूर्ण दर्शन धारण करने वाला अमलान्तरात्मा संत को ही मोक्ष प्राप्त होता है। "तीर्थ में मृत्यु हो जाय" - यह उत्कंठा से एक उत्सुक अभिलाषा है जो अपने घर का परित्याग करके तीर्थ में निवास करता है और मुक्ति क्षेत्र में मरता है, वही मोक्ष प्राप्त करता है। अयोध्या, मथुरा, कनखल-हरिद्वार, काशी, कांची, अवंतिका औरवतीपुरी - ये सात पुरियां मोक्ष देने वाली हैं।
हे तार्क्ष्य ;- मैंने सनातन मोक्ष धर्म को बताया, ज्ञान और वैराग्य के साथ इसे श्रवण पुरुष मोक्ष प्राप्त होता है। तत्त्वज्ञ पुरुष मोक्ष प्राप्त होते हैं, धार्मिक पुरुष स्वर्ग प्राप्त होते हैं। पापियों की दुर्गति होती है और पशु-पक्षी आदि पुन:-पुन: जन्म-मरण रूपी संसार में भ्रमण करते हैं। इस प्रकार सभी शास्त्रों का सारोधर मैंने सेल अध्यायों में कहा, अब और क्या सिद्धांत चाहते हो?
सूत जी ने कहा - हे
राजन ; हे नाथ ! हे प्रभु! अपने अमृतमय वचनों को सुनकर आपने मुझे भवसागर से तार दिया है। अब मेरा संदेह समाप्त हो गया है और मैं कृतार्थ हो गया हूं, संशय नहीं - ऐसे साकर गरुड़ जी ने मौन में भगवद्ध्यानपरायण हो गए। स्मरण करने से जो दुर्गति का हरण कर लेते हैं, पूजन और यज्ञ के द्वारा जो सद्गति प्रदान करते हैं और अपनी परम भक्ति के द्वारा जो मुक्ति प्रदान कर देते हैं, वे हति मेरी रक्षा करते हैं।
.. "इस प्रकार गरुड़पुराण के मठ सरोधर में भगवान विष्णु ओर गरुड़ के संवाद में "मोक्षधर्मनिरूपण" नामक सेलवाँ अध्याय पुरा हुआ।।
तप, व्रत, तीर्थ, जप, गृह तथा पूजा आदि सत्कर्मों का अनुष्ठान तथा वेद, शास्त्र तथा आगम की कथा तब तक उपयोगी है, जब तक जीव को तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं होता। इसलिए तार्क्ष्य ! यदि आपके मोक्ष की इच्छा हो तो सर्वदा संपूर्ण प्रयासों के सभी चरणों में अनुष्ठान करके तत्त्वज्ञान की प्राप्ति में संलग्न रहना चाहिए।
जो प्राणी (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) ताप त्रय से सदा संत रहता है, उसे मोक्ष वृक्ष की छाया का आश्रय लेना चाहिए। जिस मोक्षवृक्ष का पुष्प धर्म और ज्ञानस्वरूप है तथा फल स्वर्ग एवं मोक्ष है। इसलिए श्रीगुरु मुख से आत्मतत्त्वविषयक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान हो जाने पर जीव इस घोर संसार बंधन से सुख अंधकार मुक्त हो जाता है।
हे तार्क्ष्य ;- मैं तत्त्वज्ञानी पुरुष के द्वारा जाने वाले अंतिम ग्रंथ के विषय में हथियार रखता हूँ, सुनो ! जिस उपाय से जीव को ब्रह्मनिर्वाणसंज्ञक मोक्ष की प्राप्ति होती है। अंतकाल के आ जाने पर पुरुष भय को ठीक करने के लिए अनासक्तिरूपी शस्त्र से देह-गेहादि विषय की ममत्व को काटा जाता है। वह धीर पुरुष घर से पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करके पवित्र और एकांत देश में स्वीकृत आसन ग्रहण करके बैठ जाए और शुद्ध परम त्रिवृत ब्रह्माक्षर अर्थात ओंकार का मन से अभ्यास करे और ब्रह्मबीज स्वरूप ओंकार का सारगर्भित स्मरण करके श्वास को पवित्र मन को नियंत्रित करे।
बुद्धि रूपी सारथी की सहायता से मन रूपी सारथी की सहायता से इंद्रियों को विषयों से नियंत्रित कर ले और कर्मों के द्वारा आक्षेपित मन को बुद्धि की सहायता से शुभ अर्थ में अर्थात परब्रह्म का चिंतन में लगा दे। मैं ब्रह्म हूं, मैं परम धाम हूं और परम पदरूपी ब्रह्म मैं हूं - ऐसी समीक्षा करके आत्मा अपनी को निष्कल परमात्मा में लगा दे और 'ओम्' इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता है और मेरा स्मरण करता है जो मनुष्य देह-त्याग करता है, वह इस संसार से तर जाता है और परम गति प्राप्त करता है। मन और मोह से अनुपयोगी तथा आशक्ति से उत्पन्न होने वाले दोषों को प्राप्त करने वाले, सुख-दुःखदि द्वन्द्वों से मुक्त ज्ञानी पुरुष उस शाश्वत जहानी परम पद को प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति राग और द्वेष रूपी मालों का अपमान करने वाले ज्ञानरूप मठ और सत्यस्वरूप जलवाले मानसतीर्थ में स्नान करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
जो वैराग्य को धारण करके अन्य भावों का परित्याग करता है, वह केवल मदविषयक भावना के द्वारा मेरा भजन करता है, ऐसा पूर्ण दर्शन धारण करने वाला अमलान्तरात्मा संत को ही मोक्ष प्राप्त होता है। "तीर्थ में मृत्यु हो जाय" - यह उत्कंठा से एक उत्सुक अभिलाषा है जो अपने घर का परित्याग करके तीर्थ में निवास करता है और मुक्ति क्षेत्र में मरता है, वही मोक्ष प्राप्त करता है। अयोध्या, मथुरा, कनखल-हरिद्वार, काशी, कांची, अवंतिका औरवतीपुरी - ये सात पुरियां मोक्ष देने वाली हैं।
हे तार्क्ष्य ;- मैंने सनातन मोक्ष धर्म को बताया, ज्ञान और वैराग्य के साथ इसे श्रवण पुरुष मोक्ष प्राप्त होता है। तत्त्वज्ञ पुरुष मोक्ष प्राप्त होते हैं, धार्मिक पुरुष स्वर्ग प्राप्त होते हैं। पापियों की दुर्गति होती है और पशु-पक्षी आदि पुन:-पुन: जन्म-मरण रूपी संसार में भ्रमण करते हैं। इस प्रकार सभी शास्त्रों का सारोधर मैंने सेल अध्यायों में कहा, अब और क्या सिद्धांत चाहते हो?
सूत जी ने कहा - हे
राजन ; हे नाथ ! हे प्रभु! अपने अमृतमय वचनों को सुनकर आपने मुझे भवसागर से तार दिया है। अब मेरा संदेह समाप्त हो गया है और मैं कृतार्थ हो गया हूं, संशय नहीं - ऐसे साकर गरुड़ जी ने मौन में भगवद्ध्यानपरायण हो गए। स्मरण करने से जो दुर्गति का हरण कर लेते हैं, पूजन और यज्ञ के द्वारा जो सद्गति प्रदान करते हैं और अपनी परम भक्ति के द्वारा जो मुक्ति प्रदान कर देते हैं, वे हति मेरी रक्षा करते हैं।
.. "इस प्रकार गरुड़पुराण के मठ सरोधर में भगवान विष्णु ओर गरुड़ के संवाद में "मोक्षधर्मनिरूपण" नामक सेलवाँ अध्याय पुरा हुआ।।
हम गरुड़ पुराण के **दूसरे अध्याय** का संक्षिप्त व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। यह अध्याय भी **आचार खंड** का हिस्सा है और भगवान विष्णु व गरुड़ के संवाद को आगे बढ़ाता है। यह सृष्टि, कर्म, और धर्म के गहन विषयों को स्पष्ट करता है। आइए, इसके सार को संक्षेप में समझें।
### **गरुड़ पुराण: दूसरा अध्याय (संक्षिप्त व्याख्यान)**
दूसरे अध्याय में गरुड़ भगवान विष्णु से सृष्टि की उत्पत्ति, विश्व के संचालन, और जीवों के कर्मों के प्रभाव के बारे में प्रश्न करते हैं। वे यह भी जानना चाहते हैं कि मनुष्य जीवन को सार्थक कैसे बनाए और धर्म के मार्ग पर कैसे चले।
भगवान विष्णु जवाब में सृष्टि के निर्माण का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि विश्व की रचना ब्रह्माजी द्वारा हुई, जिसमें प्रकृति और पुरुष का संयोग महत्वपूर्ण है। सृष्टि के विभिन्न तत्व—पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), और प्राणियों की उत्पत्ति का क्रमबद्ध वर्णन किया जाता है। यह अध्याय सृष्टि की जटिलता को सरलता से समझाता है।
इसके साथ ही, विष्णु कर्म के सिद्धांत पर बल देते हैं। वे कहते हैं कि जीव अपने कर्मों के आधार पर विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। अच्छे कर्म स्वर्ग और सुख की ओर ले जाते हैं, जबकि पापकर्म दुख और नरक का कारण बनते हैं। मनुष्य जन्म को विशेष माना जाता है, क्योंकि यह धर्म और मोक्ष प्राप्ति का अवसर प्रदान करता है।
विष्णु यह भी बताते हैं कि धर्म का पालन, भक्ति, और दान-पुण्य से मनुष्य अपने कर्मों को शुद्ध कर सकता है। वे वैष्णव भक्ति की महिमा का वर्णन करते हैं, जिसमें भगवान विष्णु की उपासना और उनके अवतारों—विशेषकर श्रीकृष्ण और श्रीराम—के प्रति श्रद्धा को मोक्ष का मार्ग बताया गया है।
यह अध्याय सामाजिक और नैतिक नियमों पर भी प्रकाश डालता है। गृहस्थ जीवन, सन्यास, और समाज के प्रति कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए यह सिखाता है कि संतुलित जीवन ही धर्म का आधार है।
इति गरुड़ पुराण के दूसरे अध्याय का संक्षिप्त व्याख्यान समाप्त। धन्यवाद।
महत्व :- तीसरा अध्याय सृष्टि के रहस्य, कर्म के सिद्धांत, और भक्ति के मार्ग को सरलता से समझाता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुखों तक सीमित नहीं है, बल्कि धर्म और भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना है। यह अध्याय मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सजग रहने और भगवान की शरण में जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा देता है।
नमस्ते, आज हम गरुड़ पुराण के **तीसरे अध्याय** का संक्षिप्त व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। यह अध्याय भी **आचार खंड** का हिस्सा है और भगवान विष्णु व गरुड़ के संवाद को आगे बढ़ाता है। इसमें सृष्टि की संरचना, धर्म, और कर्म के महत्व पर गहराई से प्रकाश डाला गया है। आइए, इसके सार को संक्षेप में समझें।
### **गरुड़ पुराण: तीसरा अध्याय (संक्षिप्त व्याख्यान)**
तीसरे अध्याय में गरुड़ भगवान विष्णु से सृष्टि के विभिन्न तत्वों, प्राणियों की उत्पत्ति, और धर्म के स्वरूप के बारे में प्रश्न करते हैं। वे यह भी जानना चाहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन को कैसे सार्थक बनाए और कर्मों के फल से कैसे मुक्ति पाए।
भगवान विष्णु जवाब में सृष्टि की संरचना का विस्तार से वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि सृष्टि में प्रकृति के पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और सूक्ष्म तत्वों का समन्वय है। विभिन्न प्राणियों की उत्पत्ति और उनके जीवन चक्र को समझाते हुए वे कहते हैं कि प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों के अनुसार जन्म और जीवन प्राप्त करता है।
इस अध्याय में कर्म के सिद्धांत पर विशेष जोर दिया गया है। विष्णु स्पष्ट करते हैं कि कर्म ही जीव के सुख-दुख, स्वर्ग-नरक, और पुनर्जन्म का आधार है। मनुष्य जन्म को दुर्लभ और मोक्ष का द्वार बताया गया है, क्योंकि यह धर्म, भक्ति, और ज्ञान के माध्यम से आत्मा को मुक्त करने का अवसर देता है।
विष्णु वैष्णव भक्ति की महिमा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान विष्णु की भक्ति, उनके नाम का जप, और उनके अवतारों—विशेषकर श्रीकृष्ण और श्रीराम—के प्रति श्रद्धा से जीव पापों से मुक्त हो सकता है। साथ ही, दान, तप, और यज्ञ जैसे पुण्य कार्यों का महत्व भी बताया गया है।
यह अध्याय सामाजिक व्यवस्था और नैतिकता पर भी प्रकाश डालता है। गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों, समाज के प्रति उत्तरदायित्व, और धर्म के पालन की शिक्षा दी गई है। विष्णु यह भी बताते हैं कि सत्य, अहिंसा, और परोपकार ही धर्म का मूल हैं।
इस प्रकार, गरुड़ पुराण का तीसरा अध्याय सृष्टि, कर्म, और भक्ति के गहन दर्शन को प्रस्तुत करता है। यह हमें धर्म के मार्ग पर चलने और जीवन को सार्थक बनाने का संदेश देता है।
इति गरुड़ पुराण के तीसरे अध्याय का संक्षिप्त व्याख्यान समाप्त। धन्यवाद।
निरपराध को दण्ड देते हैं, वे नरकगामी होते हैं। आशा लगाकर घर पर आये हुए ब्राह्मणों और याचकों को पाकसम्पन्न रहने पर भी जो भोजन नहीं कराते, वे निश्चय ही नरक प्राप्त करने वाले होते हैं। जो सभी प्राणियों में विश्वास नहीं करते और उन पर दया नहीं करते तथा जो सभी प्राणियों के प्रति कुटिलता का व्यवहार करते हैं, वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं। जो अजितेन्द्रिय पुरुष नियमों को स्वीकार कर के बाद में उन्हें त्याग देते हैं, वे नरकगामी होते हैं।
जो अध्यात्म विद्या प्रदान करने वाले गुरु को नहीं मानते और जो पुराणवक्ता को नहीं मानते, वे नरक में जाते हैं। विवाह को भंग करने वाला, देव यात्रा में विघ्न करने वाला तथा तीर्थयात्रियों को लूटने वाला घोर नरक में वास करता है और वहाँ से उसका पुनरावर्तन नहीं होता।
जो महापापी घर, गाँव तथा जंगल में आग लगाता है, यमदूत उसे ले जाकर अग्निकुण्डों में पकाते हैं। इस अग्नि में जले हुए अंगवाला वह पापी जब छाया की याचना करता है तो यमदूत उसे असिपत्र नामक वन में ले जाते हैं। जहाँ तलवार के समान तीक्ष्ण पत्तों से उसके अंग जब कट जाते हैं तब यमदूत उससे कहते हैं – रे पापी! शीतल छाया में सुख की नींद सो।।
जब वह प्यास से व्याकुल होकर जल पीने की इच्छा से पानी माँगता है तो दूतों के द्वारा उसे खौलता हुआ तेल पीने के लिये दिया जाता है। “पानी पीयो और अन्न खाओ” – ऎसा उस समय उनके द्वारा कहा जाता है। उस अति उष्ण तेल के पीते ही उनकी आँतें जल जाती हैं और वे गिर पड़ते हैं। किसी प्रकार पुन: उठकर अत्यन्त दीन की भाँति प्रलाप करते हैं। विवश होकर ऊर्ध्व श्वास लेते हुए वे कुछ कहने में भी समर्थ नहीं होते।।
हे तार्क्ष्य ;- इस प्रकार की पापियों की बहुत सी यातनाएँ बतायी गई हैं। विस्तारपूर्वक इन्हें कहने की क्या आवश्यकता? इनके संबंध में सभी शास्त्रों में कहा गया है। इस प्रकार हजारों नर-नारी नारकीय यातना को भोगते हुए प्रलयपर्यन्त घोर नरकों में पकते रहते हैं। उस पाप का अक्षय फल भोगकर पुन: वहीं पैदा होते हैं और यम की आज्ञा से पृथ्वी पर आकर स्थावर आदि योनियों को प्राप्त करते हैं।
वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, गिरि (पर्वत) तथा तृण आदि ये स्थावर योनियाँ कही गई हैं, ये अत्यन्त मोह से आवृत हैं। कीट, पशु-पक्षी, जलचर तथा देव – इन योनियों को मिलाकर चौरासी लाख योनियाँ कही गई हैं।
इन सभी योनियों में घूमते हुए जब जीव मनुष्य योनि प्राप्त करते हैं और मनुष्य योनि में भी नरक से आये व्यक्ति चाण्डाल के घर जन्म लेते हैं तथा उसमें भी कुष्ठ आदि पाप चिह्नों से वे बहुत दु:खी रहते हैं। किसी को गलित कुष्ठ हो जाता है, कोई जन्म से अन्धे होते हैं और कोई महारोग से व्यथित होते हैं। इस प्रकार पुरुष और स्त्री में पाप के चिह्न दिखाई पड़ते हैं।
।। "इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में ‘नरक प्रदान करने वाले पाप कर्म’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ" ।।
जो अध्यात्म विद्या प्रदान करने वाले गुरु को नहीं मानते और जो पुराणवक्ता को नहीं मानते, वे नरक में जाते हैं। विवाह को भंग करने वाला, देव यात्रा में विघ्न करने वाला तथा तीर्थयात्रियों को लूटने वाला घोर नरक में वास करता है और वहाँ से उसका पुनरावर्तन नहीं होता।
जो महापापी घर, गाँव तथा जंगल में आग लगाता है, यमदूत उसे ले जाकर अग्निकुण्डों में पकाते हैं। इस अग्नि में जले हुए अंगवाला वह पापी जब छाया की याचना करता है तो यमदूत उसे असिपत्र नामक वन में ले जाते हैं। जहाँ तलवार के समान तीक्ष्ण पत्तों से उसके अंग जब कट जाते हैं तब यमदूत उससे कहते हैं – रे पापी! शीतल छाया में सुख की नींद सो।।
जब वह प्यास से व्याकुल होकर जल पीने की इच्छा से पानी माँगता है तो दूतों के द्वारा उसे खौलता हुआ तेल पीने के लिये दिया जाता है। “पानी पीयो और अन्न खाओ” – ऎसा उस समय उनके द्वारा कहा जाता है। उस अति उष्ण तेल के पीते ही उनकी आँतें जल जाती हैं और वे गिर पड़ते हैं। किसी प्रकार पुन: उठकर अत्यन्त दीन की भाँति प्रलाप करते हैं। विवश होकर ऊर्ध्व श्वास लेते हुए वे कुछ कहने में भी समर्थ नहीं होते।।
हे तार्क्ष्य ;- इस प्रकार की पापियों की बहुत सी यातनाएँ बतायी गई हैं। विस्तारपूर्वक इन्हें कहने की क्या आवश्यकता? इनके संबंध में सभी शास्त्रों में कहा गया है। इस प्रकार हजारों नर-नारी नारकीय यातना को भोगते हुए प्रलयपर्यन्त घोर नरकों में पकते रहते हैं। उस पाप का अक्षय फल भोगकर पुन: वहीं पैदा होते हैं और यम की आज्ञा से पृथ्वी पर आकर स्थावर आदि योनियों को प्राप्त करते हैं।
वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, गिरि (पर्वत) तथा तृण आदि ये स्थावर योनियाँ कही गई हैं, ये अत्यन्त मोह से आवृत हैं। कीट, पशु-पक्षी, जलचर तथा देव – इन योनियों को मिलाकर चौरासी लाख योनियाँ कही गई हैं।
इन सभी योनियों में घूमते हुए जब जीव मनुष्य योनि प्राप्त करते हैं और मनुष्य योनि में भी नरक से आये व्यक्ति चाण्डाल के घर जन्म लेते हैं तथा उसमें भी कुष्ठ आदि पाप चिह्नों से वे बहुत दु:खी रहते हैं। किसी को गलित कुष्ठ हो जाता है, कोई जन्म से अन्धे होते हैं और कोई महारोग से व्यथित होते हैं। इस प्रकार पुरुष और स्त्री में पाप के चिह्न दिखाई पड़ते हैं।
।। "इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में ‘नरक प्रदान करने वाले पाप कर्म’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ" ।।
ब्राह्मण को आजीविका देने वाला व्यक्ति एक लाख गोदान का फल प्राप्त करता है और ब्राह्मण की वृत्तिका हरण करने वाला बन्दर, कुत्ता तथा लंगूर होता है।
हे खगेश्वर ;- प्राणियों को अपने कर्म के अनुसार लोक में पूर्वोक्त योनियाँ तथा शरीर पर चिह्न देखने को मिलते हैं। इस प्रकार दुष्कर्म करने वाले जीव नारकीय यातनाओं को भोगकर अवशिष्ट पापों को भोगने के लिये इन पूर्वोक्त योनियों में जाते हैं।
इसके बाद हजारों जन्मों तक तिर्यक (पशु-पक्षी) का शरीर प्राप्त करके वे बोझा ढोने आदि कार्यों से दु:ख प्राप्त करते हैं। फिर पक्षी बनकर वर्षा, शीत तथा आतप से दु:खी होते हैं। इसके बाद अन्त में जब पुण्य और पाप बराबर हो जाते हैं तब मनुष्य की योनि मिलती है। स्त्री-पुरुष के संबंध से वह गर्भ में उत्पन्न होकर क्रमश: गर्भ से लेकर मृत्यु तक के दु:ख प्राप्त करके पुन: मर जाता है।
इस प्रकार सभी प्राणियों का जन्म और विनाश होता है। यह जन्म-मरण का चक्र चारों प्रकार की सृष्टि में चलता रहता है। मेरी माया से प्राणी रहट (घटी यन्त्र) की भाँति ऊपर-नीचे की योनियों में भ्रमण करते रहते हैं। कर्मपाश बँधे रहकर कभी वे नरक में और कभी भूमि पर जन्म लेते हैं।
दान न देने से प्राणी दरिद्र होता है। दरिद्र हो जाने पर फिर पाप करता है। पाप के प्रभाव से नरक में जाता है और नरक से लौटकर पुन: दरिद्र और पुन: पापी होता है। प्राणी के द्वारा किये गये शुभ और अशुभ कर्मों का फल भोग उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है, क्योंकि सैकड़ों कल्पों के बीत जाने पर भी बिना भोग के कर्म फल का नाश नहीं होता।
।। "इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “पापचिह्ननिरुपण” नामक पाँचवां अध्याय पूर्ण हुआ" ।।
हे खगेश्वर ;- प्राणियों को अपने कर्म के अनुसार लोक में पूर्वोक्त योनियाँ तथा शरीर पर चिह्न देखने को मिलते हैं। इस प्रकार दुष्कर्म करने वाले जीव नारकीय यातनाओं को भोगकर अवशिष्ट पापों को भोगने के लिये इन पूर्वोक्त योनियों में जाते हैं।
इसके बाद हजारों जन्मों तक तिर्यक (पशु-पक्षी) का शरीर प्राप्त करके वे बोझा ढोने आदि कार्यों से दु:ख प्राप्त करते हैं। फिर पक्षी बनकर वर्षा, शीत तथा आतप से दु:खी होते हैं। इसके बाद अन्त में जब पुण्य और पाप बराबर हो जाते हैं तब मनुष्य की योनि मिलती है। स्त्री-पुरुष के संबंध से वह गर्भ में उत्पन्न होकर क्रमश: गर्भ से लेकर मृत्यु तक के दु:ख प्राप्त करके पुन: मर जाता है।
इस प्रकार सभी प्राणियों का जन्म और विनाश होता है। यह जन्म-मरण का चक्र चारों प्रकार की सृष्टि में चलता रहता है। मेरी माया से प्राणी रहट (घटी यन्त्र) की भाँति ऊपर-नीचे की योनियों में भ्रमण करते रहते हैं। कर्मपाश बँधे रहकर कभी वे नरक में और कभी भूमि पर जन्म लेते हैं।
दान न देने से प्राणी दरिद्र होता है। दरिद्र हो जाने पर फिर पाप करता है। पाप के प्रभाव से नरक में जाता है और नरक से लौटकर पुन: दरिद्र और पुन: पापी होता है। प्राणी के द्वारा किये गये शुभ और अशुभ कर्मों का फल भोग उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है, क्योंकि सैकड़ों कल्पों के बीत जाने पर भी बिना भोग के कर्म फल का नाश नहीं होता।
।। "इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “पापचिह्ननिरुपण” नामक पाँचवां अध्याय पूर्ण हुआ" ।।
भगवान गरुड़ पुराण - सातवां अध्याय ( संक्षिप्त गरुड़ पुराण - अध्याय सात)
इस अध्याय में पुत्र की महिमा, दूसरे के द्वारा दिए गए पिंडदान आदि से प्रेतत्व से मुक्ति की बात कही गई है - इस संदर्भ में राजा बभ्रुवाहन और एक प्रेत की कथा का वर्णन है।
सूतजी ने कहा ;- असा भयभीत पीपल के पत्तों की भाँति काँपते गरुड़जी ने मोक्ष के उपकार के लिए पुन: भगवान विष्णु से पूछा।
गरुड़ जी ने कहा है - हे स्वामिन ;- किस उपाय से मनुष्य प्रमादश या पापकर्मों को जानकर भी यम की यातना प्राप्त नहीं कर सकता, उसे कहिए। संसार रूपी सागर में डूबे हुए, दीन चित्तवाले, पाप से नष्ट बुद्धिवाले और विषयों के कारण ठोस आत्मा वाले विचारों के सिद्धांतों के लिए हे माधव! पुराणों में पक्के तौर पर बताए गए उपाय बताएं, जिससे मनुष्य को सद्गति प्राप्त हो सके।
श्री भगवान बोले - हे तार्क्ष्य ; -हित की कामना से अच्छी बात पूछी है। सावधान सुनो, मैं सब कुछ बताता हूँ। हे खगेश्वर! मैंने सबसे पहले पुत्र लाभ और पापी संगम की यातना का वर्णन किया है। पुत्रवान तथा धार्मिक सम्प्रदाय की पूर्वोक्त दुर्गति कभी नहीं होती। यदि आपके पूर्वअर्जित कर्मों के कारण पुत्रोत्पत्ति में विघ्न हो तो किसी भी उपाय से पुत्र की उत्पत्ति का पता लगाएं। हरिवंशपुराण की कथा दंग रह गई, खंडित शतचंडी यज्ञ करके और भक्ति अहंकार शिव की कथा सुनकर विद्वानों को जन्म देना चाहिए।
यत्: पुत्र पितरों की पुम् नामक नरक से रक्षा करती है, अत: स्वयं भगवान ब्रह्मा ने ही उन्हें पुत्र नाम से कहा है। एक धर्मात्मा पुत्र संपूर्ण कुल को तार देता है। पुत्र के द्वारा व्यक्ति लोकों को जीतते हैं, ऎसी सनातनी श्रुति है। इस प्रकार वेदों ने भी पुत्रों के उत्तम माहात्म्य को बताया है। इसलिए पुत्र का मुख देखकर मनुष्य पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है। पितृ का स्पर्श करके मनुष्य तृतीय ऋण - देव, ऋषि, पितृ - से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार पुत्र-पौत्र तथा प्रपौत्रों से यमलोक का प्रबंध करके स्वर्ग आदि को प्राप्त किया जाता है। ब्रह्मविवाह की विधि से उत्पन्न पत्नी से उत्पन्न पुत्र ऊर्ध्वगति प्राप्त की जाती है और संगृहीत पुत्र अधोगति की ओर ले जाया जाता है।
हे खगश्रेष्ठ ;- इसा जान करके व्यक्ति हीन जाति की स्त्री से उत्पन्न पुत्रों को त्याग दे।
हे खग ;- सावे पुरुषों से सावेरा शैतान में जो पुत्र पैदा होते हैं, वे और पुत्र कहे जाते हैं और वे ही श्राद्ध प्रदान करके पितरों को स्वर्ग प्राप्ति के कारण होते हैं। और पुत्र के श्राद्ध से पिता को स्वर्ग की प्राप्ति होती है, इस विषय में क्या कहा गया है? दूसरे के द्वारा किये गये श्राद्ध से भी प्रेत स्वर्ग चला जाता है, इस विषय में सुनो। यहाँ मैं एक प्राचीन इतिहास कहूँगा, जो अलौकिक दान के श्रेष्ठ महात्म्य को सूचित करता हूँ।
हे तार्क्ष्य ;-पूर्वकाल में त्रेता युग में सर नाम के रमणीय नगर में महाबलशाली और धर्मपरायण बभ्रुवाहन नामक एक राजा रहते थे। वह यज्ञानुष्ठानपरायण, दानियों में श्रेष्ठ, लक्ष्मी से, ब्राह्मणभक्त और साधु पुरुषों के प्रति अनुराग धारण करने वाला, शील और आचार आदि गुणों से युक्त, स्वजनों के प्रति अपनत्व और इतरजनों के प्रति दया के भाव से प्रमाणित थे। क्षत्रधर्मपरायण वह राजा और पुत्र की भाँति धर्म निर्बलता से अपनी प्रजा का पालन करता था और दण्ड योग्य उपकरणों को दण्ड देता था।
वह महाबाहु किसी समय सेना के साथ मृगया के लिए नाना वृक्षों से युक्त एक घनघोर वन में प्रविष्ट हुआ। वह वन नाना मृग गणों से व्याप्ति और अनेक पक्षियों से भरा हुआ था। उसी समय राजा ने वन के मध्य में दूर से एक मृग को देखा।
राजा के द्वारा सुदृढ बाण से विद्ध वह मृग बाण सहित जंगल में अदृश्य हो गया था। रुधिर से निकली घास पर बने शिलालेख से राजा ने उसका पीछा किया तब मृग के प्रसंग से वह राजा दूसरे वन में गया। भूख-प्यास से तीखा हुआ कंठ वाला और परिश्रम के संताप से पीड़ित उस राजा ने एक घोड़े के साथ स्नान और कमल की गंधादि से सुगन्धित शीतल जल का पान कराया।
इसके बाद उस कहावत से राजा बभ्रुवाहन ने वृक्ष रूपी विशाल वास्तुशिल्प के कारण आकर्षक, मनोरम और शीतल छाया वाले और पक्षी व्यालीनता से कूजित एक वट वृक्ष देखा। वह संपूर्ण वन की महती पताका की भाँति स्थित था। उसके जाट के पास राजा बैठा। उसके बाद राजा ने भूख और प्यास से व्याकुल इंद्रियों वाले, ऊपर की ओर उठे हुए बालों वाले, अत्यधिक मलिन, कुबड़े और माताओं को एक सादृश्य प्रेत को देखा।
उस प्रोटोटाइप पुरातत्व वाले को देखकर बभ्रुवाहन विस्मित हो गया। प्रेत भी समुद्रतट में आये हुए राजा को देखकर चकित हो गया और समुत्सुक मन वाला वह प्रेत उसके पास आया।
तार्क्ष्य ;-
तब प्रेतराज ने राजा से कहा था - हे महाबाहो ;- आपके संबंध से मैंने प्रेत भाव का त्याग कर दिया है अर्थात मेरा प्रेत भाव छूट गया है और मुझे परम शांति प्राप्त हो गई है तथा धन्यतर हो गया हूं।
राजा ने कहा ;- हे कृष्णवर्ण वाले तथा सित्राय रूप वाले प्रेत ! किस कर्म के प्रभाव से देखने में डराने वाले और बहुत ही मंगलकारी इस प्रेतत्व-स्वरूप को प्राप्त किया गया है।
हे तात ;- अपने प्रेतत्व की प्राप्ति का सारा कारण बतालो। तुम कौन हो और किस दान से ग़रीब प्रेतत्व का नाश होगा?
प्रेत ने कहा ;- हे श्रेष्ठ राजन! मैं शुरुआत से आपको सब कुछ बताता हूँ। प्रेतत्व के कारण से परेशान होकर आप कृपया उसे दूर करने की दया करें। वैदिश नाम का एक नगर था जो सभी प्रकार के आक्षेपों से समृद्ध था, नाना प्रान्तों से समृद्ध था, अनेक प्रकार के रत्नों से समृद्ध था, धनिकों के दर्शन तथा देव एवं राजप्रसादों से सुशोभित तथा अनेक प्रकार के धर्मानुष्ठानों से युक्त था।
हे तात ;- मैं वहां रहता था साधारण देवपूजा करता था।
विदित होना चाहिए कि मैं वैश्य जाति में उत्पन्न हुआ और मेरा नाम सुदेव था। मैंने देवताओं का वर्णन करके और काव्य प्रस्तुत करके पितरों का तर्पण किया है। अनेक प्रकार के दानों से मैंने ब्राह्मणों को सन्तुष्ट किया था और अनेक बार दीन, अँधेरे एवं कृपाण संयोजन को अन्न दिया था।
सहायक राजन हे ;- मेरा यह सारा सत्कर्म मेरे दुर्दैव से निष्फल हो गया। जिस कारण मेरा सुकृत निष्फल हुआ, वह मैं आपको बताता हूँ। मेरा कोई सन्तान नहीं है, मेरा कोई सुहृद नहीं है, कोई बंधन नहीं है और न उसका कोई मित्र है जो मेरी अधुधिक क्रिया करता है। मृत्यु के अनंतर जिस व्यक्ति के उद्देश्य से षोडश मासिक श्राद्ध नहीं मिलता, सैकड़ों श्राद्ध करने पर भी उसका प्रेतत्व सुस्थिर ही रहता है अर्थात दूर नहीं होता।
हे महाराज ;- आप मेरी दिव्य दैहिक रचना करके मेरा नारा लगाओ। क्योंकि इस लोक में राजा सभी वर्णों की बंधुओं को कहा जाता है।
इसलिए हे राजकुमार ! आप मेरा आभूषण खरीदें, मैं आपको मणिरत्न देता हूं।
हे वीर ;- अगर आप मेरा हित चाहते हैं तो जैसी मेरी सद्गति हो सके और मेरी प्रेत योनि से जैसी मुक्ति हो सके, वैसे आप। भूख-प्यास आदि दु:खों के कारण यह प्रेत योनि मेरे लिए दु:सह हो गई है।
इस वन में सुंदर स्वाद वाले शीतल जल और फल साधु हैं फिर भी मैं भूख और प्यास से पीड़ित हूं। जल मुझे और फल की प्राप्ति नहीं हो सकती।
हे राजन विधि ;- यदि मेरे उद्देश्य से यथा नारायण बलि की जाए, उसके बाद वेदमंत्रों के द्वारा मेरे सभी आध्यात्मिक दैहिक ग्रंथों का संकलन किया जाए तो निश्चित ही मेरा प्रेतवाधिक विनाश हो जाएगा, इसमें कोई संशय नहीं है। मैंने सुना है कि वेद के मंत्र, तप, दान और सभी शास्त्रों का श्रवण, भगवान विष्णु की पूजा और सज्जनों की संगति - ये सब प्रेत योनि के विनाश के लिए होते हैं।
इसलिए मैं आपसे विष्णु पूजा को नष्ट करने वाली बात कहूँगा।
हे राजन ;- न्यायोपार्जित दो सुवर्ण (32 माशा) भार का सोना लेकर नारायण की एक मूर्ति, जिसे विविध पवित्र जलों से स्नान दो पिय वस्त्रों से वेष्टित करके सभी अलंकारों से विहित कर अधिवासित करें, तदनंतर उनका पूजन करें। उस प्रतिमा के पूर्व भाग में श्रीधर, दक्षिण में मधुसूदन, पश्चिम में वामन और उत्तर में गदाधर, मध्य में पितामह ब्रह्मा और महादेव शिव की स्थापना करके गंध-पुष्पदी द्रव्यों के विधि-विधान से पृथक्करण-पृथक पूजन करें। उसके बाद प्रदक्षिणा करके अग्नि में देवताओं को तृप्त करके घृत, दधि और दूध से विश्वेदेवों को तृप्त करें।
तदनन्तर समाहित चित्तवाला यजमान स्नान करके नारायण के अग्र भाग में, सनातन कथा विधि निषेध मन में संकल्पित आध्यात्मिक क्रिया का आरंभ करें। इसके बाद क्रोध और लोभ से सभी श्राद्धों को अनुपयोगी शास्त्र विधि से करें और वृषोत्सर्ग करें। तदनन्तर ब्राह्मणों को तीर्थ दान करे, फिर सय्यादान दान देने के लिए घाट का दान करे।
राजा ने कहा – हे प्रेत ;- किस विधान से प्रेत घाट का निर्माण करना चाहिए और किस विधान से उसका दान करना चाहिए। सभी आतंकवादियों के ऊपर अनुकंपा करने के उद्देश्य से प्रेतों को मुक्ति दिलाने वाले प्रेतघट-दान के विषय में बताएं।
प्रेत ने कहा - हे महाराज ; प्रेतघट का दान, सभी प्रकार के मंगलों का विनाश करने वाला, सभी लोकों में दुर्लभ और दुर्गति को नष्ट करने वाला है। ब्रह्मा, शिव और विष्णु सहित लोकपालों ने तपाये हुए सोने का एक घटा दूध उसे दिया, घी आदि से पुरा तीर्थ, भक्ति को पवित्र मानकर ब्राह्मण को दान करें। इसके अतिरिक्त सुरक्षा अन्य सैकड़ों दानों को देने की क्या आवश्यकता है?
हे राजन ;- उस घाट के मध्य में ब्रह्मा, विष्णु और कल्याण करने वाले विष्णु शंकर की स्थापना एवं घाट के कंठ में पूर्व आदिम द्वीपों में पूर्णिमा: लोकपालों का आह्वान करके उनकी धूप, पुष्प, चंदन आदि से पूजा करके दूध और घी के साथ उस हिरण घाट्यमय का ब्राह्मण को दान करना चाहिए। हे राजन ! सभी दानों में श्रेष्ठ और महापातकों का नाश करने वाले इस दान को श्रद्धा से वंचित करना चाहिए।
श्री भगवान ने कहा - हे कश्यपपुत्र गरुड़ ;-प्रेत के साथ इस प्रकार की बातचीत हो ही रही थी कि उसी समय हाथी, घोड़ा आदि से लेकर विशाल राजा की सेना तक पीछे आ गई। सेना के आगमन के बाद राजा को महामनी ने उन्हें प्रणाम करके पुन: कहा: अपने स्थान के लिए अलौकिक क्रिया करने की प्रार्थना करके वह प्रेत अदृश्य हो गया।
हे पक्षिन ;- उस वन से राजा भी अपने नगर को चला गया और अपने नगर में पहुंच कर प्रेत के द्वारा बताए गए वचनों के अनुसार उसने विधि-विधान से अलौकिक क्रिया का अनुष्ठान किया। उसका पुण्यसदस्य मुक्त तारा प्रेट स्वर्ग को चला गया।
जब दूसरे के द्वारा किये गये श्राद्ध से प्रेत की सद्गति हो गयी तो फिर पुत्र के द्वारा किये गये श्राद्ध से पिता की सद्गति हो गयी, इसमें क्या आश्चर्य!! इस पुण्यप्रद इतिहास को जो मिलता है और जो सुना जाता है, वे दोनों पापाचारों से युक्त पर भी प्रेतत्व प्राप्त नहीं होते।
.. "इस प्रकार गरुड़पुराण के मठ सरोधर "बभ्रुवाहनप्रेतसंस्कार" को सातवाँ अध्याय पुरा कहा गया।।
इस अध्याय में पुत्र की महिमा, दूसरे के द्वारा दिए गए पिंडदान आदि से प्रेतत्व से मुक्ति की बात कही गई है - इस संदर्भ में राजा बभ्रुवाहन और एक प्रेत की कथा का वर्णन है।
सूतजी ने कहा ;- असा भयभीत पीपल के पत्तों की भाँति काँपते गरुड़जी ने मोक्ष के उपकार के लिए पुन: भगवान विष्णु से पूछा।
गरुड़ जी ने कहा है - हे स्वामिन ;- किस उपाय से मनुष्य प्रमादश या पापकर्मों को जानकर भी यम की यातना प्राप्त नहीं कर सकता, उसे कहिए। संसार रूपी सागर में डूबे हुए, दीन चित्तवाले, पाप से नष्ट बुद्धिवाले और विषयों के कारण ठोस आत्मा वाले विचारों के सिद्धांतों के लिए हे माधव! पुराणों में पक्के तौर पर बताए गए उपाय बताएं, जिससे मनुष्य को सद्गति प्राप्त हो सके।
श्री भगवान बोले - हे तार्क्ष्य ; -हित की कामना से अच्छी बात पूछी है। सावधान सुनो, मैं सब कुछ बताता हूँ। हे खगेश्वर! मैंने सबसे पहले पुत्र लाभ और पापी संगम की यातना का वर्णन किया है। पुत्रवान तथा धार्मिक सम्प्रदाय की पूर्वोक्त दुर्गति कभी नहीं होती। यदि आपके पूर्वअर्जित कर्मों के कारण पुत्रोत्पत्ति में विघ्न हो तो किसी भी उपाय से पुत्र की उत्पत्ति का पता लगाएं। हरिवंशपुराण की कथा दंग रह गई, खंडित शतचंडी यज्ञ करके और भक्ति अहंकार शिव की कथा सुनकर विद्वानों को जन्म देना चाहिए।
यत्: पुत्र पितरों की पुम् नामक नरक से रक्षा करती है, अत: स्वयं भगवान ब्रह्मा ने ही उन्हें पुत्र नाम से कहा है। एक धर्मात्मा पुत्र संपूर्ण कुल को तार देता है। पुत्र के द्वारा व्यक्ति लोकों को जीतते हैं, ऎसी सनातनी श्रुति है। इस प्रकार वेदों ने भी पुत्रों के उत्तम माहात्म्य को बताया है। इसलिए पुत्र का मुख देखकर मनुष्य पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है। पितृ का स्पर्श करके मनुष्य तृतीय ऋण - देव, ऋषि, पितृ - से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार पुत्र-पौत्र तथा प्रपौत्रों से यमलोक का प्रबंध करके स्वर्ग आदि को प्राप्त किया जाता है। ब्रह्मविवाह की विधि से उत्पन्न पत्नी से उत्पन्न पुत्र ऊर्ध्वगति प्राप्त की जाती है और संगृहीत पुत्र अधोगति की ओर ले जाया जाता है।
हे खगश्रेष्ठ ;- इसा जान करके व्यक्ति हीन जाति की स्त्री से उत्पन्न पुत्रों को त्याग दे।
हे खग ;- सावे पुरुषों से सावेरा शैतान में जो पुत्र पैदा होते हैं, वे और पुत्र कहे जाते हैं और वे ही श्राद्ध प्रदान करके पितरों को स्वर्ग प्राप्ति के कारण होते हैं। और पुत्र के श्राद्ध से पिता को स्वर्ग की प्राप्ति होती है, इस विषय में क्या कहा गया है? दूसरे के द्वारा किये गये श्राद्ध से भी प्रेत स्वर्ग चला जाता है, इस विषय में सुनो। यहाँ मैं एक प्राचीन इतिहास कहूँगा, जो अलौकिक दान के श्रेष्ठ महात्म्य को सूचित करता हूँ।
हे तार्क्ष्य ;-पूर्वकाल में त्रेता युग में सर नाम के रमणीय नगर में महाबलशाली और धर्मपरायण बभ्रुवाहन नामक एक राजा रहते थे। वह यज्ञानुष्ठानपरायण, दानियों में श्रेष्ठ, लक्ष्मी से, ब्राह्मणभक्त और साधु पुरुषों के प्रति अनुराग धारण करने वाला, शील और आचार आदि गुणों से युक्त, स्वजनों के प्रति अपनत्व और इतरजनों के प्रति दया के भाव से प्रमाणित थे। क्षत्रधर्मपरायण वह राजा और पुत्र की भाँति धर्म निर्बलता से अपनी प्रजा का पालन करता था और दण्ड योग्य उपकरणों को दण्ड देता था।
वह महाबाहु किसी समय सेना के साथ मृगया के लिए नाना वृक्षों से युक्त एक घनघोर वन में प्रविष्ट हुआ। वह वन नाना मृग गणों से व्याप्ति और अनेक पक्षियों से भरा हुआ था। उसी समय राजा ने वन के मध्य में दूर से एक मृग को देखा।
राजा के द्वारा सुदृढ बाण से विद्ध वह मृग बाण सहित जंगल में अदृश्य हो गया था। रुधिर से निकली घास पर बने शिलालेख से राजा ने उसका पीछा किया तब मृग के प्रसंग से वह राजा दूसरे वन में गया। भूख-प्यास से तीखा हुआ कंठ वाला और परिश्रम के संताप से पीड़ित उस राजा ने एक घोड़े के साथ स्नान और कमल की गंधादि से सुगन्धित शीतल जल का पान कराया।
इसके बाद उस कहावत से राजा बभ्रुवाहन ने वृक्ष रूपी विशाल वास्तुशिल्प के कारण आकर्षक, मनोरम और शीतल छाया वाले और पक्षी व्यालीनता से कूजित एक वट वृक्ष देखा। वह संपूर्ण वन की महती पताका की भाँति स्थित था। उसके जाट के पास राजा बैठा। उसके बाद राजा ने भूख और प्यास से व्याकुल इंद्रियों वाले, ऊपर की ओर उठे हुए बालों वाले, अत्यधिक मलिन, कुबड़े और माताओं को एक सादृश्य प्रेत को देखा।
उस प्रोटोटाइप पुरातत्व वाले को देखकर बभ्रुवाहन विस्मित हो गया। प्रेत भी समुद्रतट में आये हुए राजा को देखकर चकित हो गया और समुत्सुक मन वाला वह प्रेत उसके पास आया।
तार्क्ष्य ;-
तब प्रेतराज ने राजा से कहा था - हे महाबाहो ;- आपके संबंध से मैंने प्रेत भाव का त्याग कर दिया है अर्थात मेरा प्रेत भाव छूट गया है और मुझे परम शांति प्राप्त हो गई है तथा धन्यतर हो गया हूं।
राजा ने कहा ;- हे कृष्णवर्ण वाले तथा सित्राय रूप वाले प्रेत ! किस कर्म के प्रभाव से देखने में डराने वाले और बहुत ही मंगलकारी इस प्रेतत्व-स्वरूप को प्राप्त किया गया है।
हे तात ;- अपने प्रेतत्व की प्राप्ति का सारा कारण बतालो। तुम कौन हो और किस दान से ग़रीब प्रेतत्व का नाश होगा?
प्रेत ने कहा ;- हे श्रेष्ठ राजन! मैं शुरुआत से आपको सब कुछ बताता हूँ। प्रेतत्व के कारण से परेशान होकर आप कृपया उसे दूर करने की दया करें। वैदिश नाम का एक नगर था जो सभी प्रकार के आक्षेपों से समृद्ध था, नाना प्रान्तों से समृद्ध था, अनेक प्रकार के रत्नों से समृद्ध था, धनिकों के दर्शन तथा देव एवं राजप्रसादों से सुशोभित तथा अनेक प्रकार के धर्मानुष्ठानों से युक्त था।
हे तात ;- मैं वहां रहता था साधारण देवपूजा करता था।
विदित होना चाहिए कि मैं वैश्य जाति में उत्पन्न हुआ और मेरा नाम सुदेव था। मैंने देवताओं का वर्णन करके और काव्य प्रस्तुत करके पितरों का तर्पण किया है। अनेक प्रकार के दानों से मैंने ब्राह्मणों को सन्तुष्ट किया था और अनेक बार दीन, अँधेरे एवं कृपाण संयोजन को अन्न दिया था।
सहायक राजन हे ;- मेरा यह सारा सत्कर्म मेरे दुर्दैव से निष्फल हो गया। जिस कारण मेरा सुकृत निष्फल हुआ, वह मैं आपको बताता हूँ। मेरा कोई सन्तान नहीं है, मेरा कोई सुहृद नहीं है, कोई बंधन नहीं है और न उसका कोई मित्र है जो मेरी अधुधिक क्रिया करता है। मृत्यु के अनंतर जिस व्यक्ति के उद्देश्य से षोडश मासिक श्राद्ध नहीं मिलता, सैकड़ों श्राद्ध करने पर भी उसका प्रेतत्व सुस्थिर ही रहता है अर्थात दूर नहीं होता।
हे महाराज ;- आप मेरी दिव्य दैहिक रचना करके मेरा नारा लगाओ। क्योंकि इस लोक में राजा सभी वर्णों की बंधुओं को कहा जाता है।
इसलिए हे राजकुमार ! आप मेरा आभूषण खरीदें, मैं आपको मणिरत्न देता हूं।
हे वीर ;- अगर आप मेरा हित चाहते हैं तो जैसी मेरी सद्गति हो सके और मेरी प्रेत योनि से जैसी मुक्ति हो सके, वैसे आप। भूख-प्यास आदि दु:खों के कारण यह प्रेत योनि मेरे लिए दु:सह हो गई है।
इस वन में सुंदर स्वाद वाले शीतल जल और फल साधु हैं फिर भी मैं भूख और प्यास से पीड़ित हूं। जल मुझे और फल की प्राप्ति नहीं हो सकती।
हे राजन विधि ;- यदि मेरे उद्देश्य से यथा नारायण बलि की जाए, उसके बाद वेदमंत्रों के द्वारा मेरे सभी आध्यात्मिक दैहिक ग्रंथों का संकलन किया जाए तो निश्चित ही मेरा प्रेतवाधिक विनाश हो जाएगा, इसमें कोई संशय नहीं है। मैंने सुना है कि वेद के मंत्र, तप, दान और सभी शास्त्रों का श्रवण, भगवान विष्णु की पूजा और सज्जनों की संगति - ये सब प्रेत योनि के विनाश के लिए होते हैं।
इसलिए मैं आपसे विष्णु पूजा को नष्ट करने वाली बात कहूँगा।
हे राजन ;- न्यायोपार्जित दो सुवर्ण (32 माशा) भार का सोना लेकर नारायण की एक मूर्ति, जिसे विविध पवित्र जलों से स्नान दो पिय वस्त्रों से वेष्टित करके सभी अलंकारों से विहित कर अधिवासित करें, तदनंतर उनका पूजन करें। उस प्रतिमा के पूर्व भाग में श्रीधर, दक्षिण में मधुसूदन, पश्चिम में वामन और उत्तर में गदाधर, मध्य में पितामह ब्रह्मा और महादेव शिव की स्थापना करके गंध-पुष्पदी द्रव्यों के विधि-विधान से पृथक्करण-पृथक पूजन करें। उसके बाद प्रदक्षिणा करके अग्नि में देवताओं को तृप्त करके घृत, दधि और दूध से विश्वेदेवों को तृप्त करें।
तदनन्तर समाहित चित्तवाला यजमान स्नान करके नारायण के अग्र भाग में, सनातन कथा विधि निषेध मन में संकल्पित आध्यात्मिक क्रिया का आरंभ करें। इसके बाद क्रोध और लोभ से सभी श्राद्धों को अनुपयोगी शास्त्र विधि से करें और वृषोत्सर्ग करें। तदनन्तर ब्राह्मणों को तीर्थ दान करे, फिर सय्यादान दान देने के लिए घाट का दान करे।
राजा ने कहा – हे प्रेत ;- किस विधान से प्रेत घाट का निर्माण करना चाहिए और किस विधान से उसका दान करना चाहिए। सभी आतंकवादियों के ऊपर अनुकंपा करने के उद्देश्य से प्रेतों को मुक्ति दिलाने वाले प्रेतघट-दान के विषय में बताएं।
प्रेत ने कहा - हे महाराज ; प्रेतघट का दान, सभी प्रकार के मंगलों का विनाश करने वाला, सभी लोकों में दुर्लभ और दुर्गति को नष्ट करने वाला है। ब्रह्मा, शिव और विष्णु सहित लोकपालों ने तपाये हुए सोने का एक घटा दूध उसे दिया, घी आदि से पुरा तीर्थ, भक्ति को पवित्र मानकर ब्राह्मण को दान करें। इसके अतिरिक्त सुरक्षा अन्य सैकड़ों दानों को देने की क्या आवश्यकता है?
हे राजन ;- उस घाट के मध्य में ब्रह्मा, विष्णु और कल्याण करने वाले विष्णु शंकर की स्थापना एवं घाट के कंठ में पूर्व आदिम द्वीपों में पूर्णिमा: लोकपालों का आह्वान करके उनकी धूप, पुष्प, चंदन आदि से पूजा करके दूध और घी के साथ उस हिरण घाट्यमय का ब्राह्मण को दान करना चाहिए। हे राजन ! सभी दानों में श्रेष्ठ और महापातकों का नाश करने वाले इस दान को श्रद्धा से वंचित करना चाहिए।
श्री भगवान ने कहा - हे कश्यपपुत्र गरुड़ ;-प्रेत के साथ इस प्रकार की बातचीत हो ही रही थी कि उसी समय हाथी, घोड़ा आदि से लेकर विशाल राजा की सेना तक पीछे आ गई। सेना के आगमन के बाद राजा को महामनी ने उन्हें प्रणाम करके पुन: कहा: अपने स्थान के लिए अलौकिक क्रिया करने की प्रार्थना करके वह प्रेत अदृश्य हो गया।
हे पक्षिन ;- उस वन से राजा भी अपने नगर को चला गया और अपने नगर में पहुंच कर प्रेत के द्वारा बताए गए वचनों के अनुसार उसने विधि-विधान से अलौकिक क्रिया का अनुष्ठान किया। उसका पुण्यसदस्य मुक्त तारा प्रेट स्वर्ग को चला गया।
जब दूसरे के द्वारा किये गये श्राद्ध से प्रेत की सद्गति हो गयी तो फिर पुत्र के द्वारा किये गये श्राद्ध से पिता की सद्गति हो गयी, इसमें क्या आश्चर्य!! इस पुण्यप्रद इतिहास को जो मिलता है और जो सुना जाता है, वे दोनों पापाचारों से युक्त पर भी प्रेतत्व प्राप्त नहीं होते।
.. "इस प्रकार गरुड़पुराण के मठ सरोधर "बभ्रुवाहनप्रेतसंस्कार" को सातवाँ अध्याय पुरा कहा गया।।
संक्षिप्त गरुड़ पुराण – आठवाँ अध्याय (succinct Garuda Purana - Eighth Chapter)
गरुड़ जी ने कहा – हे तार्क्ष्य ;- मनुष्यों के हित की दृष्टि से आपने बड़ी उत्तम बात पूछी है। धार्मिक मनुष्य के लिए करने योग्य जो कृत्य हैं, वह सब कुछ मैं तुम्हें कहता हूँ। पुण्यात्मा व्यक्ति वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर अपने शरीर को व्याधिग्रस्त तथा ग्रहों की प्रतिकूलता को देखकर और प्राण वायु के नाद न सुनाई पड़ने पर अपने मरण का समय जानकर निर्भय हो जाए और आलस्य का परित्याग कर जाने-अनजाने किये गये पापों के विनाश के लिए प्रायश्चित का आचरण करे।
जब आतुरकाल उपस्थित हो जाए तो स्नान करके शालग्राम स्वरुप भगवान विष्णु की पूजा कराए। गन्ध, पुष्प, कुंकुम, तुलसीदल, धूप, दीप तथा बहुत से मोदक आदि नैवेद्यों को समर्पित करके भगवान की अर्चा करे और विप्रों को दक्षिणा देकर नैवेद्य का ही भोजन कराएँ तथा अष्टाक्षर (ऊँ नमो नारायणाय) अथवा द्वादशाक्षर (ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्र का जप करें। भगवान विष्णु और शिव के नाम का स्मरण करें और सुनें, भगवान का नाम कानों से सुनाई पड़ने पर वह मनुष्य के पाप को नष्ट करता है। रोगी के समीप आकर बान्धवों को शोक नहीं करना चाहिए। प्रत्युत मेरे पवित्र नाम का बार-बार स्मरण करना चाहिए।
विद्वान व्यक्ति को, मत्स्य, कूर्म, वराह, नारसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि (भगवान के ये दस अवतार हैं) – इन दस नामों का सदा स्मरण कीर्तन करना चाहिए। जो व्यक्ति रोगी के समीप उपर्युक्त नामों का कीर्तन करते हैं, वे ही उसके सच्चे बान्धव कहे गये हैं। “कृष्ण” यह मंगलमय नाम जिसकी वाणी से उच्चरित होता है, उसके करोड़ों महापातक तत्काल भस्म हो जाते हैं।
मरणासन्न अवस्था में अपने पुत्र के बहाने से “नारायण” नाम लेकर अजामिल भी भगद्धाम को प्राप्त हो गया तो फिर जो श्रद्धापूर्वक भगवान के नाम का उच्चारण करने वाले हैं, उनके विषय में क्या कहना !! दूषित चित्तवृत्ति वाले व्यक्ति के द्वारा भी स्मरण किये जाने पर भगवान उसके समस्त पापों को नष्ट कर देते हैं, जैसे अनिच्छापूर्वक भी स्पर्श करने पर अग्नि जलाता ही है।
हे द्विज ;- वासना के सहित पापों का समूल विनाश करने की जितनी शक्ति भगवान नाम में हैं, पातकी मनुष्य उतना पाप करने में समर्थ ही नहीं है।
यमदेव अपने किंकरों से कहते हैं – हे दूतों ;- हमारे पास नास्तिकजनों को ले आया करो। भगवान के नाम का स्मरण करने वाले मनुष्यों को मेरे पास मत लाया करो क्योंकि मैं स्वयं अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ, जानकीनायक रामचन्द्र का भजन करता हूँ।
हे दूतों ;- जो व्यक्ति हे कमलनयन, हे वासुदेव, हे विष्णु, हे धरणीधर, हे अच्युत, हे शंखचक्रपाणि ! आप मेरे शरणदाता हो – ऎसा कहते हैं, उन निष्पाप व्यक्तियों को तुम दूर से ही छोड़ देना।
हे दूतों ;- जो निष्किंचन और रसज्ञ परमहंसों के द्वारा निरन्तर आस्वादित भगवान मुकुन्द के पादारविन्द-मकरन्द-रस से विमुख हैं अर्थात भगवद भक्ति से विमुख हैं और नरक के मूल गृहस्थी के प्रपंच में तृष्णा से बद्ध हैं, ऎसे असत्पुरुषों को मेरे पास लाया करो।
जिनकी जिह्वा भगवान के गुण और नाम का कीर्तन नहीं करती, चित्त भगवान के चरणाविन्द का स्मरण नहीं करता, सिर एक बार भी भगवान को प्रणाम नहीं करता, ऎसे विष्णु के आराधना-उपासना आदि कृत्यों से रहित असत्पुरुषों को मेरे पास ले आओ। इसलिए हे पक्षीन्द्र ;- जगत में मंगल – स्वरूप भगवान विष्णु का कीर्तन ही एकमात्र महान पापों के आत्यन्तिक और ऎकान्तिक निवृत्ति का प्रायश्चित है – ऎसा जानो।
नारायण से पराड्मुख रहने वाले व्यक्तियों के द्वारा किये गये प्रायश्चित्ताचरण भी दुर्बुद्धि प्राणि को उसी प्रकार पवित्र नहीं कर सकते, जैसे मदिरा से भरे घट को गंगाजी – सदृश नदियाँ पवित्र नहीं कर सकतीं। भगवान कृष्ण के नाम स्मरण से पाप नष्ट हो जाने के कारण जीव नरक को नहीं देखते और स्वप्न में भी कभी यम तथा यमदूतों को नहीं देखते।
जो व्यक्ति अन्तकाल में नन्दनन्दन भगवान श्रीकृष्ण के पीछे चलते हैं, ऎसी गाय को ब्राह्मणों को दान देता है, वह माँस, हड्डी और रक्त से परिपूर्ण वैतरणी नडी में गिरता अथवा जो मृत्यु के समय में ‘नन्दनन्दन’ इस प्रकार की वाणी का उच्चारण करता है, शरीर धारण नहीं करता अर्थात मुक्त हो जाता है। अत: पापों के समूह को नष्ट करने वाले महाविष्णु के नाम का स्मरण करना चाहिए अथवा गीत या विष्णुसहस्त्रनाम का पठन अथवा श्रवण करना चाहिए। एकादशी का व्रत, गीता, गंगाजल, तुलसीदल, भगवान विष्णु का चरणामृत और नाम – ये मरणकाल में मुक्ति देने वाले हैं। इसके बाद घृत और सुवर्ण सहित अन्नदान का संकल्प करें। श्रोत्रिय द्विज (वेदपाठी ब्राह्मण) को सवत्सा गौ का दान करें।
हे तार्क्ष्य ;- जो मनुष्य अन्तकाल में थोड़ा बहुत दान देता है और पुत्र उसका अनुमोदन करता है, वह दान अक्षय होता है।
सत्पुत्र को चाहिए कि अन्तकाल में सभी प्रकार का दान दिलाए, लोक में धर्मज्ञ पुरुष इसीलिए पुत्र के लिए प्रार्थना करते हैं। भूमि पर स्थित, आधी आँखे मूँदे हुए पिता को देखकर पुत्रों को उनके द्वारा पूर्व संचित धन के विषय में तृष्णा नहीं करनी चाहिए। सत्पुत्र के द्वारा दिये गये दान से जब तक उसका पिता जीवित हो तब तक और फिर मृत्यु के अनन्तर आतिवाहिक शरीर से भी परलोक के मर्ग में वह दु:ख नहीं प्राप्त करता।
आतुरकाल और ग्रहणकाल – इन दोनों कालों में दिये गये दान का विशेष महत्व है, इसलिए तिल आदि अष्ट दान अवश्य देने चाहिए। तिल, लोहा, सोना, कपास, नमक, सप्तधान्य (धान, जौ, गेहूँ, उड़द, काकुन या कंगुनी और चना – ये सप्तधान्य कहे जाते हैं), भूमि और गाय – इनमें से एक-एक का दान भी पवित्र करने वाला है। यह अष्ट महादान महापातकों का नाश करने वाला है। अत: अन्तकाल में इसे देना चाहिए। इन दानों का जो उत्तम फल है उसे सुनो – तीन प्रकार के पवित्र तिल मेरे पसीने से उत्पन्न हुए हैं। असुर, दानव और दैत्य तिल दान से तृप्त होते हैं। श्वेत, कृष्ण तथा कपिल (भूरे) वर्ण के तिल का दान वाणी, मन और शरीर के द्वारा किये गये त्रिविध पापों को नष्ट कर देता है।
लोहे का दान भूमि में हाथ रखकर देना चाहिए। ऎसा करने से वह जीव यम सीमा को नहीं प्राप्त होता और यम मार्ग में नहीं जाता। पाप-कर्म करने वाले व्यक्तियों का निग्रह करने के लिए यम के हाथ में कुल्हाड़ी, मूसल, दण्ड, तलवार तथा छुरी – शस्त्र के रुप में रहते हैं। यमराज के आयुधों को संतुष्ट करने के लिए यह लोहे का दान कहा गया है इसलिए यमलोक में सुख देने वाले लोहदान को करना चाहिए।
उरण, श्यामसूत्र, शण्डामर्क, उदुम्बर, शेषम्बल नामक यम के महादूत लोहदान से सुख प्रदान करने वाले होते हैं।
हे तार्क्ष्य ;- परम गोपनीय और दानों में उत्तम दान को सुनो, जिसके देने से भूलोक, भुवर्लोक (अन्तरिक्ष) और स्वर्गलोक के निवासी अर्थात मनुष्य, भूत-प्रेत तथा देवगण संतुष्ट होते हैं। ब्रह्मा आदि देवता, ऋषिगण तथा धर्मराज के सभासद – स्वर्णदान से संतुष्ट होकर वर प्रदान करने वाले होते हैं। इसलिए प्रेत के उद्धार के लिए स्वर्णदान करना चाहिए।
हे तात ;- स्वर्ण का दान देने से जीव यमलोक नहीं जाता, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
बहुत काल तक वह सत्यलोक में निवास करता है, तदनन्तर इस लोक में रूपवान, धार्मिक, वाक्पटु, श्रीमान और अतुल पराक्रमी राजा होता है। कपास का दान देने से यमदूतों से भय नहीं होता, लवण का दान से यम से भय नहीं होता। लोहा, नमक, कपास, तुल और स्वर्ण के दान से यमपुर के निवासी चित्रगुप्त आदि संतुष्ट होते हैं। सप्तधान्य प्रदान करने से धर्मराज और यमपुर के तीनों द्वारों पर रहने वाले अन्य द्वारपाल भी प्रसन्न हो जाते हैं।
धान, जौ, गेहूँ, मूँग, उड़द, काकुन या कँगुनी और सातवाँ चना – ये सप्तधान्य कहे गये हैं। जो व्यक्ति गोचर्ममात्र (सो गायें और एक बैल जितनी भूमि पर स्वतंत्र रूप से रह सकें, विचरण कर सकें, उतनी विस्तार वाली भूमि गोचर्म कहलाती है। इसका दान समस्त पापों का नाश करने वाला है) भूमि विधानपूर्वक सत्पात्र को देता है, वह ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है, ऎसा मुनीश्वरों ने देखा है। राज्य में किया हुआ अर्थात राज्यसंचालन में राजा से होने वाला महापाप न व्रतों से, न तीर्थ सेवन से और न अन्य किसी दान से नष्ट होता है अपितु वह तो केवल भूमि दान से ही विलीन होता है। जो व्यक्ति ब्राह्मण को धान्यपूर्ण पृथिवी का दान करता है, वह देवताओं और असुरों से पूजित होकर इन्द्रलोक में जाता है।
हे गरुड़ ;- अन्य दानों का फल अत्यल्प होता है किंतु पृथ्वी दान का पुण्य दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है। भूमि का स्वामी होकर भी जो ब्राह्मण को भूमि नहीं देता वह जन्मान्तर में किसी ग्राम में एक कुटिया तक भी नहीं प्राप्त करता और जन्म-जन्मान्तर में अर्थात प्रत्येक जन्म में दरिद्र होता है। भूमि का स्वामी होने के अभिमान में जो भूमि का दान नहीं करता, वह तब तक नरक में निवास करता है, जब तक शेष नाग पृथ्वी को धारण करते हैं। इसलिए भूमि के स्वामी को भूमि दान करना ही चाहिए। अन्य व्यक्तियों के लिए भूमि दान के स्थान पर मैंने गोदान का विधान किया है। इसके बाद अन्तधेनु का दान करना चाहिए और रुद्रधेनु देनी चाहिए। तदनन्तर ऋणधेनु देकर मोक्षधेनु का दान करना चाहिए।
हे खग ;- विशेष विधानपूर्वक वैतरणीधेनु का दान करना चाहिए। दान में दी गई गौएँ मनुष्य को त्रिविध पापों से मुक्त करती हैं।
बाल्यावस्था में, कुमारावस्था में, युवावस्था में, वृद्धावस्था में अथवा दूसरे जन्म में, रात में, प्रात:काल, मध्याह्न, अपराह्ण और दोनों संध्या कालों में शरीर, मन और वाणी से जो पाप किये गये हैं, वे सभी पाप तपस्या और सदाचार से युक्त वेदविद ब्राह्मणों को उपस्करयुक्त (दान सामग्री सहित) सवत्सा और दूध देने वाली कपिला गौ के एक बार दान देने से नष्ट हो जाते हैं। दान में दी गई वह गौ अन्तकाल में गोदान करने वाले व्यक्ति का संचित पापों से उद्धार कर देती है।
स्वस्थचित्तावस्था में दी गई एक गौ, आतुरावस्था में दी गई सौ गाय और मृत्युकाल में चित्तविवर्जित व्यक्ति के द्वारा दी गई एक हजार गाय तथा मरणोत्तर काल में दी गई विधिपूर्वक एक लाख गाय के दान का फल बराबर ही होता है। (यहाँ स्वस्थावस्था में गोदान करने का विशेष महत्व बतलाया गया है) तीर्थ में सत्पात्र को दी गई एक गाय का दान एक लक्ष गोदान के तुल्य होता है।
सत्पात्र में दिया गया दान लक्षगुना होता है। उस दान से दाता को अनन्त फल प्राप्त होता है और दान लेने वाले पात्र को प्रतिग्रह दान लेने का दोष नहीं लगता। स्वाध्याय और होम करने वाला तथा दूसरे के द्वारा पकाए गये अन्न को न खाने वाला अर्थात स्वयं पाकी ब्राह्मण रत्नपूर्ण पृथ्वी का दान लेकर भी प्रतिग्रह दोष से लिप्त नहीं होता। विष और शीत को नष्ट करने वाले मन्त्र और आग भी क्या दोष के भागी होते हैं? अपात्र को दी गई वह गाय दाता को नरक में ले जाती है और अपात्र प्रतिग्रहीता को एक सौ एक पीढ़ी के पुरुषों के सहित नरक में गिराती है। इसलिए अपने कल्याण की इच्छा करने वाले विद्वान व्यक्ति को अपात्र को दान नहीं देना चाहिए।
एक गाय एक ही ब्राह्मण को देनी चाहिए। बहुत ब्राह्मणों को एक गाय कदापि नहीं देनी चाहिए। वह गौ यदि बेची या बाँटी गई तो सात पीढ़ी तक के पुरुषों को जला देती है। हे खगेश्वर ! मैंने तुमसे पहले वैतरणी नदी के विषय में कहा था, उसे पार करने के उपायभूत गोदान के विषय में मैं तुमसे कहता हूँ।
काले अथवा लाल रंग की गाय को सोने के सींग, चाँदी के खुर और काँसे के पात्र की दोहनी के सहित दो काले रंग के वस्त्रों से आच्छादित करें। उसके कण्ठ में घण्टा बाँधे तब कपास के ऊपर वस्त्र सहित ताम्रपात्र को स्थापित करके वहाँ लोहदण्ड सहित सोने की यम मूर्त्ति भी स्थापित करें और काँसे के पात्र में घृत रखकर यह सब ताम्रपात्र के ऊपर रखें। ईख की नींव बनाकर उसे रेशमी सूत्र से बाँधकर, भूमि पर गढ्ढा खोदे एवं उसमें जल भरकर वह ईख की नाव उसमें डाले।
उसके समीप सूर्य की देह से उत्पन्न हुई धेनु को खड़ी करके शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार उसके दान का संकल्प करें। ब्राह्मणों को अलंकार और वस्त्र का दान दें तथा गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि से विधानपूर्वक गाय की पूजा करें। गाय की पूँछ को पकड़कर ईख की नाव पर पैर रखकर ब्राह्मण को आगे करके इस मन्त्र को पढ़े –
‘हे जगन्नाथ ! हे शरणागतवत्सल ! भवसागर में डूबे हुए शोक-संताप की लहरों से दु:ख प्राप्त करते हुए जनों के आप ही रक्षक हैं। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! विष्णुरूप ! भूमिदेव ! आप मेरा उद्धार कीजिए। मैंने दक्षिणा के सहित यह वैतरणी-रूपिणी गाय आपको दी है, आपको नमस्कार है। मैं महाभयावह यम मार्ग में सौ योजन विस्तार वाली उस वैतरणी नदी को पार करने की इच्छा से आपको इस वैतरणी गाय का दान देता हूँ। आपको नमस्कार है।’
हे वैतरणी धेनु ! हे देवेशि ! यमद्वार के महामार्ग में वैतरणी नदी के पार कराने के लिए आप मेरी प्रतीक्षा करना, आपको नमस्कार है। मेरे आगे भी गौएँ हो, मेरे पीछे भी गौएँ हों, मेरे हृदय में भी गौएँ हों और मैं गौओं के मध्य में निवास करुँ। जो लक्ष्मी सभी प्राणियों में प्रतिष्ठित हैं तथा जो देवता में प्रतिष्ठित हैं वे ही धेनुरूपा लक्ष्मी देवी मेरे पाप को नष्ट करें। इस प्रकार मन्त्रों से भली-भाँति प्रार्थना करके हाथ जोड़कर गाय और यम की प्रदक्षिणा कर के सब कुछ ब्राह्मण को प्रदान करें।
हे खग ;- इस विधान से जो वैतरणी धेनु का दान करता है, वह धर्म मार्ग से धर्मराज की सभा में जाता है। शरीर की स्वस्थावस्था में ही वैतरणी विषयक व्रत का आचरण कर लेना चाहिए और वैतरणी पार करने की इच्छा से विद्वान को वैतरणी गाय का दान करना चाहिए।
हे खग ;- वैतरणी गाय का दान करने से महामार्ग में वह नदी नहीं आती इसलिए सर्वदा पुण्यकाल में गोदान करना चाहिए। गंगा आदि सभी तीर्थों में, ब्राह्मणों के निवास स्थानों में, चन्द्र और सूर्यग्रहण काल में, संक्रान्ति में, अमावस्या तिथि में, उत्तरायण और दक्षिणायन (कर्क और मकर संक्रान्तियों) में, विषुव ( अर्थात मेष तथा तुला की संक्रान्ति में), व्यतीपात योग में, युगादि तिथियों में तथा अन्यान्य पुण्यकालों में उत्तम गोदान देना चाहिए।
जब कभी भी श्रद्धा उत्पन्न हो जाए और जब भी दान के लिए सुपात्र प्राप्त हो जाए, वही समय दान के लिए पुण्यकाल है, क्योंकि सम्पत्ति अस्थिर है। शरीर नश्वर है, सम्पत्ति सदा रहने वाली नहीं है और मृत्यु प्रतिक्षण निकट आती जा रही है, इसलिए धर्म का संचय करना चाहिए। अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार किया गया दान अनन्त फलवाला होता है। इसलिए अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को विद्वान ब्राह्मण को दान देना चाहिए।
अपने हाथ से अपने कल्याण के लिए दिया गया अल्प वित्त वाला वह दान भी अक्षय होता है और उसका फल भी तत्काल प्राप्त होता है। दान रूपी पाथेय को लेकर जीव परलोक के महामार्ग में सुखपूर्वक जाता है अन्यथा दानरुपी पाथेय रहित प्राणि को यममार्ग में क्लेश प्राप्त होता है। पृथ्वी पर मनुष्यों के द्वारा जो-जो दान दिये जाते हैं, यमलोक के मार्ग वे सभी आगे-आगे उपस्थित हो जाते हैं। महान पुण्य के प्रभाव से मनुष्य-जन्म प्राप्त होता है। उस मनुष्य योनि को प्राप्त कर जो व्यक्ति धर्माचरण करता है, वह परमगति को प्राप्त करता है। धर्म को न जानने के कारण व्यक्ति संसार में दु:खपूर्वक जन्म लेता है और मरता है। केवल धर्म के सेवन में ही मनुष्य जीवन की सफलता है।
धन, पुत्र, पत्नी आदि बान्धव और यह शरीर भी सब कुछ अनित्य हैै इसलिए धर्माचरण करना चाहिए। जब तक मनुष्य जीता है तभी तक बन्धु-बान्धव और पिता आदि का संबंध रहता है, मरने के अनन्तर क्षणमात्र में सम्पूर्ण स्नेह संबंध निवृत हो जाता है। जीवितावस्था में अपनी आत्मा ही अपना बन्धु है – ऎसा बार-बार विचार करना चाहिए। मरने के अनन्तर कौन उसके उद्देश्य से दान देगा? ऎसा जानकर अपने हाथ से ही सब कुछ दान देना चाहिए क्योंकि जीवन अनित्य है, बाद में अर्थात उसकी मृत्यु के पश्चात कोई भी उसके लिए दान नहीं देगा। मृत शरीर को काठ और ढेले के समान पृथ्वी पर छोड़कर बन्धु-बान्धव विमुख होकर लौट जाते हैं, केवल धर्म ही उसका अनुगमन करता है। धन-सम्पत्ति घर में ही छूट जाती है, सभी बन्धु-बान्धव श्मशान में छूट जाते हैं किंतु प्राणी के द्वारा किया हुआ शुभाशुभ कर्म परलोक में उसके पीछे-पीछे जाता है।
शरीर आग से जल जाता है किंतु किया हुआ कर्म साथ में रहता है। प्राणि जो कुछ पाप अथवा पुण्य करता है, उसका वह सर्वत्र भोग प्राप्त करता है। इस दु:खपूर्ण संसार सागर में कोई भी किसी का बन्धु नहीं है। प्राणी अपने कर्म संबंध से संसार में आता है और फल भोग से कर्म का क्षय होने पर पुन: चला जाता है अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
माता-पिता, पुत्र, भाई, बन्धु और पत्नी आदि का परस्पर मिलन प्याऊ पर एकत्र हुए जन्तुओं के समान अथवा नदी में बहने वाले काष्ठ समूह के समान नितान्त चंचल अर्थात अस्थिर है। किसके पुत्र, किसके पौत्र, किसकी भार्या और किसका धन? संसार में कोई किसी का नहीं है। इसलिए अपने हाथ से स्वयं दान देना चाहिए। जब तक धन अपने अधीन है तब तक ब्राह्मण को दान कर दें क्योंकि धन दूसरे के अधीन हो जाने पर तो दान देने के लिए कहने का साहस भी नहीं होगा।
पूर्व जन्म में किये हुए दान के फलस्वरुप यहाँ बहुत सारा धन प्राप्त हुआ है इसलिए ऎसा जानकर धर्म के लिए धन देना चाहिए। धर्म से अर्थ की प्राप्ति होती है, धर्म से काम की प्राप्ति होती है और धर्म से ही मोक्ष की भी प्राप्ति होती है इसलिए धर्माचरण करना चाहिए। धर्म श्रद्धा से धारण किया जाता है, बहुत सी धन राशि से नहीं। अकिंचन मुनिगण भी श्रद्धावान होकर स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।
जो मनुष्य पत्र, पुष्प, फल अथवा जल मुझे भक्तिभाव से समर्पित करता है, उस संयतात्मा के द्वारा भक्तिपूर्वक दिये गये पदार्थों को मैं प्राप्त करता हूँ। इसलिए विधिविधानपूर्वक अवश्य ही दान देना चाहिए। थोड़ा हो या अधिक इसकी कोई गणना नहीं करनी चाहिए। जो पुत्र पृथ्वी पर पड़े हुए आतुर पिता के द्वारा दान दिलाता है, वह धर्मात्मा पुत्र देवताओं के लिए भी पूजनीय होता है। माता-पिता के निमित्त जो धन पुत्र के द्वारा सत्पात्र को समर्पित किया जाता है, उससे पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र के साथ वह व्यक्ति स्वयं भी पवित्र हो जाता है। पिता के उद्देश्य से किये गये दान से हजार गुना, बहन के उद्देश्य से किये गये दान से दस हजार गुना और सहोदर भाई के निमित्त किए गये दान से अनन्त गुना पुण्य प्राप्त होता है।
दान देने वाला उपद्रवग्रस्त नहीं होता, उसे नरक यातना नहीं प्राप्त होती और मृत्युकाल में उसे यमदूतों से भी कोई भय नहीं होता।
हे खग ;- यदि कोई व्यक्ति लोभ से आतुरकाल में दान नहीं देते वे कंजूस पापी प्राणी मरने के अनन्तर शोकगमन होते हैं। आतुरकाल में आतुर के उद्देश्य से जो पुत्र, पौत्र, सहोदर भाई, सगोत्री और सुहृज्जन दान नहीं देते, वे ब्रह्महत्यारे हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।
।। "इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में ‘आतुरदाननिरूपण’ नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ" ।।
गरुड़ जी ने कहा – हे तार्क्ष्य ;- मनुष्यों के हित की दृष्टि से आपने बड़ी उत्तम बात पूछी है। धार्मिक मनुष्य के लिए करने योग्य जो कृत्य हैं, वह सब कुछ मैं तुम्हें कहता हूँ। पुण्यात्मा व्यक्ति वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर अपने शरीर को व्याधिग्रस्त तथा ग्रहों की प्रतिकूलता को देखकर और प्राण वायु के नाद न सुनाई पड़ने पर अपने मरण का समय जानकर निर्भय हो जाए और आलस्य का परित्याग कर जाने-अनजाने किये गये पापों के विनाश के लिए प्रायश्चित का आचरण करे।
जब आतुरकाल उपस्थित हो जाए तो स्नान करके शालग्राम स्वरुप भगवान विष्णु की पूजा कराए। गन्ध, पुष्प, कुंकुम, तुलसीदल, धूप, दीप तथा बहुत से मोदक आदि नैवेद्यों को समर्पित करके भगवान की अर्चा करे और विप्रों को दक्षिणा देकर नैवेद्य का ही भोजन कराएँ तथा अष्टाक्षर (ऊँ नमो नारायणाय) अथवा द्वादशाक्षर (ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्र का जप करें। भगवान विष्णु और शिव के नाम का स्मरण करें और सुनें, भगवान का नाम कानों से सुनाई पड़ने पर वह मनुष्य के पाप को नष्ट करता है। रोगी के समीप आकर बान्धवों को शोक नहीं करना चाहिए। प्रत्युत मेरे पवित्र नाम का बार-बार स्मरण करना चाहिए।
विद्वान व्यक्ति को, मत्स्य, कूर्म, वराह, नारसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि (भगवान के ये दस अवतार हैं) – इन दस नामों का सदा स्मरण कीर्तन करना चाहिए। जो व्यक्ति रोगी के समीप उपर्युक्त नामों का कीर्तन करते हैं, वे ही उसके सच्चे बान्धव कहे गये हैं। “कृष्ण” यह मंगलमय नाम जिसकी वाणी से उच्चरित होता है, उसके करोड़ों महापातक तत्काल भस्म हो जाते हैं।
मरणासन्न अवस्था में अपने पुत्र के बहाने से “नारायण” नाम लेकर अजामिल भी भगद्धाम को प्राप्त हो गया तो फिर जो श्रद्धापूर्वक भगवान के नाम का उच्चारण करने वाले हैं, उनके विषय में क्या कहना !! दूषित चित्तवृत्ति वाले व्यक्ति के द्वारा भी स्मरण किये जाने पर भगवान उसके समस्त पापों को नष्ट कर देते हैं, जैसे अनिच्छापूर्वक भी स्पर्श करने पर अग्नि जलाता ही है।
हे द्विज ;- वासना के सहित पापों का समूल विनाश करने की जितनी शक्ति भगवान नाम में हैं, पातकी मनुष्य उतना पाप करने में समर्थ ही नहीं है।
यमदेव अपने किंकरों से कहते हैं – हे दूतों ;- हमारे पास नास्तिकजनों को ले आया करो। भगवान के नाम का स्मरण करने वाले मनुष्यों को मेरे पास मत लाया करो क्योंकि मैं स्वयं अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ, जानकीनायक रामचन्द्र का भजन करता हूँ।
हे दूतों ;- जो व्यक्ति हे कमलनयन, हे वासुदेव, हे विष्णु, हे धरणीधर, हे अच्युत, हे शंखचक्रपाणि ! आप मेरे शरणदाता हो – ऎसा कहते हैं, उन निष्पाप व्यक्तियों को तुम दूर से ही छोड़ देना।
हे दूतों ;- जो निष्किंचन और रसज्ञ परमहंसों के द्वारा निरन्तर आस्वादित भगवान मुकुन्द के पादारविन्द-मकरन्द-रस से विमुख हैं अर्थात भगवद भक्ति से विमुख हैं और नरक के मूल गृहस्थी के प्रपंच में तृष्णा से बद्ध हैं, ऎसे असत्पुरुषों को मेरे पास लाया करो।
जिनकी जिह्वा भगवान के गुण और नाम का कीर्तन नहीं करती, चित्त भगवान के चरणाविन्द का स्मरण नहीं करता, सिर एक बार भी भगवान को प्रणाम नहीं करता, ऎसे विष्णु के आराधना-उपासना आदि कृत्यों से रहित असत्पुरुषों को मेरे पास ले आओ। इसलिए हे पक्षीन्द्र ;- जगत में मंगल – स्वरूप भगवान विष्णु का कीर्तन ही एकमात्र महान पापों के आत्यन्तिक और ऎकान्तिक निवृत्ति का प्रायश्चित है – ऎसा जानो।
नारायण से पराड्मुख रहने वाले व्यक्तियों के द्वारा किये गये प्रायश्चित्ताचरण भी दुर्बुद्धि प्राणि को उसी प्रकार पवित्र नहीं कर सकते, जैसे मदिरा से भरे घट को गंगाजी – सदृश नदियाँ पवित्र नहीं कर सकतीं। भगवान कृष्ण के नाम स्मरण से पाप नष्ट हो जाने के कारण जीव नरक को नहीं देखते और स्वप्न में भी कभी यम तथा यमदूतों को नहीं देखते।
जो व्यक्ति अन्तकाल में नन्दनन्दन भगवान श्रीकृष्ण के पीछे चलते हैं, ऎसी गाय को ब्राह्मणों को दान देता है, वह माँस, हड्डी और रक्त से परिपूर्ण वैतरणी नडी में गिरता अथवा जो मृत्यु के समय में ‘नन्दनन्दन’ इस प्रकार की वाणी का उच्चारण करता है, शरीर धारण नहीं करता अर्थात मुक्त हो जाता है। अत: पापों के समूह को नष्ट करने वाले महाविष्णु के नाम का स्मरण करना चाहिए अथवा गीत या विष्णुसहस्त्रनाम का पठन अथवा श्रवण करना चाहिए। एकादशी का व्रत, गीता, गंगाजल, तुलसीदल, भगवान विष्णु का चरणामृत और नाम – ये मरणकाल में मुक्ति देने वाले हैं। इसके बाद घृत और सुवर्ण सहित अन्नदान का संकल्प करें। श्रोत्रिय द्विज (वेदपाठी ब्राह्मण) को सवत्सा गौ का दान करें।
हे तार्क्ष्य ;- जो मनुष्य अन्तकाल में थोड़ा बहुत दान देता है और पुत्र उसका अनुमोदन करता है, वह दान अक्षय होता है।
सत्पुत्र को चाहिए कि अन्तकाल में सभी प्रकार का दान दिलाए, लोक में धर्मज्ञ पुरुष इसीलिए पुत्र के लिए प्रार्थना करते हैं। भूमि पर स्थित, आधी आँखे मूँदे हुए पिता को देखकर पुत्रों को उनके द्वारा पूर्व संचित धन के विषय में तृष्णा नहीं करनी चाहिए। सत्पुत्र के द्वारा दिये गये दान से जब तक उसका पिता जीवित हो तब तक और फिर मृत्यु के अनन्तर आतिवाहिक शरीर से भी परलोक के मर्ग में वह दु:ख नहीं प्राप्त करता।
आतुरकाल और ग्रहणकाल – इन दोनों कालों में दिये गये दान का विशेष महत्व है, इसलिए तिल आदि अष्ट दान अवश्य देने चाहिए। तिल, लोहा, सोना, कपास, नमक, सप्तधान्य (धान, जौ, गेहूँ, उड़द, काकुन या कंगुनी और चना – ये सप्तधान्य कहे जाते हैं), भूमि और गाय – इनमें से एक-एक का दान भी पवित्र करने वाला है। यह अष्ट महादान महापातकों का नाश करने वाला है। अत: अन्तकाल में इसे देना चाहिए। इन दानों का जो उत्तम फल है उसे सुनो – तीन प्रकार के पवित्र तिल मेरे पसीने से उत्पन्न हुए हैं। असुर, दानव और दैत्य तिल दान से तृप्त होते हैं। श्वेत, कृष्ण तथा कपिल (भूरे) वर्ण के तिल का दान वाणी, मन और शरीर के द्वारा किये गये त्रिविध पापों को नष्ट कर देता है।
लोहे का दान भूमि में हाथ रखकर देना चाहिए। ऎसा करने से वह जीव यम सीमा को नहीं प्राप्त होता और यम मार्ग में नहीं जाता। पाप-कर्म करने वाले व्यक्तियों का निग्रह करने के लिए यम के हाथ में कुल्हाड़ी, मूसल, दण्ड, तलवार तथा छुरी – शस्त्र के रुप में रहते हैं। यमराज के आयुधों को संतुष्ट करने के लिए यह लोहे का दान कहा गया है इसलिए यमलोक में सुख देने वाले लोहदान को करना चाहिए।
उरण, श्यामसूत्र, शण्डामर्क, उदुम्बर, शेषम्बल नामक यम के महादूत लोहदान से सुख प्रदान करने वाले होते हैं।
हे तार्क्ष्य ;- परम गोपनीय और दानों में उत्तम दान को सुनो, जिसके देने से भूलोक, भुवर्लोक (अन्तरिक्ष) और स्वर्गलोक के निवासी अर्थात मनुष्य, भूत-प्रेत तथा देवगण संतुष्ट होते हैं। ब्रह्मा आदि देवता, ऋषिगण तथा धर्मराज के सभासद – स्वर्णदान से संतुष्ट होकर वर प्रदान करने वाले होते हैं। इसलिए प्रेत के उद्धार के लिए स्वर्णदान करना चाहिए।
हे तात ;- स्वर्ण का दान देने से जीव यमलोक नहीं जाता, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
बहुत काल तक वह सत्यलोक में निवास करता है, तदनन्तर इस लोक में रूपवान, धार्मिक, वाक्पटु, श्रीमान और अतुल पराक्रमी राजा होता है। कपास का दान देने से यमदूतों से भय नहीं होता, लवण का दान से यम से भय नहीं होता। लोहा, नमक, कपास, तुल और स्वर्ण के दान से यमपुर के निवासी चित्रगुप्त आदि संतुष्ट होते हैं। सप्तधान्य प्रदान करने से धर्मराज और यमपुर के तीनों द्वारों पर रहने वाले अन्य द्वारपाल भी प्रसन्न हो जाते हैं।
धान, जौ, गेहूँ, मूँग, उड़द, काकुन या कँगुनी और सातवाँ चना – ये सप्तधान्य कहे गये हैं। जो व्यक्ति गोचर्ममात्र (सो गायें और एक बैल जितनी भूमि पर स्वतंत्र रूप से रह सकें, विचरण कर सकें, उतनी विस्तार वाली भूमि गोचर्म कहलाती है। इसका दान समस्त पापों का नाश करने वाला है) भूमि विधानपूर्वक सत्पात्र को देता है, वह ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है, ऎसा मुनीश्वरों ने देखा है। राज्य में किया हुआ अर्थात राज्यसंचालन में राजा से होने वाला महापाप न व्रतों से, न तीर्थ सेवन से और न अन्य किसी दान से नष्ट होता है अपितु वह तो केवल भूमि दान से ही विलीन होता है। जो व्यक्ति ब्राह्मण को धान्यपूर्ण पृथिवी का दान करता है, वह देवताओं और असुरों से पूजित होकर इन्द्रलोक में जाता है।
हे गरुड़ ;- अन्य दानों का फल अत्यल्प होता है किंतु पृथ्वी दान का पुण्य दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है। भूमि का स्वामी होकर भी जो ब्राह्मण को भूमि नहीं देता वह जन्मान्तर में किसी ग्राम में एक कुटिया तक भी नहीं प्राप्त करता और जन्म-जन्मान्तर में अर्थात प्रत्येक जन्म में दरिद्र होता है। भूमि का स्वामी होने के अभिमान में जो भूमि का दान नहीं करता, वह तब तक नरक में निवास करता है, जब तक शेष नाग पृथ्वी को धारण करते हैं। इसलिए भूमि के स्वामी को भूमि दान करना ही चाहिए। अन्य व्यक्तियों के लिए भूमि दान के स्थान पर मैंने गोदान का विधान किया है। इसके बाद अन्तधेनु का दान करना चाहिए और रुद्रधेनु देनी चाहिए। तदनन्तर ऋणधेनु देकर मोक्षधेनु का दान करना चाहिए।
हे खग ;- विशेष विधानपूर्वक वैतरणीधेनु का दान करना चाहिए। दान में दी गई गौएँ मनुष्य को त्रिविध पापों से मुक्त करती हैं।
बाल्यावस्था में, कुमारावस्था में, युवावस्था में, वृद्धावस्था में अथवा दूसरे जन्म में, रात में, प्रात:काल, मध्याह्न, अपराह्ण और दोनों संध्या कालों में शरीर, मन और वाणी से जो पाप किये गये हैं, वे सभी पाप तपस्या और सदाचार से युक्त वेदविद ब्राह्मणों को उपस्करयुक्त (दान सामग्री सहित) सवत्सा और दूध देने वाली कपिला गौ के एक बार दान देने से नष्ट हो जाते हैं। दान में दी गई वह गौ अन्तकाल में गोदान करने वाले व्यक्ति का संचित पापों से उद्धार कर देती है।
स्वस्थचित्तावस्था में दी गई एक गौ, आतुरावस्था में दी गई सौ गाय और मृत्युकाल में चित्तविवर्जित व्यक्ति के द्वारा दी गई एक हजार गाय तथा मरणोत्तर काल में दी गई विधिपूर्वक एक लाख गाय के दान का फल बराबर ही होता है। (यहाँ स्वस्थावस्था में गोदान करने का विशेष महत्व बतलाया गया है) तीर्थ में सत्पात्र को दी गई एक गाय का दान एक लक्ष गोदान के तुल्य होता है।
सत्पात्र में दिया गया दान लक्षगुना होता है। उस दान से दाता को अनन्त फल प्राप्त होता है और दान लेने वाले पात्र को प्रतिग्रह दान लेने का दोष नहीं लगता। स्वाध्याय और होम करने वाला तथा दूसरे के द्वारा पकाए गये अन्न को न खाने वाला अर्थात स्वयं पाकी ब्राह्मण रत्नपूर्ण पृथ्वी का दान लेकर भी प्रतिग्रह दोष से लिप्त नहीं होता। विष और शीत को नष्ट करने वाले मन्त्र और आग भी क्या दोष के भागी होते हैं? अपात्र को दी गई वह गाय दाता को नरक में ले जाती है और अपात्र प्रतिग्रहीता को एक सौ एक पीढ़ी के पुरुषों के सहित नरक में गिराती है। इसलिए अपने कल्याण की इच्छा करने वाले विद्वान व्यक्ति को अपात्र को दान नहीं देना चाहिए।
एक गाय एक ही ब्राह्मण को देनी चाहिए। बहुत ब्राह्मणों को एक गाय कदापि नहीं देनी चाहिए। वह गौ यदि बेची या बाँटी गई तो सात पीढ़ी तक के पुरुषों को जला देती है। हे खगेश्वर ! मैंने तुमसे पहले वैतरणी नदी के विषय में कहा था, उसे पार करने के उपायभूत गोदान के विषय में मैं तुमसे कहता हूँ।
काले अथवा लाल रंग की गाय को सोने के सींग, चाँदी के खुर और काँसे के पात्र की दोहनी के सहित दो काले रंग के वस्त्रों से आच्छादित करें। उसके कण्ठ में घण्टा बाँधे तब कपास के ऊपर वस्त्र सहित ताम्रपात्र को स्थापित करके वहाँ लोहदण्ड सहित सोने की यम मूर्त्ति भी स्थापित करें और काँसे के पात्र में घृत रखकर यह सब ताम्रपात्र के ऊपर रखें। ईख की नींव बनाकर उसे रेशमी सूत्र से बाँधकर, भूमि पर गढ्ढा खोदे एवं उसमें जल भरकर वह ईख की नाव उसमें डाले।
उसके समीप सूर्य की देह से उत्पन्न हुई धेनु को खड़ी करके शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार उसके दान का संकल्प करें। ब्राह्मणों को अलंकार और वस्त्र का दान दें तथा गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि से विधानपूर्वक गाय की पूजा करें। गाय की पूँछ को पकड़कर ईख की नाव पर पैर रखकर ब्राह्मण को आगे करके इस मन्त्र को पढ़े –
‘हे जगन्नाथ ! हे शरणागतवत्सल ! भवसागर में डूबे हुए शोक-संताप की लहरों से दु:ख प्राप्त करते हुए जनों के आप ही रक्षक हैं। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! विष्णुरूप ! भूमिदेव ! आप मेरा उद्धार कीजिए। मैंने दक्षिणा के सहित यह वैतरणी-रूपिणी गाय आपको दी है, आपको नमस्कार है। मैं महाभयावह यम मार्ग में सौ योजन विस्तार वाली उस वैतरणी नदी को पार करने की इच्छा से आपको इस वैतरणी गाय का दान देता हूँ। आपको नमस्कार है।’
हे वैतरणी धेनु ! हे देवेशि ! यमद्वार के महामार्ग में वैतरणी नदी के पार कराने के लिए आप मेरी प्रतीक्षा करना, आपको नमस्कार है। मेरे आगे भी गौएँ हो, मेरे पीछे भी गौएँ हों, मेरे हृदय में भी गौएँ हों और मैं गौओं के मध्य में निवास करुँ। जो लक्ष्मी सभी प्राणियों में प्रतिष्ठित हैं तथा जो देवता में प्रतिष्ठित हैं वे ही धेनुरूपा लक्ष्मी देवी मेरे पाप को नष्ट करें। इस प्रकार मन्त्रों से भली-भाँति प्रार्थना करके हाथ जोड़कर गाय और यम की प्रदक्षिणा कर के सब कुछ ब्राह्मण को प्रदान करें।
हे खग ;- इस विधान से जो वैतरणी धेनु का दान करता है, वह धर्म मार्ग से धर्मराज की सभा में जाता है। शरीर की स्वस्थावस्था में ही वैतरणी विषयक व्रत का आचरण कर लेना चाहिए और वैतरणी पार करने की इच्छा से विद्वान को वैतरणी गाय का दान करना चाहिए।
हे खग ;- वैतरणी गाय का दान करने से महामार्ग में वह नदी नहीं आती इसलिए सर्वदा पुण्यकाल में गोदान करना चाहिए। गंगा आदि सभी तीर्थों में, ब्राह्मणों के निवास स्थानों में, चन्द्र और सूर्यग्रहण काल में, संक्रान्ति में, अमावस्या तिथि में, उत्तरायण और दक्षिणायन (कर्क और मकर संक्रान्तियों) में, विषुव ( अर्थात मेष तथा तुला की संक्रान्ति में), व्यतीपात योग में, युगादि तिथियों में तथा अन्यान्य पुण्यकालों में उत्तम गोदान देना चाहिए।
जब कभी भी श्रद्धा उत्पन्न हो जाए और जब भी दान के लिए सुपात्र प्राप्त हो जाए, वही समय दान के लिए पुण्यकाल है, क्योंकि सम्पत्ति अस्थिर है। शरीर नश्वर है, सम्पत्ति सदा रहने वाली नहीं है और मृत्यु प्रतिक्षण निकट आती जा रही है, इसलिए धर्म का संचय करना चाहिए। अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार किया गया दान अनन्त फलवाला होता है। इसलिए अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को विद्वान ब्राह्मण को दान देना चाहिए।
अपने हाथ से अपने कल्याण के लिए दिया गया अल्प वित्त वाला वह दान भी अक्षय होता है और उसका फल भी तत्काल प्राप्त होता है। दान रूपी पाथेय को लेकर जीव परलोक के महामार्ग में सुखपूर्वक जाता है अन्यथा दानरुपी पाथेय रहित प्राणि को यममार्ग में क्लेश प्राप्त होता है। पृथ्वी पर मनुष्यों के द्वारा जो-जो दान दिये जाते हैं, यमलोक के मार्ग वे सभी आगे-आगे उपस्थित हो जाते हैं। महान पुण्य के प्रभाव से मनुष्य-जन्म प्राप्त होता है। उस मनुष्य योनि को प्राप्त कर जो व्यक्ति धर्माचरण करता है, वह परमगति को प्राप्त करता है। धर्म को न जानने के कारण व्यक्ति संसार में दु:खपूर्वक जन्म लेता है और मरता है। केवल धर्म के सेवन में ही मनुष्य जीवन की सफलता है।
धन, पुत्र, पत्नी आदि बान्धव और यह शरीर भी सब कुछ अनित्य हैै इसलिए धर्माचरण करना चाहिए। जब तक मनुष्य जीता है तभी तक बन्धु-बान्धव और पिता आदि का संबंध रहता है, मरने के अनन्तर क्षणमात्र में सम्पूर्ण स्नेह संबंध निवृत हो जाता है। जीवितावस्था में अपनी आत्मा ही अपना बन्धु है – ऎसा बार-बार विचार करना चाहिए। मरने के अनन्तर कौन उसके उद्देश्य से दान देगा? ऎसा जानकर अपने हाथ से ही सब कुछ दान देना चाहिए क्योंकि जीवन अनित्य है, बाद में अर्थात उसकी मृत्यु के पश्चात कोई भी उसके लिए दान नहीं देगा। मृत शरीर को काठ और ढेले के समान पृथ्वी पर छोड़कर बन्धु-बान्धव विमुख होकर लौट जाते हैं, केवल धर्म ही उसका अनुगमन करता है। धन-सम्पत्ति घर में ही छूट जाती है, सभी बन्धु-बान्धव श्मशान में छूट जाते हैं किंतु प्राणी के द्वारा किया हुआ शुभाशुभ कर्म परलोक में उसके पीछे-पीछे जाता है।
शरीर आग से जल जाता है किंतु किया हुआ कर्म साथ में रहता है। प्राणि जो कुछ पाप अथवा पुण्य करता है, उसका वह सर्वत्र भोग प्राप्त करता है। इस दु:खपूर्ण संसार सागर में कोई भी किसी का बन्धु नहीं है। प्राणी अपने कर्म संबंध से संसार में आता है और फल भोग से कर्म का क्षय होने पर पुन: चला जाता है अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
माता-पिता, पुत्र, भाई, बन्धु और पत्नी आदि का परस्पर मिलन प्याऊ पर एकत्र हुए जन्तुओं के समान अथवा नदी में बहने वाले काष्ठ समूह के समान नितान्त चंचल अर्थात अस्थिर है। किसके पुत्र, किसके पौत्र, किसकी भार्या और किसका धन? संसार में कोई किसी का नहीं है। इसलिए अपने हाथ से स्वयं दान देना चाहिए। जब तक धन अपने अधीन है तब तक ब्राह्मण को दान कर दें क्योंकि धन दूसरे के अधीन हो जाने पर तो दान देने के लिए कहने का साहस भी नहीं होगा।
पूर्व जन्म में किये हुए दान के फलस्वरुप यहाँ बहुत सारा धन प्राप्त हुआ है इसलिए ऎसा जानकर धर्म के लिए धन देना चाहिए। धर्म से अर्थ की प्राप्ति होती है, धर्म से काम की प्राप्ति होती है और धर्म से ही मोक्ष की भी प्राप्ति होती है इसलिए धर्माचरण करना चाहिए। धर्म श्रद्धा से धारण किया जाता है, बहुत सी धन राशि से नहीं। अकिंचन मुनिगण भी श्रद्धावान होकर स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।
जो मनुष्य पत्र, पुष्प, फल अथवा जल मुझे भक्तिभाव से समर्पित करता है, उस संयतात्मा के द्वारा भक्तिपूर्वक दिये गये पदार्थों को मैं प्राप्त करता हूँ। इसलिए विधिविधानपूर्वक अवश्य ही दान देना चाहिए। थोड़ा हो या अधिक इसकी कोई गणना नहीं करनी चाहिए। जो पुत्र पृथ्वी पर पड़े हुए आतुर पिता के द्वारा दान दिलाता है, वह धर्मात्मा पुत्र देवताओं के लिए भी पूजनीय होता है। माता-पिता के निमित्त जो धन पुत्र के द्वारा सत्पात्र को समर्पित किया जाता है, उससे पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र के साथ वह व्यक्ति स्वयं भी पवित्र हो जाता है। पिता के उद्देश्य से किये गये दान से हजार गुना, बहन के उद्देश्य से किये गये दान से दस हजार गुना और सहोदर भाई के निमित्त किए गये दान से अनन्त गुना पुण्य प्राप्त होता है।
दान देने वाला उपद्रवग्रस्त नहीं होता, उसे नरक यातना नहीं प्राप्त होती और मृत्युकाल में उसे यमदूतों से भी कोई भय नहीं होता।
हे खग ;- यदि कोई व्यक्ति लोभ से आतुरकाल में दान नहीं देते वे कंजूस पापी प्राणी मरने के अनन्तर शोकगमन होते हैं। आतुरकाल में आतुर के उद्देश्य से जो पुत्र, पौत्र, सहोदर भाई, सगोत्री और सुहृज्जन दान नहीं देते, वे ब्रह्महत्यारे हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।
।। "इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में ‘आतुरदाननिरूपण’ नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ" ।।
सकती है? जब तक देहाभिमान (देह को अपना स्वरुप फेल) होता है, जब तक ममता रहती है, जब तक प्रयत्नों का वेग रहता है, जब तक संकल्प की कल्पना होती है, जब तक मन स्थिर नहीं होता, जब तक शास्त्र का चिंतन नहीं होता और जब तक गुरु की कृपा प्राप्त नहीं होती, तब तक तत्त्वज्ञान की चर्चा ही कहाँ होती है?
तप, व्रत, तीर्थ, जप, गृह तथा पूजा आदि सत्कर्मों का अनुष्ठान तथा वेद, शास्त्र तथा आगम की कथा तब तक उपयोगी है, जब तक जीव को तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं होता। इसलिए तार्क्ष्य ! यदि आपके मोक्ष की इच्छा हो तो सर्वदा संपूर्ण प्रयासों के सभी चरणों में अनुष्ठान करके तत्त्वज्ञान की प्राप्ति में संलग्न रहना चाहिए।
जो प्राणी (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) ताप त्रय से सदा संत रहता है, उसे मोक्ष वृक्ष की छाया का आश्रय लेना चाहिए। जिस मोक्षवृक्ष का पुष्प धर्म और ज्ञानस्वरूप है तथा फल स्वर्ग एवं मोक्ष है। इसलिए श्रीगुरु मुख से आत्मतत्त्वविषयक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान हो जाने पर जीव इस घोर संसार बंधन से सुख अंधकार मुक्त हो जाता है।
हे तार्क्ष्य ;- मैं तत्त्वज्ञानी पुरुष के द्वारा जाने वाले अंतिम ग्रंथ के विषय में हथियार रखता हूँ, सुनो ! जिस उपाय से जीव को ब्रह्मनिर्वाणसंज्ञक मोक्ष की प्राप्ति होती है। अंतकाल के आ जाने पर पुरुष भय को ठीक करने के लिए अनासक्तिरूपी शस्त्र से देह-गेहादि विषय की ममत्व को काटा जाता है। वह धीर पुरुष घर से पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करके पवित्र और एकांत देश में स्वीकृत आसन ग्रहण करके बैठ जाए और शुद्ध परम त्रिवृत ब्रह्माक्षर अर्थात ओंकार का मन से अभ्यास करे और ब्रह्मबीज स्वरूप ओंकार का सारगर्भित स्मरण करके श्वास को पवित्र मन को नियंत्रित करे।
बुद्धि रूपी सारथी की सहायता से मन रूपी सारथी की सहायता से इंद्रियों को विषयों से नियंत्रित कर ले और कर्मों के द्वारा आक्षेपित मन को बुद्धि की सहायता से शुभ अर्थ में अर्थात परब्रह्म का चिंतन में लगा दे। मैं ब्रह्म हूं, मैं परम धाम हूं और परम पदरूपी ब्रह्म मैं हूं - ऐसी समीक्षा करके आत्मा अपनी को निष्कल परमात्मा में लगा दे और 'ओम्' इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता है और मेरा स्मरण करता है जो मनुष्य देह-त्याग करता है, वह इस संसार से तर जाता है और परम गति प्राप्त करता है। मन और मोह से अनुपयोगी तथा आशक्ति से उत्पन्न होने वाले दोषों को प्राप्त करने वाले, सुख-दुःखदि द्वन्द्वों से मुक्त ज्ञानी पुरुष उस शाश्वत जहानी परम पद को प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति राग और द्वेष रूपी मालों का अपमान करने वाले ज्ञानरूप मठ और सत्यस्वरूप जलवाले मानसतीर्थ में स्नान करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
जो वैराग्य को धारण करके अन्य भावों का परित्याग करता है, वह केवल मदविषयक भावना के द्वारा मेरा भजन करता है, ऐसा पूर्ण दर्शन धारण करने वाला अमलान्तरात्मा संत को ही मोक्ष प्राप्त होता है। "तीर्थ में मृत्यु हो जाय" - यह उत्कंठा से एक उत्सुक अभिलाषा है जो अपने घर का परित्याग करके तीर्थ में निवास करता है और मुक्ति क्षेत्र में मरता है, वही मोक्ष प्राप्त करता है। अयोध्या, मथुरा, कनखल-हरिद्वार, काशी, कांची, अवंतिका औरवतीपुरी - ये सात पुरियां मोक्ष देने वाली हैं।
हे तार्क्ष्य ;- मैंने सनातन मोक्ष धर्म को बताया, ज्ञान और वैराग्य के साथ इसे श्रवण पुरुष मोक्ष प्राप्त होता है। तत्त्वज्ञ पुरुष मोक्ष प्राप्त होते हैं, धार्मिक पुरुष स्वर्ग प्राप्त होते हैं। पापियों की दुर्गति होती है और पशु-पक्षी आदि पुन:-पुन: जन्म-मरण रूपी संसार में भ्रमण करते हैं। इस प्रकार सभी शास्त्रों का सारोधर मैंने सेल अध्यायों में कहा, अब और क्या सिद्धांत चाहते हो?
सूत जी ने कहा - हे
राजन ; हे नाथ ! हे प्रभु! अपने अमृतमय वचनों को सुनकर आपने मुझे भवसागर से तार दिया है। अब मेरा संदेह समाप्त हो गया है और मैं कृतार्थ हो गया हूं, संशय नहीं - ऐसे साकर गरुड़ जी ने मौन में भगवद्ध्यानपरायण हो गए। स्मरण करने से जो दुर्गति का हरण कर लेते हैं, पूजन और यज्ञ के द्वारा जो सद्गति प्रदान करते हैं और अपनी परम भक्ति के द्वारा जो मुक्ति प्रदान कर देते हैं, वे हति मेरी रक्षा करते हैं।
.. "इस प्रकार गरुड़पुराण के मठ सरोधर में भगवान विष्णु ओर गरुड़ के संवाद में "मोक्षधर्मनिरूपण" नामक सेलवाँ अध्याय पुरा हुआ।।
तप, व्रत, तीर्थ, जप, गृह तथा पूजा आदि सत्कर्मों का अनुष्ठान तथा वेद, शास्त्र तथा आगम की कथा तब तक उपयोगी है, जब तक जीव को तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं होता। इसलिए तार्क्ष्य ! यदि आपके मोक्ष की इच्छा हो तो सर्वदा संपूर्ण प्रयासों के सभी चरणों में अनुष्ठान करके तत्त्वज्ञान की प्राप्ति में संलग्न रहना चाहिए।
जो प्राणी (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) ताप त्रय से सदा संत रहता है, उसे मोक्ष वृक्ष की छाया का आश्रय लेना चाहिए। जिस मोक्षवृक्ष का पुष्प धर्म और ज्ञानस्वरूप है तथा फल स्वर्ग एवं मोक्ष है। इसलिए श्रीगुरु मुख से आत्मतत्त्वविषयक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान हो जाने पर जीव इस घोर संसार बंधन से सुख अंधकार मुक्त हो जाता है।
हे तार्क्ष्य ;- मैं तत्त्वज्ञानी पुरुष के द्वारा जाने वाले अंतिम ग्रंथ के विषय में हथियार रखता हूँ, सुनो ! जिस उपाय से जीव को ब्रह्मनिर्वाणसंज्ञक मोक्ष की प्राप्ति होती है। अंतकाल के आ जाने पर पुरुष भय को ठीक करने के लिए अनासक्तिरूपी शस्त्र से देह-गेहादि विषय की ममत्व को काटा जाता है। वह धीर पुरुष घर से पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करके पवित्र और एकांत देश में स्वीकृत आसन ग्रहण करके बैठ जाए और शुद्ध परम त्रिवृत ब्रह्माक्षर अर्थात ओंकार का मन से अभ्यास करे और ब्रह्मबीज स्वरूप ओंकार का सारगर्भित स्मरण करके श्वास को पवित्र मन को नियंत्रित करे।
बुद्धि रूपी सारथी की सहायता से मन रूपी सारथी की सहायता से इंद्रियों को विषयों से नियंत्रित कर ले और कर्मों के द्वारा आक्षेपित मन को बुद्धि की सहायता से शुभ अर्थ में अर्थात परब्रह्म का चिंतन में लगा दे। मैं ब्रह्म हूं, मैं परम धाम हूं और परम पदरूपी ब्रह्म मैं हूं - ऐसी समीक्षा करके आत्मा अपनी को निष्कल परमात्मा में लगा दे और 'ओम्' इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता है और मेरा स्मरण करता है जो मनुष्य देह-त्याग करता है, वह इस संसार से तर जाता है और परम गति प्राप्त करता है। मन और मोह से अनुपयोगी तथा आशक्ति से उत्पन्न होने वाले दोषों को प्राप्त करने वाले, सुख-दुःखदि द्वन्द्वों से मुक्त ज्ञानी पुरुष उस शाश्वत जहानी परम पद को प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति राग और द्वेष रूपी मालों का अपमान करने वाले ज्ञानरूप मठ और सत्यस्वरूप जलवाले मानसतीर्थ में स्नान करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
जो वैराग्य को धारण करके अन्य भावों का परित्याग करता है, वह केवल मदविषयक भावना के द्वारा मेरा भजन करता है, ऐसा पूर्ण दर्शन धारण करने वाला अमलान्तरात्मा संत को ही मोक्ष प्राप्त होता है। "तीर्थ में मृत्यु हो जाय" - यह उत्कंठा से एक उत्सुक अभिलाषा है जो अपने घर का परित्याग करके तीर्थ में निवास करता है और मुक्ति क्षेत्र में मरता है, वही मोक्ष प्राप्त करता है। अयोध्या, मथुरा, कनखल-हरिद्वार, काशी, कांची, अवंतिका औरवतीपुरी - ये सात पुरियां मोक्ष देने वाली हैं।
हे तार्क्ष्य ;- मैंने सनातन मोक्ष धर्म को बताया, ज्ञान और वैराग्य के साथ इसे श्रवण पुरुष मोक्ष प्राप्त होता है। तत्त्वज्ञ पुरुष मोक्ष प्राप्त होते हैं, धार्मिक पुरुष स्वर्ग प्राप्त होते हैं। पापियों की दुर्गति होती है और पशु-पक्षी आदि पुन:-पुन: जन्म-मरण रूपी संसार में भ्रमण करते हैं। इस प्रकार सभी शास्त्रों का सारोधर मैंने सेल अध्यायों में कहा, अब और क्या सिद्धांत चाहते हो?
सूत जी ने कहा - हे
राजन ; हे नाथ ! हे प्रभु! अपने अमृतमय वचनों को सुनकर आपने मुझे भवसागर से तार दिया है। अब मेरा संदेह समाप्त हो गया है और मैं कृतार्थ हो गया हूं, संशय नहीं - ऐसे साकर गरुड़ जी ने मौन में भगवद्ध्यानपरायण हो गए। स्मरण करने से जो दुर्गति का हरण कर लेते हैं, पूजन और यज्ञ के द्वारा जो सद्गति प्रदान करते हैं और अपनी परम भक्ति के द्वारा जो मुक्ति प्रदान कर देते हैं, वे हति मेरी रक्षा करते हैं।
.. "इस प्रकार गरुड़पुराण के मठ सरोधर में भगवान विष्णु ओर गरुड़ के संवाद में "मोक्षधर्मनिरूपण" नामक सेलवाँ अध्याय पुरा हुआ।।
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