प्रिय आत्मन्
जीव की वास्तविक यात्रा आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद ही आरंभ होती है । अतः पहले आत्मज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है । वैदिक सनातन धर्म में सभी योगों एवं मार्गों का एक ही उद्देश्य है कि अपने मूल स्वभाव को जानना ( आत्मज्ञान, आत्म साक्षात्कार ) एवं उसके अनुसार अपने कर्तव्य कर्म करें ।
👉क्या करें -
१- मुक्त होकर कार्य करें - जैसे कृष्ण
२- मर्यादा में रहकर कार्य करें - जैसे राम
३- यदि अपने जीवन काल में मुक्त नहीं है और मर्यादा में रहकर कर भी नहीं करते तब भी आत्मज्ञान प्राप्त कर ले और संसार में कार्य करें जैसे बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, रविदास, इसी श्रेणी के अन्य संत आदि ।
४- अपने जीवन काल में यदि आत्मज्ञान भी प्राप्त नहीं कर पाए तो किसी आत्मज्ञानी संत की शरण में जाकर उसके निर्देशों का पालन करते हुए जीवन यापन करना चाहिए ।
५- यदि अपने जीवन काल में आत्मज्ञानी संत ना मिले तो फिर सद्गुणों को अपनाकर अपने बुद्धि विवेक अनुसार संसार में जीवन जीना चाहिए ।
६- यदि बुद्धि विवेक भी ना हो तो प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए अपना जीवन यापन करना चाहिए ।
७- यदि प्रकृति के नियम भी ज्ञात न हो तो किसी भी अनुभवी सद्गुणी व्यक्ति से परामर्श लेकर कार्य करना चाहिए । जैसे - अपने कुलगुरु ।
👉आत्मज्ञान प्राप्ति के साधन -
१- सुनने से आत्मज्ञान नहीं होगा
२- देखने से आत्मज्ञान नहीं होगा
३- पढ़ने से आत्मज्ञान नहीं होगा
४- रटने से आत्मज्ञान नहीं होगा
५- तत्वदर्शी गुरु के सानिध्य में व्यवस्थित क्रम से उनके निर्देशानुसार साधना करने पर ही स्वानुभव आधारित आत्मज्ञान संभव है ।
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