प्रिय आत्मन्
जीवन दर्शन ( जीवन रहस्य ) यह एक ऐसा पाठ्यक्रम है, जिसे तीन
अध्याय में बांटा है एवं जो आपके शारीरिक मानसिक और बौद्धिक अशुद्धियां दूर करके आपके पूर्ण विकास ( भगवत् प्राप्ति ) में सहयोगी है । मानव शरीर ग्रहण करने के बाद हमारा प्रथम लक्ष्य स्वयं का मूल्यांकन करना होना चाहिए। हमें यह गहराई से विचार करना चाहिए कि हम कौन हैं, इस जीवन का उद्देश्य क्या है, और हम किस दिशा में जा रहे हैं। यह एक उत्कृष्ट मार्गदर्शन है कि हमें अपने जीवन को किस प्रकार से व्यवस्थित करना चाहिए और आध्यात्मिक उन्नति की ओर कैसे बढ़ना चाहिए।
आइए, इन लक्ष्यों पर थोड़ा और विचार करते हैं:-
१- जीवन में लाभ हानि, यश अपयश, निंदा स्तुति से मुक्त होकर
विश्व कल्याण के लिए कार्य करें। जैसे - कृष्ण:- यह उच्चतम अवस्था है जहाँ व्यक्ति कर्मफल की आसक्ति से परे होकर केवल कर्तव्य भाव से कर्म करता है। भगवान कृष्ण इस आदर्श के प्रतीक हैं।
२- जीवन में यदि यह ना हो सके तो पुरुषार्थ युक्त मर्यादा में रहकर कार्य करें । जैसे - राम:- यदि हम पूर्ण अनासक्ति को प्राप्त नहीं कर सकते, तो हमें मर्यादाओं का पालन करते हुए, अपने प्रयासों में ईमानदारी और धर्म का ध्यान रखना चाहिए। भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में हमारे आदर्श हैं।
३- जीवन में यदि यह भी ना हो सके तो जिस पर आपका अधिकार है वह सब कुछ देकर भगवत् प्राप्ति कर लें:- यदि हम सांसारिक आसक्तियों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाते हैं, तो हमें अपनी क्षमतानुसार त्याग और समर्पण के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
४- जीवन में यदि यह भी ना हो सके तो किसी भी कीमत पर आत्मज्ञान प्राप्त कर लें:- यदि हम बाहरी त्याग और समर्पण में कठिनाई महसूस करते हैं, तो हमें स्वयं के भीतर सत्य को जानने का प्रयास करना चाहिए। आत्मज्ञान ही मुक्ति का मार्ग है।
५- जीवन में यदि यह भी ना हो सके तो तत्वदर्शी संत को समर्पित हो जाएं:- यदि हम स्वयं आत्मज्ञान प्राप्त करने में असमर्थ महसूस करते हैं, तो हमें एक ऐसे ज्ञानी गुरु की शरण लेनी चाहिए जो हमें सही मार्ग दिखा सके।
६- जीवन में यदि यह ना हो सके तो तत्व दर्शी संत से दीक्षा लेकर अपने परिवार के उद्धार के लिए कार्य करें:- यदि हम व्यक्तिगत मोक्ष के लिए तुरंत प्रयास नहीं कर पाते हैं, तो हमें गुरु से दीक्षा लेकर अपने परिवार और आसपास के लोगों के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए। यह भी एक प्रकार की सेवा और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
७- जीवन में यदि यह ना हो सके तो साधक के गुणों (सद्गुणों) को अपनाकर जिसमें स्वयं का और समाज का कल्याण हो वह कार्य करें:- यदि हम ऊपर के लक्ष्यों को प्राप्त करने में कठिनाई महसूस करते हैं, तो हमें कम से कम अच्छे गुणों को अपने जीवन में धारण करना चाहिए और ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे हमारा और समाज दोनों का भला हो।
८- जीवन में इससे नीचे की स्थिति में जाने पर तो मानव शरीर का पतन हीं होता है:- यह चेतावनी है कि यदि हम इन लक्ष्यों की ओर ध्यान नहीं देते हैं और केवल भोग और स्वार्थ में लिप्त रहते हैं, तो हम अपने मानव जीवन के उद्देश्य से भटक जाते हैं।
👉जीवन दर्शन ( जीवन रहस्य )भाग -१ प्रारंभिक विषय
१- सत्य, धारणा, मान्यताएं, अंधविश्वास ।
२- आपका परिचय और सत्यापन
३- लोगों को परखने की मान दंड
४- ज्ञान प्राप्त करने का उद्देश्य
५- मूल्यांकन
६- भाषा शुद्धि
७- मेरा पतन
८- अध्यात्म
९- गुरु
१०- परीक्षा
११- प्रश्न करने का अधिकारी कौन ?
👉जीवन दर्शन ( जीवन रहस्य )भाग -२ प्रारंभिक विषय
१- प्रयोग
२- लोगों की श्रेणी
३- बुद्धि
४- प्रमाण
५- सही परिभाषा
६- मनुष्य शरीर
७- ज्ञानेंद्रियां
८- स्त्री और पुरुष
९- ओज/रज
१०- पंच कोष
११- मैं
१२- धर्म
१३- कर्म
१४- भक्ति
१५- न्याय
१६- नैतिक शिक्षा
१७- लाभ
१८- पाप - पुण्य
१९- इच्छापूर्ति
२०- प्रमाण पत्र
👉 जीवन दर्शन ( जीवन रहस्य ) भाग -३, शुद्धिकरण सधना से संबंधित विषय -
१- वृत्तियां
२- विकार
३- विचार
४- भावनाएं
५- संगत
६- आदतें
७- गुण
८- कर्म
९- संस्कार
१०- बुद्धि
११- अपना प्रारब्ध जाने
१२- दिनचर्या
१३- नियम
१४- अनुशासन
१५- संधिकाल
१६- संकल्प शक्ति
१७- साधक के गुण
१८- ४० दिवसीय प्रयोग आरंभ करें-
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