Thursday, April 10, 2025

एक और मूल्यांकन


प्रिय आत्मन्  
जीवन दर्शन ( जीवन रहस्य ) यह एक ऐसा पाठ्यक्रम है जो आपके शारीरिक मानसिक और बौद्धिक अशुद्धियां दूर करके आपके पूर्ण विकास ( भगवत् प्राप्ति ) में सहयोगी है, कार्यक्रम में आगे बढ़ने से पहले आपको कुछ महत्वपूर्ण चरण पूर्ण करना आवश्यक है । क्योंकि यहां अलग-अलग श्रेणी के अनुसार अलग-अलग पाठ्यक्रम हैं ।

👉"मैं ही सब कुछ हूं, और मैं कुछ भी नहीं हूं, जो कुछ हो रहा है या मैं कर्ता हुआ दिखाई दे रहा हूं वही श्रेष्ठ है, उससे श्रेष्ठ कुछ हो नहीं सकता ।" जब तक इस विचारधारा के सामने आपका समर्पण नहीं हो जाता तब तक यह यात्रा यूं ही चलती रहेगी ।

👉यात्रा संसारी से शिष्य तक:-

१- शिष्य - अपने अनुकूल गुरु को समर्पित व्यक्ति ।

२- साधक - आत्म कल्याण के लिए गुरु और मार्ग खोजता हुआ व्यक्ति ।

३- समर्थक - समर्थक हमारी कमियों और खूबियां को नजरअंदाज करते हुए हमारे हर सही गलत निर्णय में हमारे साथ रहते हैं ।

४- आलोचक - आलोचक हमारी कमियां और खूबियां दोनों का बराबरी से मूल्यांकन करते हैं और हमें सुधार के लिए प्रेरित करते हैं ।

५- विरोधी - विरोधी लोगों को आपके सही और गलत होने से कोई मतलब नहीं होता वह तो आपके विरोध में ही बोलेंगे ।

६- संसारी - संसारी लोगों को किसी भी विचारधारा से कोई मतलब नहीं रहता । वह तो बस वहीं जुड़ना पसंद करते हैं, जहां उन्हें भौतिक लाभ दिखाई देता है ।

👉मानव शरीर ग्रहण करने के बाद हमारा प्रथम लक्ष्य क्या होना चाहिए स्वयं मूल्यांकन करें ।

👉मानव जीवन का लक्ष्य क्रम से -
१- जीवन में लाभ हानि , यश अपयश , निंदा स्तुति से मुक्त होकर विश्व कल्याण के लिए कार्य करें । जैसे - कृष्ण

२- जीवन में यदि यह ना हो सके तो पुरुषार्थ युक्त मर्यादा में रहकर कार्य करें । जैसे - राम
 
३- जीवन में यदि यह भी ना हो सके तो जिस पर आपका अधिकार है वह सब कुछ देकर भगवत् प्राप्ति कर लें ।

४- जीवन में यदि यह भी ना हो सके तो किसी भी कीमत पर आत्मज्ञान प्राप्त कर लें।

५- जीवन में यदि यह भी ना हो सके तो तत्वदर्शी संत को समर्पित हो जाएं ।

६- जीवन में यदि यह ना हो सके तो तत्व दर्शी संत से दीक्षा लेकर अपने परिवार के उद्धार के लिए कार्य करें ।

७- जीवन में यदि यह ना हो सके तो साधक के गुणों ( सद्गुणों ) को अपनाकर जिसमें स्वयं का और समाज का कल्याण हो वह कार्य करें ।

८- जीवन में इससे नीचे की स्थिति में जाने पर तो मानव शरीर का पतन हीं होता है ।

👉किसी भी प्रकार का प्रश्न पूछे जाने पर आपकी प्रतिक्रिया क्या होती है ? अपना मूल्यांकन स्वयं करें ।

१- विषय के बारे में नहीं जानते, यह मूर्छा की अवस्था है ।
२- विषय के बारे में नहीं जानना चाहते, यह आपकी अरुचि को दर्शाता है ।
३- विषय समझ में नहीं आता, यह बौद्धिक अशुद्धि है ।
४- जानते हैं पर व्यक्त करना नहीं आता, यह जीवन में सत्संग का अभाव है ।
५- जानते हैं किंतु आवश्यक होने पर भी जिज्ञासुओं को नहीं 
बताएंगे यह अहंकार की अवस्था है ।
६- जानते हैं पर व्यक्त नहीं करना चाहते , यह आत्मसंतुष्टि की अवस्था है ।
७- जानते हैं एवं जिज्ञासु शिष्यों के लिए तर्क प्रमाणों के आधार पर प्रक्रिया सहित व्याख्या भी कर सकते हैं और उनको अपने अनुभव तक भी पहुंचा सकते हैं, यह चेतना की उच्चतम अवस्था है । जो कि ईश्वर तुल्य व्यक्ति अर्थात सद्गुरु की होती है ।

👉कुछ संभावित प्रश्न जिनका उत्तर स्वयं को ज्ञात होना चाहिए 
१- समाज में इतनी समस्याएं और संतुलन का क्या कारण है ?
२- वर्तमान समय में ऐसी कौन सी समस्या है जो आपको प्रभावित करती है और आप उसे दूर करने के लिए अपनी ओर से क्या प्रयास कर रहे हैं ?
३- सही गलत, धर्म अधर्म, पाप-पुण्य, न्याय अन्याय का निर्णय आप किस आधार पर करते हैं ?
४- आपके लिए लोगों को परखने के मानदंड क्या-क्या है ?
५- सही गलत धर्म अधर्म पाप-पुण्य का निर्णय आप किस आधार पर करते हैं ?

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