Saturday, March 1, 2025

चक्र अनुसार साधना

प्रिय आत्मन् 
स्वयं का मूल्यांकन इस तरह करना चाहिए कि किसी दूसरे का मूल्यांकन किया जा रहा है ,तभी सही मूल्यांकन हो पाएगा अन्यथा मूल्यांकन गलत होने पर साधना में विघ्न हो सकता है ।किसी मान्यताएं या अवधारणा के आधार पर मूल्यांकन ना करें ,अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर ही स्वयं का अध्ययन करें। 

(चेतावनी  :- स्वयं का ही आत्म मूल्यांकन करें किसी दूसरे का नहीं क्योंकि आपके द्वारा किसी दूसरे का किया गया मूल्यांकन साधक के मार्ग में विघ्न डाल सकता है)

यहां पर आत्मा मूल्यांकन के मापदंड निम्नलिखित लिए गए हैं
1) व्यवहार ,2) वाणी ,3)विचार ,4)संबंध,5) मनोरंजन और 6) विकार 

मूलाधार चक्र-
योग मार्ग में पहली परत को मूलाधार चक्र कहते हैं, यह उत्तरजीविता (जीवित रहने के लिए)से संबंधित परत है। जिस साधक में इस तरह की  प्रवृत्तियां है, वह परेशान ना हो क्योंकि जीव का मुख्य कार्य उत्तरजीविता ही है बस ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक दिन में कितना समय वह इस परत पर व्यतीत कर रहा है। अगर सारा समय इसी परत पर व्यतीत हो रहा है तब यह कहा जा सकता है कि ऊर्जा इसी परत पर रुक गई है। तब साधना के द्वारा इस परत से ऊपर की परतों में विकास किया जा सकता है। 

साधना का मार्ग:- भक्ति मार्ग, हठ, योग मार्ग , कुलदेवता से प्रार्थना आदि। 

स्वाधिष्ठान चक्र-
योग मार्ग में दूसरी परत को स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं। यह भोग विलास से संबंधित परत है। इस तरह के व्यक्ति सुख- सुविधा के पीछे ही भागते हैं। जिस साधक में इस तरह की  प्रवृत्तियां है, वह परेशान ना हो  क्योंकि जब उत्तरजीविता की आवश्यकता (धन ,भोजन, वस्त्र, सुरक्षा आदि) की पूर्ति हो जाती है तब साधक इसी परत पर जीवन व्यतीत करता है। बस ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक दिन में कितना समय वह इस परत पर व्यतीत कर रहा है। अगर सारा समय इसी परत पर व्यतीत हो रहा है तब यह कहा जा सकता है कि ऊर्जा इसी परत पर रुक गई है। तब साधना के द्वारा इस परत से ऊपर की परतों में विकास किया जा सकता है। 

साधना का मार्ग:- कर्म योग, इष्ट देव की भक्ति आदि। 

मणिपुर चक्र- 
योग मार्ग में इसे मणिपुर चक्र कहते हैं। यह अहंकार की परत है। इस तरह के व्यक्ति सामाजिक, बहिर्मुखी ,प्रतियोगितावादी, आक्रमक, असंतोष, पूंजीवादी, राजनीतिक, ख्याति की इच्छा रखने वाले ,जो किसी के पास नहीं है वह खरीदना चाहते हैं ,दिखावा कि मैं श्रेष्ठ हूं, समय की कमी, देशभक्त, जातिभक्त होते हैं। जिस साधक में इस तरह की  प्रवृत्तियां है, वह परेशान ना हो  बस ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक दिन में कितना समय वह इस परत पर व्यतीत कर रहा है। अगर सारा समय इसी परत पर व्यतीत हो रहा है तब यह कहा जा सकता है कि ऊर्जा इसी परत पर रुक गई है। तब साधना के द्वारा इस परत से ऊपर की परतों में विकास किया जा सकता है। 

साधना का मार्ग:-  कर्म योग और सेवा 

अनाहत चक्र-
योग मार्ग में चौथी परत को अनाहत चक्र कहते हैं। ऐसे व्यक्ति अंतर्मुखी होते हैं। इस तरह के व्यक्ति का व्यवहार सहानुभूति ,दयालु, कलाओं में निपुण , दूसरों को दुख ना देना, बुद्धि को अभिव्यक्त करने में कुशल, चंचल चित्त, जो ह्रदय में होता है 
स्त्रियां ज्यादातर इसी परत पर अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देती है। स्त्रियों के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण परत है। 

साधना का मार्ग:- कर्म योग या भक्ति मार्ग 

विशुद्धि चक्र -

योग मार्ग में पांचवी परत को विशुद्धि चक्र  कहते हैं। इस परत के व्यक्ति की मुक्ति इसी जन्म में संभव है। इस परत के व्यक्ति विद्वान् ,अध्ययनरत, रचनात्मक, सीखने के लिए आतुर, शिक्षक, कलाकार, लेखन में रुचि और बुद्धिमान होते हैं। इस प्रवृत्ति के व्यक्ति बहुत कम , सत्य, सीधा बोलने वाले होते हैं। इनकी ना कोई तीव्र इच्छा होती है ना भावनाएं, ध्यान बहुत तेज होता है और मनन में लगे रहते हैं। 

साधना का मार्ग:- ज्ञान मार्ग व तंत्र मार्ग। 

आज्ञा चक्र -
योग मार्ग में छठी परत को आज्ञा चक्र कहते हैं। इस परत में साधक बहुत शांत, स्थिर ,संतुष्ट ,न्यूनता वादी और आनंदित होता है। इनकी वाणी बहुत मधुर व  ज्ञानपूर्ण होती है। यह अल्प भाषी होते हैं, पूछने पर ही बोलते हैं और जब भी बोलते हैं तो सत्य बोलते हैं। इनके विचारों में सदैव मनन ही चलता रहता है। इन्हें मनोरंजन के साधनों की आवश्यकता नहीं होती।इस तरह की प्रवृत्ति वाले साधक सदैव चेतनापूर्ण और समाधि मैं ही रहते हैं। इनका संबंध गुरु के साथ होता है।
इस तरह के साधन के चित्त में भी विकार देखे जा सकते हैं जैसे सूक्ष्म शरीर में रुचि ,सिद्धियों के चक्कर में फस जाना, शक्तियों का असंतुलन आदि। अगर इस परत पर विकार आ जाता है तो साधक कई जन्मों तक इन विकारों में उलझा रह सकता है। 

साधना का मार्ग:- इन्हें किसी साधना की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि इस परत पर चित्त मुक्त हो जाता है। विकारों को दूर करने के लिए चित्त शुद्धि की आवश्यकता होती है। 

सातवीं परत:- 
योग मार्ग में सातवीं परत को सहस्त्रार कहते हैं। इस परत पर पहुंचने के बाद साधक पूर्णतः कर्म मुक्त हो जाता है। क्योंकि अहम् का भाव यहां पर पूरी तरह से समाप्त हो जाता है। इस तरह का साधक बहुत साधारण होता है, सब कुछ उसके नियंत्रण में होता है जैसे इच्छा, विचार, भावनाएं, चित्त वृत्तीय आदि। इनकी वाणी संतवाणी होती है और ज्यादातर यह मौन में रहते हैं ।इनके लिए ज्ञान देना भी अर्थहीन सा हो जाता है। इनके विचार पूर्ण चेतना में होते हैं । इस तरह के साधक निर्विकल्प समाधि( तुरिया अवस्था) में होते हैं। इनका किसी से संबंध नहीं होता या यह कह लें इनका सब से संबंध होता है क्योंकि ये एकता और अद्वैत के तल पर जीते हैं इनके लिए जीवन भी अर्थहीन हो जाता है। इनको मनोरंजन की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि इस परत पर चित्त होता ही नहीं है। चित्त का विलय हो चुका होता है।
साधना का मार्ग:- इन्हें किसी भी साधना की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यह गंतव्य पर पहुंच गए हैं।

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