प्रिय आत्मन्
वाणी की तरह ही मौन भी मनुष्य के आंतरिक स्तर को समझने का एक अत्यंत गहरा और सूक्ष्म माध्यम है। मौन केवल शब्दों का न होना नहीं है, बल्कि यह चेतना की एक विशेष अवस्था है। जिस प्रकार एक आत्मज्ञानी और एक विवेकहीन व्यक्ति के बोलने में बड़ा अंतर होता है, उसी प्रकार दोनों के मौन रहने के कारण और उसके पीछे छिपे उद्देश्य में भी जमीन-आसमान का अंतर होता है। इस सूक्ष्म भेद को समझना हर साधक के लिए अत्यंत आवश्यक है।
ज्ञानी व्यक्ति के मौन रहने का कारण उसके भीतर की अगाध शांति, आत्म-संतोष और परम चेतना से जुड़ाव होता है। जब भीतर का कोलाहल पूरी तरह शांत हो जाता है और सत्य की साक्षात् अनुभूति हो जाती है, तब शब्द छोटे पड़ने लगते हैं। ज्ञानी का मौन किसी मजबूरी से नहीं, बल्कि आंतरिक पूर्णता से पैदा होता है; वह समझ जाता है कि जो तत्व समझने योग्य है, उसे शब्दों की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। इसके विपरीत, एक विवेकहीन व्यक्ति के मौन रहने का कारण आंतरिक शांति नहीं, बल्कि उसका अज्ञान, सत्य को स्वीकार न करने का हठ, भीतर सुलगती हुई ईर्ष्या, क्रोध या फिर किसी कपटपूर्ण योजना को आकार देना होता है। वह तब मौन होता है जब उसकी बुद्धि काम नहीं करती या जब वह अपनी अज्ञानता के पकड़े जाने के डर से भयभीत होता है।
यदि दोनों के मौन की प्रक्रिया को देखा जाए, तो ज्ञानी का मौन अत्यंत सहज, जीवंत और ऊर्जा से भरपूर होता है। उसके मौन में एक ऐसी सकारात्मकता होती है जो उसके आस-पास के वातावरण को भी पवित्र और शांत बना देती है। वह मौन रहकर भी अपनी उपस्थिति मात्र से साधकों के संशयों को दूर करने की क्षमता रखता है। वहीं दूसरी ओर, विवेकहीन व्यक्ति का मौन अत्यंत बोझिल, सुस्त और नकारात्मकता से भरा होता है। उसका मौन आंतरिक द्वंद्व और अशांति का परिणाम होता है। वह बाहर से तो चुप रहता है, लेकिन उसका मन भीतर ही भीतर तीव्र गति से चलता रहता है, दूसरों के प्रति षड्यंत्र रचता है या अपनी असफलताओं पर शोक मनाता रहता है। उसका यह मौन दूसरों के लिए असहजता और तनाव पैदा करता है।
इन दोनों के मौन के उद्देश्य में भी एक स्पष्ट विभाजन रेखा दिखाई देती है। ज्ञानी के मौन का मुख्य उद्देश्य अपनी ऊर्जा का संरक्षण करना, अंतर्मुखी होकर आत्म-अनुसंधान की गहराई में उतरना और ब्रह्मांडीय सत्य के साथ एकरूप होना होता है। उसका मौन जगत के कल्याण के लिए एक मूक प्रार्थना की तरह होता है, जो बिना बोले ही साधकों को अंतर्यात्रा की प्रेरणा देता है। इसके विपरीत, विवेकहीन व्यक्ति के मौन का उद्देश्य केवल एक दिखावा, दूसरों को अपनी झूठी गंभीरता का अहसास कराना, या फिर छल और लोभ के वशीभूत होकर किसी अनुचित अवसर की प्रतीक्षा करना होता है। वह अपने मौन का उपयोग एक हथियार की तरह दूसरों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने या अपनी कमियों को छिपाने के लिए करता है।
इस तुलनात्मक अध्ययन का परिणाम साधक को आत्म-निरीक्षण की एक नई दृष्टि प्रदान करता है। ज्ञानी का मौन जीवन को सृजन, दिव्यता और परम आनंद की ओर ले जाता है, जो साधक के भीतर भी तीव्र जिज्ञासा और तपस्या की भावना को जाग्रत करता है। जबकि विवेकहीन व्यक्ति का मौन केवल मानसिक अवसाद, अलगाव और अंधकार को जन्म देता है। साधक को बाहरी मनोरंजन की कहानियों और चमत्कारों के प्रभाव से मुक्त होकर, ज्ञानी के उस जीवंत मौन को समझने का प्रयास करना चाहिए जो आत्मज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करता है। इसी प्रकार आगे ज्ञानी का बोलना और मूर्ख का बोलना तुलनात्मक अध्ययन देखें
संसार में वाणी ही मनुष्य के व्यक्तित्व, उसकी चेतना और उसके आंतरिक स्तर को प्रकट करने का सबसे सशक्त माध्यम है। एक ही भाषा और समान शब्दों का उपयोग करने के बाद भी एक आत्मज्ञानी और एक विवेकहीन व्यक्ति के बोलने में आकाश-पाताल का अंतर होता है। इस अंतर को समझने के लिए दोनों के बोलने के कारण और उसके पीछे छिपे उद्देश्य का तुलनात्मक अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही हमारे जीवन में सही मार्ग का निर्धारण करता है।
ज्ञानी व्यक्ति के बोलने का कारण उसकी आंतरिक अनुभूति, गहरा अनुभव और सत्य को प्रत्यक्ष देखने से उत्पन्न हुआ आत्मबोध होता है। जब उसके भीतर ज्ञान की प्रचुरता होती है और वह किसी विषय के सत्य को पूरी तरह जान लेता है, तब उसकी वाणी स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होती है। इसके विपरीत, एक विवेकहीन व्यक्ति के बोलने का कारण उसका अहंकार, दूसरों से आगे दिखने की होड़, ईर्ष्या और मन में उमड़ती असीमित वासनाएं होती हैं। वह बिना किसी ठोस आधार या प्रक्रिया को पूरा किए, केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की व्याकुलता के कारण बोलता है।
यदि दोनों के बोलने की प्रक्रिया को देखा जाए, तो ज्ञानी की वाणी अत्यंत संयमित, मधुर और नपे-तुले शब्दों से युक्त होती है। वह बोलने से पहले विषय की उपयोगिता और उसके प्रभाव को भली-भांति तौलता है। उसकी वाणी में एक ठहराव और शांति होती है, जो सुनने वाले के मन को भी शांत कर देती है। वहीं दूसरी ओर, विवेकहीन व्यक्ति की बोलने की प्रक्रिया अत्यंत तीव्र, अव्यवस्थित और शोर से भरी होती है। वह बिना सोचे-समझे, दूसरों की बात को काटे बिना और बिना किसी गहरे चिंतन के निरंतर बोलता चला जाता है। उसकी वाणी में केवल मनोरंजन की भावना, चमत्कारी घटनाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन या फिर केवल निरर्थक प्रलाप होता है, जो अंततः वातावरण में भ्रम और अशांति ही पैदा करता है।
इन दोनों के बोलने के उद्देश्य में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है। ज्ञानी के बोलने का एकमात्र उद्देश्य जगत का कल्याण, साधकों के भीतर तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न करना और उन्हें सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देना होता है। वह चाहता है कि उसकी वाणी से किसी के जीवन का अंधकार दूर हो और साधक सांसारिक मोह-माया के प्रभाव से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सके। इसके विपरीत, विवेकहीन व्यक्ति के बोलने का उद्देश्य केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करना, समाज में छल, कपट, ढोंग और लोभ के माध्यम से प्रतिष्ठा पाना होता है। वह बिना किसी वास्तविक प्रयास या प्रक्रिया को समझे, सीधे परिणाम को हड़पने की चेष्टा में अपनी वाणी का दुरुपयोग करता है।
इस तुलनात्मक अध्ययन से प्राप्त परिणाम साधक के जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकता है। ज्ञानी की वाणी का परिणाम समाज में शांति, संतोष, वैराग्य और आत्मिक उन्नति के रूप में दिखाई देता है। उनकी बातें साधक के जीवन में एक प्रकाश स्तंभ की तरह काम करती हैं, जो भटके हुए को सही राह दिखाती हैं। इसके विपरीत, विवेकहीन व्यक्ति के बोलने का परिणाम केवल आपसी विवाद, मानसिक तनाव, भटकाव और अंततः विनाश के रूप में सामने आता है। साधक को जीवन में आगे बढ़ने के लिए चमत्कारी और भ्रामक बातों के प्रभाव में आए बिना, केवल सत्य और विवेकपूर्ण वाणी का ही अनुसरण करना चाहिए।
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