यह छोटी-छोटी परिभाषाएं हैं जो आगे चर्चाओं में काम देगी ।
१- नास्तिक - सत्य की खोज के लिए जो वेदों को प्रमाण न मानता हो ।
२- आस्तिक - सत्य की खोज के लिए जो वेदों को प्रमाण मानता हो ।
३- भौतिकवादी - केवल शरीर को ही मैं मानकर उसी के सुख सुविधा के लिए कार्यरत रहे ।
४- धार्मिक व्यक्ति - जीवन में पाप पुण्य को आधार मानकर कार्य करता हो और हमेशा पाप कर्मों से बचते हैं ।
५- आध्यात्मिक व्यक्ति - स्थायित्व की खोज में लगा हुआ व्यक्ति ।
६- अंधविश्वासी व्यक्ति - जो बिना तर्क और प्रमाणों के आधार पर बात को मानें ।
७- अविश्वासी व्यक्ति - जो तर्क और प्रमाणों के आधार पर बात ना माने ।
८- विश्वासी व्यक्ति - जो तर्क और प्रमाणों के आधार पर बात माने ।
९- तर्क - बुद्धि की क्षमता है जो श्रेष्ठतम की खोज के लिए उपयोगी है
वितर्क - गहन खोज बीन करना
चमत्कार - जिसे बुद्धि ना समझ पाये
१०- बहस - जब किसी को प्रमाण प्रस्तुत करना नहीं आता तब वह बहस का सहारा लेता है ।
११- चर्चा - किसी भी विषय पर खोज या विवाद को निपटाने के लिए चर्चाओं का सहारा लिया जाता है ।
१२- सुख - इंद्रिय आधारित विषयों का मिलना ।
१३- दुख - स्वयं की इच्छा अनुसार काम ना होना ।
१४ - आनंद - स्वनिर्मित विचारधारा जो सात्विक, राजसिक एवं तामसिक हो सकती है ।
परमानंद - सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक सुख - दुख और विचारों का अभाव ।
१५- ज्ञानी - जिसे व्यवस्थित क्रम से अर्थपूर्ण अनुभवों की अनुभूति हो ।
१६- अज्ञानी - जिसे अपने ना होने का ज्ञान हो ।
१७- विद्वान - जिसे अपने गुरु की परंपराओं से प्राप्त स्मृति आधारित ज्ञान हो ।
१८- सामाजिक व्यक्ति - जिनके कोई गुरु ना हो , जिसने अलग-अलग लोगों से, बिना व्यवस्थित क्रम से, सुनी हुई स्मृति आधारित जानकारी एकत्र कर रखी हो ।
१९- गुरु - वह है जो आपसे ज्यादा जानता है, आपकी सभी शंकाओं का समाधान करता हो एवं जिस पर आप विश्वास कर सकें , एवं अपने अनुभव तक आपको पहुंचा सकता है
२०- शिष्य - शिष्य वह व्यक्ति होता है जो अपने गुरु के निर्देशानुसार कार्य करता है , शिष्य का मुख्य उद्देश्य है अपने गुरु के ज्ञान को धारण करना और उनके बताए हुए ज्ञान और मार्ग का प्रचार प्रसार करना ।
साधक - साधक वह व्यक्ति होता है जो किसी विशेष विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साधना कर रहा है साधक का मुख्य उद्देश्य है स्वयं का विकास करके लक्ष्य को प्राप्त करना
जिज्ञासु - जिज्ञासु वह व्यक्ति होता है जिसमें लाभ के लिए सब कुछ जानने की तीव्र इच्छा होती है ।
२१- याद रखना - यह एक सरल प्रक्रिया है जिसमे किसी कला विषय या वस्तु की जानकारी को अपनी स्मृति में संचित कर लेना ।
२२- सीखना - एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे मनुष्य किसी कला, विषय या वस्तु की जानकारी को प्रायोगिक रूप में अपना कर उससे प्राप्त अनुभव को स्वयं में आत्मसात कर लेता है ।
२३- संस्कार - अर्थात कौन किसको समर्पित होकर कार्य करे ? हमें हमेशा ईश्वर को समर्पित होकर कार्य करना चाहिए । यदि हम ईश्वर से परिचित नहीं हैं तो सद्गुरु को समर्पित होकर कार्य करना चाहिए।
२४- ज्ञान - व्यवस्थित अनुभवों का संयोजन ज्ञान है ।
२५- अज्ञान - हमारी वे मान्यताएं जो तर्क और प्रमाण
आधारित नहीं है ।
२६- विज्ञान - भौतिक जगत के विश्लेषण करने की एक शाखा ।
२७- जो किसी को नहीं चाहिए - ज्ञान
२८ - जो सब को चाहिए - अपनी इच्छा पूर्ति के लिए जादू की छड़ी
२९ - कर्म - इच्छा आधारित कार्य, पुरुष कर्म प्रधान है ।
३०- क्रिया - अस्तित्व में स्वत: होने वाली गति या परिवर्तन । प्रकृति क्रिया प्रधान है ।
३१- मूर्ख - जो जड़ बुद्धि हो , अर्थात कोई भी बात सुनने और समझने को ही तैयार ना हो ।
३२- ऊर्जा - कार्य करने की क्षमता है ।
३३ - पाप - जो कर्म प्रकृति में विकृति फैलाए ।
३४- प्रकृति - मूल स्वभाव
३५- विकृति - मूल स्वभाव में दोष आना
३६ - पुण्य - जिनके कारण हमें हमारे अनुकूल सुख सुविधाएं प्राप्त होती रहे ।
३८- दण्ड - विकृति फैलाने पर मिलने वाला फल
३७- ईश्वर - जो विकृति को हटाए ।
३८- नाम जप - जो विकारों को हटाए ।
३९- सत्व - जो शांति प्रदायक हो ।
४०- रजस - जो भोग प्रदायक हो ।
४१- तम - जो आराम प्रदायक हो ।
👉कर्म ज्ञान
४२- नित्य कर्म - करने से पुण्य का संचय नहीं होगा किंतु ना करने से पाप का उदय अवश्य होगा ।
४३- नैमित्तक कर्म - इन्हें करने से विशेष लाभ नहीं होगा ! किंतु ना करने से पाप का संचय अवश्य होगा ।
४४- काम्य कर्म - निश्चित फलों की प्राप्ति के लिए इन्हें करने से पुण्य का संचय होगा किन्तु ना करने से पाप का संचय नहीं होगा ।
४५- निषिद्ध कर्म - करने से पाप का संचय होगा किन्तु ना करने से पुण्य की प्राप्ति होगी ।
👉आत्मज्ञान
४६- आत्मा - जो भौतिकता से परे है ! ब्रह्मांड का जीवित चैतन्य तत्व जो आप स्वयं है ।
४७- परमात्मा - जो गुणों में बंधा नहीं है अर्थात सृष्टि की कल्याण के लिए आवश्यकता अनुसार कोई भी गुण रुप धारण कर सकता है ।
४८- महात्मा - जो जीवो का उद्धार करने के लिए धरती पर अवतरित हुआ है । और सत्वगुण का प्रतिनिधित्व करता है ।
४९- पितर - वह हैं जिन्होंने सद्गुणों का विकास कर लिया है ! किंतु कुछ भौतिक इच्छाएं अभी भी शेष हैं जिसे पूरा करने के लिए वे इंतजार कर सकते हैं ।
५०- जीवात्मा - जो प्रकृति के गुणों और अपनी भौतिक इच्छाओं से बंधा हुआ है ।
५१- मानव - अर्थात कारण शरीर सहित अपनी इच्छा से बंधा हुआ प्रकृति के सभी तत्वों से मिलकर बना हुआ यंत्र ।
५२- प्रेतआत्मा - जिसने असामान्य तरीके से अपना मनुष्य शरीर छोड़ा ।
👉 अन्य
५३- धर्म - मूल स्वभाव के अनुसार कर्म
५४- कर्म - इच्छा से प्रेरित होकर किया गया कार्य ।
५५- नियम - जो मूल स्वभाव तक पहुंचाने में सहायता करें ।
५६- माया - सदैव परिवर्तनशील ।
५७- योग्यता - किसी भी गुण को धारण करने क्षमता ।
५८- तीन शक्तियां - इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति , क्रियाशक्ति
५९- आत्मन् - जिसे आत्मा का ज्ञान हो ।
६०- ब्राह्मण- जिसे ब्रह्म का ज्ञान हो ।
६१- मुक्ति - जो गुणों में बंधा ना हो । मुक्ति वृत्तियों से होती है
६२- प्रेम - जब कोई दूसरा अनुभव में ना आए ।
६३- सहयोगी - मूल स्वभाव में स्थित होने के लिए जो सहायक हो
६४- विरोधी - मूल स्वभाव मैं स्थित होने के लिए जो विध्न डालें
६५- मूर्छा अवस्था - जिसे मूल ज्ञान ना हो , और जिसे मूल ज्ञान के प्रति अरुचि हो ।
६६- कल्पना अवस्था - सुखी भविष्य को लेकर विचारों में खोए रहना ।
६७- जागृत अवस्था - हमेशा दृष्टा भाव अर्थात साक्षी भाव में स्थित रहना ।
६७- मोक्ष - जन्म मृत्यु से मुक्ति । जीव को मोक्ष मिलता है ।
६८- शुभ कर्म - जो मूल अवस्था में पहुंचने के लिए सहायक हो ।
६९- दुष्कर्म - जो मूल आवश्यकताओं को प्राप्त करने में बाधा डाले ।
७०- चमत्कार - जिसका कारण बुद्धि से समझ में ना आए ।
७१- धन, वैभव, मान, प्रतिष्ठा - पूर्व में किए गए पुण्य कर्मों का फल ।
७२- शिक्षा ग्रहण - सदाचरण सहित किसी भी विषय का तकनीकी ज्ञान एवं उनमें दक्षता प्राप्त करने की प्रक्रिया ।
७३- रूढ़िवाद - यह सामाजिक विज्ञान के अंतर्गत एक ऐसी विचारधारा है जो पारंपरिक मान्यताओं का अंध अनुकरण बिना तार्किकता या वैज्ञानिकता के आधार पर करती है ।
७४- मान्यताएं - एक प्रकार की बौद्धिक अशुद्धि जो बिना तर्क और प्रमाण के मान ली गई हो ।
७५- पूर्ण ज्ञान - इसी को हम अनुभूति भी कहते हैं । कई अनुभव मिलकर अनुभूति का निर्माण करते हैं।
७६- अधूरा ज्ञान - बिना किसी व्यक्तिगत प्रयोग के केवल सुना सुनाया या किताबों में पढ़ा स्मृति आधारित।
७७- बन्धन - हम जो चाहते हैं वह नहीं कर पाते हैं अर्थात बंधन में है
७८- स्वतंत्रता - हम जो चाहते हैं वह कर सकते हैं अर्थात मुक्त है ।
७९- शुद्धता- जो तत्व किसीभी किसी भी प्रकार के विजातीय तत्व से मुक्त हो ।
८०- पिता - जो पालन-पोषण और सुरक्षा प्रदान करता है, उसे पिता कहा जाता है।
८१- माता - जिसमें जीव को अपने गर्भ में धारण करने की एवं उसके पालन-पोषण और सुरक्षा क्षमता हो वह माता कहलाती है।
८२- पुत्र - वह नर संतान जो अपने माता-पिता एवं कुल परंपराओं के गुण ,वैभव, संस्कार, संस्कृति को आगे बढ़ाएं एवं पुन्नाम ['पुत्' नाम] नरक से उन का उद्धार करे , वह पुत्र कहलाने योग्य है ।
८३- पुत्री- स्वयं में मातृत्व के नैसर्गिक गुणों को समाये हुए किसी के वंश को बढ़ाने की शारीरिक शक्ति के साथ ,सौंपीं गई जिम्मेदारियों को निभाकर अपने कुल परंपराओं को गौरवान्वित करने वाली लक्ष्मी श्रेष्ठ पुत्री कहलाती है ।
८४- जानकारी- ऐसी कोई भी सूचना जो तथ्यों के आधार पर प्रक्रिया सहित प्रमाणित हो ।
८५- जानकारी के तीन मुख्य घटक हैं:-
1. _डेटा_: डेटा वह तथ्य या आंकड़ा है जो किसी विषय या वस्तु के बारे में जानकारी प्रदान करता है।
2. _तथ्य_: तथ्य वह जानकारी है जो सत्य और विश्वसनीय होती है।
3. _विश्लेषण_: विश्लेषण वह प्रक्रिया है जिसमें डेटा और तथ्यों को विश्लेषित किया जाता है ताकि उनका अर्थ और महत्व समझा जा सके।
८६- नियम - पूर्ण विकसित होने एवं आत्म कल्याण के लिए जो निर्देश दिए गए हैं यह निर्देश नियम कहलाते हैं ।
८७- ऋषि - जो ज्ञान, तपस्या और आध्यात्मिक विकास के उच्चतम शिखर पर पहुंच चुका होता है। वे समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत होते हैं और जीवन के अर्थ को समझने में सहायता करते हैं।
८८- मुनि - जो गहन चिंतन, मनन, तपस्या और आध्यात्मिक साधना में लीन रहता है।
८९- पशु - जो सृष्टि के नियम पूर्वक सिर्फ अपनी आवश्यकता पूर्ति कर रहे हैं ।
९०- देव - जो सृष्टि के नियम पूर्वक अपने भक्तों की इच्छा पूर्ति में करते हैं ।
९१- दानव - जो सृष्टि के नियम तोड़कर सिर्फ अपनी इच्छा पूर्ति कर रहे हैं।
९२- भगवान - जो सृष्टि के नियमों को तोड़कर भी अपने भक्तों की इच्छा पूर्ति कर देते हैं।
९३- छोटा - जिसकी इच्छा है छोटी हों
९४- बड़ा - जिसकी इच्छाएं बड़ी हो
९५- महान - जिसकी इच्छाएं ना होते हुए भी वह समाज कल्याण के लिए लोगों की नियम पूर्वक इच्छापूर्ति में सहायक रहे ।
९६- ब्रह्मज्ञ - उस व्यक्ति कहा गया है जो ब्रह्म को जान लेता है और संसार के द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है। मुंडक उपनिषद (3.1.6)
९७- ब्राह्मण - ब्रह्मा जी के पुत्र ब्राह्मण कहलाए जो एक निराकार के उपासक हैं ।
८- पुरुषार्थ - पूर्ण प्रक्रिया अपनाकर फल प्राप्त करना ।
९९- अहंकार - बिना प्रक्रिया पूर्ण किए फल प्राप्त करना ।
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