👉 ॐ त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं .....
जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताआं के घोतक हैं। उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं
इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं ।
साथ ही वह नीरोग, ऐश्वर्य युक्ता धनवान भी होता है ।
महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है । भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।
👉 त्रि -ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
👉 यम -अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में
स्थित है।
👉 ब -सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण
में स्थित है।
👉 कम -जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण
में स्थित है।
👉 य -वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित
है।
👉 जा -अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में
स्थित है।
👉 म -प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण
बाहु के मध्य में स्थित है।
👉 हे -प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
👉 सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के
अंगुलि के मुल में स्थित है।
👉 ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के
अग्र भाग में स्थित है।
👉 न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें
हाथ के मूल में स्थित है।
👉 पु -अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम
हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
👉 ष्टि- अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के
मणिबन्धा में स्थित है।
👉 व -पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की
अंगुलि के मुल में स्थित है।
👉 र्ध -भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त
अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
👉 नम् -कपाली रुद्र का घोतक है । उरु मूल में स्थित
है।
👉 उ -दिक्पति रुद्र का घोतक है! यक्ष जानु में स्थित
है।
👉 र्वा -स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में
स्थित है।
👉 रु -भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में
स्थित है।
👉 क -धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष
पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
👉 मि -अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु
मूल में स्थित है।
👉 व -मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में
स्थित है।
👉 ब -वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में
स्थित है।
👉 न्धा -अंशु आदित्यद का घोतक है । वाम पादंगुलि
के मुल में स्थित है।
👉 नात् -भगादित्यअ का बोधक है । वाम पैर की
अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
👉 मृ -विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में
स्थित है।
👉 र्त्यो् -दन्दाददित्य् का बोधक है । वाम पार्श्वि भाग में
स्थित है।
👉 मु -पूषादित्यं का बोधक है । पृष्ठै भगा में स्थित है ।
👉 क्षी -पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है । नाभि स्थिल
में स्थित है।
👉 य -त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है । गुहय भाग
में स्थित है।
👉 मां -विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप
दोनों भुजाओं में स्थित है।
👉मृ - प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित
है।
👉 तात्- अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय
प्रदेश में स्थित है। उपर वर्णन किये स्थानों पर
उपरोक्त देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण
शक्तियों सहित विराजत हैं । जो प्राणी श्रध्दा सहित
महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के
अंग-अंग ( जहां के जो देवता या वसु अथवा
आदित्यप हैं ) उनकी रक्षा होती है ।
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