Saturday, June 27, 2026

सत्य विचारों में नहीं, द्वैत से परे है

हम कैसे जानें कि कौन सत्य कह रहा है?

जब हम किसी धार्मिक प्रवचन, किसी सूत्र या किसी आध्यात्मिक गुरु को सुनते हैं, तब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—हम कैसे पहचानें कि जो कहा जा रहा है वह सत्य है या असत्य?

क्योंकि माया के स्तर पर अनेक विचार, सिद्धांत और मत एक-दूसरे के विरोधाभासी दिखाई देते हैं। कोई एक बात कहता है, कोई उसके विपरीत बात कहता है। ऐसे में सामान्य व्यक्ति क्या करता है? वह वही विचार चुन लेता है जो उसके मन को अच्छा लगे, उसकी मान्यताओं से मेल खाए या उसकी इच्छाओं को संतुष्ट करे। फिर वह उसी व्यक्ति को गुरु मानकर उसका अनुसरण करने लगता है।

लेकिन क्या यह तरीका ईश्वर को जानने या आत्मसाक्षात्कार के लिए पर्याप्त है? नहीं।

ईश्वर की प्राप्ति केवल अपनी पसंद के विचारों को चुन लेने से नहीं होती। सत्य को जानने के लिए हमें अपनी पसंद-नापसंद, अपने पूर्वाग्रह, अपनी धारणाओं और द्वैत से ऊपर उठना पड़ता है।

जब तक हम "यह सही है, यह गलत है", "यह मेरा है, यह तुम्हारा है", "यह अच्छा है, यह बुरा है"—इन मानसिक द्वंद्वों में फँसे रहते हैं, तब तक हम माया के क्षेत्र में ही घूमते रहते हैं।

सत्य द्वैत से परे है। ईश्वर विचारों के संघर्ष में नहीं, बल्कि विचारों के पार स्थित है।

इसीलिए संसार में लाखों लोग धर्म का पालन करते हैं, अनेक गुरुजनों को सुनते हैं, अनगिनत ग्रंथ पढ़ते हैं, फिर भी ईश्वर को नहीं जान पाते। क्योंकि उन्होंने शब्दों को तो पकड़ लिया, लेकिन उस चेतना तक नहीं पहुँचे जहाँ सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।

यही सबसे बड़ा रहस्य है— ईश्वर को जानने के लिए केवल विचार बदलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि चेतना का स्तर बदलना आवश्यक है। और जब चेतना द्वैत से ऊपर उठती है, तब सत्य स्वयं प्रकट होने लगता है।


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